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मंगलवार, 11 जून 2024

आतंकवाद

लेखिका: सरोजिनी चौधरी 

आये दिन समाचारपत्रों में तथा न्यूज़ चैनलों पर 

आतंकवाद की खबर देखकर मन आक्रोश से भर जाता है। आख़िर कब तक बेगुनाह जनता इन मुट्ठी भर आतंकवादियों के आतंक का शिकार होती रहेगी।बल और अधिकार की प्राप्ति का यह अर्थ बिल्कुल नहीं होता कि उस बल का प्रयोग निर्बल को संतानें के लिए किया जाए। अचानक मुझे कवि नीरज की ये पंक्तियाँ याद आ गईँ—

अब तो मज़हब भी कोई ऐसा चलाया जाए

जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए

आग बहती है जहाँ गंगा में झेलम में भी

कोई बतलाए कहाँ जा के नहाया जाए।

   आतंकवाद से त्रस्त जनता के लिए कोई स्थान सुरक्षित नहीं है।कभी दिल्ली,कभी मुंबई,कभी श्रीनगर,आए दिन धमाकों की आवाज़ से लोग धुएँ और राख की चादर से लिपट जाते हैं। पटरी पर चलते जीवन के पहिए पटरी से उतर जाते हैं।जब तक लोग हादसे को भुला सामान्य होते हैं तब तक एक नया हादसा हो जाता है।

  हमारे देश में कुछ ऐसे तंत्र हैं जो मौक़े का फ़ायदा उठाने ,एक दूसरे को भला-बुरा कहने,दंगा-फ़साद फैलाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करते।वे तो ऐसे अवसर की प्रतीक्षा में आँखें बिछाये रहते हैं।

   आतंकवाद से केवल हमारा देश ही त्रस्त नहीँ है बल्कि पूरी विश्व ही त्रस्त है।

 अमेरिका,ब्रिटेन आदि देश इसके दंश का अनुभव कर चुके हैं। भारत ने बार-बार दुनिया को ध्यान दिलाया है कि इन आतंकवादी शक्तियों को पड़ोसी देशों में आश्रय मिल रहा है प्रशिक्षक प्रेरणा के रूप में ।प्रमाणों से सिद्ध जिन आरोपों को भारत लंबे समय से अमेरिका के समक्ष रख रही है,उस ओर अमेरिका का रुझान क्यों नहीं है?


उभरते हुए खतरे

कई आतंकवादी संगठनों में एक-दूसरे के साथ सहयोग करने तथा आवश्यक रूप से वैचारिक बंधनों की भागीदारी किये बिना शस्त्रों की आपूर्ति, संभार तंत्र और यहाँ तक कि प्रचालनात्मक समर्थन के रूप में संपर्क निर्मित करने का सामर्थ्य है। ऐसे नेटवर्क अपने विनाशात्मक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिये संगठित आपराधिक संगठनों से भी समर्थन प्राप्त करने में सक्षम हैं।

21वीं सदी में आतंकवाद ने नवीन और अधिक घातक आयाम प्राप्त कर लिया है। उन सामग्रियों और प्रौद्योगिकी जिनमें पूर्व की तुलना में बहुत अधिक विनाशक क्षमता है, तक पहुँच ने भी आतंकवाद द्वारा उत्पन्न खतरे की प्रकृति को बढ़ा दिया है।

एक बहुसांस्कृतिक विश्व में प्रवासियों की बड़ी आबादी और आवागमन के विविध मार्गों वाली सीमाओं का अर्थ है कि प्राय: इंटरनेट का प्रयोग करते हुए आतंकवादी विचारधारा के प्रचार के माध्यम से उत्पन्न स्लीपर सेल लोकतांत्रिक देशों के राष्ट्रीय ढाँचे को खतरा पहुँचाते हुए पाँचवा कॉलम बन सकते है।

किसी देश में शत्रु देश के समर्थकों या उनसे गुप्त सहानुभूति रखने वाले लोगों का ऐसा समूह जो जासूसी या विध्वंसात्मक गतिविधियों में शामिल हो, उन्हें पाँचवा कॉलम (Fifth column) कहते है। 

राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार धनराशियों के तीव्रतर आवागमन के साथ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं, बैंकिंग और वित्तीय प्रणालियों का एकीकरण भी विश्व भर में आतंकवादी गतिविधियों का वित्तीयन सरल बनाता है।


भारत में आतंकवाद के नियंत्रण हेतु उठाए गए कदम

भारत विश्व में आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित देशों में से एक है। ‘इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस’ की मानें तो वर्ष 2018 भारत आतंकवाद से 7 वाँ सर्वाधिक प्रभावित देश था। आजादी के बाद से ही भारत में अनेक आतंकवादी घटनाएं घटित होती रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2001 से 2018 के मध्य भारत में आतंकी हमलों के कारण 8000 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। ऐसे में, भारत सरकार ने इसे नियंत्रित करने के लिए विभिन्न कदम उठाए हैं, जो निम्नानुसार हैं-

सभी प्रकार की आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए भारतीय संसद ने वर्ष 1967 में ‘गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम’ (UAPA) पारित किया था तथा इसे और प्रभावी बनाने के लिए वर्ष 2004 में इसमें संशोधन भी किया गया था।

भारतीय संसद में वर्ष 1987 में आतंकवादी गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए ‘आतंकवादी और विघटनकारी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम’ (TADA) पारित किया था।

वर्ष 2002 में भारतीय संसद में ‘आतंकवाद निवारण अधिनियम’ (POTA) भी पारित किया था इसका उद्देश्य भी आतंकवादी गतिविधियों से निपटना था।

भारत के मुंबई में हुए कुख्यात 26/11 आतंकवादी हमले के बाद भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय जांच एजेंसी’ (NIA) का गठन किया था।

इसके अलावा, भारत सरकार ने विभिन्न खुफिया एजेंसियों का गठन किया है, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद से निपटने के लिए कार्य करती हैं। इनमें ‘रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ (RAW), ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो’ (IB) आदि संस्थाएं प्रमुख हैं।

भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय खुफिया ग्रिड’ (NATGRID) का निर्माण भी किया है। इसका उद्देश्य विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के डेटाबेस को आपस में जोड़ना है, ताकि ये सुरक्षा एजेंसियां बेहतर सामंजस्य के साथ कार्य कर सकें।

भारत सरकार ने आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए ‘राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड’ (NSG) नामक एक अर्ध सैनिक बल का गठन भी किया है।

इसके अलावा, भारत ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ (FATF) नामक अंतर्राष्ट्रीय संगठन का भी सदस्य है, जो मुख्य रूप से धन शोधन व आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने का कार्य करती है।


