रविवार, 31 मार्च 2024

हिंदू नव वर्ष

लेखिका: अनामिका संजयअग्रवाल *मुस्कान *

भारतीय संस्कृति का पवित्र पर्व,वर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को माना जाता है।कहा जाता है कि भगवान ब्रम्हा ने इसी दिन सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी।इसी दिन भगवान विष्णु ने दशावतार में से पहला मत्स्य अवतार लेकर प्रलय काल में अथाह जल राशी में से मनु की नौका को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया था। प्रलयकाल समाप्त होने पर मनु से ही नई सृष्टि की शुरूआत हुई।

      नव वर्ष में नये सिरे से प्रकृति के नये जीवन की शुरूआत होती है।बसंत की बहार आती है।लगभग इन्ही दिनों 21 मार्च को पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरा करती है। उस वक्त दिन रात बराबर है।इसी दिन से धरती में प्राकृतिक नव वर्ष प्रारंभ होता है 

     बसंत के मनमोहक सौंदर्य की आभार यह प्रकृति रानी हरीतिमा की चुनरी ओढ़े नई दुल्हन की भांती संवर जाती है। खेतों में खिली है सरसों के पीले पीले फूल और गेहूं की बालियां मंद मंद लहराते हुए झूमती है निर्जर सघन घने जंगलों में खिले पलाश और सेमल के फूलों का अनुपम सौंदर्य मिलकर प्रकृति की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं आम्र के वृक्षों में आम्र मंजरियों से लदे वृक्षों में नई-नई सुंदर कोपलें आती हैं । कोयल की मधुर ध्वनी भौरों को आकर्षित करने लगती है चारों और प्रकृति का ही उत्सव चल रहा होता है वातारण आनंदित होकर आनन्द की अमृत वर्षा करने लगती हैं। रंगीन रंगोत्सव साथ नव संवत्सर का आगमन होता है।

प्राचीन काल में ऋतु और राशि परिवर्तन के ऐसे समय स्वयं को स्वस्थ और निरोगी रखने के लिए  सात्विक आहार व्रत उपवास से मन और शरीर दोनों को शुद्ध और सशक्त उपक्रम है। शीत और ग्रीष्म ऋतु का समागम होता है तब शरीर में वात पित्त और कफ का समायोजन घट बढ़ जाता है।तो रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है इसलिये इस समयकाल में नीम की कोमल पत्तियों को खाने से स्वास्थ्य लाभ होता है। इस समय अचानक गर्मी बढ़ जाने से बुखार मलेरिया और चेचक फैलता है अपच और उल्टी से बचने के लिये हल्काभोजन करना चाहिये ।इस समय कीट पतंगा मच्छरों का आतंक बढ़ जाता है जीससे बिमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है।वाइरस फैलते है इन सब से बचने के लिये नीम और कपूर जलाकर सकारात्मक उर्जा फैलाकर पर्यावरण को शुद्ध करते है।

पशु पक्षी और जीवजंतु में नव जीवन के संचार से नवांकुर प्रस्फुटित होने लगते हैं।

सरसो और गेहूं की लहलहाती फसलों को देखकर किसान खुशी से झुमते नाचते गाते है।

     इस समय सभी कुछ नया होता है। बच्चों की पढ़ाई का एक सत्र खत्म होता है। नये जोश के साथ नयी किताबें नयी अध्ययन सामग्री के साथ नयी कक्षायें प्रारंभ होती हैं। इसी समय 1अप्रेल से नये सत्र के वित्तीय काम प्रारंभ होते हैं। 

   वर्तमान में विश्वविख्यात स्वयंसेवी सामाजिक  संगठन राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केशवराम बलिराम हेडगेवार जी की जयंती भी इसी दिन मनाई जाती है

    भारत वर्ष के गौरव को पुनः विश्व पटल पर लाने के लिये पश्चिम अंधानुकरण के भ्रमजाल से निकलकर अपनी हिन्दू सभ्यता के नव वर्ष को मनाने की परंपरा को अपनाना चाहिये और नयी पीढी को भी यही करने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये। 

धन्यवाद।

अनामिका संजयअग्रवाल *मुस्कान *

बुधवार, 27 मार्च 2024

माटी को बचाना है

विनोद शर्मा

माटी की उपयोगिता क्या है?  इसको इस तरह से समझा जा सकता है कि यह जीवन के पांच तत्वों में से एक है | यदि माटी (भूमि) नहीं है तो जीव का कोई भी अस्तित्व ही नहीं होगा बल्कि यों कहे तो अतिशयोक्ति नही होगी कि जीव की उत्पत्ति ही नहीं हो पाएगी | ब्रह्मांड में केवल पृथ्वी पर ही जीवन है, यह परम सत्य है | संपूर्ण जगत के जीवों में मनुष्य ही एक अकेला विवेकशील प्राणी है जो अच्छे बुरे को पहचानता है | पांच तत्वों/भूतों से बने तन को चलाने या जिंदा रखने के लिए इन्हीं पांच तत्वों या इनसे ही उत्पन्न वस्तुओं या सीधे रूप से सेवन कर जीव अपना जीवन यापन करता है या ऐसा कहे कि इन पर ही आश्रित रहता है | मनुष्य को छोड़कर सभी प्राणियों में वस्तुओं के भंडारण या एकत्रीकरण की दक्षता नहीं होती है | वह तो केवल अपने वर्तमान के लिए भोजन को जुटाने के लिए व्यस्त रहते हैं, जबकि मनुष्य में वस्तुओं को एकत्र करने/ इकट्ठा करने/ धरोहर के रूप में संजोने की क्षमता के साथ-साथ अपनी असीमित इच्छाओं को पूरा करने के लालच में हर प्रकार के दोहन करने में बना/लगा रहता है और वस्तुओं के संरक्षण के विषयों को भी दरकिनाक कर देता है | इसी कारण से मनुष्य पृथ्वी पर प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं जैसे-धातुएं, वनस्पति, वन्य जीव, जल यानी नदियां झील सागर इत्यादि के संतुलन को बिगाड़ने में भी संकोच नहीं करता है | मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो खुद मनुष्यों को और दूसरे प्राणियों को अपने लिए प्रयोग में लाता है |

