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गुरुवार, 20 जून 2024

यात्रा वृत्तांत चकराता

लेखिका: डॉ पूजा भारद्वाज

हेलो दोस्तों कहां हैं सभी, आओ चलो चलते है एक ओर यात्रा पर, पहाड़ों पर ,बादलों के पास हरियाली के पास यानी उत्तराखंड में एक और सुंदर जगह चकराता ,हम और हमारे एक दोस्त और उनकी फैमिली भी साथ गई थी क्यूंकि बाहर जाओ तो दोस्तों और फैमिली के साथ रास्ते का मज़ा दुगना हो जाता है ,तो सोमवार की सुबह 6 बजे निकल गए हम चकराता के लिए दिल्ली से आप गूगल बाबा की सहायता से सीधे पहुंच सकते हैं,हमारी गाड़ी भी सरपट रोड पर दौड़ रही थी, और चल रहे थे मेरे पसंदीदा गाने , सोनू निगम,इस कदर प्यार ...किशोर कुमार  के गाने जिससे बच्चे बोर हो रहे थे और वो सुन रहे थे अपने गाने इयरबर्ड लगा कर,अब समय हो चुका था 9:30 पेट भी कुछ बोल रहा था ,

मगर हम ने सीधे अपने रिसॉर्ट का मैप डाला था ,तो सीधे हम सहारनपुर होते हुए विकास नगर के रास्ते में आ गए , आप सोचोगे तो क्या हुआ हुआ ये हमने सोचा देहरादून नाश्ता करेंगे मगर देहरादून  पड़ा ही नहीं , और रास्ते में चीतल,हल्दीराम,बीकानेर छोड़ सीधे चले जा रहे थे अब क्या होता अब रिसॉर्ट तो भूल गए ,अब टारगेट था एक अच्छा सा होटल या ढाबा  खाने के लिए जो मिला विकास नगर से 2 किलोमीटर पहले डिवाइन होटल ,यदि आप के साथ भी ऐसा हो तो आप भी यहां खाना खा सकते है अच्छा होटल है , आलू पराठें , छाछ अच्छी थी अब हमारा पेट फुल था अब हम चल पड़े अपने रिसोर्ट की तरफ जहां हम पहुंचे दोपहर 2 बजे समय से ही पहुंच गए हमारे रिसोर्ट का नाम था साइड्स गैलेक्सी रिसॉर्ट , एक पहाड़ी की चोटी पर बना हुआ, बहुत सुंदर प्रकृति के बिल्कुल नजदीक , नजारे बहुत सुंदर मानो धरा ओर गगन मिल रहे हो ,यदि आप वीडिओ देखना चाहते हो तो मेरी इंस्टा पर रील देखना ,फिर शाम को प्रॉपर्टी घूमे, लोगों से मिले खाना खाया और सो गए ।

सुबह उठे पूरी एनर्जी के साथ नाश्ता किया ,तैयार हुए  अब हम रेडी थे टाइगर फाल्स जाने के लिए नेटवर्क issue बहुत है तो गाने तो चले नहीं मगर बाहर के नज़ारे बहुत अच्छे थे तो डेढ़ घंटे की रोड ड्राइव कर के हम पहुंचे टाइगर फाल्स की जगह वहां से थोड़ी सी ट्रेकिंग कर के टाइगर फाल्स तक जा सकते थे तो हमने की ट्रेकिंग और पहुंच गए चकराता की पहली डेस्टिनेशन पर नजारे सुंदर थे ,काफी लोग नहा रहे थे ,चेंजिंग रूम भी थे बहुत ऊंची पहाड़ी से गिरता टाइगर फाल्स ,मगर crowd था मैं तो नहीं नहाने गई बहुत ठंडा पानी था पैर जरूर डाले और 2 मिनट के लिए मेरे पैर सुन हो गए क्यूंकि पानी बहुत ठंडा था , बच्चे तो बच्चे होते हुए उन्होंने खूब एंजॉय किया पहाड़ों पर जाओ और मैग्गी न खाओ ऐसे कैसे हो सकता है हमने वहीं मैग्गी खाई चाय पी पर चाय अच्छी नहीं थी फिर निकल गए हम कुछ खाने के लिए चकराता माल रोड  पर फेमस चांदना mom's पर आधा घंटे की ड्राइव कर के पहुंच गए मगर माल रोड अच्छा बिल्कुल नहीं था मगर अच्छे थे चांदना शॉप के मोमोज जो हम खाने गए थे तो जाना सफल हुआ और यम्मी सी कोल्ड कॉफी तो यदि आप को मोमोस पसंद है तो आप यहां आ सकते है नहीं तो समय बरबाद न करे और आगे चले तो हम पहुंच गए अपने रिसोर्ट और शाम के समय पहुंचे sunset प्वाइंट पर समय था तो हमने वहां खूब मस्ती की रोड खाली था तो रील बनाई ,फोटो के बिना तो सब अधूरा है फिर रूम पर चले गए अगले दिन हम सब को कई जगह जाना था ,ये बुधवार की सुबह हमेशा की तरह जल्दी उठी और चाय तो 8 बजे मिलेगी , तो मैंने अपनी इंस्टेंट चाय बनाई जिसकी रेसिपी मेरे चैनल पर है ,चाय पी और रिसेप्शन पर गई ट्रैवल पेंपलेट लिया और आज की यात्रा का प्लान बनाया ,  budher caves जहां पांडव अपने वनवास के दौरान छुप कर रहे थे, कंसार वन ,देवबन एक ऐसा वन क्षेत्र जहां देवदार के विशाल वृक्ष थे , रामताल उद्यान।  नाश्ता किया और निकल गए, कम से कम दो से ढाई घंटे का सफर था नज़ारे बहुत सुंदर जो आप मेरी फोटो ग्राफी में देखेंगे और वीडिओ मेरी इंस्टा id पर वाह प्रकृति की सुंदरता देखते ही बनती थी,धरती और गगन एक दूसरे से मिलने आतुर थे और तेज हवाएं कानों में एक संगीत सा सुना रही थी और बारिश सरगम की ताल छेड़ रही थी इतना सुंदर दृश्य , मैं बारिश में निकली और मेरे कदम भी झूमे बिना नहीं रह सके ,छम छम...........



