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मंगलवार, 18 जून 2024

निर्जला एकादशी

 लेखिका: डॉ पूर्णिमा शर्मा कात्यायनी

मंगलवार 18 जून 2024 को समस्त हिन्दू धर्मावलम्बी निर्जला एकादशी के व्रत का पालन करेंगे | बारह हिन्दी मासों में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की कुल मिलाकर चौबीस एकादशी आती हैं | अधिक मास होने पर इनकी संख्या छब्बीस भी हो जाती है | हिन्दू सम्प्रदाय में एकादशी व्रत का बहुत महत्त्व माना गया है | इनमें ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है | इस उपवास में जल भी ग्रहण न करने का संकल्प लिया जाता है इसीलिए इसे निर्जला एकादशी कहते हैं | पद्मपुराण में प्रसंग आता है कि महर्षि वेदव्यास ने जब पाँचों पाण्डवों को चतुर्विध पुरुषार्थ – धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष – का फल देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया तो भीम ने कहा “पितामह, आप पक्ष में एक बार भोजन त्यागने की बात कहते हैं, किन्तु मैं तो एक दिन क्या, एक समय भी भोजन किये बिना नहीं रह सकता | मेरे उदर में स्थित “वृकाग्नि” को शान्त रखने के लिए मुझे दिन में कई बार भोजन करना पड़ता है | तो मैं भला ये व्रत कैसे कर पाऊँगा ? और यदि यह व्रत नहीं करूँगा तो इसके पुण्य से वंचित रह जाऊँगा |”

पितामह महाबुद्धे कथयामि तवाग्रतः, एकभक्ते न शक्नोमि उपवासे कुतः प्रभो

वृको हि नाम यो वह्नि: स सदा जठरे मम, अतिबेलं यदाSश्नामि तदा समुपशाम्यति

नैकं शक्नोम्यहं कर्तुमुपवासं महामुने || – पद्मपुराण उत्तरखण्ड 52 / 16 - 18

तब मुनि वेदव्यास ने भीम का मनोबल बढाते हुए उन्हें समझाया कि “हे कुन्तीपुत्र ! धर्म की यही विशेषता होती है कि वह केवल सबका धारण ही नहीं करता अपितु व्रत-उपवास के नियमों को सबके द्वारा सरलता से पालन करने योग्य भी बनाता है | तुम केवल एक ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में जब सूर्य वृषभ अथवा मिथुन राशिगत हो उस समय की एकादशी का व्रत पालन करो और वह भी निर्जल | केवल इसी व्रत के पालन से तुम्हें समस्त एकादशी के व्रत का फल प्राप्त हो जाएगा |”

वृषस्थे मिथुनस्थे वा यदा चैकादाशी भवेत्, ज्येष्ठमासे प्रयत्नेन सोपोष्योदकवर्जिता  – पद्मपुराण 52 / 20


तो, रविवार 16 जून को पूर्वाह्न 12:37 पर भगवान भास्कर मिथुन राशि में प्रविष्ट हो चुके हैं | आज सूर्योदय से पूर्व 4:42 पर एकादशी तिथि आरम्भ हो चुकी है जो कल प्रातः 6:23 तक रहेगी | कल सूर्योदय 5:16 पर है, अतः उदया तिथि के आधार पर निर्जला एकादशी व्रत कल रखा जाएगा |


पद्मपुराण में वर्णित उपरोक्त वृत्तान्त के ही कारण से इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है | इसी अध्याय में आगे कहा गया है –

ज्येष्ठे मासि तु वै भीम ! या शुक्लैकादशी शुभा

निर्जला समुपोष्यात्र जल्कुम्भान्सशर्कारान् |

प्रदाय विप्रमुखेभ्यो मोदते विष्णुसन्निधौ

ततः कुम्भा: प्रदातव्या ब्राह्मणानां च भक्तित: || – पद्मपुराण 52 / 61,62

अर्थात निर्जला एकादशी के दिन जल और शर्करा से युक्त घट का दान करने से भगवान् विष्णु का सान्निध्य प्राप्त होता है | इस तथा इसी प्रकार के अन्य पौराणिक उपाख्यानों के कारण हिन्दू समाज में मान्यता आज तक भी विद्यमान है कि यदि हम “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करते हुए निर्जला एकादशी के व्रत का पालन करेंगे और गऊ, वस्त्र, छत्र, फल, मीठा शरबत तथा कलश आदि का दान करेंगे तो हमें भगवान् विष्णु का सान्निध्य प्राप्त होगा | हर गली मोहल्ले के चोराहे पर, घरों के दरवाजों पर, सोसायटीज़ के गेट्स पर इस दिन लोग तरह तरह के शर्बतों से भरे बर्तन रख कर या तरबूज़ आदि लेकर बैठे मिल जाएँगे और हर राहगीर की प्यास बुझाते मिल जाएँगे |