पृथ्वी पर जन्में सभी जीवों के भरण पोषण के लिए यह धरती/पृथ्वी भरपूर वस्तुएं प्रदान करती है | इसके अनुसार एक खाद्य श्रृंखला का निर्माण होता है, किंतु मानव धरा पर ऐसा प्राणी है जो प्रकृति द्वारा बनाए गए नियमों में अपनी सुविधा अनुसार परिवर्तन करता रहता है जिसके परिणाम स्वरुप प्रकृति का संतुलन कई बार बिगड़ने की कगार पर पहुँच जाता है या बिगड़ जाता है | देखा जाए तो इसका प्रभाव स्वयं मनुष्य के ऊपर भी अन्य जीवों के साथ-साथ पड़ता है, मगर वह ऐसा कभी नहीं सोचता है कि मुझ पर भी इन कृत्यों का क्या प्रभाव पड़ेगा | सही मायने में हमारी यह धरा सभी का भरण पोषण करने में पूर्णत: सक्षम है, लेकिन यह किसी के लालच को पूरा कभी नहीं कर सकती/कर पाती है और समय-समय पर चेताती भी/ आगाह भी करती रहती है | मनुष्य केवल अपने ही विषय में सोचता या विचार करता रहता है जिसके अनुसार वह पृथ्वी पर रहकर अपने क्रियाकलापों को कार्यान्वित करता है |

वर्तमान काल में संसार की जनसंख्या वृद्धि के कारण पृथ्वी पर उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बहुत बड़ा दबाव पृथ्वी पर ही बढ़ता जा रहा है | सभी को खाने के लिए अन्न इत्यादि की आपूर्ति हेतु मनुष्य ने आधुनिक तकनीकी ज्ञान में वृद्धि कर इसका प्रयोग करके कृषि उत्पादन के साथ-साथ औद्योगिक क्रांति लाकर सभी यातायात घरेलू उपकरण आदि के अलावा रक्षा के क्षेत्र में युद्ध के लिए शास्त्रों का जिसमें थल, जल और वायु सभी प्रकार के शास्त्रों का विकास किया है | इस प्रगतिवाद युग में होड़ के कारण पृथ्वी पर सभी ओर से बराबर दबाव बढ़ता ही जा रहा है | इन सभी को ध्यान में रखते हुए यदि हम विचार करें कि हमने धरा की मिट्टी/मृदा की क्या दशा बना दी है? कृषि उत्पादन में वृद्धि करने के लिए हरित क्रांति जैसे कार्यक्रमों को प्रोत्साहन दिया जिससे खेतों में संकर बीजों तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग अधिकतम सीमा से भी अधिक किया | आधुनिक कृषि औजारों का भी प्रयोग किया जा रहा है | कीटनाशक दवा तथा खरपतवार को नष्ट करने के लिए भी अनेक प्रकार के रसायनों का प्रयोग अत्यधिक तेज गति से किया गया है/ किया जा रहा है | 

इन सभी प्रयोगों के कारण शुरुआती वर्षों में तो प्रति एकड़ उपज की मात्रा बहुत ही उच्च स्तर से बढोतरी हुई परंतु बाद में अब धीरे-धीरे गिरावट की ओर जा रही है | ट्रैक्टरों इत्यादि के कृषि कार्य में प्रयोग करने से हमारे देश भारत में बैलों यानी परंपरागत जोत के तरीकों को पूर्णतया छोड़कर आधुनिक विधियो को अपनाया गया है | फलस्वरूप बैल धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है/गया है | इन सभी सुविधाजनक उपकरणों और रासायनिक खादों तथा अन्य दवाओं के प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता में धीरे-धीरे बड़ी गिरावट आई है | ये सभी कारक मिट्टी प्रदूषण का भी एक बड़ा कारण बना है |

इन सभी कारकों के द्वारा केवल मिट्टी की उर्वरा शक्ति ही नहीं घटी अपितु भूमिगत जल प्रदूषण की समस्या भी उभर कर सामने आई है | भूमि पर जितने भी रसायनों का प्रयोग पैदावार बढ़ाने को होता है, वे कभी समाप्त नहीं होते हैं या यूं कहें कि वे मिट्टी में ही घुल जाते हैं और रंध्रों के माध्यम से भूमि के आन्तरिक भाग में प्रविष्ट कर जाते हैं, जिससे मिट्टी और जल दोनों को प्रदूषित करते हैं | आधुनिक संकर बीजों तथा फसलों के गलत चयन (किस खेत में कौन सी फसल को बोना उचित होगा) के कारण सिंचाई के लिए भूमिगत जल का अधिक दोहन किया गया/ जा रहा है, इससे भू जल स्तर भी नीचे जा रहा है/जा चुका है | यहां पर सभी को विशेषत: किसानों का ध्यान इस ओर आकर्षित करना आवश्यक है कि खेतों में जो भी रसायन खाद, कीटनाशक और खरपतवार नाशक दवाएं डाली जाती है उससे खाद्य श्रृंखला बर्बाद होती है तथा इससे भी अधिक बात यह है कि इन सभी रसायनों का जैव आवर्धन होता है ( बायो-मैग्नीफिकेशन) अर्थात ये सभी रसायन फसलों की जड़ों के माध्यम से बीजों में जिसे मनुष्य अपने भोजन के रूप में प्रयोग करता है तथा चारे के माध्यम से पशुओं में पहुंचते हैं | साथ ही दूध और मांस आदि के माध्यम से मनुष्यों के शरीर में खाने के रूप में प्रविष्टि करता है जो पूर्णतया प्रदूषित होता है | जितना जिस गति से हम इन रसायनों का प्रयोग कर रहे हैं या बढ़ता जा रहा है उसकी उतनी ही तीव्र गति से नई-नई बीमारियां मनुष्यों और अन्य जीवों को अपनी चपेट में ले रही हैं/ लेती जा रहीं हैं |

