गुरुवार, 27 जून 2024

कैसे लिखें, अच्छी कविता..? भाग 02

कविता कैसे लिखें – संवेदना, विषय और विचार 

लेखक: प्राणेंद्र नाथ मिश्र 


कविता लेखन पर एक धारावाहिक ब्लॉग जिसको कई भागो में प्रकाशित किया जाएगा| इसका श्रीगणेश "कविता क्या है?" से भाग 01 में किया गया| अनुक्रमणिका के हरेक अवयव का आगे आने वाले पोस्ट में विस्तार किया जाएगा| आज प्रस्तुत है भाग 02। एक संग्रहनीय पोस्ट श्रृंखला, जो पाठको को कविता से जोड़ पाएगी| आप अपने सुझाव और प्रश्न, टिप्पणी के माध्यम से व्यक्त कर सकते है| लेखक उस पर अपने विचार जरूर देंगे| 

ब्लॉग नियंत्रक: डॉ हिमांशु शेखर 

अनुक्रमणिका :
कविता क्या है
2 कविता के घटक
 - संवेदना, शब्द, भाषा, बिम्ब, प्रतीक, अलंकार, रस 
3 कविता का स्वरूप
    
बाह्य स्वरूप
       
aa छंद – मात्रा (meter), यति , गति, क्रम एवं तुकांत
    
b आंतरिक स्वरूप
       
bb भाव, प्रयोजन, कल्पना शक्ति और उद्देश्य

काव्य का अंतर्वस्तु उसके बाह्य और आनतारिक स्वरूप से बनता है।

4 अंतःकरण की शक्ति –
        रस,
        अलंकार ,
        शब्द शक्ति ,
        अभिव्यंजना  
5 शब्दों की ध्वन्यात्मकता – भाषा
छंद का ,महत्व

7  कविता के प्रकार- छंदमुक्त और छंदयुक्त ,,, तुकांत अतुकांत

8  छंद के अंग :

छन्द के निम्नलिखित अंग है-
(1)चरण /पद /पाद
(2) वर्ण और मात्रा  (मात्रा कलन  – ॐ नीरव )
(3) संख्या क्रम और गण
(4)लघु और गुरु
(5) गति
(6) यति /विराम
(7) तुक

9 छंदमुक्त कविता के गुण
10 ग़ज़ल एवं आजाद नज़्म
11 लुप्त मात्राएं एवं काव्य दोष

 

कविता लिखने से पहले रचनाकार को कुछ विचार आने चाहियें जैसे कि आप किस विषय पर कविता लिखना चाह रहे हैं, किस विधा मे लिखना चाह रहे हैं। जैसे दोहा, छंद, मुक्त छंद, चौपाई अकविता आदि। गद्यात्मक कविता, हरिगीतिका गीतिका या अन्य कोई छंद या ग़ज़ल आदि। 

जब एक विचार या विषय हमारे मस्तिष्क मे आ जाता है, तब हम उस पर सोचते हैं कि क्या लिखने से वह दृश्य शब्दों के माध्यम से दिखने लगेगा, किस तरह के शब्दों का प्रयोग करना चाहिए, ताकि प्रभावी लगे और शब्दों को किस क्रम मे रखें कि छंद, ताल और लय तथा गति बन सके। फिर हम लिखना आरंभ करके शब्दों को जोड़ते हैं, सोचते हैं, शब्द खोजते हैं, उन्हें “मैच” कराते हैं, शब्दों में भाव लाते हैं और अंत मे तुक लगा कर छंद बनाने की कोशिश करते हैं।  

अतः कविता लिखने के लिए कुछ मुख्य घटक आवश्यक हैं:

- 1. संवेदना, 2. शब्द, 3. भाषा, 4. बिम्ब, 5. प्रतीक, 6. अलंकार, 7. रस  

आइए, देखते हैं थोड़ा संवेदना के बारे मे और कुछ उदाहरणों से समझते हैं कि संवेदना या भाव किस तरह कविता की प्रेरणा होते हैं। 

1 संवेदना: 

साहित्य की मूल प्रेरणा संवेदना है। जब कोई मर्माहत व्यक्ति अपने मन की वेदना को शब्दों द्वारा किसी को नहीं बता देता, उसके मन को शांति नहीं मिलती। संवेदना का यही तत्व गायन और संगीत में भी देखा जाता है, जहां सुनने वाले भाव विभोर हो जाते हैं। 

कविता के मूल में संवेदना है, राग तत्व है। यही संवेदना कवि के हृदय को सृष्टि से जोड़ती है और वह ब्रह्मांड के किसी भी घटन या अघटन को कल्पित कर के अपने मन की संवेदना उसमे भरता है तथा उसे शब्दों के द्वारा दूसरे के मन तक पहुंवचाता है।

लेकिन, संवेदना क्या है.. किसी भी वस्तु, भाव और स्थति के हृदय पर पड़े प्रभाव को संवेदना कहते हैं। जब किसी कवि की वेदना इतनी घनीभूत हो जाती है कि उसमे मैं और दूसरे के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है तब वह यह समझने लगता है कि जैसे सब कुछ उसी पर घटित हो रहा है। ऐसी दशा मे वह शब्दों के द्वारा काव्य मे उसे चित्रित करता है जिसे सुनकर या पढ़कर कोई भी संवेदन शील व्यक्ति का हृदय उस रस मे मिल जाए तब कहा जाता है कि काव्य या रचना बहुत प्रभावी है। 

   मान लीजिए आप सड़क पर जा रहे हैं, चिलचिलाती धूप मे सड़क के किनारे एक अपाहिज, कमजोर और बूढ़ा भिखारी असहाय अवस्था मे आप की तरफ हाथ बढ़ाता है। उसकी स्थिति, उसके चेहरे के भाव को देख कर आप का मन पसीज जाता है और आप उसे कुछ रुपये निकाल कर दे देते हैं। यहाँ .. देखिए कि भिखारी को देखने से पहले आप के मन मे करुणा की कोई भवना नहीं थी, आप मस्ती मे अपनी धुन मे चले जा रहे थे, लेकिन भिखारी की दशा देखा कर आप के अंदर की संवेदना जग उठी और आप करुणा से भर गए। 

अब अगर यही दृश्य कविता मे लिख कर आप उस स्थति को शब्दों से बना सकें, तो आप की कविता संवेदनशील होगी और आप की रचना भावपूर्ण मानी जाएगी॥ निराला जी की कविता “भिक्षुक” मे ऐसा ही एक दृश्य शब्दों मे देखिए:

वह आता--

दो टूक कलेजे को करता, पछताता

पथ पर आता।

पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,

चल रहा लकुटिया टेक,

मुट्ठी भर दाने को — भूख मिटाने को

मुँह फटी पुरानी झोली को फैलाता —

दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए,

बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते,

और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाए।

भूख से सूख ओठ जब जाते

दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?

घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।

चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,

और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए !     (निराला)

एक भिखारी और उसके आस पास का दृश्य इन शब्दों से समपूर्ण चित्रित हो जाता है और ऐसा 

लगता है जैसे हम देख रहे हों, महसूस कर रहे हों..  

ये संवेदनाएं रस के नाम से पहचानी जाती हैं। हमारा मन करुणा, रौद्र, क्रोध, वीर, शोक, प्रेम, वियोग आदि भावनाओं से भरा रहता है। इन्हीं भावनाओं मे शब्द को ढालने से कविता का भाव दूसरे को मन को छूता है। 

संवेदना, भाव, रस, कविता के शब्दों मे दृश्य बनाते हैं और पाठक या श्रोता के पास भेजते हैं। रचनाकार अपने भावों, संवेदनाओं को शब्दों के माध्यम से शब्द चित्र बनाता है और पाठक के मन मस्तिष्क मे वह भाव उत्पन्न कर के, उस दृश्य को चित्रित करके उसके भावों को छू लेता है। 

जिस दिन अर्घ्य दिया तुमने  

आँसू से अपने, रो कर के

मैं पीठ मोड कर सुबक पड़ा 

तुमको जीवन मे खो कर के 

वह पीड़ा मेरी अंतिम थी ..  

वह कविता मेरी, अंतिम थी..                 (प्राणेन्द्र नाथ मिश्र)

यहाँ वियोग की धार कविता के इस छंद मे प्रतीत हो रही है। वियोग, बिछोह, करुणा शब्दों से प्रतीत हो रहे हैं। शब्दों की महत्ता, शब्दों का क्रम, भाव को उचित रूप से प्रेषित करता है। 

कविता की रचना करने से पहले वे विचार, जिनको लेकर कविता का स्वरूप देना है, पहले आना चाहिए और फिर शब्दों को चुनना चाहिए। आप देखेंगे कि कुछ शब्द करूण, कुछ हास्य, कुछ शोक, कुछ वीर, कुछ क्रोध, कुछ शांत आदि भावों की संवेदना प्रकट करते हैं। अतः विचार और भाव लाने के लिए अपना अगला कदम शब्दों पर जाना चाहिए।

संवेदनाएं, हमारे मन की अनुभूतियों को जागृत करती हैं। मनुष्य में क्रोध, घृणा, हास्य, करुणा, प्रेम, वियोग, वात्सल्य, भक्ति, वीरता, वैराग्य आदि अनुभूतियाँ समय समय पर परिस्थिति के अनुसार जागृत होती हैं। इन अनुभूतियों को जब रचनाकार अपनी रचना या काव्य के ज़रिए पाठकों या श्रोताओं मे जागृत कर देता है तब रचना उच्च कोटि की मानी जाती है।  

देखिए.. दो पंक्तियों में सुभद्रा कुमारी चौहान ने कितना सुंदर वीर रस का शब्द चित्र रखा है 

बुंदेले मुँहबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।

वहीं पर जीवन संघर्ष को राजस्थानी कवियत्री रजनी मोरवाल ने कितना मार्मिक दृश्य चित्रित किया है.. 

दिन दहाड़े भूख से नीलाम होती शर्म है 

भूख ही तो आदमी का धर्म है 

भूख बचपन, भूख यौवन, भूख जीवन की हवा  

भूख मे सिमटा बुढ़ापा, भूख मरघट की दवा     

                                                (रजनी मोरवाल)

सामाजिक विसंगतियाँ और भ्रूण हत्या के ऊपर कोख के अंदर पल रही बच्ची का मार्मिक कथन देखिए..

मेरी सूरत देखि न जानी, 

मेरी कीमत कुछ न जानी

बहुज्ञा- अभिशाप समझ के, 

कोख से फेंक देने की ठानी।     

भारतेन्दु जी ने भारत दुर्दशा पर टीस देते हुए कहा है.. 

