लेखक: डॉ हिमांशु शेखर
प्रस्तावना
राम कथा
के अरण्यकाण्ड में अपने वनवास के अंतिम वर्ष में श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मण जी पंचवटी में कुटी बनाकर रह रहे
थे| इसी दौरान शूर्पनखा के अंग भंग प्रकरण और खर-दूषण का सेना सहित वध के बाद, शूर्पनखा
के उकसाने पर रावण सीता जी के अपहरण के लिए उद्यत होता है| मारीच को कपट मृग बना
कर श्रीराम को कुटी से दूर किया जाता है| कुटी और सीताजी से लक्ष्मण जी को अलग
करने के लिए मिथ्या चित्कार का सहारा लिया जाता है| सीताजी लक्ष्मण जी को श्रीराम
की सेवा में जाने के लिए कटु वचनों से दवाब डालती है| सीताजी को अकेले छोड़ने के
पहले सीताजी की सुरक्षा के लिए किए गए प्रयत्न में जमीन पर खिंची गई एक रेखा का
जिक्र आता है, जिसे पार करना रावण के लिए असंभव था| कहा जाता है कि सीताजी का हरण
उस रेखा को पार करने के कारण हुआ| आज इस पोस्ट में इस लक्ष्मण रेखा की प्रामाणिकता
पर एक विचार प्रस्तुत है|
प्रामाणिकता में संशय
परेशानी
इस बात की है कि महर्षि वाल्मिकी की रामायण, तुलसीदास जी की श्रीरामचरितमानस और
वेदव्यास की महाभारत में लक्ष्मण रेखा का जिक्र नही है|
रामायण:
माता सीता के कठोर वचन सुनकर लक्ष्मण व्यथित हुए और वन देवता से उनकी
रक्षा का आह्वान कर धनुष-बाण लेकर ध्वनि की दिशा में चल दिए।
रक्षन्तु त्वामङ्घपुनरागत:। (श्लोक 34)
अर्थात् विशाललोचने! वन के सम्पूर्ण देवता आपकी रक्षा करें, क्या
मैं श्रीरामचंद्र के साथ लौटकर पुन: आपको कुशल देख सकूंगा?’ यह कह कर लक्ष्मण जी चल देते हैं और सीताजी
व्यथित हो जाती हैं। इसके बाद महर्षि वाल्मीकि ने उनकी व्यथा का तो वर्णन किया है।
पर रेखा खींचे जाने का उल्लेख नहीं किया है।
श्रीरामचरितमानस:
मरम बचन जब सीता बोला।
हरि प्रेरित लछिमन मन डोला।
बन दिसि देव सौंपि सब काहू।
चले जहाँ रावन ससि राहू।"
#अरण्यकाड रामचरितमानस (दोहा 27 चौपाई 3)
इस पर जब सीताजी कुछ मर्मभेदी वचन कहने लगीं तब भगवान की प्रेरणा से
लक्ष्मण जी का मन चँचल हो उठा। वे श्रीसीता जी को वन और दिशाओं के देवताओं को
सौंपकर वहाँ चले जहाँ रावण रूपी चंद्रमा के लिए राहुरूपी श्री राम जी थे। यहाँ भी
लक्ष्मण रेखा का विवरण नही है| लेकिन सीताहरण के पश्चात लंकाकाण्ड में मन्दोदरी ने
रावण को समझाते हुए कहा-
कंत समुझि मन तजहु कुमति ही।
सोई न समर तुम्हहि रघुपति ही।।
रामानुज लघु रेख खचाई।
सोउ नहिं नाधेहु असि मनुसाई।।
श्रीरामचरितमानस लंकाकाण्ड ३६-१
हे कांत! मन में सोच विचार कर कुबुद्धि को छोड़ दो। आपको रघुनाथजी से
युद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटा भाई (रामानुज) ने जरा-सी रेखा खींच दी थी। उसे आप
नहीं लाँघ सके, ऐसा तो आपका पुरुषत्व है। इस प्रकार
यहाँ लक्ष्मण-रेखा का वर्णन है, किन्तु
लक्ष्मण रेखा धनुष या बाण से खींची गई स्पष्ट नहीं है। लक्ष्मण रेखा का वर्णन
अरण्यकाण्ड में न होकर लंकाकाण्ड में है। महाभारत की राम कथा में तो इसका जिक्र है ही नही| कुछ प्रसिद्ध प्रामाणिक राम कथाओं में भी इसका जिक्र नही है|
लिखित प्रमाण
हनुमन्नाटक:
स व्याह रद्धर्मिणि देहि