उपसंहार 

मेरी राय में तो इस समस्या का समाधान सबको मिलकर ही करना होगा।इस क्षेत्र में काफ़ी कुछ किया गया है और अभी और बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।अपने ही लोग जब घातक कार्यों में लग जाते हैं तो यह चिंता का विषय हो जाता है।आवश्यकता है उनकी सोच को निर्मल करने की,जब तक अंतर से आवाज़ नहीं उठेगी कि ग़लत काम नहीं करना तब तक इसे रोकना संभव न होगा ।कुछ नियम,कुछ सतर्कता,लोगों का जागरुक होना,यह सब आवश्यक है।श्री विजय खेड़ा ने ठीक ही कहा है-“यदि हम समस्या के समाधान का हिस्सा नहीं हैं तो स्वयं एक समस्या हैं।”

धन्यवाद|

लेखिका का जीवन परिचय

इलाहाबाद में पली-बढ़ी सरोजिनी जी की शिक्षा वर्तमान प्रयाग राज (इलाहाबाद) में संपन्न हुई।विवाहोपरांत जबलपुर में रहना हुआ। तेईस वर्ष तक अध्यापन कार्य करने के उपरांत सेवानिवृत्त हो गईं।लेखन कार्य में रुचि पहले से ही थी।समय मिलने पर कविताएँ लिखती थीं,उनकी कई कविताएँ समाचार-पत्रों में छपती थी।करोना काल में ऑन लाइन पटल मिला और तब से लेखन कार्य को गति मिली।

अब विभिन्न पटलों से जुड़ी हुई ऑन लाइन और ऑफ लाइन कवि सम्मेलनों में भाग लेती हैं।आपकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं-पहली “काव्य-नीर” और दूसरी “शब्द पंख बन उर से निकले”।कई साझा संकलन भी प्रकाशित हुए हैं जैसे किलकारी,ऊर्जिता,सबके राम,माँ मान बेटी सम्मान,बापू आदि।

      लम्हे ज़िंदगी के द्वारा साहित्य भूषण,साहित्य सुगंध ,साहित्य विभूषण एवं साहित्य संयोग तथा अन्य मंचों के द्वारा सम्मानित निरंतर साहित्य साधना में लगी हुई हैं।

सोमवार, 10 जून 2024

जेठ की तपती दोपहरी और वृक्षारोपण

लेखिका: डॉ पूर्णिमा शर्मा 'कात्यायनी'

जेठ की तपती दुपहरी में हमारी उम्र के बहुत से लोगों को याद आता होगा अपने गाँव के घर का चबूतरा और उसके बीचों बीच सर ऊँचा किये खड़ा नीम का पेड़ | किसी के घर में खड़े जामुन-आम-अमरूद के पेड़ मुस्कुराते रहते होंगे | तो किसी के घर के बाहर बरगद और पीपल के वृक्ष आग उगलती दोपहरी से राहत दिलाने शीतल हवा घर के भीतर पहुँचाते होंगे | और तुलसी गुलाब तो हर घर के आँगन में सुगन्धित हवा लुटाते ही रहते होंगे | पर आज वो ये सब केवल कल का सपना भर बनकर रह गया है | आज हम पण्डितों तथा ज्योतिषियों द्वारा निर्दिष्ट तुलसी विवाह, वट-पीपल के वृक्ष की पूजा जैसे धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन तो करते हैं, किन्तु इस सबके मूल में निहित महान और उदात्त भावना पर विचार नहीं करते |

मनुष्य अपने जीवन यापन के लिए प्रकृति पर निर्भर है यह सत्य है | 

किन्तु सभ्यता की अन्धी दौड़, शहरीकरण के दबाव, बढती जनसँख्या और आधुनिकीकरण की उत्कट लालसा ने सबसे अधिक प्रहार प्रकृति पर ही किया है | फिर चाहे वह नदियों का दोहन हो अथवा जंगलों की कटाई | आज जिस तरह तेज़ी से जंगल काट काट कर रातों रात पहाड़ों को नंगा करते हुए हम कंक्रीट के जंगल खड़े करते जा रहे हैं उसके सामने क्या हम अपने लिए विनाश का द्वार नहीं खोल रहे ? हम वृक्षों पर कुल्हाड़ी चलाते हुए एक पल को भी नहीं सोचते कि इसी तरह चलता रहा तो एक दिन हम बस घरों के भीतर एयरकंडीशनर की नकली हवा और सूर्य के प्रकाश का भ्रम देते दूधिया बल्वों की चमक पर ही आश्रित होकर रह जाएँगे जिसके फलस्वरूप अनेक रोगों का शिकार होकर अपने विनाश को ही आमन्त्रित करेंगे |

मनुष्य को अनादि काल से ही अपने दिन प्रतिदिन के कार्यों में लकड़ी की आवश्यकता रही है | लोग उस समय सादा व शान्त जीवन जीने के आदी थे | जनसँख्या सीमित होने के कारण लोगों के निवास की समस्या भी उस समय नहीं थी | इस प्रकार किसी भी रूप में पर्यावरण प्रदूषण से भी लोग परिचित नहीं थे | फिर भी उस समय का जनसमाज वृक्षारोपण के प्रति तथा उनके पालन के प्रति इतना जागरूक और सचेत था कि वृक्षों के साथ उसने भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित कर लिये थे | यही कारण था कि भीष्म ने मुनि पुलस्त्य से प्रश्न किया था कि “पादपानां विधिं ब्रह्मन्यथावद्विस्तराद्वद | विधिना येन कर्तव्यं पादपारोपणम् बुधै ||” अर्थात हे ब्रह्मन् ! मुझे वह विधि बताइये जिससे विधिवत वृक्षारोपण किया जा सके | – पद्मपुराण 28/1

भीष्म के इस प्रश्न के उत्तर में पुलस्त्य ने वृक्षारोपण तथा उनकी देखभाल की समस्त विधि बताई थी | उसके अनुसार जिस प्रकार हिन्दू मान्यता के अन्तर्गत व्यक्ति के विविध संस्कार किये जाते हैं जन्म से पूर्व से लेकर अन्तिम यात्रा तक उसी प्रकार वृक्ष के भी किये जाते थे | बीज बोने के समय गर्भाधान संस्कार की ही भाँति धार्मिक अनुष्ठान किये जाते थे | जैसे जैसे बीज अँकुरित होता जाता था, उस पर पत्तियाँ फूल फल आदि आते जाते थे – हर अवसर पर कोई न कोई धार्मिक अनुष्ठान किया जाता था | किसी वृक्ष की पत्तियाँ कब तोडनी हैं, किस प्रकार तोडनी हैं इस सबका पूरा एक विधान होता था | उस समय तो औषधि के निमित्त भी वृक्षों की ओर ही देखा जाता था – तो उस सबके लिए भी पूरा विधान था कि किस वृक्ष का कौन सा अंग किस रोग में काम आता है और किस प्रकार उसे तोडना चाहिए तथा तोड़ने से पूर्व किस प्रकार धार्मिक अनुष्ठान आदि के द्वारा वृक्ष से आज्ञा लेनी चाहिए | साथ ही यह भी आवश्यक था कि एक व्यक्ति जितने वृक्ष काटेगा उसके दुगुने वृक्ष लगाएगा भी और उनकी देखभाल भी करेगा |