रोवहउँ सब मिलि आवहउँ भारत भाई/ भारत दुर्दशा अब देखि न जाई । 

शोषित वर्ग के ऊपर चार पंक्तियाँ दिनकर जी की संवेदना देखिए:

श्वानों को मिलता दूध वस्त्र

भूखे बालक अकुलाते है

माँ की हड्डी से चिपक – ठिठुर, 

जाड़े की रात बिताते हैं।  

इसी तरह हास्य का दृश्य और शब्दों का प्रयोग देखिए 

आधुनिका पत्नी मिली, पट्टी के पड़ी नकेल 

वाक शास्त्र मे पास थी, पाक शास्त्र में फेल 

पाक शास्त्र मे फेल, रसोई कर दी चालू 

स्वेटर बुनने लगी, जल गए सारे आलू। 

पुस्तक खोली, पति से बोली – जल्दी आओ    

जले हुए आलुओं पर बरनॉल लगाओ।              (काका हाथरसी)

इस तरह सबसे पहले आप को कविता के विषय मे विचार करके, उसमे प्रयोग होने शब्दों को चुनना है और ऐसे शब्द हों जो आप के विचार के अनुसार आप के मन के भावों को कविता मे प्रस्तुत कर सकें। 

अगले पोस्ट मे हम शब्दों के प्रयोग के बारे मे देखेंगे कि किस तरह शब्द कविता के आचार, व्यवहार और विचार को बदल देते हैं! किस तरह शब्द अर्थ को अनर्थ कर सकते हैं और अनर्थ को सार्थक कर सकते हैं।  

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प्राणेंद्र नाथ मिश्र 


गुरुवार, 20 जून 2024

यात्रा वृत्तांत चकराता

लेखिका: डॉ पूजा भारद्वाज

हेलो दोस्तों कहां हैं सभी, आओ चलो चलते है एक ओर यात्रा पर, पहाड़ों पर ,बादलों के पास हरियाली के पास यानी उत्तराखंड में एक और सुंदर जगह चकराता ,हम और हमारे एक दोस्त और उनकी फैमिली भी साथ गई थी क्यूंकि बाहर जाओ तो दोस्तों और फैमिली के साथ रास्ते का मज़ा दुगना हो जाता है ,तो सोमवार की सुबह 6 बजे निकल गए हम चकराता के लिए दिल्ली से आप गूगल बाबा की सहायता से सीधे पहुंच सकते हैं,हमारी गाड़ी भी सरपट रोड पर दौड़ रही थी, और चल रहे थे मेरे पसंदीदा गाने , सोनू निगम,इस कदर प्यार ...किशोर कुमार  के गाने जिससे बच्चे बोर हो रहे थे और वो सुन रहे थे अपने गाने इयरबर्ड लगा कर,अब समय हो चुका था 9:30 पेट भी कुछ बोल रहा था ,

मगर हम ने सीधे अपने रिसॉर्ट का मैप डाला था ,तो सीधे हम सहारनपुर होते हुए विकास नगर के रास्ते में आ गए , आप सोचोगे तो क्या हुआ हुआ ये हमने सोचा देहरादून नाश्ता करेंगे मगर देहरादून  पड़ा ही नहीं , और रास्ते में चीतल,हल्दीराम,बीकानेर छोड़ सीधे चले जा रहे थे अब क्या होता अब रिसॉर्ट तो भूल गए ,अब टारगेट था एक अच्छा सा होटल या ढाबा  खाने के लिए जो मिला विकास नगर से 2 किलोमीटर पहले डिवाइन होटल ,यदि आप के साथ भी ऐसा हो तो आप भी यहां खाना खा सकते है अच्छा होटल है , आलू पराठें , छाछ अच्छी थी अब हमारा पेट फुल था अब हम चल पड़े अपने रिसोर्ट की तरफ जहां हम पहुंचे दोपहर 2 बजे समय से ही पहुंच गए हमारे रिसोर्ट का नाम था साइड्स गैलेक्सी रिसॉर्ट , एक पहाड़ी की चोटी पर बना हुआ, बहुत सुंदर प्रकृति के बिल्कुल नजदीक , नजारे बहुत सुंदर मानो धरा ओर गगन मिल रहे हो ,यदि आप वीडिओ देखना चाहते हो तो मेरी इंस्टा पर रील देखना ,फिर शाम को प्रॉपर्टी घूमे, लोगों से मिले खाना खाया और सो गए ।

सुबह उठे पूरी एनर्जी के साथ नाश्ता किया ,तैयार हुए  अब हम रेडी थे टाइगर फाल्स जाने के लिए नेटवर्क issue बहुत है तो गाने तो चले नहीं मगर बाहर के नज़ारे बहुत अच्छे थे तो डेढ़ घंटे की रोड ड्राइव कर के हम पहुंचे टाइगर फाल्स की जगह वहां से थोड़ी सी ट्रेकिंग कर के टाइगर फाल्स तक जा सकते थे तो हमने की ट्रेकिंग और पहुंच गए चकराता की पहली डेस्टिनेशन पर नजारे सुंदर थे ,काफी लोग नहा रहे थे ,चेंजिंग रूम भी थे बहुत ऊंची पहाड़ी से गिरता टाइगर फाल्स ,मगर crowd था मैं तो नहीं नहाने गई बहुत ठंडा पानी था पैर जरूर डाले और 2 मिनट के लिए मेरे पैर सुन हो गए क्यूंकि पानी बहुत ठंडा था , बच्चे तो बच्चे होते हुए उन्होंने खूब एंजॉय किया पहाड़ों पर जाओ और मैग्गी न खाओ ऐसे कैसे हो सकता है हमने वहीं मैग्गी खाई चाय पी पर चाय अच्छी नहीं थी फिर निकल गए हम कुछ खाने के लिए चकराता माल रोड  पर फेमस चांदना mom's पर आधा घंटे की ड्राइव कर के पहुंच गए मगर माल रोड अच्छा बिल्कुल नहीं था मगर अच्छे थे चांदना शॉप के मोमोज जो हम खाने गए थे तो जाना सफल हुआ और यम्मी सी कोल्ड कॉफी तो यदि आप को मोमोस पसंद है तो आप यहां आ सकते है नहीं तो समय बरबाद न करे और आगे चले तो हम पहुंच गए अपने रिसोर्ट और शाम के समय पहुंचे sunset प्वाइंट पर समय था तो हमने वहां खूब मस्ती की रोड खाली था तो रील बनाई ,फोटो के बिना तो सब अधूरा है फिर रूम पर चले गए अगले दिन हम सब को कई जगह जाना था ,ये बुधवार की सुबह हमेशा की तरह जल्दी उठी और चाय तो 8 बजे मिलेगी , तो मैंने अपनी इंस्टेंट चाय बनाई जिसकी रेसिपी मेरे चैनल पर है ,चाय पी और रिसेप्शन पर गई ट्रैवल पेंपलेट लिया और आज की यात्रा का प्लान बनाया ,  budher caves जहां पांडव अपने वनवास के दौरान छुप कर रहे थे, कंसार वन ,देवबन एक ऐसा वन क्षेत्र जहां देवदार के विशाल वृक्ष थे , रामताल उद्यान।  नाश्ता किया और निकल गए, कम से कम दो से ढाई घंटे का सफर था नज़ारे बहुत सुंदर जो आप मेरी फोटो ग्राफी में देखेंगे और वीडिओ मेरी इंस्टा id पर वाह प्रकृति की सुंदरता देखते ही बनती थी,धरती और गगन एक दूसरे से मिलने आतुर थे और तेज हवाएं कानों में एक संगीत सा सुना रही थी और बारिश सरगम की ताल छेड़ रही थी इतना सुंदर दृश्य , मैं बारिश में निकली और मेरे कदम भी झूमे बिना नहीं रह सके ,छम छम...........



नजरों के बीच हम पहुंच गए budher  caves पर हमारा दुर्भाग्य कनासर  पहुंचते ही जिस जगह से हम तीन किलोमीटर की ट्रेकिंग करनी थी  budher caves  पहुंचने के लिए तभी बहुत तेज़ बारिश और ओले गिरने लगे , रास्ता छोटे छोटे चिकने पत्थरों वाला था पानी से दुर्गम ही गया था , बस हमारा caves का सफर बारिश ने रोक दिया , हम ने  वहीं देव वन में फोटो क्लिक किए और  प्रकृति बारिश के मज़े लेते हुए  चकराता चौक  पहुंच गए ,इस ठंडे मौसम में  गरमा गर्म चाय और पहाड़ों की तीखी सी मेगी , वाह क्या बात थी और ओले तो इतने बड़े बड़े गिरे कि मानो छोटी टेबल टेनिस की बाल, थोड़ी देर रुके फिर हम पहुंच गए अगले स्पॉट  चिरमिरी टॉप वहां जा कर ऐसा लगा कि लद्दाख में आ गए ,colorfull झंडे काले काले  बादल मौसम 12  से 10 डिग्री होगा बहुत ठंड गर्म कपड़े  हम ऊपर ले नहीं गए थे  नजारे कैसे थे आप मेरी फोटो में देखना क्यूंकि कुछ  बातों का वर्णन नहीं किया जा सकता ..




अब हम रिसोर्ट आ गए .. थकान बहुत थी डिनर किया और सो गए अगले दिन घर निकलना था ,सुबह के सूरज के साथ उठी और मेरी मस्ती चालू मैंने पति देव से कहा चलो ट्रेकिंग कर के आते हैं जवाब सब जानते हैं , और वो ट्रेकिंग हमारे रिसोर्ट से ही निकल रही थी मगर मना कर दिया मैं कहा मानने वाली थी बच्चों को उठाया और ट्रेकिंग के लिए चली गई ।

वहां से  हिमालय की चोटियां दिख रही थी, ऊंची चोटी पर थे हम फिर नीचे आ गए .. तैयार हुए नाश्ता किया और घर के लिए निकल लिए....आ अब लोट चले .......ये थी चकराता थी आखरी रील 

कैसा लगा मेरा यात्रा वृत्तांत कमेंट जरूर करे


डॉ पूजा भारद्वाज

मंगलवार, 18 जून 2024

निर्जला एकादशी

 लेखिका: डॉ पूर्णिमा शर्मा कात्यायनी

मंगलवार 18 जून 2024 को समस्त हिन्दू धर्मावलम्बी निर्जला एकादशी के व्रत का पालन करेंगे | बारह हिन्दी मासों में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की कुल मिलाकर चौबीस एकादशी आती हैं | अधिक मास होने पर इनकी संख्या छब्बीस भी हो जाती है | हिन्दू सम्प्रदाय में एकादशी व्रत का बहुत महत्त्व माना गया है | इनमें ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है | इस उपवास में जल भी ग्रहण न करने का संकल्प लिया जाता है इसीलिए इसे निर्जला एकादशी कहते हैं | पद्मपुराण में प्रसंग आता है कि महर्षि वेदव्यास ने जब पाँचों पाण्डवों को चतुर्विध पुरुषार्थ – धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष – का फल देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया तो भीम ने कहा “पितामह, आप पक्ष में एक बार भोजन त्यागने की बात कहते हैं, किन्तु मैं तो एक दिन क्या, एक समय भी भोजन किये बिना नहीं रह सकता | मेरे उदर में स्थित “वृकाग्नि” को शान्त रखने के लिए मुझे दिन में कई बार भोजन करना पड़ता है | तो मैं भला ये व्रत कैसे कर पाऊँगा ? और यदि यह व्रत नहीं करूँगा तो इसके पुण्य से वंचित रह जाऊँगा |”