नजरों के बीच हम पहुंच गए budher  caves पर हमारा दुर्भाग्य कनासर  पहुंचते ही जिस जगह से हम तीन किलोमीटर की ट्रेकिंग करनी थी  budher caves  पहुंचने के लिए तभी बहुत तेज़ बारिश और ओले गिरने लगे , रास्ता छोटे छोटे चिकने पत्थरों वाला था पानी से दुर्गम ही गया था , बस हमारा caves का सफर बारिश ने रोक दिया , हम ने  वहीं देव वन में फोटो क्लिक किए और  प्रकृति बारिश के मज़े लेते हुए  चकराता चौक  पहुंच गए ,इस ठंडे मौसम में  गरमा गर्म चाय और पहाड़ों की तीखी सी मेगी , वाह क्या बात थी और ओले तो इतने बड़े बड़े गिरे कि मानो छोटी टेबल टेनिस की बाल, थोड़ी देर रुके फिर हम पहुंच गए अगले स्पॉट  चिरमिरी टॉप वहां जा कर ऐसा लगा कि लद्दाख में आ गए ,colorfull झंडे काले काले  बादल मौसम 12  से 10 डिग्री होगा बहुत ठंड गर्म कपड़े  हम ऊपर ले नहीं गए थे  नजारे कैसे थे आप मेरी फोटो में देखना क्यूंकि कुछ  बातों का वर्णन नहीं किया जा सकता ..




अब हम रिसोर्ट आ गए .. थकान बहुत थी डिनर किया और सो गए अगले दिन घर निकलना था ,सुबह के सूरज के साथ उठी और मेरी मस्ती चालू मैंने पति देव से कहा चलो ट्रेकिंग कर के आते हैं जवाब सब जानते हैं , और वो ट्रेकिंग हमारे रिसोर्ट से ही निकल रही थी मगर मना कर दिया मैं कहा मानने वाली थी बच्चों को उठाया और ट्रेकिंग के लिए चली गई ।

वहां से  हिमालय की चोटियां दिख रही थी, ऊंची चोटी पर थे हम फिर नीचे आ गए .. तैयार हुए नाश्ता किया और घर के लिए निकल लिए....आ अब लोट चले .......ये थी चकराता थी आखरी रील 

कैसा लगा मेरा यात्रा वृत्तांत कमेंट जरूर करे


डॉ पूजा भारद्वाज

रविवार, 28 अप्रैल 2024

होली , प्रकृति और आत्मा

लेखिका: डॉ.रश्मि चौबे

होली का दिन था ।सुबह से सभी बड़ों और छोटों को होली की बधाई देना लेना हो रहा था। आज रोशनी के घर उसकी कुछ सहेलियां आई हुई थीं होली मिलने रोशनी के पैर में चोट आने के कारण और उसके परिवार में  सूतक है(किसी की मृत्यु या जन्म होने पर 10या13दिन लगता है)।कल होली खेलने सोसाइटी में नहीं गई इसलिए वहां की सारी सखियां  मिलने चली आई थीं। रंगों में मिले केमिकल के कारण या खाने की वजह और गीले होने के कारण किसी को बुखार,तो किसी की आँख में रंग चला गया, चाय पीते हंसी ठहाकों के साथ सभी जिंदगी के रंगों और रूपों पर चर्चा कर रहे थे ।सभी कह रही थीं पिछली बार की होली कितनी अच्छी थी रोशनी सचमुच बहुत अच्छी व्यवस्था थी और हमने बहुत इंजॉय किया था । रोशनी अचानक उनके जाने के बाद एकांत में बैठी तो जैसे कलम ने कहा कि, विचारों के रंगों को पन्नों पर उडेल दो, होली है भाई। रोशनी पिछली होली की और इस बार की होली की तुलना करने लगी ।पिछले वर्ष अपने कर्तव्यों को निभाते हुए सोसायटी के लोग अच्छे से होली का आनंद उठा पाऐं इस व्यवस्था के कार्यभार को सुचारू रूप से निभाने में लगी हुई उसने  समाज में व्याप्त अनेक रंगों में स्त्री पुरुषों की मानसिकता समझी ।कुछ लोग सहयोग दे रहे थे उसके साथ तो, कुछ उसकी बनी बनाई बात को बिगाड़ने में लगे हुए थे ।सच ,आज समाज में एक के साथ एक ग्यारह नहीं बल्कि एक से घटकर शून्य करने की मानसिकता अधिक प्रबल है। स्वयं के नाम के लिए इंसान अच्छे से अच्छे कार्यक्रम में जहर फैलाने में माहिर दिखाई देते हैं । तभी उसे याद आया कि ,कुछ दिन पहले ही ज्यादातर युवा जो उससे मिले थे, उसके पूछते ही कि आप क्या कर रहे हैं? उत्तर में कहा कि, मनोविज्ञान में एम.ए. कर रहे हैं ,इसका बहुत स्कोप है आंटी।इन शब्दों का अर्थ शायद समझ आज आ रहा था । इस बार की होली में पैरों में चोट के कारण वह होली खेलने के लिए तो जा नहीं पाई।रोशनी ने सोचा बचपन से ही उसे होली कहां पसंद थी पर शादी के  बाद होली खेल लेती थी पर आज विचार उसे कुछ और ही समझना चाहते थे।