सम्भवतः विधि विधान पूर्वक वृक्षारोपण तथा नियमित वृक्षार्चन आज की व्यस्त जीवन शैली को देखते हुए हास्यास्पद प्रतीत हो – किन्तु सामयिक अवश्य है | वृक्षों का विधिपूर्वक आरोपण करना, सन्तान के समान उन्हें संस्कारित करना तथा देवताओं के समान प्रतिदिन उनकी अर्चना का विधान कोरे अन्धविश्वास के कारण ही नहीं बनाया गया था – अपितु उसका उद्देश्य था जनसाधारण के हृदयों में वृक्षों के प्रति स्नेह व श्रद्धा की भावना जागृत करना | ये समस्त तुलसी विवाह, वट-पीपल आदि के वृक्ष की पूजा आदि भी इसी प्रक्रिया के ही अंग थे | स्वाभाविक है कि जिन वृक्षों को आरोपित करते समय सन्तान के समान माँगलिक संस्कार किये गए हों, देवताओं के समान जिन वृक्षों की नियमपूर्वक श्रद्धाभाव से उपासना की जाती हो उन्हें अपने किसी भी स्वार्थ के लिये मनुष्य आघात कैसे पहुँचा सकता है ? वेदी व मण्डल बनाने का उद्देश्य भी सम्भवतः यही था कि लोग आसानी से वृक्षों तक पहुँच न सकें | उस समय वनों की सुरक्षा तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता किसी दण्ड अथवा जुर्माने के भय से नहीं थी – अपितु वृक्षों के प्रति स्वाभाविक वात्सल्य ए़वं श्रद्धा के कारण थी |

दैनिक जीवन में लकड़ी की आवश्यकता से कभी भी इनकार नहीं किया जा सकता और इसके लिए वृक्षों की कटाई भी आवश्याक है | किन्तु, उपरोक्त समस्त पौराणिक तथ्यों में से कुछ भी यदि हम स्वीकार कर लें तो वृक्षों की कटाई के बाद भी वृक्षों का अभाव और उस अभाव से होने वाले दुष्परिणामों से हम स्वयं को, अपनी आने वाली कई पीढ़ियों को और प्रकृति को बचा सकते हैं…

धन्यवाद।

---कात्यायनी

रविवार, 31 मार्च 2024

हिंदू नव वर्ष

लेखिका: अनामिका संजयअग्रवाल *मुस्कान *

भारतीय संस्कृति का पवित्र पर्व,वर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को माना जाता है।कहा जाता है कि भगवान ब्रम्हा ने इसी दिन सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी।इसी दिन भगवान विष्णु ने दशावतार में से पहला मत्स्य अवतार लेकर प्रलय काल में अथाह जल राशी में से मनु की नौका को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया था। प्रलयकाल समाप्त होने पर मनु से ही नई सृष्टि की शुरूआत हुई।

      नव वर्ष में नये सिरे से प्रकृति के नये जीवन की शुरूआत होती है।बसंत की बहार आती है।लगभग इन्ही दिनों 21 मार्च को पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरा करती है। उस वक्त दिन रात बराबर है।इसी दिन से धरती में प्राकृतिक नव वर्ष प्रारंभ होता है 

     बसंत के मनमोहक सौंदर्य की आभार यह प्रकृति रानी हरीतिमा की चुनरी ओढ़े नई दुल्हन की भांती संवर जाती है। खेतों में खिली है सरसों के पीले पीले फूल और गेहूं की बालियां मंद मंद लहराते हुए झूमती है निर्जर सघन घने जंगलों में खिले पलाश और सेमल के फूलों का अनुपम सौंदर्य मिलकर प्रकृति की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं आम्र के वृक्षों में आम्र मंजरियों से लदे वृक्षों में नई-नई सुंदर कोपलें आती हैं । कोयल की मधुर ध्वनी भौरों को आकर्षित करने लगती है चारों और प्रकृति का ही उत्सव चल रहा होता है वातारण आनंदित होकर आनन्द की अमृत वर्षा करने लगती हैं। रंगीन रंगोत्सव साथ नव संवत्सर का आगमन होता है।

प्राचीन काल में ऋतु और राशि परिवर्तन के ऐसे समय स्वयं को स्वस्थ और निरोगी रखने के लिए  सात्विक आहार व्रत उपवास से मन और शरीर दोनों को शुद्ध और सशक्त उपक्रम है। शीत और ग्रीष्म ऋतु का समागम होता है तब शरीर में वात पित्त और कफ का समायोजन घट बढ़ जाता है।तो रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है इसलिये इस समयकाल में नीम की कोमल पत्तियों को खाने से स्वास्थ्य लाभ होता है। इस समय अचानक गर्मी बढ़ जाने से बुखार मलेरिया और चेचक फैलता है अपच और उल्टी से बचने के लिये हल्काभोजन करना चाहिये ।इस समय कीट पतंगा मच्छरों का आतंक बढ़ जाता है जीससे बिमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है।वाइरस फैलते है इन सब से बचने के लिये नीम और कपूर जलाकर सकारात्मक उर्जा फैलाकर पर्यावरण को शुद्ध करते है।

पशु पक्षी और जीवजंतु में नव जीवन के संचार से नवांकुर प्रस्फुटित होने लगते हैं।

सरसो और गेहूं की लहलहाती फसलों को देखकर किसान खुशी से झुमते नाचते गाते है।

     इस समय सभी कुछ नया होता है। बच्चों की पढ़ाई का एक सत्र खत्म होता है। नये जोश के साथ नयी किताबें नयी अध्ययन सामग्री के साथ नयी कक्षायें प्रारंभ होती हैं। इसी समय 1अप्रेल से नये सत्र के वित्तीय काम प्रारंभ होते हैं। 

   वर्तमान में विश्वविख्यात स्वयंसेवी सामाजिक  संगठन राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केशवराम बलिराम हेडगेवार जी की जयंती भी इसी दिन मनाई जाती है