भिक्षामलंघयँलक्ष्मणलक्ष्मलेखाम
जग्राह तां पणितले क्षिपन्तीमाकारयन्ती रघुराज
पुत्री।।
हनुमन्नाटक भाषा टीका समेत अंक ४-६
रावण ने कहा- हे धर्मपरायण। भिक्षा दो। तब ज्योंहि लक्ष्मण जी की धनुष
रेखा को लाँघकर, रावण के हाथ में भीख देने लगी त्यों ही
वह उन्हें हरण कर ले गया और हा आर्यपुत्र! हा लक्ष्मण! पुकारती (सीता) रह गईं। इस
प्रकार यहां लक्ष्मण रेखा लक्ष्मणजी के धनुष द्वारा खींची गई बताई गई है।
आनन्दरामायण:
लक्ष्मण : “तुमने मुझको जो वाणी रूपी बाणों से प्रताड़ित किया है, उसका फल तुम शीघ्र प्राप्त करोगी।“
तथापि श्रुणु म्रद्वाक्यं यन्मयाऽत्रोच्यते
हितम्।
नयैतां घनुषा रेखां कृतां त्वसरितोऽघुनो।।
त्वद्रक्षणार्थं दुष्टानां दुर्विलंघ्यां
महन्तमाम्।
मा त्वमुल्लंघयस्वेमां प्राणै: कंठगतैरपि।।
इत्युक्त्वा धनुष: कोटया कृत्वा रेखां समंतत:।
बाह्यदेशे पंचवहया: सौमित्र: परिघोपमाम्।।
आनन्दरामायण सारकाण्ड सर्ग ७-९८ से १००
इतना होने पर भी मेरे कहे हुए इस हितकारी वचन को सुन लो। मैं धनुष से
तुम्हारे चारों ओर यह रेखा खींच देता हूँ। यदि तुम्हारी रक्षा के लिए और दुष्टों
के दुर्लंघनीय तथा भयंकर भय उत्पन्न करने वाली होगी। तुम्हारे प्राणों के कंठ में
आ जाने पर भी तुम इस रेखा का उल्लंघन मत करना। इतना कहकर धनुष की कोर से लक्ष्मण
ने पंचवटी के बाहर खाई की भाँति सीताजी के चारों ओर रेखा खींच दी। इतना कहकर वह
श्रीरामजी की ओर चल पड़े।
मराठी राम-विजय रामायण (रचयिता पं. श्रीधर
स्वामी):
इन कटु एवं मार्मिक वचनों को सुनकर लक्ष्मण ने सीता जी को कुछ
गलतियाँ बताई| तब लक्ष्मण ने गुफा के द्वार पर धनुष की डोरी से एक रेखा खींच दी और
कहा- यदि तुम इस रेखा के बाहर जाओगी तो परम संकट होगा। श्रीराम की तुम्हें
सौगन्ध है। घोर अरण्य में रोते हुए लक्ष्मण श्रीराम को खोजने निकल पड़े। तत्पश्चात्
रावण लक्ष्मण द्वारा अंकित रेखा के बाहर खड़ा हो गया। उसने कहा अब बिना फलों के
आहार के यहाँ मेरे प्राण निकलना चाहते हैं अत: तुम गुफा के बाहर आकर मेरे मुख में
फल डाल दो। रावण ने कहा दौड़ो मेरे प्राण निकले जा रहे हैं। तब सीताजी फल लेकर रेखा
के निकट पहुँच गई ज्यों ही सीता ने भिक्षा डालने के लिए हाथ लक्ष्मण रेखा के बाहर
बढ़ाया त्यों ही उस राक्षस ने सीताजी को खींचकर झट से उन्हें उठा लिया एवं सच्चा
रूप लंकापति रावण का बताकर हरण कर लिया।
गुजराती गिरधर रामायण:
लक्ष्मण ने सीताजी से कहा कि आप माता हैं तो मैं आपका पुत्र हूँ। मैं
मन में ऐसा ही जानता हूँ। श्रीराम को भगवान् जानकर सेवा करता हूँ। तदनन्तर
उन्होंने उस समय कुटी के पीछे धनुष से रेखा खींच दी तथा वे बोले- हे जानकी, बिना हमारे (लौट) आए यदि आप बाहर निकलें तो
आपको श्रीराम की शपथ है। मैं निश्चयपूर्वक यह कह रहा हूँ कि बिना हमारे लौट आए जो
यह रेखा लाँघकर कुटी में प्रवेश करेगा, वह
प्राणी जलकर भस्म हो जाएगा। तत्पश्चात् रावण ने सीताजी को लक्ष्मण रेखा को पार
करने के लिए विवश किया।
मैथिली रामायण (रचयिता चन्द्रा झा):
हम कहइत छी दुइ कर जोड़ि। सीताकाँ जाइत घी
छोड़ि।।
सोपि देल अछि अपनेकँ हाथ। हम चललहुँ जत छथि
रघुनाथ।।
