गुरुवार, 27 जून 2024

कैसे लिखें, अच्छी कविता..? भाग 02

कविता कैसे लिखें – संवेदना, विषय और विचार 

लेखक: प्राणेंद्र नाथ मिश्र 


कविता लेखन पर एक धारावाहिक ब्लॉग जिसको कई भागो में प्रकाशित किया जाएगा| इसका श्रीगणेश "कविता क्या है?" से भाग 01 में किया गया| अनुक्रमणिका के हरेक अवयव का आगे आने वाले पोस्ट में विस्तार किया जाएगा| आज प्रस्तुत है भाग 02। एक संग्रहनीय पोस्ट श्रृंखला, जो पाठको को कविता से जोड़ पाएगी| आप अपने सुझाव और प्रश्न, टिप्पणी के माध्यम से व्यक्त कर सकते है| लेखक उस पर अपने विचार जरूर देंगे| 

ब्लॉग नियंत्रक: डॉ हिमांशु शेखर 

अनुक्रमणिका :
कविता क्या है
2 कविता के घटक
 - संवेदना, शब्द, भाषा, बिम्ब, प्रतीक, अलंकार, रस 
3 कविता का स्वरूप
    
बाह्य स्वरूप
       
aa छंद – मात्रा (meter), यति , गति, क्रम एवं तुकांत
    
b आंतरिक स्वरूप
       
bb भाव, प्रयोजन, कल्पना शक्ति और उद्देश्य

काव्य का अंतर्वस्तु उसके बाह्य और आनतारिक स्वरूप से बनता है।

4 अंतःकरण की शक्ति –
        रस,
        अलंकार ,
        शब्द शक्ति ,
        अभिव्यंजना  
5 शब्दों की ध्वन्यात्मकता – भाषा
छंद का ,महत्व

7  कविता के प्रकार- छंदमुक्त और छंदयुक्त ,,, तुकांत अतुकांत

8  छंद के अंग :

छन्द के निम्नलिखित अंग है-
(1)चरण /पद /पाद
(2) वर्ण और मात्रा  (मात्रा कलन  – ॐ नीरव )
(3) संख्या क्रम और गण
(4)लघु और गुरु
(5) गति
(6) यति /विराम
(7) तुक

9 छंदमुक्त कविता के गुण
10 ग़ज़ल एवं आजाद नज़्म
11 लुप्त मात्राएं एवं काव्य दोष

 

कविता लिखने से पहले रचनाकार को कुछ विचार आने चाहियें जैसे कि आप किस विषय पर कविता लिखना चाह रहे हैं, किस विधा मे लिखना चाह रहे हैं। जैसे दोहा, छंद, मुक्त छंद, चौपाई अकविता आदि। गद्यात्मक कविता, हरिगीतिका गीतिका या अन्य कोई छंद या ग़ज़ल आदि। 

जब एक विचार या विषय हमारे मस्तिष्क मे आ जाता है, तब हम उस पर सोचते हैं कि क्या लिखने से वह दृश्य शब्दों के माध्यम से दिखने लगेगा, किस तरह के शब्दों का प्रयोग करना चाहिए, ताकि प्रभावी लगे और शब्दों को किस क्रम मे रखें कि छंद, ताल और लय तथा गति बन सके। फिर हम लिखना आरंभ करके शब्दों को जोड़ते हैं, सोचते हैं, शब्द खोजते हैं, उन्हें “मैच” कराते हैं, शब्दों में भाव लाते हैं और अंत मे तुक लगा कर छंद बनाने की कोशिश करते हैं।  

अतः कविता लिखने के लिए कुछ मुख्य घटक आवश्यक हैं:

- 1. संवेदना, 2. शब्द, 3. भाषा, 4. बिम्ब, 5. प्रतीक, 6. अलंकार, 7. रस  

आइए, देखते हैं थोड़ा संवेदना के बारे मे और कुछ उदाहरणों से समझते हैं कि संवेदना या भाव किस तरह कविता की प्रेरणा होते हैं। 

1 संवेदना: 

साहित्य की मूल प्रेरणा संवेदना है। जब कोई मर्माहत व्यक्ति अपने मन की वेदना को शब्दों द्वारा किसी को नहीं बता देता, उसके मन को शांति नहीं मिलती। संवेदना का यही तत्व गायन और संगीत में भी देखा जाता है, जहां सुनने वाले भाव विभोर हो जाते हैं। 