पितामह महाबुद्धे कथयामि तवाग्रतः, एकभक्ते न शक्नोमि उपवासे कुतः प्रभो

वृको हि नाम यो वह्नि: स सदा जठरे मम, अतिबेलं यदाSश्नामि तदा समुपशाम्यति

नैकं शक्नोम्यहं कर्तुमुपवासं महामुने || – पद्मपुराण उत्तरखण्ड 52 / 16 - 18

तब मुनि वेदव्यास ने भीम का मनोबल बढाते हुए उन्हें समझाया कि “हे कुन्तीपुत्र ! धर्म की यही विशेषता होती है कि वह केवल सबका धारण ही नहीं करता अपितु व्रत-उपवास के नियमों को सबके द्वारा सरलता से पालन करने योग्य भी बनाता है | तुम केवल एक ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में जब सूर्य वृषभ अथवा मिथुन राशिगत हो उस समय की एकादशी का व्रत पालन करो और वह भी निर्जल | केवल इसी व्रत के पालन से तुम्हें समस्त एकादशी के व्रत का फल प्राप्त हो जाएगा |”

वृषस्थे मिथुनस्थे वा यदा चैकादाशी भवेत्, ज्येष्ठमासे प्रयत्नेन सोपोष्योदकवर्जिता  – पद्मपुराण 52 / 20


तो, रविवार 16 जून को पूर्वाह्न 12:37 पर भगवान भास्कर मिथुन राशि में प्रविष्ट हो चुके हैं | आज सूर्योदय से पूर्व 4:42 पर एकादशी तिथि आरम्भ हो चुकी है जो कल प्रातः 6:23 तक रहेगी | कल सूर्योदय 5:16 पर है, अतः उदया तिथि के आधार पर निर्जला एकादशी व्रत कल रखा जाएगा |


पद्मपुराण में वर्णित उपरोक्त वृत्तान्त के ही कारण से इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है | इसी अध्याय में आगे कहा गया है –

ज्येष्ठे मासि तु वै भीम ! या शुक्लैकादशी शुभा

निर्जला समुपोष्यात्र जल्कुम्भान्सशर्कारान् |

प्रदाय विप्रमुखेभ्यो मोदते विष्णुसन्निधौ

ततः कुम्भा: प्रदातव्या ब्राह्मणानां च भक्तित: || – पद्मपुराण 52 / 61,62

अर्थात निर्जला एकादशी के दिन जल और शर्करा से युक्त घट का दान करने से भगवान् विष्णु का सान्निध्य प्राप्त होता है | इस तथा इसी प्रकार के अन्य पौराणिक उपाख्यानों के कारण हिन्दू समाज में मान्यता आज तक भी विद्यमान है कि यदि हम “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करते हुए निर्जला एकादशी के व्रत का पालन करेंगे और गऊ, वस्त्र, छत्र, फल, मीठा शरबत तथा कलश आदि का दान करेंगे तो हमें भगवान् विष्णु का सान्निध्य प्राप्त होगा | हर गली मोहल्ले के चोराहे पर, घरों के दरवाजों पर, सोसायटीज़ के गेट्स पर इस दिन लोग तरह तरह के शर्बतों से भरे बर्तन रख कर या तरबूज़ आदि लेकर बैठे मिल जाएँगे और हर राहगीर की प्यास बुझाते मिल जाएँगे |


ज्येष्ठ मास की तपती दोपहर में शीतलता प्रदान करने वाली वस्तुएँ दान करना वास्तव में एक स्वस्थ प्रथा है | लेकिन क्या इसका पालन केवल एक ही दिन होना चाहिए – वह भी इस भावना से कि ऐसा करके हमें पुण्य प्राप्त होगा ? क्या ही अच्छा हो यदि ये समस्त कार्य हम धर्म के भय या मोक्ष अथवा ईश्वरप्राप्ति के लालच से न करके मानवता के नाते करें… क्योंकि हर जीव ईश्वर का ही तो प्रतिरूप है… जब भी ऐसा हो जाएगा तो “निर्जला एकादशी” केवल एक दिन का पर्व भर बनकर नहीं रह जाएगी… हर दिन हर दीन हीन को गर्मी से राहत दिलाने के लिए शीतल पेय दान के रूप में उपलब्ध हो सकेगा…


प्राचीन काल में तो ज्येष्ठ मास की तपती दोपहरी में भी अधिकाँश लोग पैदल अथवा खुली बैलगाड़ियों, ऊँट आदि के माध्यम से यात्रा किया करते थे | थक जाने पर मार्ग में खड़े घने वृक्षों की छाया में कुछ पल विश्राम कर लिया करते थे | साथ में मिट्टी के घड़ों में जल लेकर चलते थे | वह भी गर्मी में समाप्त हो जाता था | ऐसे में जहाँ रुके वहाँ आस पास कहीं जलाशय हुआ तो वहाँ पुनः घड़ों में जल भर लिए और हाथ मुँह धोकर साथ लाए फल आदि ग्रहण कर लिए और फिर आगे अपने गन्तव्य की ओर बढ़ चले | उन राहगीरों की सहायता के लिए मार्ग में स्थित ग्रामवासी भी दौड़े चले आते थे जल से पूर्ण पात्र और फलादि लेकर ताकि उन राहगीरों की भूख प्यास बुझा सकें | और ऐसा मात्र एकादशी के दिन ही नहीं होता था, दिन प्रतिदिन का यही नियम था |


निर्जला एकादशी के दिन निर्जल व्रत रखने के पीछे एक यह भी कारण हो सकता है कि इस दिन गर्मी अपने चरम पर होती है जिसके कारण जल का महत्त्व और भी बढ़ जाता है | सम्भवतः इसीलिए जन साधारण को जल का महत्त्व समझाने के लिए तथा उसके प्रति जन मानस में सम्मान का भाव बनाए रखने के लिए हमारे मनीषियों ने यह विधान बनाया कि इस दिन जो व्यक्ति स्वयं निर्जल रहकर दूसरों को जल का दान करेगा वह पुण्य का भागी होगा | क्योंकि धर्म के साथ जिस भाव को जोड़ दिया जाता है जन साधारण पूर्ण निष्ठा के साथ उसका पालन करता है | आज इस तथ्य से सभी परिचित हैं कि नदियों का जलस्तर धीरे धीरे घट रहा है | इसके बाद भी हम लोग जल का अपव्यय करते हैं | आवश्यक कार्यों के लिए तथा पीने के लिए जल का प्रयोग आवश्यक है | किन्तु हम लोग अपनी असावधानियों के चलते नलकों को खुला छोड़कर न जाने कितना पानी व्यर्थ बहा देते हैं | यदि हम निर्जला एकादशी के दिन जल को संरक्षित करने का संकल्प ले लें, और वर्षा के जल को भी संग्रहण करने का प्रयास करने लग जाएँ तो यह भी निर्जला एकादशी के व्रत की ही भाँति पुण्य प्रदान करने वाला कार्य होगा, क्योंकि ऐसा करके भविष्य में होने वाले जल के अभाव से बहुत सीमा तक मुक्ति प्राप्त की जा सकती है…

सभी स्वस्थ रहें यही ईश्वर से प्रार्थना है…

-----कात्यायनी

सोमवार, 17 जून 2024

उपमा कालिदासस्य

 लेखिका: सरोजिनी चौधरी


उपमा कालिदासस्य

निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु

प्रीतिर्मधुर-सान्द्रासु मंजरीष्विव जायते ।

      अर्थात कवि कालिदास की सुमधुर सूक्तियों में आम्रमंजरी के समान किसको आनन्द नहीं प्राप्त होगा?अपितु सभी को प्राप्त होता है।संस्कृत कविता कालिदास को पाकर अपने को  सौभाग्यशाली समझती है, कृतकृत्य मानती है।कविता की सुकुमारता,भावों की सागर सदृश गहराई और हिमालय तुल्य ऊँचाई पर चढ़ना और उतरना हो,शारदीय-ज्योत्स्यना तथा बासंती वैभव का सम्मिश्रण देखना हो, ग्रीष्म के धर्म बिंदुओं एवं शिशिर के तुहिन-कणों की विशिष्टता का एक साथ आकलन करना हो तो महाकवि कालिदास की कृतियों का अवलोकन हमें अवश्य करना चाहिए।

    संस्कृत साहित्य में अनेक ऐसी प्रशस्तियाँ उपलब्ध होती हैं जिसमें किसी कवि की किसी एक विशेषता की ओर मुख्य रूप से संकेत किया गया है। महाकवि कालिदास उपमा के सम्राट हैं।यद्यपि आपने सभी अलंकारों का प्रयोग दक्षता से किया है किन्तु उपमा पर आपका चामत्कारिक अधिकार है।संस्कृत जगत ही नहीं अपितु विश्व का भी ऐसा कोई कवि नहीं है जो कवि की उपमा कला की तुलना कर सके।

     रघुवंश हो या मेघदूत,कुमार संभव हो या ऋतुसंहार सर्वत्र उपमाओं की रसात्मिकता दृष्टिगोचर होती है।उनकी उपमा योजना सरलता ,रम्यता, विविधता,मार्मिकता,यथार्थता एवं वैज्ञानिकता की दृष्टि से बेजोड़ है।आपने बड़ी सरलता से भावों को पाठक के हृदय में उतारने का प्रयास किया है।

   रघुवंश का तो प्रारंभ ही उपमा अलंकार से हुआ है।प्रथम सर्ग के प्रथम श्लोक में ही कवि ने उपमा के प्रयोग में अपनी अद्भुत काव्य-कला का परिचय दिया है—

   वागर्थाविव संपक्तो वागर्थाप्रतिपत्रये

     जगतपितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।

   अर्थात शब्द और अर्थ के यथार्थ ज्ञान के लिए मैं शब्द और अर्थ की तरह मिले हुए संसार के माता-पिता पार्वती और शिव की वंदना करता हूँ।

     इस प्रकार रघुवंश में इन्दुमती स्वयंवर के वर्णन के समय का निम्न श्लोक कितना सुंदर है-