    भारत वर्ष के गौरव को पुनः विश्व पटल पर लाने के लिये पश्चिम अंधानुकरण के भ्रमजाल से निकलकर अपनी हिन्दू सभ्यता के नव वर्ष को मनाने की परंपरा को अपनाना चाहिये और नयी पीढी को भी यही करने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये। 

धन्यवाद।

अनामिका संजयअग्रवाल *मुस्कान *

बुधवार, 27 मार्च 2024

माटी को बचाना है

विनोद शर्मा

माटी की उपयोगिता क्या है?  इसको इस तरह से समझा जा सकता है कि यह जीवन के पांच तत्वों में से एक है | यदि माटी (भूमि) नहीं है तो जीव का कोई भी अस्तित्व ही नहीं होगा बल्कि यों कहे तो अतिशयोक्ति नही होगी कि जीव की उत्पत्ति ही नहीं हो पाएगी | ब्रह्मांड में केवल पृथ्वी पर ही जीवन है, यह परम सत्य है | संपूर्ण जगत के जीवों में मनुष्य ही एक अकेला विवेकशील प्राणी है जो अच्छे बुरे को पहचानता है | पांच तत्वों/भूतों से बने तन को चलाने या जिंदा रखने के लिए इन्हीं पांच तत्वों या इनसे ही उत्पन्न वस्तुओं या सीधे रूप से सेवन कर जीव अपना जीवन यापन करता है या ऐसा कहे कि इन पर ही आश्रित रहता है | मनुष्य को छोड़कर सभी प्राणियों में वस्तुओं के भंडारण या एकत्रीकरण की दक्षता नहीं होती है | वह तो केवल अपने वर्तमान के लिए भोजन को जुटाने के लिए व्यस्त रहते हैं, जबकि मनुष्य में वस्तुओं को एकत्र करने/ इकट्ठा करने/ धरोहर के रूप में संजोने की क्षमता के साथ-साथ अपनी असीमित इच्छाओं को पूरा करने के लालच में हर प्रकार के दोहन करने में बना/लगा रहता है और वस्तुओं के संरक्षण के विषयों को भी दरकिनाक कर देता है | इसी कारण से मनुष्य पृथ्वी पर प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं जैसे-धातुएं, वनस्पति, वन्य जीव, जल यानी नदियां झील सागर इत्यादि के संतुलन को बिगाड़ने में भी संकोच नहीं करता है | मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो खुद मनुष्यों को और दूसरे प्राणियों को अपने लिए प्रयोग में लाता है |

पृथ्वी पर जन्में सभी जीवों के भरण पोषण के लिए यह धरती/पृथ्वी भरपूर वस्तुएं प्रदान करती है | इसके अनुसार एक खाद्य श्रृंखला का निर्माण होता है, किंतु मानव धरा पर ऐसा प्राणी है जो प्रकृति द्वारा बनाए गए नियमों में अपनी सुविधा अनुसार परिवर्तन करता रहता है जिसके परिणाम स्वरुप प्रकृति का संतुलन कई बार बिगड़ने की कगार पर पहुँच जाता है या बिगड़ जाता है | देखा जाए तो इसका प्रभाव स्वयं मनुष्य के ऊपर भी अन्य जीवों के साथ-साथ पड़ता है, मगर वह ऐसा कभी नहीं सोचता है कि मुझ पर भी इन कृत्यों का क्या प्रभाव पड़ेगा | सही मायने में हमारी यह धरा सभी का भरण पोषण करने में पूर्णत: सक्षम है, लेकिन यह किसी के लालच को पूरा कभी नहीं कर सकती/कर पाती है और समय-समय पर चेताती भी/ आगाह भी करती रहती है | मनुष्य केवल अपने ही विषय में सोचता या विचार करता रहता है जिसके अनुसार वह पृथ्वी पर रहकर अपने क्रियाकलापों को कार्यान्वित करता है |

वर्तमान काल में संसार की जनसंख्या वृद्धि के कारण पृथ्वी पर उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बहुत बड़ा दबाव पृथ्वी पर ही बढ़ता जा रहा है | सभी को खाने के लिए अन्न इत्यादि की आपूर्ति हेतु मनुष्य ने आधुनिक तकनीकी ज्ञान में वृद्धि कर इसका प्रयोग करके कृषि उत्पादन के साथ-साथ औद्योगिक क्रांति लाकर सभी यातायात घरेलू उपकरण आदि के अलावा रक्षा के क्षेत्र में युद्ध के लिए शास्त्रों का जिसमें थल, जल और वायु सभी प्रकार के शास्त्रों का विकास किया है | इस प्रगतिवाद युग में होड़ के कारण पृथ्वी पर सभी ओर से बराबर दबाव बढ़ता ही जा रहा है | इन सभी को ध्यान में रखते हुए यदि हम विचार करें कि हमने धरा की मिट्टी/मृदा की क्या दशा बना दी है? कृषि उत्पादन में वृद्धि करने के लिए हरित क्रांति जैसे कार्यक्रमों को प्रोत्साहन दिया जिससे खेतों में संकर बीजों तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग अधिकतम सीमा से भी अधिक किया | आधुनिक कृषि औजारों का भी प्रयोग किया जा रहा है | कीटनाशक दवा तथा खरपतवार को नष्ट करने के लिए भी अनेक प्रकार के रसायनों का प्रयोग अत्यधिक तेज गति से किया गया है/ किया जा रहा है | 

इन सभी प्रयोगों के कारण शुरुआती वर्षों में तो प्रति एकड़ उपज की मात्रा बहुत ही उच्च स्तर से बढोतरी हुई परंतु बाद में अब धीरे-धीरे गिरावट की ओर जा रही है | ट्रैक्टरों इत्यादि के कृषि कार्य में प्रयोग करने से हमारे देश भारत में बैलों यानी परंपरागत जोत के तरीकों को पूर्णतया छोड़कर आधुनिक विधियो को अपनाया गया है | फलस्वरूप बैल धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है/गया है | इन सभी सुविधाजनक उपकरणों और रासायनिक खादों तथा अन्य दवाओं के प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता में धीरे-धीरे बड़ी गिरावट आई है | ये सभी कारक मिट्टी प्रदूषण का भी एक बड़ा कारण बना है |