धनुष-रेख-बाहर जनि जाउ। वञ्चक वचनन कि
घुपपतिआउ।।
चन्द्रा झा कृत मैथिलीरामायण अरण्यकाण्ड अध्याय
७-५५ से ५७
मैं दोनों हाथ जोड़कर कहता हूँ आप सुनिये। मैं सीता को अकेली छोड़कर
जाता हूँ, तत्पश्चात् लक्ष्मणजी ने सीताजी से
कहा- मैं धनुष से लकीर खींच देता हूँ। आप उस लकीर (रेखा) से बाहर मत जाइए तथा ठगों
की बात पर विश्वास मत कीजिएगा। लक्ष्मणजी के जाने के बाद रावण संन्यासी के वेश में
आया तथा सीताजी को विवश कर हरण कर लिया।
आधुनिक व्याख्या
ऐसा
लगता है कि शुरू में लक्ष्मण रेखा राम कथा का हिस्सा नही थी| लेकिन स्मृति और
श्रुति ग्रन्थ होने के कारण हर आश्रम और ज्ञान-केन्द्रों ने अपनी सुविधा अनुसार इस
कथा में अपनी मान्यता के आधार पर कुछ परिवर्तन किए है| बाद के ग्रंथो में इसका
जिक्र ज्यादा दिखता है| एक बहुत प्रामाणिक सी दिखने वाली व्याख्या है – “लक्ष्मण
रेखा का मूल नाम सोमातिती विद्या है| इसे सोमना कृतिका यंत्र से जोड़ा गया है, जिसे
पृथ्वी और वृहस्पति के मध्य में स्थापित किया जाता है| ये जल, वायु और अग्नि को
सोखता है और उल्टा करने पर अग्नि और विद्युत् के परमाणुओ का उत्सर्जन करता है| लक्ष्मण
ने इसकी शिक्षा महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में ली थी| मुनि दधीचि और शांडिल्य इसके
जानकार थे| इसके अंतिम जानकार भगवान श्रीकृष्ण थे, जिन्होंने महाभारत के रणक्षेत्र
के बाहर इसे खींचा था| इससे दिव्यास्त्रो का प्रभाव युद्ध क्षेत्र के बाहर नही
दिखा था|” ये व्याख्या भी बहुत प्रामाणिक प्रतीत नही होती है| इसका सन्दर्भ खोजना भी बहुत मुश्किल है|
कई बार
लक्ष्मण रेखा को नारी की मर्यादा रेखा से जोड़ा जाता है| यह भी एक अंधविश्वास है|
रामकथा में अपनी लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन तो रावण ने किया था, जो ब्राह्मण का रूप लेकर
अपहरण करने आया था| मै नारियो पर इसतरह के किसी भी मर्यादा रेखा को थोपने के खिलाफ
हूँ| नर नारी में इसतरह का विभेद दकियानूसी और पाश्चात्य प्रेमी के दिमाग की उपज
होती है|
आधुनिक
सन्दर्भ में बंजारों और आदिवासियों में चौकी बांधने की प्रक्रिया होती है, जिसका
प्रयोग वे अपने बच्चो या मवेशियों के चारो ओर अभिमंत्रित सुरक्षा रेखा खींच कर
करते है| इसे आजकल अंधविश्वास माना जाता है पर मान्यता तो है| इसी तरह माता की चौकी,
भैरव बाबा की चौकी आदि की चर्चा भी अभी आम है| इससे होने वाले सुरक्षा चक्र
निर्माण को भी लक्ष्मण रेखा के समकक्ष माना जा सकता है| ऐसा भी माना जा सकता है कि
लक्ष्मण रेखा आजकल के ट्रिप वायर वाली बारूदी सुरंग थी, जिसके तार को विस्थापित
करने पर विस्फोट द्वारा विध्वंस को अंजाम दिया जा सकता है|
आज भी हर
किले के बाहर खाई का निर्माण दिखता है| उसमें जल भर कर मगर छोड़ कर किले की सुरक्षा
की जाती थी| ये भी एक प्रकार से लक्ष्मण रेखा के समकक्ष मानी जा सकती है| इसतरह के
दुर्ग का वर्णन लंका से सीताजी का पता लगाकर लौटने के बाद हनुमान जी ने भी किया
था| खाई पार करने के बाद खडी दीवाल पर चढ़ाना भी एक चुनौती होती थी| साथ ही किलो की प्राचीर से जब गरम पानी या मोम