इसमें कोई शक नहीं है कि हमें खेतों में पैदावार बढ़ानी है क्योंकि जिस तरह जनसंख्या बढ़ रही है उसी प्रकार से खाने की वस्तुओं अर्थात खाद्यान्नों की आवश्यकता भी बढ़ रही है | इसके लिए हमें उन माध्यमों के प्रयोग पर जोर देना चाहिए जिससे पैदावार भी बढ़ सके और मिट्टी तथा जल प्रदूषण होने से बचा रहे | इसके लिए हमें खेतों में जैविक खादों के प्रयोग पर जोर देना चाहिए | फसल चक्र का विशेष ध्यान रखना चाहिए, साथ-साथ खेतों में निराई गुड़ाई को करना चाहिए जिससे खरपतवार के असर को कम करने में मदद मिल सके और रसायन ना डालना पड़े | पशुधन पर ध्यान देकर जैविक खाद तथा दूध आदि के उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है |

इस प्रकार जैव आवर्धन से बचाव होगा जिससे बीमारियों का कम प्रकोप होगा | यदि हम आने वाले समय में माटी को सुरक्षित कर लेंगे तो पृथ्वी पर प्राणी जीवन को सुरक्षा प्रदान कर पाएंगे | यह सब आपसी सहयोग से ही संभव हो पाएगा वैज्ञानिक सोच समझ तथा आविष्कारों का सदुपयोग कर हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं या हमें अपना लक्ष्य प्राप्त करना चाहिए |

*माटी हमें बचानी है, जैविक खाद लगानी है, 

बैलों से खेती करनी है, पैदावार बढ़ानी है|*

धन्यवाद।

विनोद शर्मा

रविवार, 24 मार्च 2024

फेसबुक को पक्षाघात पर भक्तों का अरण्यरोदन

 लेखक: राकेश अचल

'फेसबुक ' को बीती रात अल्प पक्षाघात हुआ तो पूरी दुनिया में फेसबुक के भक्त विचलित हो गए। लगा कि जैसे किसी ने उनकी जान ही छीन ली हो। मै भी इस भक्तमंडली का सदस्य था लेकिन फेसबुक   के शांत होने के बाद मैंने भी चैन की सांस ली। मैंने बहुत कम अवसरों पर देखा है, जब लोग किसी चीज के लिए इतने परेशान और फिक्रमंद होते हैं। फेसबुक तो कोई चीज भी नहीं है। एक सेवा है किन्तु अपनी उपयोगिता की वजह से आज दुनिया के एक बड़े हिस्से के लिए प्राणवायु बन गयी है।

दुनिया में जिंदगी के लिए जैसे भोजन -पानी और आक्सीजन आवश्यक है वैसे ही अब सोशल मीडिया एक आवश्यक अवयव बन गया है ।  अकेले फेसबुक दुनिया के 1560  मिलियन लोग फेसबुक की सेवाओं से जुड़े हैं ,और ऐसे जुड़े हैं कि  कुछ समय के लिए ही फेसबुक के बंद होने से सदमे की स्थिति में पहुँच गए। फेसबुक के हितग्राहियों की दशा ऐसी हो गयी जैसे किसी सांप के मुंह से उसकी मणि छीन ली गयी हो ,या किसी मछली को पानी से निकाल कर गर्म रेत पर फेंक दिया हो। जाहिर है कि  फेसबुक ने बीस साल में ही   जनमानस पर अपना इतना प्रभुत्व बना लिया है की लोग उसके आदी हो गए हैं और एक पल भी ' फेसबुकाये ' बिना नहीं रह सकते।

फेसबुक  'अनंग  ' है। फेसबुक को शैव सम्प्रदाय का कोई ' हैकर ' ही अपनी तीसरी आँख से भस्म कर सकता है लेकिन हमेशा  के लिए नहीं। फेसबुक की मारक क्षमता से समाज ही नहीं बल्कि सियासत भी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है ,बावजूद इसके फेसबुक अपनी जगह है ,उसे मिटाने की,' हैक ' करने की तमाम कोशिशें बार-बार नाकाम हो जाती है।  5  मार्च 2024  को भी ऐसी ही कोशिशें नाकाम हुईं और लोगों ने चैन की सांस ली। सवाल ये है कि  गुण-दोषों से भरी फेसबुक आम आदमी की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन कैसे गयी  ? इसके लिए हम खुद जिम्मेदार है।  हमारी सियासत जिम्मेदार है।  जिन्होंने लगातार ऐसी परिस्थितियां पैदा की  जिसकी वजह से इंसान आपस में कटता चला गया। संवाद की सूरत लगातार कम होती चली गयी।