इन सभी कारकों के द्वारा केवल मिट्टी की उर्वरा शक्ति ही नहीं घटी अपितु भूमिगत जल प्रदूषण की समस्या भी उभर कर सामने आई है | भूमि पर जितने भी रसायनों का प्रयोग पैदावार बढ़ाने को होता है, वे कभी समाप्त नहीं होते हैं या यूं कहें कि वे मिट्टी में ही घुल जाते हैं और रंध्रों के माध्यम से भूमि के आन्तरिक भाग में प्रविष्ट कर जाते हैं, जिससे मिट्टी और जल दोनों को प्रदूषित करते हैं | आधुनिक संकर बीजों तथा फसलों के गलत चयन (किस खेत में कौन सी फसल को बोना उचित होगा) के कारण सिंचाई के लिए भूमिगत जल का अधिक दोहन किया गया/ जा रहा है, इससे भू जल स्तर भी नीचे जा रहा है/जा चुका है | यहां पर सभी को विशेषत: किसानों का ध्यान इस ओर आकर्षित करना आवश्यक है कि खेतों में जो भी रसायन खाद, कीटनाशक और खरपतवार नाशक दवाएं डाली जाती है उससे खाद्य श्रृंखला बर्बाद होती है तथा इससे भी अधिक बात यह है कि इन सभी रसायनों का जैव आवर्धन होता है ( बायो-मैग्नीफिकेशन) अर्थात ये सभी रसायन फसलों की जड़ों के माध्यम से बीजों में जिसे मनुष्य अपने भोजन के रूप में प्रयोग करता है तथा चारे के माध्यम से पशुओं में पहुंचते हैं | साथ ही दूध और मांस आदि के माध्यम से मनुष्यों के शरीर में खाने के रूप में प्रविष्टि करता है जो पूर्णतया प्रदूषित होता है | जितना जिस गति से हम इन रसायनों का प्रयोग कर रहे हैं या बढ़ता जा रहा है उसकी उतनी ही तीव्र गति से नई-नई बीमारियां मनुष्यों और अन्य जीवों को अपनी चपेट में ले रही हैं/ लेती जा रहीं हैं |

इसमें कोई शक नहीं है कि हमें खेतों में पैदावार बढ़ानी है क्योंकि जिस तरह जनसंख्या बढ़ रही है उसी प्रकार से खाने की वस्तुओं अर्थात खाद्यान्नों की आवश्यकता भी बढ़ रही है | इसके लिए हमें उन माध्यमों के प्रयोग पर जोर देना चाहिए जिससे पैदावार भी बढ़ सके और मिट्टी तथा जल प्रदूषण होने से बचा रहे | इसके लिए हमें खेतों में जैविक खादों के प्रयोग पर जोर देना चाहिए | फसल चक्र का विशेष ध्यान रखना चाहिए, साथ-साथ खेतों में निराई गुड़ाई को करना चाहिए जिससे खरपतवार के असर को कम करने में मदद मिल सके और रसायन ना डालना पड़े | पशुधन पर ध्यान देकर जैविक खाद तथा दूध आदि के उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है |

इस प्रकार जैव आवर्धन से बचाव होगा जिससे बीमारियों का कम प्रकोप होगा | यदि हम आने वाले समय में माटी को सुरक्षित कर लेंगे तो पृथ्वी पर प्राणी जीवन को सुरक्षा प्रदान कर पाएंगे | यह सब आपसी सहयोग से ही संभव हो पाएगा वैज्ञानिक सोच समझ तथा आविष्कारों का सदुपयोग कर हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं या हमें अपना लक्ष्य प्राप्त करना चाहिए |

*माटी हमें बचानी है, जैविक खाद लगानी है, 

बैलों से खेती करनी है, पैदावार बढ़ानी है|*

धन्यवाद।

विनोद शर्मा

रविवार, 24 मार्च 2024

फेसबुक को पक्षाघात पर भक्तों का अरण्यरोदन

 लेखक: राकेश अचल

'फेसबुक ' को बीती रात अल्प पक्षाघात हुआ तो पूरी दुनिया में फेसबुक के भक्त विचलित हो गए। लगा कि जैसे किसी ने उनकी जान ही छीन ली हो। मै भी इस भक्तमंडली का सदस्य था लेकिन फेसबुक   के शांत होने के बाद मैंने भी चैन की सांस ली। मैंने बहुत कम अवसरों पर देखा है, जब लोग किसी चीज के लिए इतने परेशान और फिक्रमंद होते हैं। फेसबुक तो कोई चीज भी नहीं है। एक सेवा है किन्तु अपनी उपयोगिता की वजह से आज दुनिया के एक बड़े हिस्से के लिए प्राणवायु बन गयी है।

दुनिया में जिंदगी के लिए जैसे भोजन -पानी और आक्सीजन आवश्यक है वैसे ही अब सोशल मीडिया एक आवश्यक अवयव बन गया है ।  अकेले फेसबुक दुनिया के 1560  मिलियन लोग फेसबुक की सेवाओं से जुड़े हैं ,और ऐसे जुड़े हैं कि  कुछ समय के लिए ही फेसबुक के बंद होने से सदमे की स्थिति में पहुँच गए। फेसबुक के हितग्राहियों की दशा ऐसी हो गयी जैसे किसी सांप के मुंह से उसकी मणि छीन ली गयी हो ,या किसी मछली को पानी से निकाल कर गर्म रेत पर फेंक दिया हो। जाहिर है कि  फेसबुक ने बीस साल में ही   जनमानस पर अपना इतना प्रभुत्व बना लिया है की लोग उसके आदी हो गए हैं और एक पल भी ' फेसबुकाये ' बिना नहीं रह सकते।

फेसबुक  'अनंग  ' है। फेसबुक को शैव सम्प्रदाय का कोई ' हैकर ' ही अपनी तीसरी आँख से भस्म कर सकता है लेकिन हमेशा  के लिए नहीं। फेसबुक की मारक क्षमता से समाज ही नहीं बल्कि सियासत भी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है ,बावजूद इसके फेसबुक अपनी जगह है ,उसे मिटाने की,' हैक ' करने की तमाम कोशिशें बार-बार नाकाम हो जाती है।  5  मार्च 2024  को भी ऐसी ही कोशिशें नाकाम हुईं और लोगों ने चैन की सांस ली। सवाल ये है कि  गुण-दोषों से भरी फेसबुक आम आदमी की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन कैसे गयी  ? इसके लिए हम खुद जिम्मेदार है।  हमारी सियासत जिम्मेदार है।  जिन्होंने लगातार ऐसी परिस्थितियां पैदा की  जिसकी वजह से इंसान आपस में कटता चला गया। संवाद की सूरत लगातार कम होती चली गयी।

