सोमवार, 22 अप्रैल 2024

संत कबीरदास

 लेखिका: डॉ.रश्मि चौबे

संत कबीरदास ऐसे व्यक्तित्व के धनी हैं , जो इतिहासकार वर्कले के इस कथन की सत्यता के प्रमाण हैं कि,” युग की महान विभूतियां काल प्रसूत होती हैं ,जिसमें जनजीवन की आत्मा को जीवित रखने के लिए विरोधी शक्तियों से खुलकर संघर्ष किया, जिसका व्यक्तित्व स्वयं ही जलती मशाल था। जिसकी चमक से युग धर्म और विरोधी शक्तियां सिहर उठीं इतना ही नहीं यह कभी रहस्यवाद का अमर गायक तथा ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया ‘जैसे पदों में मानव शरीर रचना की हड्डियों की व्याख्या करता है। जो राम को अपना प्रियतम और स्वयं को उसकी बहुरिया मानता है। एक प्रियतमा के रूप में वे अपने प्रियतम पर मुग्ध हैं। उसके विरह में व्याकुल है । उनमें अनुभूति की तीव्रता और वेदना की पुकार है । इसी वियोग में अपनी सृष्टि को रंगा देखते हैं ।

सचमुच कबीर वे कवि हैं, जिनकी पताका को धर्म लोक में फहराती देखकर पीपा और रयदास विस्मय से पुकार उठे नाव नवखंड पर सिद्ध कबीरा अनेकता को मिथ्या सिद्ध करके एकता का प्रतिपादन करने वाले सारगृही महात्मा थे। उनका लक्ष्य हृदयलोक से निकलकर ज्ञानलोक ले जाना है । भावनाओं को आधार बना वे ज्ञानशिखर पर आरोहण करते हैं ।

उनके पास क्रांति दृष्टि होने के साथ ही अनंतर दृष्टि भी उपलब्ध थी। जो उस युग की विषम परिस्थितियों को भेदकर मनुष्य की पीड़ा को पहचान ही नहीं सकती थी वरना, अभिव्यक्ति भी दे सकती थी। उग्रता के साथ उनकी साधना में मस्ती है और अभिव्यक्ति में अर्थ भेदी पारदर्शिता। उनकी अखंडता और लापरवाही में उनकी सच्ची साधुता और चिंतन शीलता प्रतिबिंबित है।

कबीर जी की भाषा तो सधुक्कडी भाषा थी और उनकी भाषा में ब्रज, पंजाबी, अरबी, फारसी , राजस्थानी , तुर्की सभी के शब्द मिलते थे और वे कहते थे कि संस्कृत है कूप जल, भाषा बहता नीर। ज्यादातर संतों का सारा साहित्य मुक्तक है। दोहा शब्द रमैनी आदि में इनकी कविता आम जनता की आत्मा को झकझोर देती थी। ठेठ बोली में बिना लपेट के अपनी अनुभूति को वे इस तत्परता से रख देते थे कि, उनकी उक्तियों, रूपकों, मुहावरों में कवित्व निखर उठता है।

‘मसि कागद छुओ’ वाले कवि ‘केवल ढाई आखर प्रेम का’ पढ़े थे। कबीर की अभिव्यक्ति सिद्ध करती है कि , कबीर ज्ञान भक्ति एवं प्रेम के अगाध भंडार हैं। उनके काव्य में न शब्दों की जटिलता है न , अलंकारों का धटाटोप और न छन्दों की उछल कूद । सब कुछ स्वभाविक मानव उलट वासियों में जीवन के सत्य की यथार्थ सीधी सुरीली मधुर वंशी बज रही है । ये उलट बासियां सुलटकर जीवन का राग सुना रही हैं।

डॉ रामकुमार वर्मा के शब्दों में_” उनकी युगांतकारी कविता भक्ति की विनय शीलता और आत्मरक्षा के बीच में स्पष्ट कंठ से कही गई धार्मिक और सामाजिक जीवन की पक्षपात रहित विवेचना है।”

