लेखक: प्रो. वी. पी. श्रीवास्तव
प्रकृति की गोद में पशु पक्षियों के समान जीवन: आहार, निद्रा, भय, मैथुन से आगे बढ़कर मानव ने अपने लिए सुखकर
जीवन बनाया , संस्कृतियां पनपीं, मिटीं। भारतीय संस्कृति के लिए कहा जाता है:
यूरोप, मिस्र,
रोमां
सब मिट गए जहां से,
कुछ चीज़ है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी।
नहीं - ऐसा ना समझें। धरती ही खतरे में है , भारतीय संस्कृति की क्या कहें। शताब्दी के अंत
तक समुद्र के अपनी तटीय मर्यादा के छोड़ने की भविष्यवाणी है। बात वही है," कुछ चीज़ है" जिसने हमारी हस्ती बचाए रखा
था:"संयम"। पता नहीं कब ये चीज़
हाथ से निकलने लगी। सुनाई पड़ता है अब तो, कभी कभी ही सही ,There is enough for every one's need but not enough for
anyone's greed. अब
तो greed भी आम हो चली है।
असंयम का शिकार महिला थी, अब
भी है, अब धरती भी हो गई है। असंयमित पुरुष के
लिए महिला उपभोग की वस्तु थी। जैसे ज़मीन, राज्य
पाने के लिए युद्ध किए गए,
वैसे ही औरत के लिए भी युद्ध किए
गए।वर्तमान युग में , बाज़ार ने वस्तुओं के उपभोग को असंयमित
करने के लिए, उपभोक्ता यानी जनसाधारण के लिए भी
स्त्री के अमर्यादित रूप को सहज कर दिया। हम भले ही गीता पाठ करते रहें "
ध्यायतो विषयानपुन्सह...." अर्थात कि विषयों का ध्यान करने से उनमें आसक्ति, और उनकी प्राप्ति ना होने से क्रोध, मतिभ्रष्टि... आदि, आदि होता है। आप चाहें ना चाहें,
मीडिया
दिन रात बूढ़े , बच्चे, जवान को समभाव से विषयों में डुबकी डुबा डुब लगवाता रहता है। पद्मनी, रूपमती vitually बिना फौज के उपलब्ध हैं, शिकार
वो हुई जो real world में पास में उपलब्ध हो। आज भारतवर्ष
में औसतन प्रति घंटे बलात्कार की चार घटनाओं की शिकायत पुलिस में
दर्ज होती हैं, वर्ष में 32000 मामले।जबकि इन घटनाओं की रिपोर्ट करने से
अधिकांशतः लोग कतराते हैं। इसलिए ब्राजील की माहिला जब लिखती है कि अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए वो
अपने किसी पर विश्वास नहीं करती तो जानिए कि यह एक वैश्विक सत्य है। विश्वास किस
पर ,ना पुलिस, ना कचहरी। समाज तो टूट ही रहा है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए बनाए नए कानून उसे
और बेबस बना रहे हैं।
स्त्री हो या पुरुष, जो
विवेकशील हैं और साहसी भी,
वे मिलजुलकर अपने समय की मुख्य
समस्याओं से जूझते हैं, बिना तुरंत परिणाम की चिंता किए।
पर्यावरणीय संकट, युद्ध की विभीषिकाएं या महिला असुरक्षा
जैसी ही नहीं परिवार और स्थानीय समाज की समस्याएं सभी महत्वपूर्ण होती हैं।
महिलाओं को गांधीजी ने पुरुष से कभी पीछे नहीं समझा। तभी तो सत्याग्रह के सभी
मोर्चे पर स्त्रियों को आगे रखा। उनमें नाम मात्र भर पढ़ी महिलाओं से लेकर उच्चतम
योग्यता प्राप्त संभ्रांत घर की महिलाएं, हर
धर्म की , देश विदेश की महिलाएं सभी शामिल थीं
(बापू की महिला ब्रिगेड लेखक अरविंद मोहन की हाल में प्रकाशित पुस्तक)।नेताजी ने
रानी झांसी ब्रिगेड में महिलाओं को बंदूक पकड़ा दी। इराम शर्मीला के हिंसा के
प्रतिकार में लगभग 16 वर्ष का अन्न जल त्याग के आगे तो
पौराणिक कथाएं भी छोटी पड़ जाती हैं। Non Violent Peace Force
में
Adbusters.org में महिलाएं किसी से पीछे नहीं हैं।
ध्यान रहे पर्यावरणीय संकट हो या दहेज की समस्या का मुख्य कारण उपभोक्तावाद है, और उसको बढ़ाने में पढ़ी लिखी महिलाओं का हाथ
प्रमुख है। बिमल मित्र की एक दिल को दहला देने वाली कहानी है_ हत्या या आत्महत्या, जिसमें नायक पत्नी की दूसरों के सदृश गाड़ी, टीवी, आदि
उपकरणों की फरमाइश से तंग आकर सरकारी
खजाने से चोरी करता है और पकड़े जाने के डर से आत्महत्या कर लेता है। वहां पहुंच
कर लेखक को लगा कि उसे देख कर उसका मृतक शरीर उनसे अपनी व्यथा चीख चीख कर सुना रहा है।लेखक घबड़ा कर आंख कान
बंद कर के भागने लगता है।लेखक को लगता है
जैसे बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के सारे
हिंदुस्तान का सामूहिक क्रंदन उसका पीछा कर रहा है...।
इस क्रंदन से हम सभी कहीं न कहीं प्रभावित हैं और इसका समाधान भी हमें
ही करना है इसलिए हम वापस संयम के रास्ते पर चलें।
धन्यवाद|
प्रो. वी. पी. श्रीवास्तव

तटस्थता से आरम्भ हुआ लेख, स्त्रियों के लालच और पुरुष के शोषण पर ख़त्म होता है। यानी जो अविवाहित पुरुष हैं वो अपने स्तर, विलासिता और वैभव प्रदर्शन से दूर सन्त और त्यागी जीवन बिताते हैं। आज विवाह की औसत उम्र बढ़ गई है। जो अविवाहित युवा पुरुष हैं उनके पास बड़ी गाड़ी, घर, मंहगे कपडे, दामी मोबाइल, लैपटॉप आदि का खर्चा नहीं होगा। सभी अपनी आय में जी रहे होंगे, किसी को लोन लेने या गलत साधन से पैसे कमाने की कोई जरूरत नहीं होगी? पैसों के लिए कोई अनैतिक काम नहीं कर रहे होगें? कृपया महिलाओं पर आरोप लगाने से पहले आंकड़े देखें। आज के युग में इंटरनेट की कृपा से सभी तरह के आंकड़े देखना आसन है।
जवाब देंहटाएंबहुत ही प्रभावशाली 👌👌👌👌
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