कविता के मूल में संवेदना है, राग तत्व है। यही संवेदना कवि के हृदय को सृष्टि से जोड़ती है और वह ब्रह्मांड के किसी भी घटन या अघटन को कल्पित कर के अपने मन की संवेदना उसमे भरता है तथा उसे शब्दों के द्वारा दूसरे के मन तक पहुंवचाता है।

लेकिन, संवेदना क्या है.. किसी भी वस्तु, भाव और स्थति के हृदय पर पड़े प्रभाव को संवेदना कहते हैं। जब किसी कवि की वेदना इतनी घनीभूत हो जाती है कि उसमे मैं और दूसरे के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है तब वह यह समझने लगता है कि जैसे सब कुछ उसी पर घटित हो रहा है। ऐसी दशा मे वह शब्दों के द्वारा काव्य मे उसे चित्रित करता है जिसे सुनकर या पढ़कर कोई भी संवेदन शील व्यक्ति का हृदय उस रस मे मिल जाए तब कहा जाता है कि काव्य या रचना बहुत प्रभावी है। 

   मान लीजिए आप सड़क पर जा रहे हैं, चिलचिलाती धूप मे सड़क के किनारे एक अपाहिज, कमजोर और बूढ़ा भिखारी असहाय अवस्था मे आप की तरफ हाथ बढ़ाता है। उसकी स्थिति, उसके चेहरे के भाव को देख कर आप का मन पसीज जाता है और आप उसे कुछ रुपये निकाल कर दे देते हैं। यहाँ .. देखिए कि भिखारी को देखने से पहले आप के मन मे करुणा की कोई भवना नहीं थी, आप मस्ती मे अपनी धुन मे चले जा रहे थे, लेकिन भिखारी की दशा देखा कर आप के अंदर की संवेदना जग उठी और आप करुणा से भर गए। 

अब अगर यही दृश्य कविता मे लिख कर आप उस स्थति को शब्दों से बना सकें, तो आप की कविता संवेदनशील होगी और आप की रचना भावपूर्ण मानी जाएगी॥ निराला जी की कविता “भिक्षुक” मे ऐसा ही एक दृश्य शब्दों मे देखिए:

वह आता--

दो टूक कलेजे को करता, पछताता

पथ पर आता।

पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,

चल रहा लकुटिया टेक,

मुट्ठी भर दाने को — भूख मिटाने को

मुँह फटी पुरानी झोली को फैलाता —

दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए,

बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते,

और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाए।

भूख से सूख ओठ जब जाते

दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?

घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।

चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,

और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए !     (निराला)

एक भिखारी और उसके आस पास का दृश्य इन शब्दों से समपूर्ण चित्रित हो जाता है और ऐसा 

लगता है जैसे हम देख रहे हों, महसूस कर रहे हों..  

ये संवेदनाएं रस के नाम से पहचानी जाती हैं। हमारा मन करुणा, रौद्र, क्रोध, वीर, शोक, प्रेम, वियोग आदि भावनाओं से भरा रहता है। इन्हीं भावनाओं मे शब्द को ढालने से कविता का भाव दूसरे को मन को छूता है। 

संवेदना, भाव, रस, कविता के शब्दों मे दृश्य बनाते हैं और पाठक या श्रोता के पास भेजते हैं। रचनाकार अपने भावों, संवेदनाओं को शब्दों के माध्यम से शब्द चित्र बनाता है और पाठक के मन मस्तिष्क मे वह भाव उत्पन्न कर के, उस दृश्य को चित्रित करके उसके भावों को छू लेता है। 

जिस दिन अर्घ्य दिया तुमने  

आँसू से अपने, रो कर के

मैं पीठ मोड कर सुबक पड़ा 

तुमको जीवन मे खो कर के 

वह पीड़ा मेरी अंतिम थी ..  