यह एवेलिन अंडर विल के शब्दों में-“कबीर आत्मा विस्मयकारी और परम उल्लास में साक्षात्कार के समय दैनन्दिन व्यवहार की दुनिया छोड़ नहीं जाते और साधारण मानव जीवन को भुला नहीं देते उनके पैर मजबूती के साथ धरती पर जमे रहते हैं उनके महिमासमन्वित और आवेगमय विचार दीन और सजीव बुद्धि तथा सहज भाव द्वारा नियंत्रित होते रहते हैं जो सच्चे मार्ग मर्मी कवियों में ही मिलते हैं।”

कबीर जी पेसे से बुनकर थे पर यह समाज के लिए 600 साल पहले ऐसी बातें बुनकर चले गए कि उनके बगैर भारत की कहानी अधूरी है। कहते हैं -कबीर हर इंसान के अंदर हैं जरूरत है उन्हें ढूंढने की । कबीर ना हिंदू हैं ना मुस्लिम हैं, ना अमीर हैं ना गरीब हैं, कुछ लोग तो इन्हें भगवान का अवतार मानते हैं और कहते हैं ‘सब पीरन के पीर’ कुछ निर्गुण संत, कुछ लोग सतगुरु, तो कुछ कवि, तो कुछ राम के भक्त कुछ लोग फकीर कहते हैं । कबीर दास जी बनारस के थे । काशी के पास लहरतारा तालाब है । जहां कबीर की मूर्ति है । जो कमल के फूल पर है। कहते हैं, विधवा ब्राह्मणी की कोख से पैदा हुए और वो उनको छोड़कर चली गयी ।कबीर जी लहरतारा तालाब में कमल पुष्प पर बाल स्वरूप में नीरू और नीमा को प्राप्त हुए थे । ऐसा कहना है। परंतु यहां कोई ऐतिहासिक तथ्य की व्यंजना प्रस्तुत नहीं हुई । वे मुस्लिम थे या हिंदू थे या तुर्क थे इससे कबीर दास जी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

ज्ञानामार्गी शाखा के कवि जैसे कि, कबीर दास जी मलूक दास जी सूरदास जी नानक देव जी इन की विचार धारा क्रांतिकारी विचारधारा के रूप में विख्यात है। यह किसी निश्चित दार्शनिक मत का प्रतिपादन नहीं करते। उनकी जो रचना है वह लोक भाषा और लोग जगत के घटनाओं पर आधारित है और यह कहते हैं कि- तू कहता कागज की लेखी ,मैं कहता आंखन की देखी।संत काव्य धारा में गुरु को ईश्वर से भी ऊपर रखा है -गुरु गोविंद दोऊ खड़े ,काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो बताए।।कबीर जी के गुरु रामानंद जी थे। जिन्होंने पहले तो इन्हें शिष्य बनाने से मना कर दिया लेकिन बाद में इनसे प्रभावित हुए और शिष्य बनाया। कबीर दास जी का कहना है कि, अनुभव ही सबसे बड़ा गुरु है। अक्षर ज्ञान प्राप्त नहीं किया था परंतु जब भी वे सत्संग करते थे तब समाज के निचले दवे लोगों की भीड़ होती थी। सत्संग बहुत ही सुंदर होता था। कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लकुटिया हाथ। जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ।।

कबीर दास जी के समय समाज में बहुत उथल-पुथल मची थी। भीष्म साहनी ने ‘कबीरा खड़ा बाजार में’ में तब के हालात का वर्णन किया है। कवि ने जो समाज में देखा उस में तरह-तरह की विशेषताएं थी। उस समय इंसान को बड़े या छोटे होने का मापदंड भाग्य तय करता था। कौन किस कुल में जन्मा है ,वही बहुत कुछ तय करता था । कवि ने कहा -जात पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि को होई।