आज फेसबुक है तो तमाम दूसरी बुक्स बेकार है।  फेसबुक आज का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा लोकप्रिय महाग्रंथ बन चुका है। फेसबुक किसी से भेदभाव नहीं करता। फेसबुक की  अपनी दुनिया है ।  अपने कानून हैं। अपने तौर-तरीके हैं। फेसबुक की अपनी कोई भाषा नहीं है। फेसबुक   अपने उपयोगकर्ताओं को अपनी पसंद की भाषा चुनने का अवसर देती है। फेसबुक का अपना लोकतंत्र है,अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है,हालाँकि इसके अपने मापदंड हैं,सीमाएं है ।  फेसबुक भी अभिव्यक्ति की आजादी को एक सीमा के बाद पाबंद करती है किन्तु उस तरीके से नहीं जिस तरीके से आज दुनिया में तमाम  धार्मिक और लोकतांत्रिक सरकारें कर रही हैं। फेसबुक दुनिया के तमाम सत्ता प्रतिष्ठानों के लिए खतरा है। इसीलिए जब तब दुनिया के तमाम देशों की सरकारें फेसबुक   को प्रतिबंधित करने के लिए इंटरनेट को ही बंद करा देतीहैं। हमारे हिन्दुस्तान में तो ये सब आये दिन होता रहता है।

कहते हैं कि  आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है ,सो इसी तरह अमेरिका के एक कालेज छात्र मार्क जुकरबर्ग की मित्रों से जुड़े रहने की जरूरत ने 2004  में फेसबुक को जन्म दिया था जो आज दुनिया के एक बाद हिस्से की जरूरत बन चुकी है। दुनिया के के तमाम लोग जुकरबर्ग के शुक्रगुजार हैं फेसबुक बनाने के लिए। फेसबुक दुनिया का ऐसा मेला है जहाँ दशकों से गुम हुए लोग आपस में मिल जाते हैं। ये काम आसान काम नहीं है। फेसबुक ने मनुष्य के एकांत में दखल किया है ।  मनुष्य को अवसाद से बचाया भी है और सामाजिक सुरक्षा भी  दी है ,साथ ही  अश्लीलता ,घृणा भी परोसी है। फेसबुक   गोपनीयता के लिए खतरा भी है और समाज को पारदर्शिता की और भी ले जाती है। यानि फेसबुक  एक दोधारी तलवार है। ये ऐसा उस्तरा भी है जो यदि बंदर के हाथ लग जाये तो हजामत बनने के बजाय गर्दन काटने   का भी काम कर सकती है।

फेसबुक के अनेक रूप है।  फेसबुक दवा भी है और जहर भी ।  फेसबुक मनोरंजन भी देती है और विकृति भी ।  फेसबुक के पास दोस्ती  और दुश्मनी के लिए पर्याप्त समय है ।  फेसबुक राजनीतिक हस्तक्षेप भी करती है और निजता पर भी डाका डालती है। फेसबुक नशा भी है और नशामुक्ति भी। फेसबुक के समर्थक भी हैं और विरोधी भी ।  फेसबुक अबाल-वृद्ध सबकी मित्र है। सबकी अभिभावक भी है ।  सबकी हमराह,हम जुल्फ,हमदर्द, हमजोली यानि सब कुछ है। फेसबुक किसी के लिए गीता है तो किसी के लिए कुरआन । किसी के लिए बाइबल है तो किसी के लिए कुछ और। इतना रूतबा  और व्यापकता शायद किसी दूसरे माध्यम के पास नहीं हैं। 

फेसबुक से आप मनोरंजन,ज्ञानार्जन   ,व्यवसाय  ,महिमा मण्डन और मन मर्दन जो चाहे सो कर सकते है।  ये आपके ऊपर है कि  आप फेसबुक का कैसे इस्तेमाल करना चाहते है।  दुनिया में जैसे विभिन्न प्रकार के नशा से मुक्ति के लिए अभियान चलाये जाते हैं उसी तरह फेसबुक से मुक्ति के लिए भी अभियान चलाये जाते हैं। कुछ लोग 31  मई को फेसबुक   छोडो दिवस के रूप में भी मानते हैं। कुल मिलाकर फेसबुक आज मनुष्य जीवन  की प्राणवायु है। इस पर जब-जब खतरा मंडराता है दुनिया  बेचैन हो जाती है ।  इसलिए जरूरी है कि  आप फेसबुक से मुहब्बत करते हुए भी इसका कोई न कोई विकल्प खोजकर रखिये अन्यथा खुदा न खस्ता किसी दिन फेसबुक समाप्त हुई उस दिन आपकी दुनिया भी आपको समाप्त होती सी नजर आएगी। वैसे मै फेसबुक को कलियुग का असली अवतार मानता हूँ ।  प्रधानमंत्री श्री मोदी जी को मैंने कभी अवतार नहीं माना जबकि वे एक महान से महान नेता हैं। आइये हम सब फेसबुक की सलामती के लिए समवेत होकर ईश्वर से ,हैकरों से प्रार्थना करने की वे इस पाकीजा उपक्रम से छेड़छाड़ न करें और ईश्वर इसे लम्बी उम्र दे । 

धन्यवाद| 

राकेश अचल

बुधवार, 20 मार्च 2024

होली का पर्व

 लेखिका: रेखा अस्थाना

सुखद विविधताओं की मेरी जन्मभूमि भारत🌷🌹🌸🌺

ईश्वरीय कृपा से भारत एक विशाल देश है और इसमें छः ॠतुएँ क्रमवार आती जाती हैं। सभी का अद्भुत नजारा होता है।कोई किसी से कम नहीं।वर्ष  के 365 दिनों में 365पर्व मनाए जाते हैं।पर कुछ खास पर्व जैसे होली,दिवाली,दशहरा।पर्व  सदा से ही खुशहाली का कारण होते आए हैं।क्योंकि इनका सीधा संबंध फसलों से होता है।

आज मैं केवल अपने बचपन की होली वह भी प्रयागराज जो पहले इलाहाबाद के नाम से जाना जाता था ।आज से कई दशक पहले की बात है तब तीज त्योहार की अपनी ही रौनक व गरिमा होती थी।पूरा मोहल्ला एक होता था।सभी अपने अपने घरों से चंदा देते व लकड़ियां  लाकर बीच चौराहे में जहाँ होलिका दहन निश्चित किया जाता था जमा करते थे।

टेसू के फूल लाए जाते थे बढ़िया अबीर-गुलाल चंदे के पैसों से मंगवाया जाता था। वैसे तो होली की तैयारी महीनों पहले से शुरु की जाती थी।घर पर स्त्रियाँ पापड़,चिप्स,कचरी  बनाकर रखती थी ।चार -पाँच दिन पहले से गुजिया भी बनने लगती थी।घर पर ही नमकीन बनाया करती थी।