ज्येष्ठ मास की तपती दोपहर में शीतलता प्रदान करने वाली वस्तुएँ दान करना वास्तव में एक स्वस्थ प्रथा है | लेकिन क्या इसका पालन केवल एक ही दिन होना चाहिए – वह भी इस भावना से कि ऐसा करके हमें पुण्य प्राप्त होगा ? क्या ही अच्छा हो यदि ये समस्त कार्य हम धर्म के भय या मोक्ष अथवा ईश्वरप्राप्ति के लालच से न करके मानवता के नाते करें… क्योंकि हर जीव ईश्वर का ही तो प्रतिरूप है… जब भी ऐसा हो जाएगा तो “निर्जला एकादशी” केवल एक दिन का पर्व भर बनकर नहीं रह जाएगी… हर दिन हर दीन हीन को गर्मी से राहत दिलाने के लिए शीतल पेय दान के रूप में उपलब्ध हो सकेगा…


प्राचीन काल में तो ज्येष्ठ मास की तपती दोपहरी में भी अधिकाँश लोग पैदल अथवा खुली बैलगाड़ियों, ऊँट आदि के माध्यम से यात्रा किया करते थे | थक जाने पर मार्ग में खड़े घने वृक्षों की छाया में कुछ पल विश्राम कर लिया करते थे | साथ में मिट्टी के घड़ों में जल लेकर चलते थे | वह भी गर्मी में समाप्त हो जाता था | ऐसे में जहाँ रुके वहाँ आस पास कहीं जलाशय हुआ तो वहाँ पुनः घड़ों में जल भर लिए और हाथ मुँह धोकर साथ लाए फल आदि ग्रहण कर लिए और फिर आगे अपने गन्तव्य की ओर बढ़ चले | उन राहगीरों की सहायता के लिए मार्ग में स्थित ग्रामवासी भी दौड़े चले आते थे जल से पूर्ण पात्र और फलादि लेकर ताकि उन राहगीरों की भूख प्यास बुझा सकें | और ऐसा मात्र एकादशी के दिन ही नहीं होता था, दिन प्रतिदिन का यही नियम था |


निर्जला एकादशी के दिन निर्जल व्रत रखने के पीछे एक यह भी कारण हो सकता है कि इस दिन गर्मी अपने चरम पर होती है जिसके कारण जल का महत्त्व और भी बढ़ जाता है | सम्भवतः इसीलिए जन साधारण को जल का महत्त्व समझाने के लिए तथा उसके प्रति जन मानस में सम्मान का भाव बनाए रखने के लिए हमारे मनीषियों ने यह विधान बनाया कि इस दिन जो व्यक्ति स्वयं निर्जल रहकर दूसरों को जल का दान करेगा वह पुण्य का भागी होगा | क्योंकि धर्म के साथ जिस भाव को जोड़ दिया जाता है जन साधारण पूर्ण निष्ठा के साथ उसका पालन करता है | आज इस तथ्य से सभी परिचित हैं कि नदियों का जलस्तर धीरे धीरे घट रहा है | इसके बाद भी हम लोग जल का अपव्यय करते हैं | आवश्यक कार्यों के लिए तथा पीने के लिए जल का प्रयोग आवश्यक है | किन्तु हम लोग अपनी असावधानियों के चलते नलकों को खुला छोड़कर न जाने कितना पानी व्यर्थ बहा देते हैं | यदि हम निर्जला एकादशी के दिन जल को संरक्षित करने का संकल्प ले लें, और वर्षा के जल को भी संग्रहण करने का प्रयास करने लग जाएँ तो यह भी निर्जला एकादशी के व्रत की ही भाँति पुण्य प्रदान करने वाला कार्य होगा, क्योंकि ऐसा करके भविष्य में होने वाले जल के अभाव से बहुत सीमा तक मुक्ति प्राप्त की जा सकती है…

सभी स्वस्थ रहें यही ईश्वर से प्रार्थना है…

-----कात्यायनी

गुरुवार, 2 मई 2024

श्रवण कुमार की तथ्यात्मक कथा

 

लेखक: डॉ हिमांशु शेखर

 

रामकथा की भूमिका में श्रवण कुमार की कथा का बहुत बड़ा योगदान है, पर इसकी कथा, नाम, और घटनाक्रम पर अलग अलग अवधारणाएं दिखाती है| प्रचलित अवधारणा के अनुसार श्रवण कुमार नाम के एक माता पिता के भक्त का जिक्र उद्धृत किया जाता है, जिसने अंधे माता पिता को कंधे पर लादकर तीर्थ यात्रा करवाई थी| इस दौरान दशरथ के बाणों से गलती से उसका वध हो गया था| इस मूल कथा में कई घटनाएँ कथा-वाचको द्वारा प्रसिद्धि के लिए जोड़ दी गई है| श्रवण कुमार के माता पिता जन्मांध नही थे, बल्कि ब्रह्मा के शाप के कारण पुत्र को देखते ही अंधे हो गए थे| एक कथा में श्रवण कुमार के माता पिता जन्मांध थे और तपस्या द्वारा उन्होने श्रवण कुमार को पुत्र रत्न के रूप में प्राप्त किया था| एक अन्य कथा में श्रवण कुमार की पत्नी द्वारा सास ससुर की उचित देखभाल नही होने के कारण श्रवण कुमार ने अपने माता पिता के साथ घर छोड़ दिया था| एक और अवधारणा के अनुसार आँख का अंधा नाम नयनसुख की तर्ज पर कम सुनाने वाले बालक का नाम श्रवण कुमार रख दिया गया था| इस कथा के सन्दर्भ और उसकी पौराणिक प्रामाणिकता पर एक नजर डालने की आवश्यकता है|