संचारिणी दीपशिखेव रात्रि, यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा।

नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः।।

अर्थात् इन्दुमती स्वयंवर में आए हुए राजाओं का परिचय प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ती जाती है। इन्दुमती जिस-जिस राजा को छोड़कर आगे बढ़ जाती है,उस राजा की आशाओं पर तुषारापात हो जाता है और उसका मुख मलीन हो जाता है। जिस प्रकार रात्रि में चलती हुई दीपक की शिखा जिस प्रासाद को छोड़कर आगे बढ़ जाती है,वहीं महल अंधकार से मलीन हो जाता है।इस श्लोक में दीपशिखा के साथ इन्दुमती की उपमा अद्वितीय है ।इस श्लोक पर मुग्ध होकर विद्वानों ने कालिदास को दीपशिखा की उपाधि से विभूषित किया।

    संपूर्ण उपमा का एक और सुंदर दर्शन देखिए— सायंकाल दिलीप गाय लेकर लौट रहे हैं। लाल रंग की गाय आगे-आगे है और शुभ्र वसनधारी दिलीप पीछे-पीछे हैं।हरित वस्त्रधारिणी सुदक्षिणा अगवानी के लिए आगे बढ़ रही है।उपमा की यह कल्पना कितनी स्वाभाविक और यथार्थ है।रक्त वर्ण स्त्रीलिंग नन्दिनी संध्या है,तेजस्वी पुल्लिंग राजा दिलीप दिन हैं तथा स्त्रीलिंग सुदक्षिणा रात्रि के समान है—

पुरस्कृता वर्त्मनि पार्थिव्न प्रत्युदगता पार्थिवधर्मपल्या।

तदन्तरे सा विरराज धेनुर्दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्या।॥

    प्रकृति तत्व को अत्यधिक सूक्ष्मता से निहारने के कारण ही उनके काव्यों में पाठक को अद्वितीय सौंदर्य,नवीन चेतना और अपरिमेय सुखानुभूति सुलभ होती है।उन्होंने उपमा के माध्यम से मनुष्य और प्रकृति के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित करने का प्रयास किया है। मेघदूत में मेघ को दूत बनाने तथा वियुक्ता प्रिया को संदेश भेजने में महाकवि की दक्षता तथा अनुपमता स्पष्ट परिलक्षित होती है।

    अभिज्ञानशाकुन्तलम् में शकुन्तला को पुष्पित लता के समान बतला कर कवि ने उसके सौंदर्य में अनुपम मादकता भर दी।दुष्यंत की दृष्टि में शकुन्तला लता से तनिक भी कम नहीं है—

अधरः किसलयरागः कोमलविटपानुकारिणौ बाहू।

कुसुमामिव लोभनीय यौवन-भगडेषु सन्नध्दम्॥

   कवि कालिदास के प्रकृति वर्णन में प्रेमी-प्रेमिका और पति-पत्नी के दाम्पत्य जीवन के दर्शन होते हैं ।प्रकृति का कोई ऐसा पक्ष नहीं हैं जहाँ कवि की दृष्टि न गई हो।

    इस प्रकार हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि कवि की लेखनी ने किशोरावस्था की प्रथम प्रणय लीला का पूर्वाभ्यास हो या प्रौढ़ावस्था की ऊषा बेला में रस-क्रीड़ा का अभ्यास हो,सर्वत्र अपनी काव्य-प्रतिभा का अनूठा परिचय दिया है । बाह्य सरोवर से निकलने वाले सरयू की उपमा सांख्य-शास्त्र की अव्यक्त मूल प्रकृति से दी गई है ।अपनी अनुपम कल्पना-शक्ति से कवि ने अपनी कृतियों में उपमा की अद्भुत छटा बिखेरी है ।किसी प्रशंसक कवि ने महाकवि कालिदास की उपमा के विषय में सत्य ही कहा है—

 उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम्

  नैषधे पदलालित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणाः॥

     धन्यवाद|

लेखिका: सरोजिनी चौधरी

गुरुवार, 13 जून 2024

कैसे लिखें, अच्छी कविता..? भाग 01

लेखक: प्राणेंद्र नाथ मिश्र 

कविता लेखन पर एक धारावाहिक ब्लॉग जिसको कई भागो में प्रकाशित किया जाएगा| इसका श्रीगणेश "कविता क्या है?" से भाग 01 में किया जा रहा है| अनुक्रमणिका के हरेक अवयव का आगे आने वाले पोस्ट में विस्तार किया जाएगा| एक संग्रहनीय पोस्ट श्रृंखला, जो पाठको को कविता से जोड़ पाएगी| आप अपने सुझाव और प्रश्न, टिप्पणी के माध्यम से व्यक्त कर सकते है| लेखक उस पर अपने विचार जरूर देंगे| 

ब्लॉग नियंत्रक: डॉ हिमांशु शेखर 

अनुक्रमणिका :
1 कविता क्या है
2 कविता के घटक
- संवेदना, शब्द, भाषा, बिम्ब, प्रतीक, अलंकार, रस 
3 कविता का स्वरूप
   
a बाह्य स्वरूप
      
aa छंद – मात्रा (meter), यति , गति, क्रम एवं तुकांत
   
b आंतरिक स्वरूप
      
bb भाव, प्रयोजन, कल्पना शक्ति और उद्देश्य

काव्य का अंतर्वस्तु उसके बाह्य और आनतारिक स्वरूप से बनता है।

4 अंतःकरण की शक्ति –
        रस,
        अलंकार ,
        शब्द शक्ति ,
        अभिव्यंजना  
5 शब्दों की ध्वन्यात्मकता – भाषा
6 छंद का ,महत्व

7  कविता के प्रकार- छंदमुक्त और छंदयुक्त ,,, तुकांत अतुकांत

8  छंद के अंग :

छन्द के निम्नलिखित अंग है-
(1)चरण /पद /पाद
(2) वर्ण और मात्रा  (मात्रा कलन  – ॐ नीरव )
(3) संख्या क्रम और गण
(4)लघु और गुरु
(5) गति
(6) यति /विराम
(7) तुक

9 छंदमुक्त कविता के गुण
10 ग़ज़ल एवं आजाद नज़्म
11 लुप्त मात्राएं एवं काव्य दोष

 

 कविता क्या है:

हम अक्सर यह सोचते हैं कि कविता क्या है,,,, कविता कैसे लिखें,,,, अच्छी कविता क्या होती है... आदि आदि। लेकिन अगर हम ध्यान दें तो पाएंगे कि हम में से सभी प्रायः प्रायः कवि हैं। जब जन्म लेते हैं, रोना शुरू करते हैं। इस रोने में एक लय होती है। शिशु जब भूख लगने पर रोता है, एक लय होती है, एक भावना होती है और उस भावना को सुनकर, समझ कर माँ उसके लिए दूध ले आती है। बच्चों की खिलखिलाहट मे एक आनंद होता है एक ताल एक लय होती है और एक आकर्षण होता है। हम उनके मन की बात समझ जाते हैं कि वह क्यों हंस रहे हैं, खिलखिला रहे हैं या बच्चों को क्यों क्रोध आ रहा है।

बच्चों की मनोवृत्ति हम समझ लेते हैं यद्यपि वे शब्द नहीं बोलते, सिर्फ ध्वनि और ध्वनि की शैली बदलते हैं। बच्चों के भाव हम समझ जाते हैं क्योंकि वे उसी भाव को चित्रित करते हैं जो उनके मन मे होता है।

अब ..... प्रश्न उठता है कि आखिर कविता क्या है... क्या कोई जटिल प्रक्रिया है...?दूसरे की कविता हमारे मन को कैसे झिझोड़ देती है... कैसे हमे आह्लादित करती है... इसमे ऐसा क्या होता है जो हमारे, मन को छू लेती है... तो उत्तर यही होगा कि कविता मे संवेदना है, राग तत्व है,,,, यह संवेदना अपने लिए ही नहीं पूरे सृष्टि के लिए होती है.... कवि को पूरी सृष्टि  अपनी लगने लगती है... रास्ते पड़ा हुआ भिखारी भी अपना लगने लगता है और तब कवि का हृदय उस भिखारी मे डूब जाता है तथा कह उठता है... वह आता..  दो टूक कलेजे के करता....  रत्नाकर डाकू ने जब सरोवर के किनारे क्रौंच जोड़े मे से एक को व्याध से आहत देखा था तब क्रौंची की आह से उनका मन पीड़ा से भर गया था... उनके भाव उस निरीह पक्षी के लिए भर उठे और वह कह उठे... मा निषाद....

कैसे बनती है कविता/कविता कैसे लिखें:

मंद मंद हवा जब चलती है, पत्ते हिलते हैं, देखने मे अच्छा लगता है, तितली के पंखों की गति देखना अच्छा लगता है, नदी मे उठती तरंग देखना अच्छा लगता है, सागर की आती जाती हुई लहरें देखना अच्छा लगता है.... आप सोचिए की इन सभी दृश्यों मे एक खासियत है और वह यह की हर एक की गति मे आवर्तन है वही गति बार बार कई बार एक अंतराल के बाद होती है। यह आवर्तन हमे अच्छा लगता है आनंदित करता है। जब हम टहलते हैं , चलते हैं हमारे हाथ पैर के साथ एक संतुलित गति मे झूलते हुये चलते हैं.... असंतुलन मे हम नहीं चल पाते या दिक्कत होती है... हमारा हृदय एक आवर्तित गति से धड़कता है। हर वह गति जो कुछ अंतराल मे पुनः होती है आकर्षित करती है, चाहे वह सूर्य का निकलना हो या चाँदनी का पूर्णिमा मे विस्तारित होना। ग्रहों का एक गति से चलना हो या धरती का एक गति से घूमना।

गति आनंदित करती है संतुलन आनंदित करता है ...ब्रह्मांड की हर वस्तु गतिशील है इसीलिए आनंद देती है।  यही बात अगर शब्दों मे कर दी जाय तो शब्द भी आनंदित करते हैं चाहे वह बच्चों की बिना मतलब की कवितायें हों या रामचरितमानस की चौपाई या रहीम के दोहे।  अब देखिये न... अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ.... क्या मतलब हुआ॥ लेकिन शब्दों मे क्रम है, संतुलन है और गति है, तुकांत है इसलिए बच्चों का सबसे प्रिय गीत भी या पहली कविता भी.... 

