लेखिका: शैली
एक महीना गया, साल का आखिरी माह आया। मैंने दीवार पर टँगे कैलेंडर का पन्ना फाड़ने के लिए हाथ बढ़ाया ही था, कि एक डरी हुई, कुछ मिन्नत करती हुई आवाज कानों में पड़ी, "अब मुझे और मत फाड़ो, बस पलट दो! एक माह ही जिन्दा रहना है, अकेला क्यों करती हो? तुम तो बुजुर्ग हो, काग़ज़ के कैलेण्डर पर ही दिन साल महीने देखे हैं। मुझे सुन कर गुस्सा आया कि सुबह सुबह कौन नामुराद मुझे बुज़ुर्ग कह रहा है! ध्यान से देखा तो सामने के कैलेंडर को हिलता और बोलता हुआ पाया। जिसका नवम्बर महीने का पन्ना मैं फाड़ कर अलग करने जा रही थी। चौंक कर ध्यान से उसकी बातें सुनाने लगी। दर्द भरी आवाज़ में कैलेंडर आगे कहने लगा - “तुम और तुम्हारी पीढ़ी तो जन्म से मुझे जानती है। तुम्हारे जन्म की तारीख़ और समय, मेरे ही किसी बुजुर्ग के सीने पर, तुम्हारे पिता ने लिखा होगा, तुम्हारी छठी, और बारहवीं की तारीखों को याद से घेरा होगा।” कैसे तुम्हें याद नहीं रहा कि हर साल दिसम्बर से सभी नए कैलेंडर के जुगाड़ में लग जाते थे। कोई सामान खरीदना होता तो हिसाब लगाते थे कि थोड़ा रुक कर खरीदेंगे तो साथ में नए साल का कैलेंडर भी मिल जाएगा। घर में नया कैलेंडर आना किसी उत्सव जैसा होता था। घर के सभी सदस्य नए कैलेंडर में क्या बना है देखने के लिए आ जाते थे। वो भी क्या दिन थे, जब हम कैलेंडरों की भी आपनी हैसियत होती थी। ड्राइंग रूम, बेड रूम, और पूजा घर में हमारा स्थान सुरक्षित रहता था। जब नया कैलेंडर टाँगा जाता तभी पुराना उतरता था। अगर नया नहीं मिला तो कई घरों में पुराने की तारीखें हटा कर चित्र वाले हिस्से का उसी खूंटी पर अधिकार बना रहता था, मज़ाल थी कि हमारी जगह कोई और चीज़ टाँगी जाय।
कैलेंडर भिन्न-भिन्न क़िस्म के होते थे, एक पन्ने, तीन पन्ने, छह पन्ने और सबसे क़ीमती बारह पन्ने वाले। किसी में भगवान की तस्वीर, कोई फूलों वाला। पहाड़ों, झरने और सीन-सीनरी वाला। बच्चों की, सुन्दरियों की फोटो वाले, तो सिनेमा के हीरो-हीरोइन के चित्रों वाले कैलेंडर भारी माँग में होते थे।
मर्फी रेडियो, बाटा, हिमालया, डाबर और डनलप वगैरह के कैलेंडर बहुत चर्चित रहते थे। दुकान वाले अपने नियमित ग्राहकों को बड़े गोपनीय ढंग से ये कैलेंडर पकड़ाते थे, ग्राहक भी धीरे से इन्हें बैग में सरकाते थे, हा! हा! हा! मानो कैलेंडर नहीं कोक की पुड़िया हो। सच, आज भी उन गौरवशाली दिनों की याद से सीना चौड़ा हो जाता है।
जब पिता घर में उस क़ीमती कैलेंडर साथ आते थे तो घर के माहौल में भी गर्मी आ जाती थी। जिस उत्सुकता से घर वाले डॉक्टर से पूछते हैं कि नवजात बेटी है या बेटा, उसी उत्सुकता से कैलेण्डर खोला जाता था। अगर 12 पन्नों का सुन्दर कलाकृति का कैलेंडर होता तो सभी के चेहरे खुशी से खिल जाते, मानो लाॅटरी लग गई हो। उसे ड्राइंग रूम में स्थान मिलता। अगर कहीं एक पन्ने का हुआ और भगवान की फोटो हुई, तो दादी की बाँछे खिल जातीं, हाथ जोड़ कर प्रणाम करती और उसे पूजा घर या अपने कमरे में पलंग के पास टांगतीं।
इसी तरह हनुमानजी का कैलेण्डर शाखा और अखाड़े जाने वाले भाई के हिस्से में, हीरो-हीरोइन वाले बड़ी दीदी के (किसी पुरुष सदस्य की हिम्मत नहीं होती थी कि उसकी माँग कर लें, बस ललचा के रह जाते थे), बच्चों या बाल कृष्ण, बाल- हनुमान आदि के कैलेंडर बच्चों के कमरे में स्थान पाते थे।