 उसे अचानक में घर में अलग-अलग तरह के रंग दिखाई देने लगे सर्वप्रथम उसे खाने की टेबल पर रखे हुए  हरेअंगूर और केसरिया संतरे, लाल सेब और पीला पपीता फलों में अलग-अलग रंग टेबल पर दिखाई देने लगे फिर जैसे ही वह भोजन की व्यवस्था देखने गई तो उसे दिखा कि, हरे रंग की मूंग दाल ,काले रंग की उड़द दाल, लाल रंग की मसूर और पीला चना और सब्जियां भी अलग-अलग रंग की रंगों से भरी हुई फ्रिज खुला तो लाल टमाटर, हरी मिर्च, बैगनी रंग का बैगन ,पीले रंग का नींबू अलग-अलग रंग दिखाई दे रहे थे।सतरंगों से सजा हुआ घर फिर जैसे ही वह बालकनी में गई तो प्रकृति कह उठी देखा, तुमने पौधों में पानी देकर मुझे पीले गेंदे ,नीली अपराजिता ,लाल रुकमणी के फूल ,सफेद सदाबहार और हरे पौधे से सतरंग कर दिया है तुमने मुझे रंग दिऐ हैं इसलिए आज मैंने  तुम्हारे घर को रंगों से भर दिया है । उसकी नजर हाथ में पहने नवरत्न और रंगे हुए नाखूनों पर भी पडी रंग ही रंग दिखाई देने लगे ।शाम हुई तो सामने चाँदनी की रोशनी के रंग दिखाई दिए।उसे याद आया सुबह सूरज भी होली खेलने आया था फिर ,सामने की भी चारों ओर जो कारें सड़क पर चल रही थीं उनकी लाइटें थीं। उसके प्रकाश ने उसका ध्यान आकर्षित किया, लाल रंग की और सफेद रंग की कार की लाइट दिख रही थी वो सब प्रकृति में रोशनी भरते हुए लग रहे  थे और कहीं ना कहीं रोशनी आत्मा को भी प्रकाशित कर रही थी।

 अचानक गुड़िया ने कहा आंटी आपकी चाय और अंकल की कॉफी दोनों एक ही टेबल पर  रख दिए हैं और साथ ही साथ मोबाइल पर ग़ज़ल गूंज रही थी और  पति साथ-साथ गा रहे थे ‘आप जिनके करीब होते हैं ,वह बड़े खुशनसीब होते हैं ।समझ में आ गया था ईश्वर ने समझा दिया था कि, होली तन को नहीं मन को भी रंगती है।रोशनी को महसूस हो रहा था कि , परमात्मा के रंगों ने चारों ओर से रंग दिया है । बेटे ने भी वीडियो काल पर इंद्रधनुष (रेनवो) दिखाकर कहा माँ विदेश में होली नहीं होती पर ये रंग आपके लिए हैं। रोशनी भाव विभोर हुई।दूसरे दिन सुबह-सुबह रोशनी की भाभी (जोदिल्ली वीजा बनवाने आई थी रोशनी के घर ठहरी थी)ने उठकर कहा कि,दीदी मैं आपके मंदिर में पूजा कर देती हूं। रोशनी के कहा ,कहा सब रंगों के फूल तोड़कर प्रभु को अर्पित कर दो और फिर वो गाने लगी ‘आप जिनके करीब होते हैं, वह बड़े खुशनसीब होते हैं ‘पंकज उदास कलाकार तो चले गए पर उनके गाए शब्द बहुत कुछ समझा गए।

जिस दिन मैंने ये लेख लिखा मेरे पतिदेव ने एयरपोर्ट से फूलों की पिचकारी का फोटो भेजा जैसे मेरे लेख पर मोहर लग गयी।

धन्यवाद।

डॉ.रश्मि चौबे , गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत

गुरुवार, 25 अप्रैल 2024

वनवासा रिसार्ट

लेखिका: डॉ पूजा भारद्वाज


दोस्तों  तो हम और हमारी धन्नो  (टोयोटा इनोवा क्रिस्टा)  निकल चुके है ,एक नई मंजिल की ओर जहां मिलेंगी  कुछ मन लुभाने वाली यादें और नए चेहरे मुस्कान लिए हुए 

अरे अरे ये बताना तो भूल ही  गई कि हम जा कहां रहे हैं, हम जा रहे हैं देवभूमि उत्तराखण्ड के ऋषि कन्न्व की नगरी कोटद्वार के पास  "वनवासा " जो एक बहुत खूब सूरत रिजॉर्ट जो स्थित है  कोटद्वार से कुछ किलोमीटर दूर काला गढ़ टाइगर रिजर्व में, तो देरी किस बात की शुरुवात करते है अपने सफर की...

28/3/2024 को हम  सुबह ६ बजे  बजे निकल पड़े , मेरठ होते हुए  करीब 8:30 से हम चीतल ग्रैंड होटल पहुंच गए,पर किसी को भूख नही लग रही थी,तो हमने सिर्फ प्रसाधन इस्तेमाल किया और आगे निकल गए , खतौली चीनी मिल हमारे रास्ते में पड़ी और जगह जगह पर गुड बनाने वाले कोल्हू चल रहे थे , हम 90s के गीत सुनते और गुनगुनाते हुए जा रहे थे ,अब करीब 10:00 बजे  बिजनौर से आगे भूख लगने लगी उसके बाद हमें अच्छा ढाबा या कोई  रेस्ट ओ रेंट नहीं मिला , खाना खाना करते हुए हम पहुंचे कीरतपुर वहां मिला हमको एक पंजाबी ढाबा और बस आलू प्याज के स्वादिष्ट परांठा और छाछ मीठी लस्सी अब पेट भरा और जान में जान आई।

11:30 बजे हम कणव नगरी कोटद्वार पहुंच गए ,कोटद्वार में हनुमान जी का प्रसिद्ध मंदिर भी है , सिद्धबली मंदिर जिसकी मान्यता है की यहां जो कोई अपना बोला हुआ प्रसाद भूल जाता है तो यहां आ कर प्रसाद बांटने से सब काम सिद्ध हो जाते है ,जय बजरंग बली


कोटद्वार से शुरू होती है पहाड़ों की चढ़ाई , क्योंकि वहां से 70 किलोमीटर दूर था   वनवासा रिजॉर्ट और यहां पहुंचने का रास्ते काला गढ़ टाइगर रिजर्व से हो कर गुजरता है,आगे चले तो कुछ छोटे छोटे गांव मिले और फिर शुरू होता है "कालागढ़ टाइगर रिजर्व " जिस के बीच में से होते हुए अपनी मंजिल तक पहुंचना था,रास्ते में जंगल के बीच हमने यादें संजोने के लिए कुछ तस्वीरें ली।