 

वाल्मीकि रामायण:

अयोध्या काण्ड का सर्ग 63 और 64 मुनि कुमार के वध की कथा और उसके माता पिता से दशरथ को मिलने वाले शाप का वर्णन करता है| राम, लक्षमण और सीता को वन में छोड़कर वापस लौटे सुमंत्र से मिलने के बाद दशरथ ने ये कथा कौसल्या को सुनाई है| सर्ग 63 का शीर्षक है – “राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनि कुमार के मारे जाने का प्रसंग सुनाना|” जब दशरथ राजकुमार थे तो अपने शब्दबेधी बाण की प्रशंसा सुनकर एक बार वो वर्षा ऋतु की ऊषा काल में सरयू तट पर शिकार करने के लिए गए| उन्हें पानी का घडा भरने का शब्द सुनाई पडा, जिसे उन्हें हाथी द्वारा सूंढ़ से पानी पीने का भ्रम हो गया| प्रत्यक्ष नही दिखने के कारण शब्द का अनुसरण करते हुए छोड़ा गया तीर एक पुरुष के आर्तनाद के रूप में उन्हें सुनाई दिया| पास पहुँच कर, दशरथ को पता चला कि एक मुनि कुमार उनके बाण से मरने की कगार पर पहुँच गया है|

लक्षयामास स ऋषिश्चिन्ताम मुनिसुतस्तदा|

ताम्यमानम स मां कृच्छ्रादुवाच परमार्थवित्|48|

मुनि कुमार का नाम यहाँ कही भी नही दिखता है| उसने बताया कि निकट ही एक कुटिया में उसके अंधे, बूढ़े, दुर्बल और लाचार माता पिता रहते है| वो उनके लिए ही जल लेने आया हुआ था| उसने स्पष्ट किया कि उसके वैश्य पिता और शूद्र जातीय माता से जन्म लेने के कारण दशरथ को ब्रह्म-ह्त्या का पाप नही लगेगा|

इसके आगे की कथा सर्ग 64 में दी गई है जिसका शीर्षक है – “राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुखी हुए उनके माता पिता के विलाप और उनके दी हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना|” इसमें शाप का जिक्र इस प्रकार है:

पुत्रव्यसनजमं दु:खं यदेतन्मम साम्प्रतं|

एवं त्वं पुत्रशोकेन राजन कालं करिष्यसि|54|

 

अन्य राम कथा सन्दर्भ:

तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस के अयोध्या काण्ड में अध्याय 86: दशरथ-सुमंत्र संवाद, दशरथ मरण में श्लोक 154 के बाद दूसरी चौपाई के अंश है:

तापस अंध साप सुधि आई|

कौसल्यहि सब कथा सुनाई||

इसमें न नाम दिया गया है, न घटनाक्रम है, न कथा दी गई है, सिर्फ एक शाप की ओर इशारा भर है|

कंब रामायण में अयोध्या काण्ड के अध्याय 4: नगर निष्क्रमण पटल में कैकयी के राम वन गमन का प्रस्ताव को सुनकर व्यथित महाराजा दशरथ महारानी कौसल्या को पूर्व काल में एक मुनि द्वारा प्राप्त शाप की कथा सुनाते है| दशरथ हाथियों के आखेट के लिए एक वन में गए थे, जिसमें अपने पुत्र पर आश्रित एक वृद्ध अंधे ब्राह्मण मुनि और उनकी अंधी पत्नी रहते थे| पुत्र द्वारा नदी से जल भरने के शब्द को हाथी द्वारा उत्पन्न ध्वनि मानकर महाराजा दशरथ ने शर संधान कर उसे बेध दिया| छटपटाते व्यक्ति ने अपना नाम सुरेचन (श्रवण कुमार नही) बताया और हाथी के भ्रम में हुई गलती के दोष से दशरथ को मुक्त बताया| जब दशरथ अंधे दंपती की पिपासा शांत करने पहुंचे तो व्याकुल होकर उन्होंने शाप दिया – “तुम भी हमारे जैसे ही पुत्र के विरह में स्वर्ग जाओगे|” यहाँ कुछ बाते द्रष्टव्य है:

  1. राम के वन गमन के पूर्व दशरथ ने ये कथा कौसल्या को सुनाई है|
  2. तीर्थ यात्रा की बात नही लिखी है|
  3. बेटे की पत्नी का जिक्र नही है|
  4. नदी का नाम नही बताया गया है|
  5. बेटे को ब्राह्मण कुमार बताया गया है|
  6. बेटे का नाम श्रवण कुमार नही है, सुरेचन है|
  7. पानी भरने के स्वर से हाथी का भ्रम हुआ था|