आज फेसबुक है तो तमाम दूसरी बुक्स बेकार है।  फेसबुक आज का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा लोकप्रिय महाग्रंथ बन चुका है। फेसबुक किसी से भेदभाव नहीं करता। फेसबुक की  अपनी दुनिया है ।  अपने कानून हैं। अपने तौर-तरीके हैं। फेसबुक की अपनी कोई भाषा नहीं है। फेसबुक   अपने उपयोगकर्ताओं को अपनी पसंद की भाषा चुनने का अवसर देती है। फेसबुक का अपना लोकतंत्र है,अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है,हालाँकि इसके अपने मापदंड हैं,सीमाएं है ।  फेसबुक भी अभिव्यक्ति की आजादी को एक सीमा के बाद पाबंद करती है किन्तु उस तरीके से नहीं जिस तरीके से आज दुनिया में तमाम  धार्मिक और लोकतांत्रिक सरकारें कर रही हैं। फेसबुक दुनिया के तमाम सत्ता प्रतिष्ठानों के लिए खतरा है। इसीलिए जब तब दुनिया के तमाम देशों की सरकारें फेसबुक   को प्रतिबंधित करने के लिए इंटरनेट को ही बंद करा देतीहैं। हमारे हिन्दुस्तान में तो ये सब आये दिन होता रहता है।

कहते हैं कि  आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है ,सो इसी तरह अमेरिका के एक कालेज छात्र मार्क जुकरबर्ग की मित्रों से जुड़े रहने की जरूरत ने 2004  में फेसबुक को जन्म दिया था जो आज दुनिया के एक बाद हिस्से की जरूरत बन चुकी है। दुनिया के के तमाम लोग जुकरबर्ग के शुक्रगुजार हैं फेसबुक बनाने के लिए। फेसबुक दुनिया का ऐसा मेला है जहाँ दशकों से गुम हुए लोग आपस में मिल जाते हैं। ये काम आसान काम नहीं है। फेसबुक ने मनुष्य के एकांत में दखल किया है ।  मनुष्य को अवसाद से बचाया भी है और सामाजिक सुरक्षा भी  दी है ,साथ ही  अश्लीलता ,घृणा भी परोसी है। फेसबुक   गोपनीयता के लिए खतरा भी है और समाज को पारदर्शिता की और भी ले जाती है। यानि फेसबुक  एक दोधारी तलवार है। ये ऐसा उस्तरा भी है जो यदि बंदर के हाथ लग जाये तो हजामत बनने के बजाय गर्दन काटने   का भी काम कर सकती है।

फेसबुक के अनेक रूप है।  फेसबुक दवा भी है और जहर भी ।  फेसबुक मनोरंजन भी देती है और विकृति भी ।  फेसबुक के पास दोस्ती  और दुश्मनी के लिए पर्याप्त समय है ।  फेसबुक राजनीतिक हस्तक्षेप भी करती है और निजता पर भी डाका डालती है। फेसबुक नशा भी है और नशामुक्ति भी। फेसबुक के समर्थक भी हैं और विरोधी भी ।  फेसबुक अबाल-वृद्ध सबकी मित्र है। सबकी अभिभावक भी है ।  सबकी हमराह,हम जुल्फ,हमदर्द, हमजोली यानि सब कुछ है। फेसबुक किसी के लिए गीता है तो किसी के लिए कुरआन । किसी के लिए बाइबल है तो किसी के लिए कुछ और। इतना रूतबा  और व्यापकता शायद किसी दूसरे माध्यम के पास नहीं हैं। 

फेसबुक से आप मनोरंजन,ज्ञानार्जन   ,व्यवसाय  ,महिमा मण्डन और मन मर्दन जो चाहे सो कर सकते है।  ये आपके ऊपर है कि  आप फेसबुक का कैसे इस्तेमाल करना चाहते है।  दुनिया में जैसे विभिन्न प्रकार के नशा से मुक्ति के लिए अभियान चलाये जाते हैं उसी तरह फेसबुक से मुक्ति के लिए भी अभियान चलाये जाते हैं। कुछ लोग 31  मई को फेसबुक   छोडो दिवस के रूप में भी मानते हैं। कुल मिलाकर फेसबुक आज मनुष्य जीवन  की प्राणवायु है। इस पर जब-जब खतरा मंडराता है दुनिया  बेचैन हो जाती है ।  इसलिए जरूरी है कि  आप फेसबुक से मुहब्बत करते हुए भी इसका कोई न कोई विकल्प खोजकर रखिये अन्यथा खुदा न खस्ता किसी दिन फेसबुक समाप्त हुई उस दिन आपकी दुनिया भी आपको समाप्त होती सी नजर आएगी। वैसे मै फेसबुक को कलियुग का असली अवतार मानता हूँ ।  प्रधानमंत्री श्री मोदी जी को मैंने कभी अवतार नहीं माना जबकि वे एक महान से महान नेता हैं। आइये हम सब फेसबुक की सलामती के लिए समवेत होकर ईश्वर से ,हैकरों से प्रार्थना करने की वे इस पाकीजा उपक्रम से छेड़छाड़ न करें और ईश्वर इसे लम्बी उम्र दे । 