फेंके जाते थे तो किला अभेद्य हो जाता था| ये सब मिलकर लक्ष्मण रेखा का निर्माण
करते है, जिसे पार कर किले तक पहुँचना मुश्किल था|
इसतरह
हर युग में लक्ष्मण रेखा का अस्तित्व है| पर उसका स्वरूप अलग होता गया| हो सकता है
त्रेता में ये कार्य मन्त्र की शक्ति से हो जाता था, जो समर्थ लोगो के लिए संभव
था| जिनमें उतनी आध्यात्मिक शक्ति नही थी या जो ज्यादा भौतिकवादी थे, उन्होंने भौतिक
बाधाओं को लक्ष्मण रेखा की तरह प्रयोग किया| अगर तुलना की जाय तो ट्रिप वायर पर
आधारित बारूदी सुरंगे इसका आधुनिक स्वरूप हो जाती है|
उपसंहार
इसतरह रामकथा में लक्ष्मण रेखा थी या नही इसमें संदेह है| पर अगर कोई रेखा थी भी तो उसे आधुनिक सन्दर्भ में ट्रिप वायर वाले बारूदी सुरंग के समकक्ष माना जा सकता है| साहित्य में व्याख्या के ढंग अलग अलग हो सकते है और समय के साथ साथ कुछ अनावश्यक सन्दर्भ भी जुड़ जाते है, जिसपर विश्वास करने से पूर्व उसकी समीक्षा आवश्यक है| लक्ष्मण रेखा ऐसा ही एक प्रसंग है जो मूल कथा का हिस्सा नही होने के बावजूद बहुत ज्यादा प्रचलित हो गया| अन्याय के खिलाफ उपलब्ध, आज की हर बाधा को लक्ष्मण रेखा माना जा सकता है|
(पिछला शोध: शबरी के जूठे बेरों की प्रामाणिकता)
Link: https://lamhejindagike2024.blogspot.com/2024/02/blog-post.html
धन्यवाद|
डॉ हिमांशु शेखर

बहुत सुंदर जानकारी सर सुंदर लेख 💐
जवाब देंहटाएंधन्यवाद पूजा जी। ये तो आपका ही पटल है। मैं तो बस कुछ जानकारी साझा करता रहता हूँ। आपको अच्छी लगी तो मुझे खुशी हुई। और लिखने के लिए प्रेरणा मिली।
हटाएंबहुत सुंदर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंधन्यवाद।
हटाएंबहुत विस्तृत व्याख्या की है। आधुनिक काल, मध्यकाल और प्रागैतिहासिक संभावनाओं का तुलनात्मक विवेचन ज्ञानवर्धन करता है। अभार और बधाई महत्वपूर्ण आलेख के लिए
जवाब देंहटाएंधन्यवाद। आप सबके सहयोग से ब्लॉग बढ़ रहा है। आप सबकी सकारात्मक टिप्पणियों से हिम्मत बढ़ती है।
हटाएंबहुत अच्छी एवं प्रमाणिक जानकारी
जवाब देंहटाएंधन्यवाद। पाठकों के विचार मेरी धरोहर हैं। मेरी खुशनसीबी है कि आलेख पसंद किया गया। हार्दिक आभार।
हटाएंये एक प्रयोग है|
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार। मेरी सोच का समर्थन करने के लिए धन्यवाद। अभिमंत्रित शक्तियों के बारे में आपके विचार से पूर्णतः सहमत हूँ। मन की शक्ति, वचन की शक्ति और उसके बाद भौतिक शक्तियों का स्थान होता है। कुछ जानकारी एक जगह एकत्र कर साझा की थी। इसे बहुत पसंद किया गया। जय श्रीराम।
जवाब देंहटाएंGood
जवाब देंहटाएंधन्यवाद।
हटाएंबहुत ही सुन्दर लेख हिमांशु जी 👏👏👏👏
जवाब देंहटाएंधन्यवाद।
हटाएंबढ़िया लेख प्रामाणिकता से हरा हुआ।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार।
हटाएंप्रमाणिकता के द्वारा स्पष्ट किया गया महत्वपूर्ण लेख
जवाब देंहटाएंधन्यवाद|
हटाएंबहुत सुंदर लेख प्रमाणित तथ्यों के साथ(सरोजिनी)
जवाब देंहटाएंधन्यवाद सरोजिनी जी। इसी बहाने कुछ पढ़ाई हो गई और आप जैसे सुधि पाठकों का प्यार भी मिला। आभार।
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