   होली  का नाम होली कैसे पड़ाअब मैंआपको इसके बारे में बताऊँगी।बिष्णुभक्त प्रह्लाद भगवान को सबसे बड़ा मानता था जब कि प्रह्लाद के पिता हरिण्याकश्पु का कहना था कि उसके आगे संसार में  कोई नहीं है बसवही भगवान है।प्रह्लाद के न मानने पर उसे नानाप्रकार के कष्ट दिए।पर भक्त के आगे तो भगवान रहते ही हैं।अंत में अपनी बहन जिसका नाम होलिका था उसको वरदान था कि वह आग में नहीं जल सकती जब वह प्रह्लाद को गोद में लेकर बैठी तो खुद जल गई और प्रह्लाद बच गए। तभी से होलिका दहन का रिवाज चल पड़ा कि इस अग्नि में प्रतिज्ञा कर अपनी सभी बुराइयों को त्याग  दो या जला दो।

तो मैं बात कर रही थी प्रयागराज के होलिकोत्सव  की।हम सब बच्चे तो कितने दिन पहले से ही होली मनाते थे पर उस खासदिन टेसू के फूलों में गर्म पानी डालकर  रखा जाता था सभी लोग अपने अपने पुराने पोशाक  में दोपहर एक बजे तक होली खेलते फिर घर आकर नहा-धोकर पकवान खाते।

अब आइए शाम के समय का दृश्य  क्योंकि यह एक सामाजिक पर्व है तो आपसी भाईचारा भी जरूरी है।हम सब नए वस्त्र पहनकर  एक दूसरे घर जाते जहाँ हमें मुँह पर गुलाल लगाकर कान में इत्र का फाहा रखा जाता था।बिना किसी भेदभाव के सबसे बड़े प्रेम से गले मिला जाता था।पूरे साल का राग-द्वेष मिट जाता था ।फिर हम खुशी खुशी गुजिया खा कर घर लौटते थे। तब प्लास्टिक का चलन न था पीतल की पिचकारी होती थी।होलिकोत्सव मिलन समारोह हफ्तों चलता था।आज जब मैं यहाँ गाजियाबाद की हालत देखती हूँ तो बस यही कहना पड़ता है----देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान , कितना बदल गया इंसान।

अहंकार और अहं जिसमें भी आ गया उसका अंत निश्चित जानों।क्योंकि हिरण्याकश्पु स्वयं को भगवान  मानने लगा था तो उसने प्रह्लाद को मरवाने के लिए एक लोहे के खंभे को खूब लाल कर गर्म किया और प्रह्लाद से कहा  क्या तेरे भगवान इस खंभे में भी हैं तब उसने कहा सर्वत्र।तो आज्ञा मिली इसे गले लगाओ ।कुछ पल प्रह्लाद ने खंभे को निहारा उसे एक छोटी चींटी आती जाती दिखाई दी तब प्रह्लाद ने सोचा अवश्य ही यह भगवान  का संकेत है।वह खंभे से लिपट गया खंभा फटा और नृसिंह भगवान अवतरित हुए उन्होंने हिरण्याकश्पु को अपनी जांघ में लिटा कर उसका पेट चीर दिया और एक अहंकारी राक्षस का अंत हो गया।सच ही कहा गया है--

भक्तों के सिर पर भगवान का हाथ होता है।

जाको राखे साईयाँ मार सके न कोई।

अब आते हैं हम होली बसन्त ऋतु की पूर्णिमा को मनाई जाती उसके पश्चात हिन्दू नववर्ष प्रारम्भ होता है।मौसम सुहावना व सुखद होता है चारों ओर की सुन्दरता देखते ही बनती है। रबी की फसल पकने को तैयार है ।इसी कारण लोग गेहूँ व चने की बालें लाकर होलिका को समर्पित करते हैं ।गाँव में रात में फाग गाए जाते हैं।गेहूँ और चने की बालों होलिका में समर्पित करते हैं फिर उसका प्रसाद सभी को देते हैं।इसमें भाव यह होता है जो प्रभु तुमने  दिया वह तुमको समर्पित। 'इदम न मम'आज के युग में न संस्कार  न संस्कृति न हर्ष  न उल्लास ।सबके मनोरंजन के अपने अपने साधन हैं।हमारा बचपन जिसे आज भी हम हृदय से न निकाल पाए अभी तक।अब किसी भी त्योहार में खुशी कम दिखावा ज्यादा।चने के बालों को भूनने से उसका नाम होरहा पड़ गया।

  क्योंकि होली का पर्व  आने वाला है इस कारण  मुझे अपने बचपन की  याद आ गई ।इसलिए यह लेख लिखा।

धन्यवाद| 

रेखा अस्थाना

रविवार, 10 मार्च 2024

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

 लेखक: प्रो. वी. पी. श्रीवास्तव

प्रकृति की गोद में पशु पक्षियों के समान जीवन: आहार, निद्रा, भय, मैथुन से आगे बढ़कर मानव ने अपने लिए सुखकर जीवन बनाया , संस्कृतियां पनपीं, मिटीं। भारतीय संस्कृति के लिए कहा जाता है:

यूरोप, मिस्र, रोमां सब मिट गए जहां से,

कुछ चीज़ है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी।

नहीं - ऐसा ना समझें। धरती ही खतरे में है , भारतीय संस्कृति की क्या कहें। शताब्दी के अंत तक समुद्र के अपनी तटीय मर्यादा के छोड़ने की भविष्यवाणी है। बात वही है," कुछ चीज़ है" जिसने हमारी हस्ती बचाए रखा था:"संयम"।  पता नहीं कब ये चीज़ हाथ से  निकलने लगी। सुनाई पड़ता है अब तो, कभी कभी ही सही  ,There is enough for every one's need but not enough for anyone's greed. अब तो greed भी आम हो चली है।

असंयम का शिकार महिला थी, अब भी है, अब धरती भी हो गई है। असंयमित पुरुष के लिए महिला उपभोग की वस्तु थी। जैसे ज़मीन, राज्य पाने के लिए युद्ध किए गए, वैसे ही औरत के लिए भी युद्ध किए गए।वर्तमान युग में , बाज़ार ने वस्तुओं के उपभोग को असंयमित करने के लिए, उपभोक्ता यानी जनसाधारण के लिए भी स्त्री के अमर्यादित रूप को सहज कर दिया। हम भले ही गीता पाठ करते रहें " ध्यायतो विषयानपुन्सह...." अर्थात कि विषयों का ध्यान करने से उनमें आसक्ति, और उनकी प्राप्ति ना होने से क्रोध, मतिभ्रष्टि... आदि, आदि होता है। आप चाहें ना चाहें,  मीडिया दिन रात बूढ़े , बच्चे, जवान को समभाव से विषयों में डुबकी डुबा डुब लगवाता रहता है। पद्मनी, रूपमती vitually बिना फौज के उपलब्ध हैं, शिकार वो हुई जो real world में पास में उपलब्ध हो। आज भारतवर्ष में औसतन  प्रति घंटे  बलात्कार की चार घटनाओं की शिकायत पुलिस में दर्ज होती हैं, वर्ष में 32000 मामले।जबकि इन घटनाओं की रिपोर्ट करने से अधिकांशतः लोग कतराते हैं। इसलिए ब्राजील की माहिला जब  लिखती है कि अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए वो अपने किसी पर विश्वास नहीं करती तो जानिए कि यह एक वैश्विक सत्य है। विश्वास किस पर ,ना पुलिस, ना कचहरी। समाज तो टूट ही रहा है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए बनाए नए कानून उसे और बेबस बना रहे हैं।