धन्यवाद| 

राकेश अचल

बुधवार, 20 मार्च 2024

होली का पर्व

 लेखिका: रेखा अस्थाना

सुखद विविधताओं की मेरी जन्मभूमि भारत🌷🌹🌸🌺

ईश्वरीय कृपा से भारत एक विशाल देश है और इसमें छः ॠतुएँ क्रमवार आती जाती हैं। सभी का अद्भुत नजारा होता है।कोई किसी से कम नहीं।वर्ष  के 365 दिनों में 365पर्व मनाए जाते हैं।पर कुछ खास पर्व जैसे होली,दिवाली,दशहरा।पर्व  सदा से ही खुशहाली का कारण होते आए हैं।क्योंकि इनका सीधा संबंध फसलों से होता है।

आज मैं केवल अपने बचपन की होली वह भी प्रयागराज जो पहले इलाहाबाद के नाम से जाना जाता था ।आज से कई दशक पहले की बात है तब तीज त्योहार की अपनी ही रौनक व गरिमा होती थी।पूरा मोहल्ला एक होता था।सभी अपने अपने घरों से चंदा देते व लकड़ियां  लाकर बीच चौराहे में जहाँ होलिका दहन निश्चित किया जाता था जमा करते थे।

टेसू के फूल लाए जाते थे बढ़िया अबीर-गुलाल चंदे के पैसों से मंगवाया जाता था। वैसे तो होली की तैयारी महीनों पहले से शुरु की जाती थी।घर पर स्त्रियाँ पापड़,चिप्स,कचरी  बनाकर रखती थी ।चार -पाँच दिन पहले से गुजिया भी बनने लगती थी।घर पर ही नमकीन बनाया करती थी।

   होली  का नाम होली कैसे पड़ाअब मैंआपको इसके बारे में बताऊँगी।बिष्णुभक्त प्रह्लाद भगवान को सबसे बड़ा मानता था जब कि प्रह्लाद के पिता हरिण्याकश्पु का कहना था कि उसके आगे संसार में  कोई नहीं है बसवही भगवान है।प्रह्लाद के न मानने पर उसे नानाप्रकार के कष्ट दिए।पर भक्त के आगे तो भगवान रहते ही हैं।अंत में अपनी बहन जिसका नाम होलिका था उसको वरदान था कि वह आग में नहीं जल सकती जब वह प्रह्लाद को गोद में लेकर बैठी तो खुद जल गई और प्रह्लाद बच गए। तभी से होलिका दहन का रिवाज चल पड़ा कि इस अग्नि में प्रतिज्ञा कर अपनी सभी बुराइयों को त्याग  दो या जला दो।

तो मैं बात कर रही थी प्रयागराज के होलिकोत्सव  की।हम सब बच्चे तो कितने दिन पहले से ही होली मनाते थे पर उस खासदिन टेसू के फूलों में गर्म पानी डालकर  रखा जाता था सभी लोग अपने अपने पुराने पोशाक  में दोपहर एक बजे तक होली खेलते फिर घर आकर नहा-धोकर पकवान खाते।

अब आइए शाम के समय का दृश्य  क्योंकि यह एक सामाजिक पर्व है तो आपसी भाईचारा भी जरूरी है।हम सब नए वस्त्र पहनकर  एक दूसरे घर जाते जहाँ हमें मुँह पर गुलाल लगाकर कान में इत्र का फाहा रखा जाता था।बिना किसी भेदभाव के सबसे बड़े प्रेम से गले मिला जाता था।पूरे साल का राग-द्वेष मिट जाता था ।फिर हम खुशी खुशी गुजिया खा कर घर लौटते थे। तब प्लास्टिक का चलन न था पीतल की पिचकारी होती थी।होलिकोत्सव मिलन समारोह हफ्तों चलता था।आज जब मैं यहाँ गाजियाबाद की हालत देखती हूँ तो बस यही कहना पड़ता है----देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान , कितना बदल गया इंसान।

अहंकार और अहं जिसमें भी आ गया उसका अंत निश्चित जानों।क्योंकि हिरण्याकश्पु स्वयं को भगवान  मानने लगा था तो उसने प्रह्लाद को मरवाने के लिए एक लोहे के खंभे को खूब लाल कर गर्म किया और प्रह्लाद से कहा  क्या तेरे भगवान इस खंभे में भी हैं तब उसने कहा सर्वत्र।तो आज्ञा मिली इसे गले लगाओ ।कुछ पल प्रह्लाद ने खंभे को निहारा उसे एक छोटी चींटी आती जाती दिखाई दी तब प्रह्लाद ने सोचा अवश्य ही यह भगवान  का संकेत है।वह खंभे से लिपट गया खंभा फटा और नृसिंह भगवान अवतरित हुए उन्होंने हिरण्याकश्पु को अपनी जांघ में लिटा कर उसका पेट चीर दिया और एक अहंकारी राक्षस का अंत हो गया।सच ही कहा गया है--

भक्तों के सिर पर भगवान का हाथ होता है।

जाको राखे साईयाँ मार सके न कोई।

अब आते हैं हम होली बसन्त ऋतु की पूर्णिमा को मनाई जाती उसके पश्चात हिन्दू नववर्ष प्रारम्भ होता है।मौसम सुहावना व सुखद होता है चारों ओर की सुन्दरता देखते ही बनती है। रबी की फसल पकने को तैयार है ।इसी कारण लोग गेहूँ व चने की बालें लाकर होलिका को समर्पित करते हैं ।गाँव में रात में फाग गाए जाते हैं।गेहूँ और चने की बालों होलिका में समर्पित करते हैं फिर उसका प्रसाद सभी को देते हैं।इसमें भाव यह होता है जो प्रभु तुमने  दिया वह तुमको समर्पित। 'इदम न मम'आज के युग में न संस्कार  न संस्कृति न हर्ष  न उल्लास ।सबके मनोरंजन के अपने अपने साधन हैं।हमारा बचपन जिसे आज भी हम हृदय से न निकाल पाए अभी तक।अब किसी भी त्योहार में खुशी कम दिखावा ज्यादा।चने के बालों को भूनने से उसका नाम होरहा पड़ गया।