और करीब 2:20 पर हम रिजॉर्ट  पहुंचने वाले ही थे कि देखा  वहां भू स्खलन होने की वजह से एक विशाल पत्थर सड़क के बीच में पड़ा है और उसको हटाने के लिए विस्फोट की तयारी हो रखी है , वहा एक आदमी खड़ा था  वो पास आया और बोला की आप अपनी गाड़ी पीछे ले जाओ ,यहां ब्लास्ट किया जा रहा है ,पहले तो लगा आना बेकार हो गया पर उसने कहा ब्लास्ट के बाद आप जा सकते हो ,अब गाड़ी यू टर्न तो हो नहीं सकता था तो सब ने गाड़ी रिवर्स लेली ,और कुछ ही सेकंड में इतनी जोरदार धमाका हुआ की सब डर गए , फिर रास्ता साफ हुआ और हम सभी  पहुंच गए अंततः अपने वनवासा रिजॉर्ट 😀 आ कर स्वागत पेय से स्वागत हुआ और कमरे दिए गए सामान रखा और लंच का समय हो चुका था ,लंच किया और आराम किया क्योंकि 7 घंटे गाड़ी में थकान तो होती है, बच्चे स्विमिंग पूल में चले गए ,7 बजे से मैजिक शो देखा,फिर लाइव म्यूजिक एंड डिनर ,डिनर के बाद सब ने मिलकर कुछ खेल खेले और एक दिन इस तरह एक समाप्त हुआ। वनवासा रिजॉर्ट  का रोजाना का एक रात्रि का चार्ज ७ से ८ हजार रुपए है जो के एक कपल के लिए है, जिसमें,ब्रेक फास्ट डिनर,लंच तीनों मिलते है जब कभी सुकून और शांति की तलाश हो तो एक बार जरूर आए अपने दोस्त और परिवार के साथ 

दूसरे दिन  हम सब लंच के लिए करीब 9: 45 पर पहुंचे ,लंच किया वहा कई और लोग आए हुए थे ,तो जैसा मेरा व्यवहार है मैं उन लोगों से बात करने चली गई ,जहां मेरी मुलाकात एक पहाड़ी परिवार से हुई , वैसे तो वह लोग दिल्ली में रहते है , मेरी बात हुई कुसुम नेगी जी से बात हुई ,उन्होंने बातों बातों में बताया हम यहां अपने गांव जागर करने आए थे ,जागर के बाद हमने सोचा थोड़ा आराम कर लिया जाए तो रिजोर्ट आ गए ,

मैंने कहा :जागर ये क्या होता है पहली बार नाम सुना ,

कुसुम जी ने बताया कि जागर मतलब जागरण हमारे यहां  पूरे कुनबे के साथ मिलकर ये पूजा की जाती है ,कोई कहीं भी रह रहा हो पर उसे जागर के लिए आना पड़ता है

इसमें ग्राम देवताओं की पूजा की जाती है ,जिसमें हम अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए और कुछ गलती हुई हो उसके लिए माफी मांगते है और पूजा करते है,मुझे वैसे भी ऐसी बातें जानने का शौक है मैं उनकी बातें बड़ी गौर से सुन रही थी ,

कुसुम जी ने मुझे एक बात और बताई की एक परिवार पूरी तरह संपन्न था ,अचानक उनके घर बीमारी बढ़ने लगी ,तो वह अपने गांव आए और खोज ने लगे की हम से क्या गलती हुई है या क्या भूल रहे है हम जिस की वजह से ये सब हो रहा है कई महीने बीत गए,एक दिन अचानक एक १० साल की लड़की सामने आई और बोली की तुम इतने साल मुझे ही ढूंढ रहे हो ,मैं तुम्हारी दादी हूं , मैं भी सरप्राइज़ थी ये क्या है, क्योंकि आज कलयुग में कोई इन बातों को नहीं मानता पर फिर भी अपनी मान्यता है ,मैंने पूंछा फिर क्या हुआ कुसुम जी हंस गई ,मैंने कहा प्लीज़ बताओ मैं कल चली जाऊंगी ,फिर कहा आप से मुलाकात होगी ,तो उन्होंने बताया की वह लड़की इतना बोलते ही भाग गई उन्होंने उसका पीछा किया ,तो लड़की बदली बदली नज़र आई ,जब जाने लगे तो फिर बोली की तुम्हारे दादा जी ने दूसरी औरत  की वजह से  मुझे घर से निकल दिया था और मेरा हक तुम लोग निभा रहे हो अब तुम सब  अपने पूरे खानदान को लेकर आओ जागर करो तब शांत सब ठीक होगा फिर उन्होंने अपने सात पीढ़ी के लोगों को जागर के लिए सूचना दी सब गांव में एकत्र हुए और पूजा अर्चना की।

बस मस्ती ,बहुत सारी फोटो क्लिक की,वहां रिजॉर्ट से थोडी सी दूरी पर एक दुकान थी मैं वहां चली गई  और उनसे बात की पहाड़ों पर रहन सहन की ओर दिन में  स्विमिंग पूल का ओर शाम  को लाइव म्यूजिक और डीजे  पर नृत्य का आनंद लिया और खूब नृत्य किया।अगले दिन ब्रेकफास्ट कर के निकल ही रहे थे की बहुत तेज तूफ़ान और खूब तेज बारिश हो गई और थोड़ी ठंड बढ़ गई थी ,जिसे कहते है गर्मी में ठंड का एहसास 😂 फिर हम निकले घर के लिए और कुछ 30 किलोमीटर जा कर हमें रास्ते में बंदरों का झुंड दिखा और दिखा बारहसिंगा  क्योंकि वो रास्ता जंगल का होता है कालागढ़ टाइगर रिजर्व का मगर टाइगर नही दिखा। और हम एक सुखद अनुभव लेकर अपने घर आ गए , क्योंकि जितना सुकून और शांति अपने घर में है कही  नही।

ये थी मेरे सफ़र की कुछ यादें जो हमेशा मेरे साथ रहेंगी ,आप भी पढ़े और कैसा लगा जरूर बताएं।

धन्यवाद।

डॉ पूजा भारद्वाज

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2024

पुराना पेड़ फल नहीं छांव ठंडी देता है

 लेखिका: रेखा चौहान 'राज'

     एक रात की बात है ठंड बहुत ज्यादा थी एक बुजुर्ग महिला जिसका नाम बुगली था गांव के एक घर के  सामने आकर चारपाई बिछाकर आराम कर रही थी उस घर की महिला की नजर उस पर पड़ी वहीं पर उस महिला सुखबीरी देवी का घर था तो उसने देखा कि वह बुजुर्ग महिला चारपाई पर लेटी थी।