रंगनाथ की तेलुगु में लिखी रामायण (अयोध्या काण्ड, अध्याय 22, दशरथ का कौसल्या को अपने शाप का वृत्तांत सुनाना) के अनुसार दशरथ द्वारा गलती से मारे गए युवक का नाम यज्ञदत्त था, जो सरयू नदी से जल कलश भरने आया था| कलश में जल भरने की ध्वनि को हाथी समझकर दशरथ द्वारा चलाए गए शब्द बेधी बाण से युवक की मृत्यु हुई थी| युवक ने स्पष्ट किया कि उसके (अंधे, दीन और वृद्ध) वैश्य पिता और शूद्र माता का पुत्र होने के कारण दशरथ को ब्राह्मण ह्त्या का पाप नही लगेगा| निकटवर्ती  पहाड़ के पास एक वटवृक्ष की कोटर में उसने माता पिता को एक कांवर में रखने की बात कही थी| इसमें पुत्र की अंत्येष्टि करने के बाद उसके माता पिता की मृत्यु दशरथ को शाप देकर होती है – “तुम भी हमारे समान ही पुत्र शोक के कारण मृत्यु को प्राप्त करोगे|यहाँ कुछ बाते द्रष्टव्य है:

  1.     राम के वन गमन के बाद मंत्री सुमंत के लौटने के बाद दशरथ ने ये कथा कौसल्या को सुनाई है|
  2.      तीर्थ यात्रा की बात नही लिखी है, बल्कि वटवृक्ष की कोटर को स्थायी निवास के रूप में बताया गया है|
  3.        बेटे की पत्नी का जिक्र नही है|
  4.        नदी का नाम सरयू बताया गया है|
  5.        बेटे को ब्राह्मण कुमार नही बताया गया है|
  6.        बेटे का नाम श्रवण कुमार नही है, यज्ञदत्त है|
  7.        पानी भरने के स्वर से हाथी का भ्रम हुआ था|

चंद्रा झा की मैथिली भाषा रामायण में इस घटना का जिक्र (पानी पिलाने से दशरथ को शाप तक) है पर नाम की जगह सिर्फ मुनि लिखा है|

मुनि हम दशरथ भूप, 

जल भरइत मारल वृथा ||69||

जानल नहि ई रूप, 

गज भ्रम सौ अपराध बाद ||70||

बूढ़ बूढइ कय विविध विलाप | 

मरण समय हमरहु देल शाप ||92||

हमर पुत्र सुख कयलह हरण | 

पुत्र वियोगहि तोहरो मरण ||93||

 

विचित्र रामायण, जैन रामायण, प्रेम रामायण में यह प्रकरण नही खोजा जा सका|

 

श्रवण कुमार सन्दर्भ

अब उन राम कथाओं को देखते है, जहां श्रवण कुमार नाम का जिक्र है| गिरधर रामायण में प्रचलित कथाओं की तरह वर्णन (बालकाण्ड, अध्याय 9: श्रवण वध) है – महाराज दशरथ का आखेट के लिए सरोवर (सरयू तट या नदी तट नही) पर जाना, युवक का नाम श्रवण कुमार बताना, युवक को ब्राह्मण कुमार बताना, माता-पिता का अँधा-बूढा होना, श्रवण कुमार का उन्हें कांवर में लेकर तीर्थयात्रा करना, दशरथ का कमंडल में पानी भरने के स्वर को मृग (पशु) का स्वर समझना, दशरथ का शब्दबेधी बाण का प्रयोग, श्रवण कुमार की मृत्यु, उनके माता-पिता का दशरथ को पुत्र वियोग में मृत्यु का शाप देकर प्राण त्यागना| गिरधर रामायण के संदर्भित पद (श्रवण नाम का सत्यापन, शाप का जिक्र) नीचे दिए गए है:

नाम सत्यापन

ते समे ब्राह्मण श्रवण नामे, वृद्ध अंध मातपिताय,

ते फरे तीरथ-अटण करतो, धरि कावड काय|23|

दशरथ को शाप

एवुं कही धरणी ढल्या, मूर्च्छा थई तव आप,

अन्तकाले रायने, वे जणे दीधो शाप|39|

पुत्र-विजोगे प्राण तारा, जजों सत्य वचन,

एवुं कही वे मरण पाम्याँ, राय कंप्या मन|40|

ये दशरथ का आत्मकथ्य है और पुत्र वंचित रहने के बाद भी इस शाप में दशरथ को पुत्र प्राप्ति का बीज दिखा|

हनुमन्नाटक में भी श्रवण कुमार नाम का जिक्र तीसरे अंक में (प्रथम पद में ही) है पर पूरी घटना का विवरण नही दीखता है|