कुछ में सिर्फ़ तारीखें होती थीं, कोई चित्र आदि नहीं। ऐसे कैलेंडर ज्यादातर बैंकों के होते थे। इन्हें किचन में टाँगा जाता था, जिसपर दूध, अखबार का हिसाब,नौकर और कामवाली के नागे और किसी के घर की शादी, मुण्डन, जनेऊ आदि के निमंत्रण की तारीखें, अलग-अलग रंग के पेंसिलों से घेरी जाती थीं, (यानी आजकल के गूगल कैलेंडर के रिमाइंडर का काम करती थीं)।
एक और कैलेंडर होता था, पंचांग वाला, जिसमें, ठाकुर प्रसाद पंचाग-कैलेंडर सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय था। इसी से मिलते-जुलते कुछ और भी कैलेंडर होते थे, जो इसकी लोकप्रियता को भुनाने के मकसद से, इसी की नकल करके बनाए जाते थे। इससे तीज त्यौहार, व्रत-उपवास, दिशा-शूल, राहुकाल और छिटपुट शुभ मुहुर्त देखे जाते थे।
कैलेंडर घर की सजावट का हिस्सा होते थे जैसे आजकल पेंटिंग आदि होते हैं। किसी-किसी घर में में तो कैलेंडरों को बिल्कुल झण्डियों की लड़ी सा टाँगा जाता था। छोटे-मोटे ढाबे, चाय, पान-सिगरेट की ढाबलियों की दीवारें तो कैलेंडर से लगभग ढकी रहती थीं। इसमें वर्ष का कोई विचार नहीं किया जाता था,बहुत उदारता से नए कैलेंडर को पुराने वालों को ऊपर नीचे करके, जगह बना कर टाँग दिया जाता था, जैसे भीड़ भरी बस में नए यात्रियों को खड़े होने की जगह, लोग थोड़ा खिसक कर, दब कर बना देते हैं। यदि नहाती हुई सुन्दरी, प्रेमी युगल या सिने-तरीका की फोटो हो तो कैलेंडर फटने तक दीवार के साथ एकाकार हो जाता था। सच! हम कैलेंडर्स के जीवन का वह स्वर्णिम युग था।
अब तो उन दिनों की याद ही बाकी है…..। ये मोबाइल क्या आया, लोग हमें भूल गए। गूगल कैलेंडर ने हमारी जगह लेली।रही सही कसर इस मुई एलेक्सा ने पूरी कर दी। अब किसी को हमारा बेसब्री से इंतजार नहीं रहता। कुछ पुराने ज़माने के लोग आज भी मुझे ले जाते हैं, पर घर के किसी गुमनाम कोने में टांग देते हैं, बस कभी-कदा गृहस्वामिनी हम पर कुछ लिख देती है, या मालिक बैंक हॉली-डे देख लेते हैं। हमारी तो कोई इम्पोर्टेंस ही नहीं रही!
हम
दीन-हीन से टँगें किसी की आहट का इन्तजार करते रहते हैं। सुबह-सुबह कोई हमें प्यार से नहीं देखता। अब किसी बच्चे या किशोरी के मुलायम हाथ हमें नहीं छूते, ये जीना भी कोई जीना है लल्लू???
मन से विजय माल्या के लिए आशीष निकलता है। किंग-फ़िशर कैलेंडर और कैलेंडर गर्ल्स ने एक बार मृतप्राय कैलेंडरों को कुछ साँसें दी थीं। हम उत्साहित थे कि कुछ लोग सबक लेंगे और पूनम पाण्डे नहीं तो राखी सावंत जैसी बोल्ड गर्ल्स को लेकर कुछ नए कैलेंडर आयेंगे। लेकिन हमारे दुर्भाग्य से वो देश छोड़ कर भागते वक्त वेंटीलेटर पर पड़े हमारे कुनबे की ऑक्सीजन बन्द कर गया…।
भविष्य की कोई आशा ही नहीं रही। 2024 यानी डिजिटल दुनिया की ओर बढ़ता नहीं छलांग लगाता एक और कदम। फोर-जी, फाइव-जी के बाद ये AI…। हमारे ताबूत पर आखि़री कील है। अब तो काग़ज़ पर प्रिंट का ज़माना ही बीता जा रहा है। न्यूज-पेपर, पत्र-पत्रिकायें भी अपने मौत की घड़ियाँ गिन रहे हैं। एक महीने बाद मैं इतिहास का हिस्सा बन जाऊँगा, तुम्हारी आने वाली नस्लें, हमें घर में नहीं शायद म्यूज़ियम में देखेंगी। मैं बहुत दुःखी हूँ, पल-पल अपनी मौत को आता हुआ देख रहा हूँ…., जिन्दगी के बचे दिनों को तुम्हारे परिवार के साथ काट लेने दो। पहली जनवरी को तो यूँ भी अलविदा कहना है। अभी मेरे इस पन्ने को मेरे साथ रहने दो। मैं कैलेंडर अब बीते वर्ष का नहीं, बीते समय की बात हूँ…..
धन्यवाद|

वास्तविक स्वरूप बताती रचना 👌
जवाब देंहटाएंबेहद खूबसूरत लिखा है
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