   😲ठंड बहुत ज्यादा थी महिला घर से बाहर आई उसने देखा कि इस कंपकंपाती ठंड में महिला सिकुड़ते हुए सोने की कोशिश कर रही है फिर उसने उस बुजुर्ग महिला से पूछा कि आप यहां क्यों लेटी हैं बुजुर्ग महिला ने भावुक होते हुए अपनी कहानी बताईं और कहा कि उसके पास बच्चे नहीं है और परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से मकान बिक चुका है कोई कमाने वाला भी नहीं है।

   इसलिए मैं यहां बुग्गी ( भैंसा बुग्गी)  ने नीचे लेट कर ठंड से बचने की कोशिश कर रही हूं महिला को उस बुजुर्ग महिला की बातों पर बड़ा ही आश्चर्य हुआ और उसने बड़े  नर्म स्वभाव के साथ अपने घर के अंदर आने के लिए कहा। फिर धीरे-धीरे करके वह बुजुर्ग महिला परिवार के सभी सदस्य के साथ घुल मिल गई और घर के बच्चों के प्रति उसका स्नेह और बच्चों का प्यार उसके प्रति बेहद मार्मिक रहा बच्चों में वह बुजुर्ग महिला अपनी सारी परेशानियां भूल गई कई सालों तक वह महिला उसी परिवार के साथ रही। 

 बच्चों को नित नई कहानियां सुनाती जीवन के प्रति संघर्ष और हौसलों के साथ आगे बढ़ाने की प्रेरणा देती, घर की लड़कियों को  संस्कार और सभ्यता के बातें बताती, जीवन में आगे बढ़ाने के  विवाह से पहले और विवाह के बाद कैसे दोनों परिवारों को जोड़ कर रखना है ऐसी बहुत सी बातें वह घर के बच्चों के साथ अन्य लोगों को भी अपने जीवन के अनुभव सुना कर जीवन के प्रति प्रेरित करती।

सच कहूं तो उन लड़कियों में से एक लड़की मैं भी थी मैं अपनी सारे कजिन भाई बहनों के साथ स्कूल कॉलेज से बाद में उस महिला के साथ खाने से लेकर हर चीज पर बातचीत करते। कभी-कभी जब उस महिला की आज भी याद आती है तो लगता है कि काश इस समय भी कोई ऐसी महिला मेरे घर में होती और मेरे बच्चों को आने वाले जीवन के प्रति कहानियां सुनाती।

तो शायद एक बार फिर संस्कृति जी उठतीं।

  दे किसी का साथ पुण्य कमाएं

  अपने लिए न सही बच्चों के लिए थोड़ा नेक कर्म कर जाएं

  अंतिम समय में भी वह महिला उसी परिवार के साथ थी जब उसका देहांत हुआ तो उसके परिवार के कुछ लोगों को बुलाकर उसका अंतिम संस्कार किया गया । इस तरह बुजुर्ग महिला का दर्द समझते हुए पूरे परिवार ने उसका साथ दिया।

    उस परिवार के बच्चे तो आज भी उस बुजुर्ग महिला की बातों को याद रखते हुए उसके द्वारा दिया ज्ञान जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा मान कर चलते हैं बुजुर्ग अपने हो या पराए हमेशा ज्ञान ही मिलता है।☺️

संस्कृति को संजोए रखना

बुजुर्गो को घर में बनाएं रखना।

पुराना पेड़ फल न सही छांव ठंडी देता है

इस सभ्यता आर्यावर्त की बनाएं रखना।


(मेरी मां और एक बुजुर्ग महिला का साथ जो की बरसों तक चला)

धन्यवाद।

रेखा चौहान 'राज'

गुरुवार, 11 अप्रैल 2024

कनपुरिया बौराई यादें

रेखा अस्थाना

हम कनपुरिया हैं  ।जैसा कि आप हमारी बोली से ही समझ जाते होंगे।

हमारी दादी जब कोई  बच्चा शरारत करता था या बेवकूफ़ी करता या उसे कोई  बात समझ न आती थी तो वे कहा करती थी---

"का भइया बौराए गए  हो का"बचपन में तो अनुमान लगा लिया था कि बौराना मतलब पागलपन या पागल हो गए  हो।

    हमारी दादी ने कभी हमसे सीधी बात नहीं कही हमेशा लोकोक्ति या मुहावरे का इस्तेमाल करके ही बात कही।नतीजा दसवीं कक्षा तक हमें ये दोनों चीजे याद नहीं करनी पड़ी।और विशेष योग्यता का विषय हिन्दी ही रहा बोर्ड  से।

अब हम आगे बढ़ते हैं ज्यों ज्यों शिक्षा बढ़ती गई  मैं हर शब्द की उत्पत्ति और व्याकरण  जानने की चेष्ठा करने लगी।तब जाकर पता चला कि बौर मायने कलियाँऔर उसमें नाम धातु लग कर वह बन गया बौराना अर्थात पागलाना या पागलपन।बसंत ऋतु में बहुत से वृक्षों में बौर आते हैं सारे कीट-भृंग पक्षीगण मद- मस्त होकर पगलाए फिरते हैं। तब मुझे  अपनी दादी माँ की याद आई। बसंत ऋतु के मादक बयार में अपने -अपने साथी को ढूंढते फिरते हैं ।और मीठी आवाज से वातावरण को गुंजायमान करते हैं।हमारी आयु वर्ग के लोगों को ही इस बात का पता होगा क्योंकि उन्होंने अमराई देखी है।

अहा! अमराई  के नीचे खाट बिछाकर बैठ कर टप्पकौए आम का स्वाद अगर मालूम है तो वह केवल हमारी आयु के लोग समझते हैं हम लोगों ने ही ही देखा है।

भई आप चाहे कितनी ही बुराई करो कानपुर  की जो मस्ती कानपुर के लोग करते हैं न वह मुझे अन्य कहीं नहीं दिखी।

तो कहने का मतलब ये है कि हमने दादी जी से पाँचवीं कक्षा तक आते आते सारी लोकोत्ति व मुहावरे सब सीख गए। बचपन में हमारे हिन्दी के गुरुजी का इतना अच्छा प्रभाव पड़ा कि मैं हिन्दी की ही अध्यापिका बनी।