भुक्त्वा भोगान्सुरंगान्कतिपयसमायं राघवो घर्मपत्न्या

सार्धं वर्धिष्णुकाम: श्रवणमुनिपितु: प्राप् हा! शाप्कालम|1|

श्रवण मुनि के पिता द्वारा दिए गए शाप का समय आने के कारण सूर्य की किरणे मलीन होने की बात यहाँ की गई है, पर शाप का कारण नही बताया गया है| पर श्रवण कुमार नाम का सत्यापन होता है| इस श्लोक के बाद होने वाले अपशकुन की लम्बी सूचि दी गई है| राम के वनगमन के बाद वन से लौटे सुमंत्र को देखकर दशरथ ने प्राण त्याग के पूर्व भी शाप का स्मरण किया था|

श्रुत्वा सुमंत्र वचनेन सुतप्रयाणम शापस्य

तस्य च विचिन्तय विपाकवेलाम|

हां राघवेति सकृदुश्चरितं तृपेण

निश्वस्य दिर्घतरमुच्छ्वासितम न भूय: |7|

आनंद रामायण के सारकांड के प्रथम सर्ग में श्रवण कुमार की कथा का वर्णन है| एक रात राजा दशरथ शिकार के लिए वन में गए| वहां जल को रोका कर उन्होंने कई शिकार किए| तब उस जगह अपने माता पिता को अपने कंधो पर लागाकर तीर्थाटन के लिए वाराणसी ले जाने वाला वैश्य कुमार श्रवण आया|

चकार वारिबंध चावधीद्वन्चराम बहून |

एतस्मिन्नन्तरे तत्र वने वरनासिपथा ||87||

करन्डस्थौ स्वपितरौ स्वस्कंधे श्रवानो वहन |

काशीं नेतुं यायो विश्वो धर्मबाधा भयान्निशि ||८८||

पानी भरने के स्वर को हाथी का स्वर समझ कर दशरथ द्वारा बाण से उसे घायल करना, उसकी मृत्यु, उसके माता पिता को जल पिलाने दशरथ का जाना और पुत्र शोक से मृत्यु का शाप पाना इसमें वर्णित है|

दशाराथाय तौ शापं ददतु: पुत्रदु:खितौ |

पुत्रशोकादावयोहि यथा मृत्युस्तवास्थिति ||95||

मराठी में लिखे श्री रामविजय रामायण के तीसरे अध्याय में भी श्रवण कुमार ही अपने माता पिता को कांवड में लेकर दिन की उष्णता से बचाते हुए रात में यात्रा कर रहा था| पूरी घटना इसमें वर्णित है|

तों ते मार्गी श्रवण | 

आला मायबाप घेऊन ||

दिवसा बहुत विघ्ने आणि ऊष्ण | 

म्हणोनि रात्री गमन करी|| 30 ||

एक सरोवर के निकट पानी पीने के लिए वे रूके| श्रवण कुमार द्वारा जल भरने के स्वर को पशु का स्वर समझ कर दशरथ ने बाण छोड़ दिया और उसकी मृत्यु हो गई| उसके माता पिता ने मरने से पहले दशरथ को पुत्र शोक में मृत्यु का शाप दिया|

मग ती शाप देती प्राण जातां | 

म्हणती तुझाही पुत्र पुत्र करितां |

प्राण जाईल रे दशरथा | 

आम्हां ऐसाचि तत्काल ||54||

 

संदर्भो की व्याख्या:

यह बात स्पष्ट है महाराजा दशरथ को शाप की कथा हर राम कथा बताती है| पर हर कथा में युवक का नाम, गोत्र आदि अलग अलग है| मूलत: ये कथा दशरथ कौसल्या को सुनाते है| कथा के उदघाटन का समय भी अलग अलग है, पर हर ग्रन्थ में यह अयोध्या काण्ड का ही हिस्सा है| कुछ राम कथाओं में तो इसका जिक्र ही नही है|

एक बात सोचने योग्य है कि अगर पुत्र के विरह को शाप में डाला गया था, तो पहले भी विश्वामित्र के साथ राम लक्ष्मण वन को गए थे| उस समय भी पुत्र शोक वाली स्थिति बन रही थी| पर उस समय तो कोई विलाप नही दिखता है| उस सन्दर्भ में प्राणांत करने वाली किसी पीड़ा का भी वर्णन नही मिलता है| यह बात भी अचंभित करती है|

कई बार इस शाप को इसतरह भी व्यक्त किया जाता है कि महाराज दशरथ को अपने पुत्र होने का पता पहले से था| तो ये शाप एक तरह से दशरथ को पुत्र पाने का पूर्वानुमान था| स्पष्ट है कि अगर पुत्र ही नही होगा तो पुत्र शोक कैसे होगा! साथ ही यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि अगर पुत्र पाना नियति थी, तो पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ का विधान अनावश्यक था| पुत्र नही होने के लिए राम कथा में व्यर्थ की चिंता व्यक्त की गई है|