दुनिया भर के सारे बच्चों की पहली सीख नर्सरी गानों से शुरू होती है। बच्चे हर गाने के साथ सिर हिलाते हैं पैर झुलाते हैं गाते हैं और आनंदित होते हैं। यह उनका भावनात्मक जुड़ाव या emotional attachment होता है। कविता उनकी संवेदनाओं को छूती है और वे कविता मे झूमने लगते हैं.... बच्चे हों या बड़े, जब कभी कोई रचना उनके मन को छू लेती है, वे आनंदित हो उठते हैं यही मन को छूने वाली, संवेदनाओं को छेड़ने वाली कला जो शब्दों मे लिखी जाती है या गयी जाती, कविता कहलाती है। कविता मन को झकझोर देती है, क्योंकि उसमे संवेदना है, राग तत्व है, और इसी संवेदना द्वारा सृष्टि के प्रत्येक अवयव को सोच लेने का बोध है। 

 आज का व्यक्ति संवेदनहीन होता जा रहा है। दिन भर की आपाधापी और तेजी से बढ़ते हुए भौतिक वातावरण मे, आज की ज़िदगी में कविता की जरूरत है। पहले से कहीं ज़्यादा है। लेकिन ज़िंदगी से कविता सुकून की तरह ग़ायब हो गई है। लोग कविताओं की तलाश कर रहे हैं। कविता लिखने का फार्मूला खोज रहे हैं। इसे कविताओं के प्रति आत्म समर्पण या प्रेम का प्रदर्शन भी कह सकते हैं। लोग अपनी संवेदनाओं को वापस पाना चाहते हैं। शायद इसीलिए कविता लिखने की होड लग गई है, कविताओं की हाट लगी है। हर कोई अपने को व्यक्त करना चाहता है। मानव बने रहना चाहता है, भावनाओं से जुड़े रहना चाहता है।

कविता किसी फॉर्मूले से नहीं लिखी जाती। लिखने का काम श्रमसाध्य है। मेहनत माँगता है। धैर्य माँगता है। छोटी-छोटी बातों को भावनाओं की नज़र से देखने की दरकार होती है। टूटी-फूटी भाषा में भी मन की बात रखने की जरूरत होती है। ज़िंदगी में यथार्थ के बंधनों की कल्पना की ऊंची उड़ान से पार करने की जरूरत होती है। लेकिन इसके लिए कुछ करना नहीं होतालोग तो कहते हैं कि दर्द जब हद से गुजर जाता हैदवा बन जाता है। और जब मन की पीड़ा बेइंतहा हो जाती है, कविता बन कर उभरने लगती है।

जीवन में जब सवालों का तूफ़ान उठने लगता है। मोहब्बत की भावनाएं उफान मारने लगती है। अंदर कुछ कहने की लालसा होती है तो शब्दों द्वारा भाव को पूरा करने के लिए कविता का उतारने लगती है। कविताएं चुपचाप चली आती हैं। भाषा और व्याकरण की दीवारों को तोड़ते हुए। कविताएं जीवन को अपनी मौजूदगी से तरंगित कर जाती हैं। जीवन के समंदर में कविताओं के गिरने से उठने वाली लहरें जीवन को संवेदनाओं के बड़े सूक्ष्म स्तर पर प्रभावित करती है। कविताएं जीवन का दर्पण बन जाती हैं, और रचनाकार अपने मन को उसमे देखने लगता है। कविताएं लिखने की शुरूआत भले ही तुकंबदी के फार्मूले से होती हो, लेकिन धीरे-धीरे छोटी-छोटी बातों को लयात्मक अंदाज़ में गुनने-बुनने और साझा करने से भी कविताओं के बनने का सिलसिला शुरू होता है।

    अब आइये हम अपने भाव देखें। हमारे मन मे जब कोई भाव उत्पन्न होता है और हम बोलते हैं तो वह दूसरा व्यक्ति समझ जाता है। इसका मतलब, हम अपनी भावना उस तक पहुंचा पाये। अब अगर हम अपने भावों को लिख कर किसी व्यक्ति को पढ़ने के लिए दें और वह उसी तरह समझे जो हम सोच रहे हैं तब भी हम अपने लेखन मे सफल हो जाते हैं।

यह लेखन गद्य या पद्य मे हो सकता है। अब इस लेखन के लिए आप को सबसे पहले शब्द की आवश्यकता होगी, फिर वह चित्र, शब्दों के माध्यम से बनाना पड़ेगा जिससे दूसरा व्यक्ति समझ जाये।आचार्य राम चन्द्र शुक्ल कहते हैं कि मानव संसार के झंझटों से हट कर समाज, संसार और ब्रह्मांड के भाव की  अनुभूति कर के उसमे डूब जाता है तब वह अनुभूति मात्र रह जाता है , उसका मुक्तहृदय हो जाता है। आत्मा जब मुक्त दशा मे होती है, ज्ञान दशा मे चली जाती है उसी तरह हृदय जब मुक्त अवस्था मे होता है, रस अवस्था मे चला जाता है। हृदय की इसी मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती है, उसे कविता कहते हैं। 

कविता हमारे मन मे बसी होती है, भावनाओं के रूप मे। जब हम अपनी भावनाओं से किसी के मन को छू लेते हैं, हम उसे प्रभावित करते हैं। इन्हीं भावनाओं को शब्दों मे पिरो कर दूसरों के पास पहुंचाना ही कविता है और यह आनंदमयी तब और हो जाती है जब यह छंदात्मक होती है।


अतः कविता लिखने के लिए कुछ मुख्य घटक आवश्यक हैं:

- 1. संवेदना, 2. शब्द, 3. भाषा, 4. बिम्ब, 5. प्रतीक, 6. अलंकार, 7. रस 
लेकिन ये घटक कविता का आंतरिक रूप ही देते हैं बाह्य रूप नहीं।  बाह्य रूप के लिए कविता का आकार, छंद, मात्रा, यति, गति, लय, प्रयोजन और शब्द क्रम की आवश्यकता पड़ती है।
आइए, अगले भाग मे हम इनके बारे मे जानें।

धन्यवाद |

लेखक: प्राणेंद्र नाथ मिश्र 

मंगलवार, 11 जून 2024

आतंकवाद

लेखिका: सरोजिनी चौधरी 

आये दिन समाचारपत्रों में तथा न्यूज़ चैनलों पर 

आतंकवाद की खबर देखकर मन आक्रोश से भर जाता है। आख़िर कब तक बेगुनाह जनता इन मुट्ठी भर आतंकवादियों के आतंक का शिकार होती रहेगी।बल और अधिकार की प्राप्ति का यह अर्थ बिल्कुल नहीं होता कि उस बल का प्रयोग निर्बल को संतानें के लिए किया जाए। अचानक मुझे कवि नीरज की ये पंक्तियाँ याद आ गईँ—

अब तो मज़हब भी कोई ऐसा चलाया जाए

जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए

आग बहती है जहाँ गंगा में झेलम में भी

कोई बतलाए कहाँ जा के नहाया जाए।

   आतंकवाद से त्रस्त जनता के लिए कोई स्थान सुरक्षित नहीं है।कभी दिल्ली,कभी मुंबई,कभी श्रीनगर,आए दिन धमाकों की आवाज़ से लोग धुएँ और राख की चादर से लिपट जाते हैं। पटरी पर चलते जीवन के पहिए पटरी से उतर जाते हैं।जब तक लोग हादसे को भुला सामान्य होते हैं तब तक एक नया हादसा हो जाता है।

  हमारे देश में कुछ ऐसे तंत्र हैं जो मौक़े का फ़ायदा उठाने ,एक दूसरे को भला-बुरा कहने,दंगा-फ़साद फैलाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करते।वे तो ऐसे अवसर की प्रतीक्षा में आँखें बिछाये रहते हैं।

   आतंकवाद से केवल हमारा देश ही त्रस्त नहीँ है बल्कि पूरी विश्व ही त्रस्त है।

 अमेरिका,ब्रिटेन आदि देश इसके दंश का अनुभव कर चुके हैं। भारत ने बार-बार दुनिया को ध्यान दिलाया है कि इन आतंकवादी शक्तियों को पड़ोसी देशों में आश्रय मिल रहा है प्रशिक्षक प्रेरणा के रूप में ।प्रमाणों से सिद्ध जिन आरोपों को भारत लंबे समय से अमेरिका के समक्ष रख रही है,उस ओर अमेरिका का रुझान क्यों नहीं है?


उभरते हुए खतरे

कई आतंकवादी संगठनों में एक-दूसरे के साथ सहयोग करने तथा आवश्यक रूप से वैचारिक बंधनों की भागीदारी किये बिना शस्त्रों की आपूर्ति, संभार तंत्र और यहाँ तक कि प्रचालनात्मक समर्थन के रूप में संपर्क निर्मित करने का सामर्थ्य है। ऐसे नेटवर्क अपने विनाशात्मक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिये संगठित आपराधिक संगठनों से भी समर्थन प्राप्त करने में सक्षम हैं।

21वीं सदी में आतंकवाद ने नवीन और अधिक घातक आयाम प्राप्त कर लिया है। उन सामग्रियों और प्रौद्योगिकी जिनमें पूर्व की तुलना में बहुत अधिक विनाशक क्षमता है, तक पहुँच ने भी आतंकवाद द्वारा उत्पन्न खतरे की प्रकृति को बढ़ा दिया है।

एक बहुसांस्कृतिक विश्व में प्रवासियों की बड़ी आबादी और आवागमन के विविध मार्गों वाली सीमाओं का अर्थ है कि प्राय: इंटरनेट का प्रयोग करते हुए आतंकवादी विचारधारा के प्रचार के माध्यम से उत्पन्न स्लीपर सेल लोकतांत्रिक देशों के राष्ट्रीय ढाँचे को खतरा पहुँचाते हुए पाँचवा कॉलम बन सकते है।

किसी देश में शत्रु देश के समर्थकों या उनसे गुप्त सहानुभूति रखने वाले लोगों का ऐसा समूह जो जासूसी या विध्वंसात्मक गतिविधियों में शामिल हो, उन्हें पाँचवा कॉलम (Fifth column) कहते है। 

राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार धनराशियों के तीव्रतर आवागमन के साथ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं, बैंकिंग और वित्तीय प्रणालियों का एकीकरण भी विश्व भर में आतंकवादी गतिविधियों का वित्तीयन सरल बनाता है।


भारत में आतंकवाद के नियंत्रण हेतु उठाए गए कदम

भारत विश्व में आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित देशों में से एक है। ‘इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस’ की मानें तो वर्ष 2018 भारत आतंकवाद से 7 वाँ सर्वाधिक प्रभावित देश था। आजादी के बाद से ही भारत में अनेक आतंकवादी घटनाएं घटित होती रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2001 से 2018 के मध्य भारत में आतंकी हमलों के कारण 8000 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। ऐसे में, भारत सरकार ने इसे नियंत्रित करने के लिए विभिन्न कदम उठाए हैं, जो निम्नानुसार हैं-