  क्योंकि होली का पर्व  आने वाला है इस कारण  मुझे अपने बचपन की  याद आ गई ।इसलिए यह लेख लिखा।

धन्यवाद| 

रेखा अस्थाना

रविवार, 17 मार्च 2024

पतंग

 

लेखक: हरि प्रकाश गुप्ता सरल

 

कहां जा रहे हो बदलू ने पूंछा मैंने कहा सकूर भाई की दुकान जा रहा हूं। वहां से पतंग और मांझा लेकर आयेंगे।आज छुट्टी का दिन है तो आज तो सामने वाली पहाड़ी पर पतंगबाजी होगी। इसलिए जल्दी जा रहा हूं क्योंकि सकूर भाई तो खुद हाथों से शानदार पतंग और मंजा बनाते हैं। लच्छू की दुकान में तो मशीन से बनी पतंगें और मांझा बिकता है। हाथों से बनाया गया मांझा और पतंग की बात ही कुछ और है। हवा में बहुत लहराती है।

हमने बदलू से कहा तुम भी चलो यार दोनों पतंग और मांझा खरीद कर पहाड़ी पर चलेंगे और पतंगबाजी का मजा लेंगे। बदलू को कहने की देर थी कि तुरंत अब्बा से पैसे लेकर सकूर भाई की दुकान हम दोनों चल दिए।सकूर भाई के घर के पास भी मैदान में उन्हीं की बनाई पतंगें उड़ती और आसमान को छूते हुए दिखाई दे रहीं थीं। पतंगों को आसमान में उड़ता देख ऐसा कौन होगा जिसे आनंद न आता हो।हम और बदलू तो पतंगबाजी के दीवाने कहलाते थे। स्कूल से आये और बस्ता पटका खटिया पर, न खाने की फिक्र और न नहाने की। कभी कभी पतंग पहले की होती तो लेकर चले जाते उड़ाने मैदान में और मित्रों के साथ आसमां में उड़ाते और आपस में पतंगों को लड़ाते।बदलू की पतंग सदा कट कर जमीन में गिर जाती और मेरी पतंग भी कभी कभी कट जाती और दूर जाकर गिरती।जिसे लेने के लिए मोहल्ले के बालक दौड़ कर जाते और पतंग को ले आते। कभी कभी की बालक मिलकर उसे अपनी ओर खींच तान करते जिससे वो फट जाती और बेकार हो जाती। आज सकूर भाई

तो जिंदा नहीं हैं पर उनका पतंग बाजी का धंधा चल रहा या बंद हो गया।पर आज भी जब पतंग की बात चलती तो बचपन के वो सुहावने दिन याद करते करते आंखों में आंसू आ जाते क्यों कि न तो बदलू का कई सालों से पता और न सकूर भाई  का।

धन्यवाद|

 

हरि प्रकाश गुप्ता सरल

गुरुवार, 14 मार्च 2024

स्वामिभक्ति

 लेखक: डॉ.अवधेश तिवारी "भावुक" 

     मेरा संस्मरण एक सच्ची घटना पर आधारित है। मेरी उम्र उस समय 10 वर्ष थी। मैं कक्षा 5 में पढ़ रहा था। मेरे घर एक भैंस थी जिसे पूरा परिवार लक्ष्मी कहकर बुलाता था। मैं उसे बहुत प्रिय था।

       स्कूल से आने के बाद मैं उसे घास चराने गाँव के पास नदी के किनारे ले जाता था। विशेष बात यह थी कि मैं उसकी पीठ पर बैठ कर गन्ना चूसता रहता और वो घास खाती। जब तक मैं उसकी पीठ पर न बैठता, न उसे चैन मिलता न मुझे। लक्ष्मी मुझे अपने पँड़वे से भी ज्यादा प्यार करती थी।

     एक दिन मैं उसकी पीठ पर बैठकर गन्ना चूस रहा था, वो नदी के किनारे घास खा रही थी। अचानक लक्ष्मी पानी पीने नदी में उतर गई, शायद वो भूल गई कि मैं उसकी पीठ पर बैठा हूँ।

लक्ष्मी पानी पीते हुई नदी में डुबकी लगा ली। मैं चिल्लाया,पर तब तक देर हो गई थी। मैं डूबने लगा। तब तक लक्ष्मी को अपनी गलती का एहसास हो चुका था।

लक्ष्मी ने अपने दाँतों से मेरे कपड़े पकड़े और मुझे खींचकर किनारे लाई और जोर -जोर से चिल्लाने लगी। मैं डर और घबराहट से बेहोश हो चुका था। लक्ष्मी की दर्द भरी आवाज को सुन आसपास खेतों में काम करने वाले लोग दौड़कर आये, मेरे पेट में गये पानी को निकाला और मुझे लेकर मेरे घर आए।

     लक्ष्मी की आँखों से आँसू लगातार बह रहा था, हमारे पीछे-पीछे वह भी घर आई। मेरी अम्मा को देखकर वो और जोर - जोर से चिल्लाने लगी।

अम्मा को लोगों ने सारी बातें बताई।अम्मा ने केवल इतना ही कहा?लक्ष्मी तुझसे ये उम्मीद नहीं थी।उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।वो वहीं दरवाजे पर बैठ गई।जब तक मैं ठीक होकर उसके पास नहीं आया, उसने कुछ नहीं खाया।