सबसे बड़ी विडम्बना है मुनिकुमार के नाम को लेकर जिसपर रामायण, रामचरितमानस, कंब रामायण, रंगनाथ रामायण आदि अलग अलग राय रखते है| आधुनिक सन्दर्भ में ऐसा माना जा सकता है कि वह मुनि कुमार माता पिता का इतना आज्ञाकारी था कि उसे केवल निर्देश लेकर उसपर अमल करना आता था| वो पूरे शरीर से केवल श्रवण ही करता था| सामान्य जन बोलते भी है, सोचते भी है, पर वो केवल श्रवण ही करता था| इसलिए उसका नाम आरम्भ में उपालंभ के तौर पर श्रवण कुमार रख दिया गया, जो कालान्तर में अर्थ संकोच द्वारा माता पिता के अंध आज्ञाकारी बेटे का पर्याय बन गया| इस नाम की उत्पत्ति प्रामाणिक ग्रंथो में खोजना सही नही लगता है क्योकि ये मूल कथा से जुड़ा एक सहयोगी दृष्टांत है| पर नाम की उत्पत्ति खोजने में शायद नाम का अर्थ दिशा निर्देश देने में सक्षम है|

धन्यवाद| 

डॉ हिमांशु शेखर

बुधवार, 17 अप्रैल 2024

राम नवमी : भगवान राम का जन्मदिन

 

लेखक: डॉ हिमांशु शेखर

जय श्री राम

प्रस्तावना

भगवान श्री राम का जन्म दिन धूमधाम से रामनवमी के दिन पूरे विश्व में मनाया जाता है| रामकथा में भगवान राम को बारह कलाओं से युक्त विष्णु का सातवां अवतार माना जाता है| यह कथा इतने रूपों में धरा पर उपस्थित है कि प्रामाणिकता पर हमेशा सवाल उठते है| पर प्रमाणिकता पर सवाल उठाने से ज्यादा सही ये लगता है कि इस कथा में राम के अवतरण और महात्मय को खोज कर भक्ति का मार्ग स्थापित किया जाए|एक और विसंगति है - जन्मदिन को जयंती कहते है - हनुमान जयंती, सीता जयंती,  महावीर जयंती, गुरू नानक जयंती, गीता जयंती....। तो भगवान श्रीराम के जन्मदिन को राम नवमी की जगह राम जयंती कहना चाहिए। 


आधुनिक गणन के परिणाम

भगवान राम का जन्म 10 जनवरी, 5114 ईसापूर्व को सुबह 12 बजकर पांच मिनट पर हुआ था। यह जानकारी 'यूनीक एग्ज़िबिशन ऑन कल्चरल कॉन्टिन्यूटी फ़्रॉम ऋग्वेद टू रोबॉटिक्स' नाम की एक रिपोर्ट में दी गई है। डॉ॰ वर्तक ने अपने ग्रंथ 'वास्तव रामायण' में ग्रहगतियों के आधार पर गणित करके राम की जन्म-तिथि 4 दिसंबर, 7323 ईसापूर्व बताई है। उनके मुताबिक, इसी दिन दिन में 1:30 से 3:00 बजे के बीच राम का जन्म हुआ होगा। 

इसपर एक पुनरावलोकन किया जा सकता है। वाल्मीकि के अनुसार श्रीराम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी तिथि एवं पुनर्वसु नक्षत्र में जब पांच ग्रह अपने उच्च स्थान में थे तब हुआ था। इस प्रकार सूर्य मेष में 10 डिग्री, मंगल मकर में 28 डिग्री, बृहस्पति कर्क में 5 डिग्री पर, शुक्र मीन में 27 डिग्री पर एवं शनि तुला राशि में 20 डिग्री पर था। (बाल कांड 18/श्लोक 8, 9)।

शोधकर्ता डॉ. पीवी वर्तक के अनुसार ऐसी स्थिति 7323 ईसा पूर्व दिसंबर में ही निर्मित हुई थी, लेकिन प्रोफेसर तोबयस के अनुसार जन्म के ग्रहों के विन्यास के आधार पर 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व हुआ था। उनके अनुसार ऐसी आका‍शीय स्थिति तब भी बनी थी। तब 12 बजकर 25 मिनट पर आकाश में ऐसा ही दृष्य था जो कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित है। ज्यातादर शोधकर्ता प्रोफेसर तोबयस के शोध से सहमत हैं। इसका मतलब यह कि राम का जन्म 10 जनवरी को 12 बजकर 25 मिनट पर 5114 ईसा पूर्व हुआ था।