कबीर दास जी आडंबर विरोधी थे। इन्होंने समाज में फैली अनेक प्रकार की बुराइयों का विरोध किया उन्होंने जाति प्रथा वर्ग भेद और मूर्ति पूजा, नामाज ,व्रत ,रोजा, बांग लगाना ,तीर्थयात्रा, तिलक और माला सभी का विरोध किया। उनके लिए यह सब आडंबर है। उनके अनुसार ईश्वर कण-कण में व्याप्त है।और कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा-

कांकर पाथर जोड़ कर ,मस्जिद लई बनाय। 

ता चढ मुल्ला बांग दे क्या, बहरा हुआ खुदाय।


कबीर ने ब्राह्मण को नहाते हुए देखकर कहा- 

नहाए धोए का भया जो मन मैल ना जाए, 

मीन सदा जल में रहे धोए बास ना जाए।


और माला फेरने के लिए उनके विचार थे-

माला फेरत युग गया, गया न मन का फेर ।

मन का मनका डार के, मन का मनका फेर।।


उन्होंने जीव हत्या को पाप कहा और कहा कि-

दिन भर रोजा रखत है, रात हनत हैं गाय। 

यह तो खून वो बंदगी, कैसी खुशी खुदाय।।


सन्यासियों पर व्यंग करते हुए कहते हैं-

नारी मुई धन-संपत्ति नासी, मूड मुड़ाए भीए सन्यासी।।


हठ योग साधना का विरोध किया और कहा कि- ईश्वर को सरलता से प्राप्त किया जा सकता है।

भारत जिन तत्वों से मिलकर बना है। उसमें से एक तत्व है कबीर मतलब जो दिया है । वह मान्य नहीं है। इसलिए वे कहते हैं कि- ‘दुई जगदीश कहां से आए ‘ईश्वर एक है कबीर जी की पंडित और मौलवियों से लगातार टक्कर रहती थी और वह निर्भय होकर निर्गुण की उपासना करते थे । इसीलिए वह कहते थे कि’ मोको कहां ढूंढे बंदे मैं तो तेरे पास में…. इन सांसो की सांस में ‘आध्यात्मिक क्रांति और दोनों में जनतांत्रिकरण है। हर व्यक्ति को ईश्वर तक पहुंचने का अधिकार है। ऐसा भी मानते थे। कबीरदास जी कहते हैं कि ,जात पात पूछा नहीं कोई ,हरि को भजे सो हरि को होई।।

कबीर जी सिकंदर लोदी के समय के थे और कहा जाता है कि इनकी शिकायत कर दी गई थी । लोधी जी से तब उसने 52 परीक्षा के लिए सैनिकों और पीरों को आदेश दिया था ।उसके लिए और इनको दरबार में बुलाया गया । इनको सुबह बुलाया था यह शाम को पहुंचे और उन्होंने कहा वहां जाकर कि ‘कबीर सोई पीर है जो जाने पर पीर और कहते हैं कि लोधी जी इन से प्रभावित हुए और इनको छोड़ दिया।

कविता बौद्धिक अभिव्यक्ति का माध्यम है ।विचारों के प्रवाह का जरिया रही है ।जो समाज का दर्पण है ।प्राचीन भारत में कविता राजनीतिक इतिहास और समाज सब के विचार लिए हुए होती थी। कबीर की भक्ति आंदोलन के मशहूर कवि हैं और इनको समाज सुधारक के रूप में मैं देखती हूं । सर्वप्रथम जो दवे कुचले लोगों की आवाज लेकर खड़े हुए, व्यक्ति के रूप में हैं। निडर और निर्भीक। उनकी रचना साकी,शब्द,रमैनी के माध्यम से कबीर आज भी हमारे बीच जिन्दा हैं। यहीं अपनी लेखनी को विराम देती हूं।

धन्यवाद।

डॉ.रश्मि चौबे

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