वह कविता मेरी, अंतिम थी..                 (प्राणेन्द्र नाथ मिश्र)

यहाँ वियोग की धार कविता के इस छंद मे प्रतीत हो रही है। वियोग, बिछोह, करुणा शब्दों से प्रतीत हो रहे हैं। शब्दों की महत्ता, शब्दों का क्रम, भाव को उचित रूप से प्रेषित करता है। 

कविता की रचना करने से पहले वे विचार, जिनको लेकर कविता का स्वरूप देना है, पहले आना चाहिए और फिर शब्दों को चुनना चाहिए। आप देखेंगे कि कुछ शब्द करूण, कुछ हास्य, कुछ शोक, कुछ वीर, कुछ क्रोध, कुछ शांत आदि भावों की संवेदना प्रकट करते हैं। अतः विचार और भाव लाने के लिए अपना अगला कदम शब्दों पर जाना चाहिए।

संवेदनाएं, हमारे मन की अनुभूतियों को जागृत करती हैं। मनुष्य में क्रोध, घृणा, हास्य, करुणा, प्रेम, वियोग, वात्सल्य, भक्ति, वीरता, वैराग्य आदि अनुभूतियाँ समय समय पर परिस्थिति के अनुसार जागृत होती हैं। इन अनुभूतियों को जब रचनाकार अपनी रचना या काव्य के ज़रिए पाठकों या श्रोताओं मे जागृत कर देता है तब रचना उच्च कोटि की मानी जाती है।  

देखिए.. दो पंक्तियों में सुभद्रा कुमारी चौहान ने कितना सुंदर वीर रस का शब्द चित्र रखा है 

बुंदेले मुँहबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।

वहीं पर जीवन संघर्ष को राजस्थानी कवियत्री रजनी मोरवाल ने कितना मार्मिक दृश्य चित्रित किया है.. 

दिन दहाड़े भूख से नीलाम होती शर्म है 

भूख ही तो आदमी का धर्म है 

भूख बचपन, भूख यौवन, भूख जीवन की हवा  

भूख मे सिमटा बुढ़ापा, भूख मरघट की दवा     

                                                (रजनी मोरवाल)

सामाजिक विसंगतियाँ और भ्रूण हत्या के ऊपर कोख के अंदर पल रही बच्ची का मार्मिक कथन देखिए..

मेरी सूरत देखि न जानी, 

मेरी कीमत कुछ न जानी

बहुज्ञा- अभिशाप समझ के, 

कोख से फेंक देने की ठानी।     

भारतेन्दु जी ने भारत दुर्दशा पर टीस देते हुए कहा है.. 

रोवहउँ सब मिलि आवहउँ भारत भाई/ भारत दुर्दशा अब देखि न जाई । 

शोषित वर्ग के ऊपर चार पंक्तियाँ दिनकर जी की संवेदना देखिए:

श्वानों को मिलता दूध वस्त्र

भूखे बालक अकुलाते है

माँ की हड्डी से चिपक – ठिठुर, 

जाड़े की रात बिताते हैं।  

इसी तरह हास्य का दृश्य और शब्दों का प्रयोग देखिए 

आधुनिका पत्नी मिली, पट्टी के पड़ी नकेल 

वाक शास्त्र मे पास थी, पाक शास्त्र में फेल 

पाक शास्त्र मे फेल, रसोई कर दी चालू 

स्वेटर बुनने लगी, जल गए सारे आलू। 

पुस्तक खोली, पति से बोली – जल्दी आओ    

जले हुए आलुओं पर बरनॉल लगाओ।              (काका हाथरसी)

इस तरह सबसे पहले आप को कविता के विषय मे विचार करके, उसमे प्रयोग होने शब्दों को चुनना है और ऐसे शब्द हों जो आप के विचार के अनुसार आप के मन के भावों को कविता मे प्रस्तुत कर सकें। 

अगले पोस्ट मे हम शब्दों के प्रयोग के बारे मे देखेंगे कि किस तरह शब्द कविता के आचार, व्यवहार और विचार को बदल देते हैं! किस तरह शब्द अर्थ को अनर्थ कर सकते हैं और अनर्थ को सार्थक कर सकते हैं।  

.........

प्राणेंद्र नाथ मिश्र 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ब्लॉग का अद्यतन पोस्ट :

कैसे लिखें, अच्छी कविता..? भाग 02

पिछले 30 दिनों में सबसे ज्यादा देखा गया पोस्ट