जन्म की भूमिका

श्री राम का जन्म संतो के उद्धार और दुर्जनों के नाश के लिए हुआ था| उनके जन्म को सार्थक करने के लिए इतनी ज्यादा कथाएँ पंक्तिबद्ध है कि उनको जोड़कर सक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करना भी एक रचना का निर्माण कर सकता है| श्री राम जन्म की सबसे बड़ी आवश्यकता रावण के संहार की थी| स्वर्गाधिपति इंद्र को परास्त कर रावण वास्तव में अपने पुत्र इन्द्रजीत की मदद से विश्व विजयी हो गया था| पर विश्व विजय करना एक सामान्य बात थी, परेशानी इस बात से थी कि वो संतो ऋषियों, मुनियों की तपस्या, यज्ञ, पूजन आदि में अड़चन पैदा करने लगा था| वो अत्याचारी हो गया था और उसको मारने का सामर्थ्य सिर्फ भगवान के अवतार द्वारा ही संभव था| वास्तव में वह भगवान बिष्णु के द्वारपाल जय विजय में से एक का पुनर्जन्म था, जिसे तीन जन्मो तक भगवान के हाथो मरने का शाप मिला था|पिछले जन्म में वो दोनों हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष बन कर पैदा हुए थे और भगवान विष्णु के नरसिंह और वाराह अवतारों द्वारा मारे गए थे। त्रेता में वे रावण और कुंभकर्ण बनकर पैदा हुए थे। द्वापर में कंस और शिशुपाल बनकर पैदा होना था। फिर भगवान के अवतार श्रीकृष्ण द्वारा मरने के बाद तीन जनँम तक भगवान के द्वारा मारे जाने का शाप पूर्ण होना था। 

दूसरा प्रयोजन था मनु और शतरूपा को भगवान द्वारा दिया गया वरदान जिसमें मनु शतरूपा ने वरदान माँगा था कि आपके सामान ही मुझे पुत्ररत्न प्राप्त हो| भगवान ने कहा था कि अपने सामान व्यक्ति खोजने से अच्छा है मै स्वयं आपका पुत्र बनाकर जन्म लूंगा| इस वरदान के फलित होने के लिए भी भवान का अवतार लेना आवश्यक था| त्रेता युग में मनु दशरथ के रूप में और शतरूपा कौसल्या के रूप में धरती पर आई थी|

तीसरी कथा थी नारद के काम-विजय के मिथ्या अभिमान के मोह भंग की| नारद में उत्पन्न मोह के निराकरण के लिए भगवान ने एक राज्य की राजकुमारी के स्वयंवर की माया नारद जी के मार्ग में उत्पन्न की| नारद उस कन्या से विवाह हेतु एक सुन्दर रूप बनाने की प्रार्थना लेकर भगवान के पास गए| उन्होंने ने  माँगा| पर पर्यायवाची शब्द होने के कारण भगवान ने उन्हें वानर का मुख प्रदान कर दिया| स्वयंवर में राजकुमारी ने भगवान का वरण किया| जब नारद जी का भ्रम टूटा तो उन्होंने क्रोध में भगवान को पत्नी विरह का शाप दिया तथा वानर की सहायता से पत्नी मिलन की व्यवस्था होगी ऐसा भी कहा|

एक प्रतापभानु की कथा भी इस सन्दर्भ में दिखती है, पर उसका सूत्र और प्रामाणिकता अन्य श्रोतों में खोजना थोड़ा जटिल है|

 

जन्म का दिन और लीला  

कंब रामायण के अनुसार राम के जन्म के समय मेष (चैत्र) मास था, नवमी तिथि थी, नक्षत्र पुनर्वसु था, श्रेष्ठ लग्न कर्कटक था| गृह गणना में ग्यारहवे घर में चार ग्रह उच्च स्थानों पर पाए गए| उनके जन्मदिवस का उत्सव बारह दिनों तक चलता रहा और तेरहवे दिन उनका नामकरण गुरु वसिष्ठ ने श्रीराम नाम से किया| कौसल्या ने मेघ और काजल की छटा दिखाने वाले विष्णु को जन्म दिया था|

गिरधर रामायण के अनुसार भगवान राम के जन्म के समय समय मंगलसूचक शब्द हो रहे थे| उनका जन्म बसंत ऋतु के चैत मास की नवमी को मध्यान्ह में हुआ था| उस समय पुष्य नक्षत्र चल रहा था और वो रविवार का दिन था| इसका वर्णन आनंद रामायण ने सारकाण्ड के द्वितीय सर्ग में कुछ इसतरह किया है|

अथ विष्णु चैत्र मासि नवम्यां मध्यमे रचौ |

सूतिकागृह मध्येअथ कौसल्याया: पुरोअभवत ||

चतुर्भुज: पीतवामा मेघश्यामो महाद्युति: ||4||

मराठी का श्री राम विजय रामायण (अध्याय 4) राम भूअवतरण को अलग ढंग से चित्रित करता है |

वशिष्ठ की भविष्यवाणी

शंख चक्र शेष नारायण | चतुर्धा रूपे प्रकाटेल जगजीवन ||

ज्याची कथा ऐकतां पापी जन | उद्धारोनि तरतील || 49 ||

जन्म समय विवरण

बसंत ऋतु चैत्र मॉस | शुक्ल पक्ष नवमी  दिवस ||

सूर्यवंशी जगन्निवास | सूर्यवासरी जन्माला || 54 ||

माध्यान्हा आला चंदाकिरण | पुष्य नक्षत्र साधून ||

अवतरला रघुनन्दन | पूर्ण ब्रह्म जगद्गुरु || 55 ||

 