गुरुजी का नाम था प॔0 उपदेश नारायण  उपाध्याय 🙏जिन्हें आज तक न भूल पाई हूँ।

  अवसर मिले तो कानपुर अवश्य  घूम आइएगा😊😊


🌳इमली का दरख्त और चने की झाड़ 🌳

     

इमली--यह एक विशाल  ,मजबूत और आर्थिक लाभ  देने वाला वृक्ष  होता है।यह लगभग 20से25वर्षो में फल देने योग्य  होता है।इसका फल खट्टा होता है और चटनी व साॅस बनाने  के काम आता है।इसकी आयु लगभग 200वर्ष की होती है।पर लोग इसे घर के आसपास या घरों में नहीं लगाते हैं।उनका मानना है कि यह जीवन में खटास घोलता है।अंधविश्वासी मानते हैं कि इसमें भूत प्रेत का वास होता है।पर इसके फलों का तो बहुत बड़ा व्यापार होता है।हमें अंधविश्वास की ओर नहीं जाना चाहिए। 

अब हम आगे हैं रबी की फसल चने की  ओर। काले चने जिनका उपयोग इसके अंकुरित होते ही होने लगता है।।इस पौधे की ऊंचाई लगभग एक से डेढ़ फुट की होती है। इसकी मुलायम, स्निग्ध पत्तियाँ लोग चटनी के साथ खाते हैं जिसके बहुत से फायदे हैं।यह पौधा झाड़ नुमा होता है कोमल भी और जब हम किसी ज्ञानी जन की अधिक  तारीफ  करते हैं तो उनको कहते सुना होगा कि हमें चने की झाड़ में मत  चढ़ाइए।

क्यों कि ऐसा हो ही नहीं  सकता है।

इन्हीं काले चने से बेसन भी बनाया जाता है।अब मैं विस्तार में तो नहीं जाऊँगी ।पर हमारी दादी कहा  करती थी,"बहुत इताराए की जरूरत नाहीं है नहीं तो चने की झाड़ पर बैठ  जहीओ।"

अगर कोई  कमी तो क्षमा करिएगा  पाठकगण। 

हम तो बस गुरुजी के आदेश के अनुसार  लिख  लेते हैं बस।कोई खेती बाड़ी तो है नहीं हमारी।पर हमारे समय  की पढ़ाई बहुत उपयोगी थी।😊🌳🦨

धन्यवाद।

रेखा अस्थाना

रविवार, 17 मार्च 2024

पतंग

 

लेखक: हरि प्रकाश गुप्ता सरल

 

कहां जा रहे हो बदलू ने पूंछा मैंने कहा सकूर भाई की दुकान जा रहा हूं। वहां से पतंग और मांझा लेकर आयेंगे।आज छुट्टी का दिन है तो आज तो सामने वाली पहाड़ी पर पतंगबाजी होगी। इसलिए जल्दी जा रहा हूं क्योंकि सकूर भाई तो खुद हाथों से शानदार पतंग और मंजा बनाते हैं। लच्छू की दुकान में तो मशीन से बनी पतंगें और मांझा बिकता है। हाथों से बनाया गया मांझा और पतंग की बात ही कुछ और है। हवा में बहुत लहराती है।

हमने बदलू से कहा तुम भी चलो यार दोनों पतंग और मांझा खरीद कर पहाड़ी पर चलेंगे और पतंगबाजी का मजा लेंगे। बदलू को कहने की देर थी कि तुरंत अब्बा से पैसे लेकर सकूर भाई की दुकान हम दोनों चल दिए।सकूर भाई के घर के पास भी मैदान में उन्हीं की बनाई पतंगें उड़ती और आसमान को छूते हुए दिखाई दे रहीं थीं। पतंगों को आसमान में उड़ता देख ऐसा कौन होगा जिसे आनंद न आता हो।हम और बदलू तो पतंगबाजी के दीवाने कहलाते थे। स्कूल से आये और बस्ता पटका खटिया पर, न खाने की फिक्र और न नहाने की। कभी कभी पतंग पहले की होती तो लेकर चले जाते उड़ाने मैदान में और मित्रों के साथ आसमां में उड़ाते और आपस में पतंगों को लड़ाते।बदलू की पतंग सदा कट कर जमीन में गिर जाती और मेरी पतंग भी कभी कभी कट जाती और दूर जाकर गिरती।जिसे लेने के लिए मोहल्ले के बालक दौड़ कर जाते और पतंग को ले आते। कभी कभी की बालक मिलकर उसे अपनी ओर खींच तान करते जिससे वो फट जाती और बेकार हो जाती। आज सकूर भाई

तो जिंदा नहीं हैं पर उनका पतंग बाजी का धंधा चल रहा या बंद हो गया।पर आज भी जब पतंग की बात चलती तो बचपन के वो सुहावने दिन याद करते करते आंखों में आंसू आ जाते क्यों कि न तो बदलू का कई सालों से पता और न सकूर भाई  का।

धन्यवाद|

 

हरि प्रकाश गुप्ता सरल

गुरुवार, 14 मार्च 2024

स्वामिभक्ति

 लेखक: डॉ.अवधेश तिवारी "भावुक" 

     मेरा संस्मरण एक सच्ची घटना पर आधारित है। मेरी उम्र उस समय 10 वर्ष थी। मैं कक्षा 5 में पढ़ रहा था। मेरे घर एक भैंस थी जिसे पूरा परिवार लक्ष्मी कहकर बुलाता था। मैं उसे बहुत प्रिय था।

       स्कूल से आने के बाद मैं उसे घास चराने गाँव के पास नदी के किनारे ले जाता था। विशेष बात यह थी कि मैं उसकी पीठ पर बैठ कर गन्ना चूसता रहता और वो घास खाती। जब तक मैं उसकी पीठ पर न बैठता, न उसे चैन मिलता न मुझे। लक्ष्मी मुझे अपने पँड़वे से भी ज्यादा प्यार करती थी।