सभी प्रकार की आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए भारतीय संसद ने वर्ष 1967 में ‘गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम’ (UAPA) पारित किया था तथा इसे और प्रभावी बनाने के लिए वर्ष 2004 में इसमें संशोधन भी किया गया था।

भारतीय संसद में वर्ष 1987 में आतंकवादी गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए ‘आतंकवादी और विघटनकारी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम’ (TADA) पारित किया था।

वर्ष 2002 में भारतीय संसद में ‘आतंकवाद निवारण अधिनियम’ (POTA) भी पारित किया था इसका उद्देश्य भी आतंकवादी गतिविधियों से निपटना था।

भारत के मुंबई में हुए कुख्यात 26/11 आतंकवादी हमले के बाद भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय जांच एजेंसी’ (NIA) का गठन किया था।

इसके अलावा, भारत सरकार ने विभिन्न खुफिया एजेंसियों का गठन किया है, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद से निपटने के लिए कार्य करती हैं। इनमें ‘रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ (RAW), ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो’ (IB) आदि संस्थाएं प्रमुख हैं।

भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय खुफिया ग्रिड’ (NATGRID) का निर्माण भी किया है। इसका उद्देश्य विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के डेटाबेस को आपस में जोड़ना है, ताकि ये सुरक्षा एजेंसियां बेहतर सामंजस्य के साथ कार्य कर सकें।

भारत सरकार ने आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए ‘राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड’ (NSG) नामक एक अर्ध सैनिक बल का गठन भी किया है।

इसके अलावा, भारत ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ (FATF) नामक अंतर्राष्ट्रीय संगठन का भी सदस्य है, जो मुख्य रूप से धन शोधन व आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने का कार्य करती है।


उपसंहार 

मेरी राय में तो इस समस्या का समाधान सबको मिलकर ही करना होगा।इस क्षेत्र में काफ़ी कुछ किया गया है और अभी और बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।अपने ही लोग जब घातक कार्यों में लग जाते हैं तो यह चिंता का विषय हो जाता है।आवश्यकता है उनकी सोच को निर्मल करने की,जब तक अंतर से आवाज़ नहीं उठेगी कि ग़लत काम नहीं करना तब तक इसे रोकना संभव न होगा ।कुछ नियम,कुछ सतर्कता,लोगों का जागरुक होना,यह सब आवश्यक है।श्री विजय खेड़ा ने ठीक ही कहा है-“यदि हम समस्या के समाधान का हिस्सा नहीं हैं तो स्वयं एक समस्या हैं।”

धन्यवाद|

लेखिका का जीवन परिचय

इलाहाबाद में पली-बढ़ी सरोजिनी जी की शिक्षा वर्तमान प्रयाग राज (इलाहाबाद) में संपन्न हुई।विवाहोपरांत जबलपुर में रहना हुआ। तेईस वर्ष तक अध्यापन कार्य करने के उपरांत सेवानिवृत्त हो गईं।लेखन कार्य में रुचि पहले से ही थी।समय मिलने पर कविताएँ लिखती थीं,उनकी कई कविताएँ समाचार-पत्रों में छपती थी।करोना काल में ऑन लाइन पटल मिला और तब से लेखन कार्य को गति मिली।

अब विभिन्न पटलों से जुड़ी हुई ऑन लाइन और ऑफ लाइन कवि सम्मेलनों में भाग लेती हैं।आपकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं-पहली “काव्य-नीर” और दूसरी “शब्द पंख बन उर से निकले”।कई साझा संकलन भी प्रकाशित हुए हैं जैसे किलकारी,ऊर्जिता,सबके राम,माँ मान बेटी सम्मान,बापू आदि।

      लम्हे ज़िंदगी के द्वारा साहित्य भूषण,साहित्य सुगंध ,साहित्य विभूषण एवं साहित्य संयोग तथा अन्य मंचों के द्वारा सम्मानित निरंतर साहित्य साधना में लगी हुई हैं।

सोमवार, 10 जून 2024

जेठ की तपती दोपहरी और वृक्षारोपण

लेखिका: डॉ पूर्णिमा शर्मा 'कात्यायनी'

जेठ की तपती दुपहरी में हमारी उम्र के बहुत से लोगों को याद आता होगा अपने गाँव के घर का चबूतरा और उसके बीचों बीच सर ऊँचा किये खड़ा नीम का पेड़ | किसी के घर में खड़े जामुन-आम-अमरूद के पेड़ मुस्कुराते रहते होंगे | तो किसी के घर के बाहर बरगद और पीपल के वृक्ष आग उगलती दोपहरी से राहत दिलाने शीतल हवा घर के भीतर पहुँचाते होंगे | और तुलसी गुलाब तो हर घर के आँगन में सुगन्धित हवा लुटाते ही रहते होंगे | पर आज वो ये सब केवल कल का सपना भर बनकर रह गया है | आज हम पण्डितों तथा ज्योतिषियों द्वारा निर्दिष्ट तुलसी विवाह, वट-पीपल के वृक्ष की पूजा जैसे धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन तो करते हैं, किन्तु इस सबके मूल में निहित महान और उदात्त भावना पर विचार नहीं करते |

मनुष्य अपने जीवन यापन के लिए प्रकृति पर निर्भर है यह सत्य है | 

किन्तु सभ्यता की अन्धी दौड़, शहरीकरण के दबाव, बढती जनसँख्या और आधुनिकीकरण की उत्कट लालसा ने सबसे अधिक प्रहार प्रकृति पर ही किया है | फिर चाहे वह नदियों का दोहन हो अथवा जंगलों की कटाई | आज जिस तरह तेज़ी से जंगल काट काट कर रातों रात पहाड़ों को नंगा करते हुए हम कंक्रीट के जंगल खड़े करते जा रहे हैं उसके सामने क्या हम अपने लिए विनाश का द्वार नहीं खोल रहे ? हम वृक्षों पर कुल्हाड़ी चलाते हुए एक पल को भी नहीं सोचते कि इसी तरह चलता रहा तो एक दिन हम बस घरों के भीतर एयरकंडीशनर की नकली हवा और सूर्य के प्रकाश का भ्रम देते दूधिया बल्वों की चमक पर ही आश्रित होकर रह जाएँगे जिसके फलस्वरूप अनेक रोगों का शिकार होकर अपने विनाश को ही आमन्त्रित करेंगे |

मनुष्य को अनादि काल से ही अपने दिन प्रतिदिन के कार्यों में लकड़ी की आवश्यकता रही है | लोग उस समय सादा व शान्त जीवन जीने के आदी थे | जनसँख्या सीमित होने के कारण लोगों के निवास की समस्या भी उस समय नहीं थी | इस प्रकार किसी भी रूप में पर्यावरण प्रदूषण से भी लोग परिचित नहीं थे | फिर भी उस समय का जनसमाज वृक्षारोपण के प्रति तथा उनके पालन के प्रति इतना जागरूक और सचेत था कि वृक्षों के साथ उसने भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित कर लिये थे | यही कारण था कि भीष्म ने मुनि पुलस्त्य से प्रश्न किया था कि “पादपानां विधिं ब्रह्मन्यथावद्विस्तराद्वद | विधिना येन कर्तव्यं पादपारोपणम् बुधै ||” अर्थात हे ब्रह्मन् ! मुझे वह विधि बताइये जिससे विधिवत वृक्षारोपण किया जा सके | – पद्मपुराण 28/1

भीष्म के इस प्रश्न के उत्तर में पुलस्त्य ने वृक्षारोपण तथा उनकी देखभाल की समस्त विधि बताई थी | उसके अनुसार जिस प्रकार हिन्दू मान्यता के अन्तर्गत व्यक्ति के विविध संस्कार किये जाते हैं जन्म से पूर्व से लेकर अन्तिम यात्रा तक उसी प्रकार वृक्ष के भी किये जाते थे | बीज बोने के समय गर्भाधान संस्कार की ही भाँति धार्मिक अनुष्ठान किये जाते थे | जैसे जैसे बीज अँकुरित होता जाता था, उस पर पत्तियाँ फूल फल आदि आते जाते थे – हर अवसर पर कोई न कोई धार्मिक अनुष्ठान किया जाता था | किसी वृक्ष की पत्तियाँ कब तोडनी हैं, किस प्रकार तोडनी हैं इस सबका पूरा एक विधान होता था | उस समय तो औषधि के निमित्त भी वृक्षों की ओर ही देखा जाता था – तो उस सबके लिए भी पूरा विधान था कि किस वृक्ष का कौन सा अंग किस रोग में काम आता है और किस प्रकार उसे तोडना चाहिए तथा तोड़ने से पूर्व किस प्रकार धार्मिक अनुष्ठान आदि के द्वारा वृक्ष से आज्ञा लेनी चाहिए | साथ ही यह भी आवश्यक था कि एक व्यक्ति जितने वृक्ष काटेगा उसके दुगुने वृक्ष लगाएगा भी और उनकी देखभाल भी करेगा |

सम्भवतः विधि विधान पूर्वक वृक्षारोपण तथा नियमित वृक्षार्चन आज की व्यस्त जीवन शैली को देखते हुए हास्यास्पद प्रतीत हो – किन्तु सामयिक अवश्य है | वृक्षों का विधिपूर्वक आरोपण करना, सन्तान के समान उन्हें संस्कारित करना तथा देवताओं के समान प्रतिदिन उनकी अर्चना का विधान कोरे अन्धविश्वास के कारण ही नहीं बनाया गया था – अपितु उसका उद्देश्य था जनसाधारण के हृदयों में वृक्षों के प्रति स्नेह व श्रद्धा की भावना जागृत करना | ये समस्त तुलसी विवाह, वट-पीपल आदि के वृक्ष की पूजा आदि भी इसी प्रक्रिया के ही अंग थे | स्वाभाविक है कि जिन वृक्षों को आरोपित करते समय सन्तान के समान माँगलिक संस्कार किये गए हों, देवताओं के समान जिन वृक्षों की नियमपूर्वक श्रद्धाभाव से उपासना की जाती हो उन्हें अपने किसी भी स्वार्थ के लिये मनुष्य आघात कैसे पहुँचा सकता है ? वेदी व मण्डल बनाने का उद्देश्य भी सम्भवतः यही था कि लोग आसानी से वृक्षों तक पहुँच न सकें | उस समय वनों की सुरक्षा तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता किसी दण्ड अथवा जुर्माने के भय से नहीं थी – अपितु वृक्षों के प्रति स्वाभाविक वात्सल्य ए़वं श्रद्धा के कारण थी |

दैनिक जीवन में लकड़ी की आवश्यकता से कभी भी इनकार नहीं किया जा सकता और इसके लिए वृक्षों की कटाई भी आवश्याक है | किन्तु, उपरोक्त समस्त पौराणिक तथ्यों में से कुछ भी यदि हम स्वीकार कर लें तो वृक्षों की कटाई के बाद भी वृक्षों का अभाव और उस अभाव से होने वाले दुष्परिणामों से हम स्वयं को, अपनी आने वाली कई पीढ़ियों को और प्रकृति को बचा सकते हैं…

धन्यवाद।

---कात्यायनी

सोमवार, 6 मई 2024

शिक्षा का महत्व

 स्कूली छात्रों और बच्चों के लिए शिक्षा पर लेख...