दूसरे दिन मैं उसको चराने नहीं ले गया।मेरा छोटा भाई लक्ष्मी को ले जाने लगा लेकिन वो नहीं गई,उसे उसने बहुत मारा।

लेकिन फिर भी वो नहीं गई।

जब मैंने उसके चिल्लाने और भाई की आवाज सुनी तो मैं अम्मा के साथ गया और उसकी पीठ पर बैठा।

     तब वो शांत हुई और मेरे साथ चरने गई।

जब तक वो जिन्दा रही हम सब उसे परिवार के सदस्य की तरह समझते और मानते रहे।

आज भी लक्ष्मी की याद मेरे मनोमस्तिष्क में मेरी माँ की तरह विद्यमान है।

कहने को वो भैंस थी किन्तु मेरे लिए किसी भी रूप में मेरी अम्मा से कम न थी...

धन्यवाद|

 

डॉ.अवधेश तिवारी "भावुक"

सोमवार, 11 मार्च 2024

पुराने समय का कैलेण्डर

 लेखिका: शैली

 

एक महीना गया, साल का आखिरी माह आया। मैंने दीवार पर टँगे कैलेंडर का पन्ना फाड़ने के लिए हाथ बढ़ाया ही था, कि एक डरी हुई, कुछ मिन्नत करती हुई आवाज कानों में पड़ी, "अब मुझे और मत फाड़ो, बस पलट दो! एक माह ही जिन्दा रहना है, अकेला क्यों करती हो? तुम तो बुजुर्ग हो, काग़ज़ के कैलेण्डर पर ही दिन साल महीने देखे हैं। मुझे सुन कर गुस्सा आया कि सुबह सुबह कौन नामुराद मुझे बुज़ुर्ग कह रहा है! ध्यान से देखा तो सामने के कैलेंडर को हिलता और बोलता हुआ पाया। जिसका नवम्बर महीने का पन्ना मैं फाड़ कर अलग करने जा रही थी। चौंक कर ध्यान से उसकी बातें सुनाने लगी। दर्द भरी आवाज़ में कैलेंडर आगे कहने लगा - “तुम और तुम्हारी पीढ़ी तो जन्म से मुझे जानती है। तुम्हारे जन्म की तारीख़ और समय, मेरे ही किसी बुजुर्ग के सीने पर, तुम्हारे पिता ने लिखा होगा, तुम्हारी छठी, और बारहवीं की तारीखों को याद से घेरा होगा।कैसे तुम्हें याद नहीं रहा कि हर साल दिसम्बर से सभी नए कैलेंडर के जुगाड़ में लग जाते थे। कोई सामान खरीदना होता तो हिसाब लगाते थे कि थोड़ा रुक कर खरीदेंगे तो साथ में नए साल का कैलेंडर भी मिल जाएगा। घर में नया कैलेंडर आना किसी उत्सव जैसा होता था। घर के सभी सदस्य नए कैलेंडर में क्या बना है देखने के लिए जाते थे। वो भी क्या दिन थे, जब हम कैलेंडरों की भी आपनी हैसियत होती थी। ड्राइंग रूम, बेड रूम, और पूजा घर में हमारा स्थान सुरक्षित रहता था। जब नया कैलेंडर टाँगा जाता तभी पुराना उतरता था। अगर नया नहीं मिला तो कई घरों में पुराने की तारीखें हटा कर चित्र वाले हिस्से का उसी खूंटी पर अधिकार बना रहता था, मज़ाल थी कि हमारी जगह कोई और चीज़ टाँगी जाय।

 कैलेंडर भिन्न-भिन्न क़िस्म के होते थे, एक पन्ने, तीन पन्ने, छह पन्ने और सबसे क़ीमती बारह पन्ने वाले। किसी में भगवान की तस्वीर, कोई फूलों वाला। पहाड़ों, झरने और सीन-सीनरी वाला। बच्चों की, सुन्दरियों की फोटो वाले, तो सिनेमा के हीरो-हीरोइन के चित्रों वाले कैलेंडर भारी माँग में होते थे।

मर्फी रेडियो, बाटा, हिमालया, डाबर और डनलप वगैरह के कैलेंडर बहुत चर्चित रहते थे। दुकान वाले अपने नियमित ग्राहकों को बड़े गोपनीय ढंग से ये कैलेंडर पकड़ाते थे, ग्राहक भी धीरे से इन्हें बैग में सरकाते थे, हा! हा! हा! मानो कैलेंडर नहीं कोक की पुड़िया हो। सच, आज भी उन गौरवशाली दिनों की याद से सीना चौड़ा हो जाता है।

जब पिता घर में उस क़ीमती कैलेंडर साथ आते थे तो घर के माहौल में भी गर्मी जाती थी। जिस उत्सुकता से घर वाले डॉक्टर से पूछते हैं कि नवजात बेटी है या बेटा, उसी उत्सुकता से कैलेण्डर खोला जाता था। अगर 12 पन्नों का सुन्दर कलाकृति का कैलेंडर होता तो सभी के चेहरे खुशी से खिल जाते, मानो लाॅटरी लग गई हो। उसे ड्राइंग रूम में स्थान मिलता। अगर कहीं एक पन्ने का हुआ और भगवान की फोटो हुई, तो दादी की बाँछे खिल जातीं, हाथ जोड़ कर प्रणाम करती और उसे पूजा घर या अपने कमरे में पलंग के पास टांगतीं।