     एक दिन मैं उसकी पीठ पर बैठकर गन्ना चूस रहा था, वो नदी के किनारे घास खा रही थी। अचानक लक्ष्मी पानी पीने नदी में उतर गई, शायद वो भूल गई कि मैं उसकी पीठ पर बैठा हूँ।

लक्ष्मी पानी पीते हुई नदी में डुबकी लगा ली। मैं चिल्लाया,पर तब तक देर हो गई थी। मैं डूबने लगा। तब तक लक्ष्मी को अपनी गलती का एहसास हो चुका था।

लक्ष्मी ने अपने दाँतों से मेरे कपड़े पकड़े और मुझे खींचकर किनारे लाई और जोर -जोर से चिल्लाने लगी। मैं डर और घबराहट से बेहोश हो चुका था। लक्ष्मी की दर्द भरी आवाज को सुन आसपास खेतों में काम करने वाले लोग दौड़कर आये, मेरे पेट में गये पानी को निकाला और मुझे लेकर मेरे घर आए।

     लक्ष्मी की आँखों से आँसू लगातार बह रहा था, हमारे पीछे-पीछे वह भी घर आई। मेरी अम्मा को देखकर वो और जोर - जोर से चिल्लाने लगी।

अम्मा को लोगों ने सारी बातें बताई।अम्मा ने केवल इतना ही कहा?लक्ष्मी तुझसे ये उम्मीद नहीं थी।उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।वो वहीं दरवाजे पर बैठ गई।जब तक मैं ठीक होकर उसके पास नहीं आया, उसने कुछ नहीं खाया।

दूसरे दिन मैं उसको चराने नहीं ले गया।मेरा छोटा भाई लक्ष्मी को ले जाने लगा लेकिन वो नहीं गई,उसे उसने बहुत मारा।

लेकिन फिर भी वो नहीं गई।

जब मैंने उसके चिल्लाने और भाई की आवाज सुनी तो मैं अम्मा के साथ गया और उसकी पीठ पर बैठा।

     तब वो शांत हुई और मेरे साथ चरने गई।

जब तक वो जिन्दा रही हम सब उसे परिवार के सदस्य की तरह समझते और मानते रहे।

आज भी लक्ष्मी की याद मेरे मनोमस्तिष्क में मेरी माँ की तरह विद्यमान है।

कहने को वो भैंस थी किन्तु मेरे लिए किसी भी रूप में मेरी अम्मा से कम न थी...

धन्यवाद|

 

डॉ.अवधेश तिवारी "भावुक"

सोमवार, 11 मार्च 2024

पुराने समय का कैलेण्डर

 लेखिका: शैली

 

एक महीना गया, साल का आखिरी माह आया। मैंने दीवार पर टँगे कैलेंडर का पन्ना फाड़ने के लिए हाथ बढ़ाया ही था, कि एक डरी हुई, कुछ मिन्नत करती हुई आवाज कानों में पड़ी, "अब मुझे और मत फाड़ो, बस पलट दो! एक माह ही जिन्दा रहना है, अकेला क्यों करती हो? तुम तो बुजुर्ग हो, काग़ज़ के कैलेण्डर पर ही दिन साल महीने देखे हैं। मुझे सुन कर गुस्सा आया कि सुबह सुबह कौन नामुराद मुझे बुज़ुर्ग कह रहा है! ध्यान से देखा तो सामने के कैलेंडर को हिलता और बोलता हुआ पाया। जिसका नवम्बर महीने का पन्ना मैं फाड़ कर अलग करने जा रही थी। चौंक कर ध्यान से उसकी बातें सुनाने लगी। दर्द भरी आवाज़ में कैलेंडर आगे कहने लगा - “तुम और तुम्हारी पीढ़ी तो जन्म से मुझे जानती है। तुम्हारे जन्म की तारीख़ और समय, मेरे ही किसी बुजुर्ग के सीने पर, तुम्हारे पिता ने लिखा होगा, तुम्हारी छठी, और बारहवीं की तारीखों को याद से घेरा होगा।कैसे तुम्हें याद नहीं रहा कि हर साल दिसम्बर से सभी नए कैलेंडर के जुगाड़ में लग जाते थे। कोई सामान खरीदना होता तो हिसाब लगाते थे कि थोड़ा रुक कर खरीदेंगे तो साथ में नए साल का कैलेंडर भी मिल जाएगा। घर में नया कैलेंडर आना किसी उत्सव जैसा होता था। घर के सभी सदस्य नए कैलेंडर में क्या बना है देखने के लिए जाते थे। वो भी क्या दिन थे, जब हम कैलेंडरों की भी आपनी हैसियत होती थी। ड्राइंग रूम, बेड रूम, और पूजा घर में हमारा स्थान सुरक्षित रहता था। जब नया कैलेंडर टाँगा जाता तभी पुराना उतरता था। अगर नया नहीं मिला तो कई घरों में पुराने की तारीखें हटा कर चित्र वाले हिस्से का उसी खूंटी पर अधिकार बना रहता था, मज़ाल थी कि हमारी जगह कोई और चीज़ टाँगी जाय।

 कैलेंडर भिन्न-भिन्न क़िस्म के होते थे, एक पन्ने, तीन पन्ने, छह पन्ने और सबसे क़ीमती बारह पन्ने वाले। किसी में भगवान की तस्वीर, कोई फूलों वाला। पहाड़ों, झरने और सीन-सीनरी वाला। बच्चों की, सुन्दरियों की फोटो वाले, तो सिनेमा के हीरो-हीरोइन के चित्रों वाले कैलेंडर भारी माँग में होते थे।

मर्फी रेडियो, बाटा, हिमालया, डाबर और डनलप वगैरह के कैलेंडर बहुत चर्चित रहते थे। दुकान वाले अपने नियमित ग्राहकों को बड़े गोपनीय ढंग से ये कैलेंडर पकड़ाते थे, ग्राहक भी धीरे से इन्हें बैग में सरकाते थे, हा! हा! हा! मानो कैलेंडर नहीं कोक की पुड़िया हो। सच, आज भी उन गौरवशाली दिनों की याद से सीना चौड़ा हो जाता है।