लेखक: डॉ.अवधेश तिवारी "भावुक"

शिक्षा एक महत्वपूर्ण उपकरण है जो हर किसी के जीवन में बहुत उपयोगी है। शिक्षा ही हमें पृथ्वी पर मौजूद अन्य प्राणियों से अलग करती है। यह मनुष्य को पृथ्वी पर सबसे बुद्धिमान प्राणी बनाता है। यह मनुष्यों को सशक्त बनाता है और उन्हें जीवन की चुनौतियों का कुशलतापूर्वक सामना करने के लिए तैयार करता है। जैसा कि कहा गया है, हमारे देश में शिक्षा अभी भी एक विलासिता बनी हुई है न कि एक आवश्यकता। शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए पूरे देश में शैक्षिक जागरूकता फैलाने की जरूरत है। लेकिन, शिक्षा के महत्व का विश्लेषण किए बिना यह अधूरा है। केवल जब लोगों को एहसास होता है कि इसका क्या महत्व है, तो वे इसे अच्छे जीवन के लिए एक आवश्यकता मान सकते हैं। शिक्षा पर इस लेख में, हम शिक्षा के महत्व को देखेंगे और यह कैसे सफलता का द्वार है।

गरीबी और बेरोजगारी को दूर करने में शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है । इसके अलावा, यह वाणिज्यिक परिदृश्य को बढ़ाता है और देश को समग्र रूप से लाभान्वित करता है। इसलिए, किसी देश में शिक्षा का स्तर जितना ऊँचा होगा, विकास की संभावनाएँ उतनी ही बेहतर होंगी।

इसके अतिरिक्त यह शिक्षा व्यक्ति को विभिन्न प्रकार से लाभ भी पहुँचाती है। यह व्यक्ति को अपने ज्ञान के उपयोग से बेहतर और सूचित निर्णय लेने में मदद करता है। इससे व्यक्ति की जीवन में सफलता दर बढ़ती है।

इसके बाद, शिक्षा एक बेहतर जीवनशैली प्रदान करने के लिए भी जिम्मेदार है। यह आपको करियर के अवसर प्रदान करता है जो आपके जीवन की गुणवत्ता को बढ़ा सकता है।

उसी प्रकार शिक्षा भी व्यक्ति को स्वतंत्र बनाने में सहायक होती है। जब कोई व्यक्ति पर्याप्त रूप से शिक्षित होगा, तो उसे अपनी आजीविका के लिए किसी और पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। वे अपने लिए कमाने और अच्छा जीवन जीने के लिए आत्मनिर्भर होंगे।

सबसे बढ़कर, शिक्षा व्यक्ति के आत्मविश्वास को भी बढ़ाती है और उन्हें जीवन में चीजों के बारे में निश्चित बनाती है। जब हम देशों के नजरिए से बात करते हैं, तब भी शिक्षा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पढ़े-लिखे लोग देश के बेहतर उम्मीदवार को वोट देते हैं। यह किसी राष्ट्र के विकास और प्रगति को सुनिश्चित करता है।

यह कहना कि शिक्षा ही आपकी सफलता का द्वार है, अतिशयोक्ति होगी। यह उस कुंजी के रूप में कार्य करता है जो कई दरवाजों को खोलेगी जो सफलता की ओर ले जाएंगी। बदले में, इससे आपको अपने लिए बेहतर जीवन बनाने में मदद मिलेगी।

एक शिक्षित व्यक्ति के पास दरवाजे के दूसरी तरफ नौकरी के ढेर सारे अवसर इंतजार कर रहे होते हैं। वे विभिन्न विकल्पों में से चुन सकते हैं और ऐसा कुछ करने के लिए बाध्य नहीं हैं जो उन्हें नापसंद हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा हमारी धारणा पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। यह हमें सही रास्ता चुनने और चीजों को केवल एक के बजाय विभिन्न दृष्टिकोण से देखने में मदद करता है।

धन्यवाद।

डॉ.अवधेश तिवारी "भावुक"

गुरुवार, 2 मई 2024

श्रवण कुमार की तथ्यात्मक कथा

 

लेखक: डॉ हिमांशु शेखर

 

रामकथा की भूमिका में श्रवण कुमार की कथा का बहुत बड़ा योगदान है, पर इसकी कथा, नाम, और घटनाक्रम पर अलग अलग अवधारणाएं दिखाती है| प्रचलित अवधारणा के अनुसार श्रवण कुमार नाम के एक माता पिता के भक्त का जिक्र उद्धृत किया जाता है, जिसने अंधे माता पिता को कंधे पर लादकर तीर्थ यात्रा करवाई थी| इस दौरान दशरथ के बाणों से गलती से उसका वध हो गया था| इस मूल कथा में कई घटनाएँ कथा-वाचको द्वारा प्रसिद्धि के लिए जोड़ दी गई है| श्रवण कुमार के माता पिता जन्मांध नही थे, बल्कि ब्रह्मा के शाप के कारण पुत्र को देखते ही अंधे हो गए थे| एक कथा में श्रवण कुमार के माता पिता जन्मांध थे और तपस्या द्वारा उन्होने श्रवण कुमार को पुत्र रत्न के रूप में प्राप्त किया था| एक अन्य कथा में श्रवण कुमार की पत्नी द्वारा सास ससुर की उचित देखभाल नही होने के कारण श्रवण कुमार ने अपने माता पिता के साथ घर छोड़ दिया था| एक और अवधारणा के अनुसार आँख का अंधा नाम नयनसुख की तर्ज पर कम सुनाने वाले बालक का नाम श्रवण कुमार रख दिया गया था| इस कथा के सन्दर्भ और उसकी पौराणिक प्रामाणिकता पर एक नजर डालने की आवश्यकता है|

 

वाल्मीकि रामायण:

अयोध्या काण्ड का सर्ग 63 और 64 मुनि कुमार के वध की कथा और उसके माता पिता से दशरथ को मिलने वाले शाप का वर्णन करता है| राम, लक्षमण और सीता को वन में छोड़कर वापस लौटे सुमंत्र से मिलने के बाद दशरथ ने ये कथा कौसल्या को सुनाई है| सर्ग 63 का शीर्षक है – “राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनि कुमार के मारे जाने का प्रसंग सुनाना|” जब दशरथ राजकुमार थे तो अपने शब्दबेधी बाण की प्रशंसा सुनकर एक बार वो वर्षा ऋतु की ऊषा काल में सरयू तट पर शिकार करने के लिए गए| उन्हें पानी का घडा भरने का शब्द सुनाई पडा, जिसे उन्हें हाथी द्वारा सूंढ़ से पानी पीने का भ्रम हो गया| प्रत्यक्ष नही दिखने के कारण शब्द का अनुसरण करते हुए छोड़ा गया तीर एक पुरुष के आर्तनाद के रूप में उन्हें सुनाई दिया| पास पहुँच कर, दशरथ को पता चला कि एक मुनि कुमार उनके बाण से मरने की कगार पर पहुँच गया है|

लक्षयामास स ऋषिश्चिन्ताम मुनिसुतस्तदा|

ताम्यमानम स मां कृच्छ्रादुवाच परमार्थवित्|48|

मुनि कुमार का नाम यहाँ कही भी नही दिखता है| उसने बताया कि निकट ही एक कुटिया में उसके अंधे, बूढ़े, दुर्बल और लाचार माता पिता रहते है| वो उनके लिए ही जल लेने आया हुआ था| उसने स्पष्ट किया कि उसके वैश्य पिता और शूद्र जातीय माता से जन्म लेने के कारण दशरथ को ब्रह्म-ह्त्या का पाप नही लगेगा|

इसके आगे की कथा सर्ग 64 में दी गई है जिसका शीर्षक है – “राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुखी हुए उनके माता पिता के विलाप और उनके दी हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना|” इसमें शाप का जिक्र इस प्रकार है:

पुत्रव्यसनजमं दु:खं यदेतन्मम साम्प्रतं|

एवं त्वं पुत्रशोकेन राजन कालं करिष्यसि|54|

 

अन्य राम कथा सन्दर्भ:

तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस के अयोध्या काण्ड में अध्याय 86: दशरथ-सुमंत्र संवाद, दशरथ मरण में श्लोक 154 के बाद दूसरी चौपाई के अंश है:

तापस अंध साप सुधि आई|

कौसल्यहि सब कथा सुनाई||

इसमें न नाम दिया गया है, न घटनाक्रम है, न कथा दी गई है, सिर्फ एक शाप की ओर इशारा भर है|

कंब रामायण में अयोध्या काण्ड के अध्याय 4: नगर निष्क्रमण पटल में कैकयी के राम वन गमन का प्रस्ताव को सुनकर व्यथित महाराजा दशरथ महारानी कौसल्या को पूर्व काल में एक मुनि द्वारा प्राप्त शाप की कथा सुनाते है| दशरथ हाथियों के आखेट के लिए एक वन में गए थे, जिसमें अपने पुत्र पर आश्रित एक वृद्ध अंधे ब्राह्मण मुनि और उनकी अंधी पत्नी रहते थे| पुत्र द्वारा नदी से जल भरने के शब्द को हाथी द्वारा उत्पन्न ध्वनि मानकर महाराजा दशरथ ने शर संधान कर उसे बेध दिया| छटपटाते व्यक्ति ने अपना नाम सुरेचन (श्रवण कुमार नही) बताया और हाथी के भ्रम में हुई गलती के दोष से दशरथ को मुक्त बताया| जब दशरथ अंधे दंपती की पिपासा शांत करने पहुंचे तो व्याकुल होकर उन्होंने शाप दिया – “तुम भी हमारे जैसे ही पुत्र के विरह में स्वर्ग जाओगे|” यहाँ कुछ बाते द्रष्टव्य है:

  1. राम के वन गमन के पूर्व दशरथ ने ये कथा कौसल्या को सुनाई है|
  2. तीर्थ यात्रा की बात नही लिखी है|
  3. बेटे की पत्नी का जिक्र नही है|
  4. नदी का नाम नही बताया गया है|
  5. बेटे को ब्राह्मण कुमार बताया गया है|
  6. बेटे का नाम श्रवण कुमार नही है, सुरेचन है|
  7. पानी भरने के स्वर से हाथी का भ्रम हुआ था|