इसी तरह हनुमानजी का कैलेण्डर शाखा और अखाड़े जाने वाले भाई के हिस्से में, हीरो-हीरोइन वाले बड़ी दीदी के (किसी पुरुष सदस्य की हिम्मत नहीं होती थी कि उसकी माँग कर लें, बस ललचा के रह जाते थे), बच्चों या बाल कृष्ण, बाल- हनुमान आदि के कैलेंडर बच्चों के कमरे में स्थान पाते थे।

कुछ में सिर्फ़ तारीखें होती थीं, कोई चित्र आदि नहीं। ऐसे कैलेंडर ज्यादातर बैंकों के होते थे। इन्हें किचन में टाँगा जाता था, जिसपर दूध, अखबार का हिसाब,नौकर और कामवाली के नागे और किसी के घर की शादी, मुण्डन, जनेऊ आदि के निमंत्रण की तारीखें, अलग-अलग रंग के पेंसिलों से घेरी जाती थीं, (यानी आजकल के गूगल कैलेंडर के रिमाइंडर  का काम करती थीं)

एक और कैलेंडर होता था, पंचांग वाला, जिसमें, ठाकुर प्रसाद पंचाग-कैलेंडर सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय था। इसी से मिलते-जुलते कुछ और भी कैलेंडर होते थे, जो इसकी लोकप्रियता को भुनाने के मकसद से, इसी की नकल करके बनाए जाते थे। इससे तीज त्यौहार, व्रत-उपवास, दिशा-शूल, राहुकाल और छिटपुट शुभ मुहुर्त देखे जाते थे।

कैलेंडर घर की सजावट का हिस्सा होते थे जैसे आजकल पेंटिंग आदि होते हैं। किसी-किसी घर में में तो कैलेंडरों को बिल्कुल झण्डियों की लड़ी सा टाँगा जाता था। छोटे-मोटे ढाबे, चाय, पान-सिगरेट की ढाबलियों की दीवारें तो कैलेंडर से लगभग ढकी रहती थीं। इसमें वर्ष का कोई विचार नहीं किया जाता था,बहुत उदारता से नए कैलेंडर को पुराने वालों को ऊपर नीचे करके, जगह बना कर टाँग दिया जाता था, जैसे भीड़ भरी बस में नए यात्रियों को खड़े होने की जगह, लोग थोड़ा खिसक कर, दब कर बना देते हैं। यदि नहाती हुई सुन्दरी, प्रेमी युगल या सिने-तरीका की फोटो हो तो कैलेंडर फटने तक दीवार के साथ एकाकार हो जाता था। सच! हम कैलेंडर्स के जीवन का वह स्वर्णिम युग था।

अब तो उन दिनों की याद ही बाकी है…..ये मोबाइल क्या आया, लोग हमें भूल गए। गूगल कैलेंडर ने हमारी जगह लेली।रही सही कसर इस मुई एलेक्सा ने पूरी कर दी। अब किसी को हमारा बेसब्री से इंतजार नहीं रहता। कुछ पुराने ज़माने के लोग आज भी मुझे ले जाते हैं, पर घर के किसी गुमनाम कोने में टांग देते हैं, बस कभी-कदा गृहस्वामिनी हम पर कुछ लिख देती है, या मालिक बैंक हॉली-डे देख लेते हैं। हमारी तो कोई इम्पोर्टेंस ही नहीं रही!  हम दीन-हीन से टँगें किसी की आहट का इन्तजार करते रहते हैं। सुबह-सुबह कोई हमें प्यार से नहीं देखता। अब किसी बच्चे या किशोरी के मुलायम हाथ हमें नहीं छूते, ये जीना भी कोई जीना है लल्लू???

मन से विजय माल्या के लिए आशीष निकलता है। किंग-फ़िशर कैलेंडर और कैलेंडर गर्ल्स ने एक बार मृतप्राय कैलेंडरों को कुछ साँसें दी थीं। हम उत्साहित थे कि कुछ लोग सबक लेंगे और पूनम पाण्डे नहीं तो राखी सावंत जैसी बोल्ड गर्ल्स को लेकर कुछ नए कैलेंडर आयेंगे। लेकिन हमारे दुर्भाग्य से वो देश छोड़ कर भागते वक्त वेंटीलेटर पर पड़े हमारे कुनबे की ऑक्सीजन बन्द कर गया

 भविष्य की कोई आशा ही नहीं रही। 2024 यानी डिजिटल दुनिया की ओर बढ़ता नहीं छलांग लगाता एक और कदम। फोर-जी, फाइव-जी के बाद ये AI…हमारे ताबूत पर आखि़री कील है। अब तो काग़ज़ पर प्रिंट का ज़माना ही बीता जा रहा है। न्यूज-पेपर, पत्र-पत्रिकायें भी अपने मौत की घड़ियाँ गिन रहे हैं। एक महीने बाद मैं इतिहास का हिस्सा बन जाऊँगा, तुम्हारी आने वाली नस्लें, हमें घर में नहीं शायद म्यूज़ियम में देखेंगी। मैं बहुत दुःखी हूँ, पल-पल अपनी मौत को आता हुआ देख रहा हूँ…., जिन्दगी के बचे दिनों को तुम्हारे परिवार के साथ काट लेने दो। पहली जनवरी को तो यूँ भी अलविदा कहना है। अभी मेरे इस पन्ने को मेरे साथ रहने दो। मैं कैलेंडर अब बीते वर्ष का नहीं, बीते समय की बात हूँ…..

 

धन्यवाद| 

शैली

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