रंगनाथ रामायण बालकाण्ड के 13वे अध्याय में पहली पंक्ति से राम जन्म का आख्यान शुरू हो जाता है| इसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है – “प्रशंसनीय मधुमास के श्रेष्ठ शुक्ल पक्ष में, पूर्ण नवमी तिथि, बुधवार, पुनर्वसु नक्षत्र में मध्यान्ह के समय ग्रह पचाको के उच्च स्थिति में रहते हुए, गुरु और चन्द्र का योग रहते हुए, ललित कर्क लग्न में, सर्वलिकाधार, जगादेकवीर, इन्द्रादि देवताओं के स्तुत्य, दिव्य लक्षणों से देदीप्यमान, अव्यय, असमान, आर्ट त्रान परायण, भव्य, चिदानंद, परम कल्याण मूर्ति, देवताओं के रक्षक, दीनार्त्तिहरण, गुनू से अलंकृत, महान कीर्तिवान, शेषशायी, श्रीपति, हृषिकेश, कमल-गर्भ के अर्द्धांश के रूप में, काकुत्स्थावंशी, श्रीराम कौसल्या के गर्भ से उत्पन्न हुए|”

गिरधर रामायण के अनुसार भगवान अट्ठारह वर्ष की सांवली मूरत के रूप में चतुर्भुज रूप धारकर प्रकट हुए| शंख, चक्र, गदा और पदम् से युक्त होकर आभूषण, कुंडल, मुकुट भी शोभायमान हो रहा था| उनके रूप पर करोडो कामदेव लज्जित हो जाते थे| पीताम्बर धारी, सुकोमल, रत्न सी कान्ति लिए भगवान में अट्ठारह रेखा कृतियाँ विद्यमान थी| कौसल्या ने ये रूप देखकर उनकी पूजा अर्चना की और राजा दशरथ के राजपुत्र के रूप में प्रकट होने की प्रार्थना की| तब भगवान पालने में छोटे बच्चे के रूप में आकर रोदन करने लगे|

श्री चंद्रा झा कृत मैथिली रामायण के बालकाण्ड में तृतीय अध्याय में हंसगति छंद में राम के प्रादुर्भाव्  का वर्णन मिलता है|

कौशल्या थिकि धनी जनिक सुत भेलाह |

ब्रह्मानंदानंदे दोष दुःख गेलाह || 59 ||

शुक्ल पक्ष नवमी शुभ कर्क्क उदित हित |

मध्य दिवस नक्षत्र पुनार्व्वसु अभिजित || 60 ||

पंचग्रह उच्चस्थ मेशामे दिनकर |

सृष्टि त्रिगुण उतपत्ति  शक्ति कर जनिकर || 61 ||

भगवान के बाल रूप का वर्णन चौपाई छंद में किया गया है|

ई कहि बनला सुन्दर बाल | 

इन्द्रनील छवि नयन विशाल || 82 ||

बाल अरुण तन दिव्य प्रकास | 

जनिकर माया विश्व विलास || 83 ||

कंब रामायण, विचित्र रामायण, जैन रामायण में भगवान के जन्म के समय की रूप सज्जा का वर्णन नही मिलता है|  


प्रामाणिक मान्य संदर्भ

इस आलेख का उपसंहार तुलसीदास जी की रामचरित मानस के बाल काण्ड की चौपाइयो और दोहों से कर रहा हूँ, जो राम जन्म के समय को बताती है और उनके रूप का भी वर्णन करती है| इनमें कौसल्या द्वारा की गई राम जी की आरती “भए प्रगट कृपाला” को हटा दिया गया है| इसमें भी भगवान चतुर्भुज रूप में प्रगट होते है और कौसल्या जी के अनुरोध पर बाल रूप में दिखते है|

जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल |

चार अरु आचार हर्षजुत राम जनम सुखमूल ||190||

नौमी तिथि मधु मास पुनीता | 

सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता ||

मध्य दिवस अति सीट न घामा | 

पावन काल लोक बिश्रामा ||

....

सुर समूह बिनती करि पहुंचे निज निज धाम |

जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम || 191 ||

समापन में वाल्मीकी रामायण के अंश नही उद्धृत करने पर इस आलेख को पूर्ण नही माना जा सकता है| बालकाण्ड के 18वे सर्ग में इसका वर्णन है|

ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतुनां षट समत्ययु: |

ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ |8|

नक्षत्रेअदितिदेवात्ये स्वोच्चसंस्थेषु पंचसु |

ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सा |9|

प्रोद्यमाने जगन्नाथंसर्वलोकनमस्कृतम |

कौसल्याजन्यदरामं दिव्यलक्षणसंयुतम |10|

 

निष्कर्ष

भगवान श्री राम का जन्म चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मध्यान्ह में हुआ था| उस समय पांच ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र उच्च स्थान में विराजमान थे| सूर्य मेष राशि में था और लग्न में चन्द्रमा के साथ वृहस्पति उपस्थित थे| आधुनिक गणना के अनुसार यह संयोग 5114 ईसा पूर्व में संभव है, जो भगवान राम के जन्म का वर्ष माना जा सकता है|

 

आज राम नवमी है और भगवान राम आ गए है | जय श्री राम|

धन्यवाद|

डॉ हिमांशु शेखर

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