रंगनाथ की तेलुगु में लिखी रामायण (अयोध्या काण्ड, अध्याय 22, दशरथ का कौसल्या को अपने शाप का वृत्तांत सुनाना) के अनुसार दशरथ द्वारा गलती से मारे गए युवक का नाम यज्ञदत्त था, जो सरयू नदी से जल कलश भरने आया था| कलश में जल भरने की ध्वनि को हाथी समझकर दशरथ द्वारा चलाए गए शब्द बेधी बाण से युवक की मृत्यु हुई थी| युवक ने स्पष्ट किया कि उसके (अंधे, दीन और वृद्ध) वैश्य पिता और शूद्र माता का पुत्र होने के कारण दशरथ को ब्राह्मण ह्त्या का पाप नही लगेगा| निकटवर्ती  पहाड़ के पास एक वटवृक्ष की कोटर में उसने माता पिता को एक कांवर में रखने की बात कही थी| इसमें पुत्र की अंत्येष्टि करने के बाद उसके माता पिता की मृत्यु दशरथ को शाप देकर होती है – “तुम भी हमारे समान ही पुत्र शोक के कारण मृत्यु को प्राप्त करोगे|यहाँ कुछ बाते द्रष्टव्य है:

  1.     राम के वन गमन के बाद मंत्री सुमंत के लौटने के बाद दशरथ ने ये कथा कौसल्या को सुनाई है|
  2.      तीर्थ यात्रा की बात नही लिखी है, बल्कि वटवृक्ष की कोटर को स्थायी निवास के रूप में बताया गया है|
  3.        बेटे की पत्नी का जिक्र नही है|
  4.        नदी का नाम सरयू बताया गया है|
  5.        बेटे को ब्राह्मण कुमार नही बताया गया है|
  6.        बेटे का नाम श्रवण कुमार नही है, यज्ञदत्त है|
  7.        पानी भरने के स्वर से हाथी का भ्रम हुआ था|

चंद्रा झा की मैथिली भाषा रामायण में इस घटना का जिक्र (पानी पिलाने से दशरथ को शाप तक) है पर नाम की जगह सिर्फ मुनि लिखा है|

मुनि हम दशरथ भूप, 

जल भरइत मारल वृथा ||69||

जानल नहि ई रूप, 

गज भ्रम सौ अपराध बाद ||70||

बूढ़ बूढइ कय विविध विलाप | 

मरण समय हमरहु देल शाप ||92||

हमर पुत्र सुख कयलह हरण | 

पुत्र वियोगहि तोहरो मरण ||93||

 

विचित्र रामायण, जैन रामायण, प्रेम रामायण में यह प्रकरण नही खोजा जा सका|

 

श्रवण कुमार सन्दर्भ

अब उन राम कथाओं को देखते है, जहां श्रवण कुमार नाम का जिक्र है| गिरधर रामायण में प्रचलित कथाओं की तरह वर्णन (बालकाण्ड, अध्याय 9: श्रवण वध) है – महाराज दशरथ का आखेट के लिए सरोवर (सरयू तट या नदी तट नही) पर जाना, युवक का नाम श्रवण कुमार बताना, युवक को ब्राह्मण कुमार बताना, माता-पिता का अँधा-बूढा होना, श्रवण कुमार का उन्हें कांवर में लेकर तीर्थयात्रा करना, दशरथ का कमंडल में पानी भरने के स्वर को मृग (पशु) का स्वर समझना, दशरथ का शब्दबेधी बाण का प्रयोग, श्रवण कुमार की मृत्यु, उनके माता-पिता का दशरथ को पुत्र वियोग में मृत्यु का शाप देकर प्राण त्यागना| गिरधर रामायण के संदर्भित पद (श्रवण नाम का सत्यापन, शाप का जिक्र) नीचे दिए गए है:

नाम सत्यापन

ते समे ब्राह्मण श्रवण नामे, वृद्ध अंध मातपिताय,

ते फरे तीरथ-अटण करतो, धरि कावड काय|23|

दशरथ को शाप

एवुं कही धरणी ढल्या, मूर्च्छा थई तव आप,

अन्तकाले रायने, वे जणे दीधो शाप|39|

पुत्र-विजोगे प्राण तारा, जजों सत्य वचन,

एवुं कही वे मरण पाम्याँ, राय कंप्या मन|40|

ये दशरथ का आत्मकथ्य है और पुत्र वंचित रहने के बाद भी इस शाप में दशरथ को पुत्र प्राप्ति का बीज दिखा|

हनुमन्नाटक में भी श्रवण कुमार नाम का जिक्र तीसरे अंक में (प्रथम पद में ही) है पर पूरी घटना का विवरण नही दीखता है|

भुक्त्वा भोगान्सुरंगान्कतिपयसमायं राघवो घर्मपत्न्या

सार्धं वर्धिष्णुकाम: श्रवणमुनिपितु: प्राप् हा! शाप्कालम|1|

श्रवण मुनि के पिता द्वारा दिए गए शाप का समय आने के कारण सूर्य की किरणे मलीन होने की बात यहाँ की गई है, पर शाप का कारण नही बताया गया है| पर श्रवण कुमार नाम का सत्यापन होता है| इस श्लोक के बाद होने वाले अपशकुन की लम्बी सूचि दी गई है| राम के वनगमन के बाद वन से लौटे सुमंत्र को देखकर दशरथ ने प्राण त्याग के पूर्व भी शाप का स्मरण किया था|

श्रुत्वा सुमंत्र वचनेन सुतप्रयाणम शापस्य

तस्य च विचिन्तय विपाकवेलाम|

हां राघवेति सकृदुश्चरितं तृपेण

निश्वस्य दिर्घतरमुच्छ्वासितम न भूय: |7|

आनंद रामायण के सारकांड के प्रथम सर्ग में श्रवण कुमार की कथा का वर्णन है| एक रात राजा दशरथ शिकार के लिए वन में गए| वहां जल को रोका कर उन्होंने कई शिकार किए| तब उस जगह अपने माता पिता को अपने कंधो पर लागाकर तीर्थाटन के लिए वाराणसी ले जाने वाला वैश्य कुमार श्रवण आया|

चकार वारिबंध चावधीद्वन्चराम बहून |

एतस्मिन्नन्तरे तत्र वने वरनासिपथा ||87||

करन्डस्थौ स्वपितरौ स्वस्कंधे श्रवानो वहन |

काशीं नेतुं यायो विश्वो धर्मबाधा भयान्निशि ||८८||

पानी भरने के स्वर को हाथी का स्वर समझ कर दशरथ द्वारा बाण से उसे घायल करना, उसकी मृत्यु, उसके माता पिता को जल पिलाने दशरथ का जाना और पुत्र शोक से मृत्यु का शाप पाना इसमें वर्णित है|

दशाराथाय तौ शापं ददतु: पुत्रदु:खितौ |

पुत्रशोकादावयोहि यथा मृत्युस्तवास्थिति ||95||

मराठी में लिखे श्री रामविजय रामायण के तीसरे अध्याय में भी श्रवण कुमार ही अपने माता पिता को कांवड में लेकर दिन की उष्णता से बचाते हुए रात में यात्रा कर रहा था| पूरी घटना इसमें वर्णित है|

तों ते मार्गी श्रवण | 

आला मायबाप घेऊन ||

दिवसा बहुत विघ्ने आणि ऊष्ण | 

म्हणोनि रात्री गमन करी|| 30 ||

एक सरोवर के निकट पानी पीने के लिए वे रूके| श्रवण कुमार द्वारा जल भरने के स्वर को पशु का स्वर समझ कर दशरथ ने बाण छोड़ दिया और उसकी मृत्यु हो गई| उसके माता पिता ने मरने से पहले दशरथ को पुत्र शोक में मृत्यु का शाप दिया|

मग ती शाप देती प्राण जातां | 

म्हणती तुझाही पुत्र पुत्र करितां |

प्राण जाईल रे दशरथा | 

आम्हां ऐसाचि तत्काल ||54||

 

संदर्भो की व्याख्या:

यह बात स्पष्ट है महाराजा दशरथ को शाप की कथा हर राम कथा बताती है| पर हर कथा में युवक का नाम, गोत्र आदि अलग अलग है| मूलत: ये कथा दशरथ कौसल्या को सुनाते है| कथा के उदघाटन का समय भी अलग अलग है, पर हर ग्रन्थ में यह अयोध्या काण्ड का ही हिस्सा है| कुछ राम कथाओं में तो इसका जिक्र ही नही है|

एक बात सोचने योग्य है कि अगर पुत्र के विरह को शाप में डाला गया था, तो पहले भी विश्वामित्र के साथ राम लक्ष्मण वन को गए थे| उस समय भी पुत्र शोक वाली स्थिति बन रही थी| पर उस समय तो कोई विलाप नही दिखता है| उस सन्दर्भ में प्राणांत करने वाली किसी पीड़ा का भी वर्णन नही मिलता है| यह बात भी अचंभित करती है|

कई बार इस शाप को इसतरह भी व्यक्त किया जाता है कि महाराज दशरथ को अपने पुत्र होने का पता पहले से था| तो ये शाप एक तरह से दशरथ को पुत्र पाने का पूर्वानुमान था| स्पष्ट है कि अगर पुत्र ही नही होगा तो पुत्र शोक कैसे होगा! साथ ही यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि अगर पुत्र पाना नियति थी, तो पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ का विधान अनावश्यक था| पुत्र नही होने के लिए राम कथा में व्यर्थ की चिंता व्यक्त की गई है|

सबसे बड़ी विडम्बना है मुनिकुमार के नाम को लेकर जिसपर रामायण, रामचरितमानस, कंब रामायण, रंगनाथ रामायण आदि अलग अलग राय रखते है| आधुनिक सन्दर्भ में ऐसा माना जा सकता है कि वह मुनि कुमार माता पिता का इतना आज्ञाकारी था कि उसे केवल निर्देश लेकर उसपर अमल करना आता था| वो पूरे शरीर से केवल श्रवण ही करता था| सामान्य जन बोलते भी है, सोचते भी है, पर वो केवल श्रवण ही करता था| इसलिए उसका नाम आरम्भ में उपालंभ के तौर पर श्रवण कुमार रख दिया गया, जो कालान्तर में अर्थ संकोच द्वारा माता पिता के अंध आज्ञाकारी बेटे का पर्याय बन गया| इस नाम की उत्पत्ति प्रामाणिक ग्रंथो में खोजना सही नही लगता है क्योकि ये मूल कथा से जुड़ा एक सहयोगी दृष्टांत है| पर नाम की उत्पत्ति खोजने में शायद नाम का अर्थ दिशा निर्देश देने में सक्षम है|

धन्यवाद| 

डॉ हिमांशु शेखर

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कैसे लिखें, अच्छी कविता..? भाग 02

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