गुरुवार, 7 मार्च 2024

जौहर क्या है?

 लेखिका: डॉ पूजा भारद्वाज

जौहर  क्या है ,क्यों किया जाता था ,क्या वजह रही होगी इस दर्द को सहने करने की , क्यों एक इंसान मानव जीवन पा कर भी एक वहशी बन जाता है और उससे डर लगने लगता है ,जहां खूंखार जानवर भी शांत प्रतीत होता है वहीं इंसान इंसान से ही डरता है कुछ मलेच्छ जीत के बाद क्यों इतने वहशी बन जाते थे कि रानियों  को मरा हुआ देख गुस्से से पागल हो जाते थे और कई बार तो यह भी बताया गया है कि उस मृत शरीर के साथ भी क्रूरता की जाती थी।

कई बार मृत शरीर के अंगों को काट डाला जाता था। यह तब होता था जब महिलाएं तथा महारानियां अपने प्राण त्याग नही देती थी । सोचो जब वो जीवित पकड़ी जाती , तो उनके साथ कैसा सुलूक किया जाता होगा। ऐसे में महिलाओं ने अपने शरीर को समाप्त करने ,पंचतत्व में विलीन कर देने या  जौहर  करने के अलावा कुछ नही बचता था ।

जौहर भारत में की जाने वाली एक हिंदू राजपूत प्रथा थी|

जौहर पुराने समय में भारत में स्त्रियों द्वारा की जाने वाली क्रिया थी। जब युद्ध में हार निश्चित हो जाती थी, वीरगति प्राप्त करने निकल जाते थे तथा स्त्रियाँ जौहर कर लेती थीं अर्थात जौहर कुंड में आग लगाकर खुद भी उसमें कूद जाती थी।आखिर क्यों !

क्योंकि उनको रक्षा करनी थी अपने मान, सम्मान अपनी देहरी,अपने समाज की रक्षा।

कितनी दर्दनाक क्रिया होती थी,जब जलती हुई लपटे अपने शरीर पर पड़ती है  शरीर पर फफोलें पड़ना ,अपने आपको अग्नि में झुलसा देना पीड़ा का भी एहसास न होना ,पर वो अग्नि भी शीतल लगती थी ,जब अपना आत्मसम्मान दांव पर लगा हो , जौहर एक पवित्र अग्नि

इसको हम सामूहिक दाह संस्कार भी कह सकते हैं

पिता अपनी नाबालिग बच्ची के माथे को चूम कर ,एक पति अपनी पत्नी की आखरी बार मांग भर कर , नासमझ बच्चों को और मांओं को जौहर की अनुमति देते थे ,सही मायने में वो इतिहास रचते थे ,एक दर्दनाक इतिहास जिसे सालों साल भुलाया नहीं जा सकता था ,वो थी एक रणभूमि में भी हार कर जीत का इतिहास लिखना और राजपूतों की आन बान और शान की मर्यादा कायम रखने का इतिहास।

भारत का प्रथम जौहर सन १३०१ में रणथंभौर अलाउद्दीन खिलजी के ऐतिहासिक आक्रमण के दौरान हुआ था। जिस में हम्मीर देव चौहान के विश्वासघात के परिणामस्वरूप वीरगति को प्राप्त हुआ और उसकी पत्नी रंगदेवी ने जौहर किया। इसे राजस्थान के गौरवशाली इतिहास का प्रथम साका जौहर कहा जाता है

१३०३ में रानी पद्मावती ने जौहर किया,अपनी लाज और मेवाड़ के आत्मसम्मान की खातिर और उन्होंने अपनी विश्वास पात्र २०००० दासियों के साथ मिलकर ये जौहर किया था ,जो भारत का सबसे बड़ा जौहर था,ये जौहर तब हुआ जब दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश की हमलावर सेना का सामना करना पड़ा था और राजा राणा रतन सिंह जी को धोखे से मारा गया था

चित्तौड़गढ़ में जौहर मेला नामक वीरता का एक वार्षिक उत्सव होता है जहां स्थानीय लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं

आप सभी को  एक और वीरता का इतिहास सुनाना चाहूंगी,वो था वीरांगना हाडी रानी का ,बहुत से लोग इस इतिहास से अपरिचित होंगे ,आखिर हाड़ी रानी ने क्या किया था ,हांडी रानी हाड़ा चौहान की पुत्री थी उनका विवाह राजा रतन सिंह चूड़ावत के साथ हुआ था ,वह मेवाड़ के सलुम्बर के सरदार थे। विवाह को एक सप्ताह ही हुआ था अचानक मुगल गवर्नर  के विरुद्ध विद्रोह करने के लिये युद्ध का आह्वान किया, रतन सिंह जी सकुंचा रहे थे की हांडी रानी को कैसा लगेगा की शादी को एक सप्ताह हुआ और मुझे युद्ध में जाना पड़ रहा है ,जहां से मैं वापस आऊंगा या नहीं,सोचते हुए युद्ध के लिए चले गए,आधे रास्ते से ही उन्होंने अपने सैनिक को रानी के पास संदेश भेजा,रानी तुम मुझे याद रखना मैं वापस लौटकर आऊंगा, ऐसे ही एक,दो और तीन दिन बीत गए मगर इस बार रानी के नाम सरदार का पत्र था ,हाड़ी रानी पत्र को पढ़कर सोच में पड़ गयीं। युद्धरत राजा का मन यदि मेरी याद में ही रमा रहा उनके नेत्रों के सामने यदि मेरा ही मुखड़ा घूमता रहा तो वह शत्रुओं से कैसे लड़ेंगे। विजय श्री का वरण कैसे करेंगे?हांडी रानी के मन में एक विचार कौंधा। वह सैनिक से बोली वीर , मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशानी दे रही हूं। इसे ले जाकर उन्हें दे देना। थाल में सजाकर सुंदर वस्त्र से ढककर अपने वीर सेनापति के पास पहुंचा देना। किन्तु इसे कोई और न देखे। राजा  ही खोल कर देखें। साथ में मेरा यह पत्र भी दे देना। हाड़ी रानी के पत्र में लिखा था प्रिय। मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशानी भेज रही हूं। तुम्हारे मोह के सभी बंधनों को काट रही हूं। अब आप अपने कर्तव्य का पालन करें मैं तो चली... स्वर्ग में तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगी । पलक झपकते ही हाड़ी रानी ने अपने कमर से तलवार निकाल, एक झटके में अपने सिर को उड़ा दिया।

हाडी रानी के शब्द थे

                    "चुण्डावत मांगी सैनाणी,

                            सिर काट दे दियो क्षत्राणी"

 

मगर आज की नारी झुलसती नहीं,अपने तेज से जला देती है ,हाथ उठे जो उस पर, उस को मिट्टी में मिला देती है जिस का एक  साक्षात प्रमाण थी रानी लक्ष्मीबाई।

धन्यवाद| 

डॉ पूजा भारद्वाज

12 टिप्‍पणियां:

  1. तेज और गौरव से भरा लेख लिखने के लिए बधाई पूजा जी। आपने भारत का और राजपूतों का ओज से ओतप्रोत इतिहास लिखा। पढ़ कर अच्छा लगा।

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  2. बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी 👏👏👏👏

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  3. बहुत ही प्रभावशाली लेख

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  4. भारतीय वीरांगनाओं को समर्पित इतिहास को दर्शाता एक शानदार लेख 👏👏

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  5. बहुत सुंदर 👌 बेहतरीन

    राजेश रघुबर ✍️

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  6. आज के ज्वलंत विषय पर भारत के इतिहास की अतुलनीय संस्कृति और राजपूत स्त्रियों के अदम्य साहस का हृदय स्पर्शी कथानक है यह लेख.. पूजा जी आपको हार्दिक बधाई

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  7. आप सभी का बहुत बहुत आभार लेख को पसंद करने और कॉमेंट करने के लिए 💐

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  8. बहुत सुंदर शिक्षाप्रद लेख, बहुत बधाई पूजा जी इतने सुंदर लेख के लिए(सरोजिनी)

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