जब पिता घर में उस क़ीमती कैलेंडर साथ आते थे तो घर के माहौल में भी गर्मी जाती थी। जिस उत्सुकता से घर वाले डॉक्टर से पूछते हैं कि नवजात बेटी है या बेटा, उसी उत्सुकता से कैलेण्डर खोला जाता था। अगर 12 पन्नों का सुन्दर कलाकृति का कैलेंडर होता तो सभी के चेहरे खुशी से खिल जाते, मानो लाॅटरी लग गई हो। उसे ड्राइंग रूम में स्थान मिलता। अगर कहीं एक पन्ने का हुआ और भगवान की फोटो हुई, तो दादी की बाँछे खिल जातीं, हाथ जोड़ कर प्रणाम करती और उसे पूजा घर या अपने कमरे में पलंग के पास टांगतीं।

इसी तरह हनुमानजी का कैलेण्डर शाखा और अखाड़े जाने वाले भाई के हिस्से में, हीरो-हीरोइन वाले बड़ी दीदी के (किसी पुरुष सदस्य की हिम्मत नहीं होती थी कि उसकी माँग कर लें, बस ललचा के रह जाते थे), बच्चों या बाल कृष्ण, बाल- हनुमान आदि के कैलेंडर बच्चों के कमरे में स्थान पाते थे।

कुछ में सिर्फ़ तारीखें होती थीं, कोई चित्र आदि नहीं। ऐसे कैलेंडर ज्यादातर बैंकों के होते थे। इन्हें किचन में टाँगा जाता था, जिसपर दूध, अखबार का हिसाब,नौकर और कामवाली के नागे और किसी के घर की शादी, मुण्डन, जनेऊ आदि के निमंत्रण की तारीखें, अलग-अलग रंग के पेंसिलों से घेरी जाती थीं, (यानी आजकल के गूगल कैलेंडर के रिमाइंडर  का काम करती थीं)

एक और कैलेंडर होता था, पंचांग वाला, जिसमें, ठाकुर प्रसाद पंचाग-कैलेंडर सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय था। इसी से मिलते-जुलते कुछ और भी कैलेंडर होते थे, जो इसकी लोकप्रियता को भुनाने के मकसद से, इसी की नकल करके बनाए जाते थे। इससे तीज त्यौहार, व्रत-उपवास, दिशा-शूल, राहुकाल और छिटपुट शुभ मुहुर्त देखे जाते थे।

कैलेंडर घर की सजावट का हिस्सा होते थे जैसे आजकल पेंटिंग आदि होते हैं। किसी-किसी घर में में तो कैलेंडरों को बिल्कुल झण्डियों की लड़ी सा टाँगा जाता था। छोटे-मोटे ढाबे, चाय, पान-सिगरेट की ढाबलियों की दीवारें तो कैलेंडर से लगभग ढकी रहती थीं। इसमें वर्ष का कोई विचार नहीं किया जाता था,बहुत उदारता से नए कैलेंडर को पुराने वालों को ऊपर नीचे करके, जगह बना कर टाँग दिया जाता था, जैसे भीड़ भरी बस में नए यात्रियों को खड़े होने की जगह, लोग थोड़ा खिसक कर, दब कर बना देते हैं। यदि नहाती हुई सुन्दरी, प्रेमी युगल या सिने-तरीका की फोटो हो तो कैलेंडर फटने तक दीवार के साथ एकाकार हो जाता था। सच! हम कैलेंडर्स के जीवन का वह स्वर्णिम युग था।

अब तो उन दिनों की याद ही बाकी है…..ये मोबाइल क्या आया, लोग हमें भूल गए। गूगल कैलेंडर ने हमारी जगह लेली।रही सही कसर इस मुई एलेक्सा ने पूरी कर दी। अब किसी को हमारा बेसब्री से इंतजार नहीं रहता। कुछ पुराने ज़माने के लोग आज भी मुझे ले जाते हैं, पर घर के किसी गुमनाम कोने में टांग देते हैं, बस कभी-कदा गृहस्वामिनी हम पर कुछ लिख देती है, या मालिक बैंक हॉली-डे देख लेते हैं। हमारी तो कोई इम्पोर्टेंस ही नहीं रही!  हम दीन-हीन से टँगें किसी की आहट का इन्तजार करते रहते हैं। सुबह-सुबह कोई हमें प्यार से नहीं देखता। अब किसी बच्चे या किशोरी के मुलायम हाथ हमें नहीं छूते, ये जीना भी कोई जीना है लल्लू???

मन से विजय माल्या के लिए आशीष निकलता है। किंग-फ़िशर कैलेंडर और कैलेंडर गर्ल्स ने एक बार मृतप्राय कैलेंडरों को कुछ साँसें दी थीं। हम उत्साहित थे कि कुछ लोग सबक लेंगे और पूनम पाण्डे नहीं तो राखी सावंत जैसी बोल्ड गर्ल्स को लेकर कुछ नए कैलेंडर आयेंगे। लेकिन हमारे दुर्भाग्य से वो देश छोड़ कर भागते वक्त वेंटीलेटर पर पड़े हमारे कुनबे की ऑक्सीजन बन्द कर गया

 भविष्य की कोई आशा ही नहीं रही। 2024 यानी डिजिटल दुनिया की ओर बढ़ता नहीं छलांग लगाता एक और कदम। फोर-जी, फाइव-जी के बाद ये AI…हमारे ताबूत पर आखि़री कील है। अब तो काग़ज़ पर प्रिंट का ज़माना ही बीता जा रहा है। न्यूज-पेपर, पत्र-पत्रिकायें भी अपने मौत की घड़ियाँ गिन रहे हैं। एक महीने बाद मैं इतिहास का हिस्सा बन जाऊँगा, तुम्हारी आने वाली नस्लें, हमें घर में नहीं शायद म्यूज़ियम में देखेंगी। मैं बहुत दुःखी हूँ, पल-पल अपनी मौत को आता हुआ देख रहा हूँ…., जिन्दगी के बचे दिनों को तुम्हारे परिवार के साथ काट लेने दो। पहली जनवरी को तो यूँ भी अलविदा कहना है। अभी मेरे इस पन्ने को मेरे साथ रहने दो। मैं कैलेंडर अब बीते वर्ष का नहीं, बीते समय की बात हूँ…..

 

धन्यवाद| 

शैली

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कैसे लिखें, अच्छी कविता..? भाग 02

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