स्त्री हो या पुरुष, जो विवेकशील हैं और साहसी भी, वे मिलजुलकर अपने समय की मुख्य समस्याओं से जूझते हैं, बिना तुरंत परिणाम की चिंता किए। पर्यावरणीय संकट, युद्ध की विभीषिकाएं या महिला असुरक्षा जैसी ही नहीं परिवार और स्थानीय समाज की समस्याएं सभी महत्वपूर्ण होती हैं। महिलाओं को गांधीजी ने पुरुष से कभी पीछे नहीं समझा। तभी तो सत्याग्रह के सभी मोर्चे पर स्त्रियों को आगे रखा। उनमें नाम मात्र भर पढ़ी महिलाओं से लेकर उच्चतम योग्यता प्राप्त संभ्रांत घर की महिलाएं, हर धर्म की , देश विदेश की महिलाएं सभी शामिल थीं (बापू की महिला ब्रिगेड लेखक अरविंद मोहन की हाल में प्रकाशित पुस्तक)।नेताजी ने रानी झांसी ब्रिगेड में महिलाओं को बंदूक पकड़ा दी। इराम शर्मीला के हिंसा के प्रतिकार में लगभग 16 वर्ष का अन्न जल त्याग के आगे तो पौराणिक कथाएं भी छोटी पड़ जाती हैं। Non Violent Peace Force  में Adbusters.org में महिलाएं किसी से पीछे नहीं हैं। ध्यान रहे पर्यावरणीय संकट हो या दहेज की समस्या का मुख्य कारण उपभोक्तावाद है, और उसको बढ़ाने में पढ़ी लिखी महिलाओं का हाथ प्रमुख है। बिमल मित्र की एक दिल को दहला देने वाली कहानी है_ हत्या या आत्महत्या, जिसमें नायक पत्नी की दूसरों के सदृश गाड़ी, टीवी, आदि उपकरणों की फरमाइश से तंग  आकर सरकारी खजाने से चोरी करता है और पकड़े जाने के डर से आत्महत्या कर लेता है। वहां पहुंच कर लेखक को लगा कि उसे देख कर उसका मृतक शरीर उनसे अपनी व्यथा  चीख चीख कर सुना रहा है।लेखक घबड़ा कर आंख कान बंद कर के  भागने लगता है।लेखक को लगता है जैसे  बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के सारे हिंदुस्तान का सामूहिक क्रंदन उसका पीछा कर रहा है...।

इस क्रंदन से हम सभी कहीं न कहीं प्रभावित हैं और इसका समाधान भी हमें ही करना है इसलिए हम वापस संयम के रास्ते पर चलें।

धन्यवाद| 

प्रो. वी. पी. श्रीवास्तव

शनिवार, 9 मार्च 2024

स्वतंत्र नारी

 लेखिका: रूबी शोम

 

स्वतंत्र नारी से आप क्या समझते हैं या कहें तो परतंत्र नारी । प्रत्येक नारी को जन्म से लेकर विवाह और फिर पुत्र सभी पर अधीन रहना पड़ता है नारी पहले पिता के घर पर अपने पिता के कहे अनुसार, विवाह के बाद पति के कहे अनुसार, उसे चलना पड़ता है और फिर पुत्र के कहे अनुसार, चलना पड़ता है दुनियां चाहे जितनी भी तरक्की कर ले पर नारी का कहां और कितना स्थान होता है, घर परिवार और समाज में यह बात किसी भी नारी से छुपी नहीं है।नारी को हर बात में चुप करा दिया जाता है, नारी स्त्री हर जगह पर मौन रहकर ही कार्य करती है नारी को अपनी बात कहने अपने विचारों को व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए यह बात पहले घर परिवार और समाज को समझनी चाहिए नारी की बात सुनकर उसके विचारों का सम्मान करना चाहिए तभी एक स्त्री अपने स्वतंत्र होने पर सभी कार्य कर सकती है और इसमें बहुत बड़ा योगदान एक नारी के लिए एक नारी का होना चाहिए जब तक एक स्त्री दूसरी स्त्री का साथ नहीं देगी उसको आगे नहीं बढ़ाएगी तब तक एक स्त्री आगे नहीं बढ़ सकती है हमें नारी के उत्थान के लिए स्त्री और पुरूष दोनों को मिलकर यह कार्य करना होगा तभी एक नारी आगे बढ़कर एक सशक्त नारी एक स्वतंत्र नारी बन सकती है इसमें पिता ,भाई ,पति और पुत्र को अहम भूमिका निभानी पड़ेगी तभी स्त्री एक स्वतंत्र नारी के रूप में अपना जीवन यापन कर सकती है।

धन्यवाद| 

रूबी शोम

शुक्रवार, 8 मार्च 2024

सेना के रूप में भारतीय नारी

 लेखिका: अनामिका संजय अग्रवाल

  

खुद के कर कमलों से सज्जित

ये जग की फुलवारी है।

घर आंगन को सजाती जहां को

महकाती ये तो नारी है ।।

मन से नाजुक पर अपनों के लिए

शक्ति रूप धारिणी  ये नारी है।

भारत की नारी है निराली  हर कष्ट

की वो तो तारण हारी है।।

      घर के अंदर हो या बाहर दोनों जगह नारी एक योद्धा की तरह हर परिस्थिति में परिवार को सुरक्षित रखती है।परिवार को हर आपदा से बचाती उसकी यही कोशिश होती है कि परिवार खुशहाल रहे। आज तो नारी घर के बाहर भी कितना कुछ कर रही है। आज की नारी सेना के हर क्षेत्र में अपना प्रतिनिधित्व निभा रही है।

       भारत में नारी को शक्ति का रूप माना गया है। भारतिय सेना में 6807 से अधिक महिलाएं काम कर रही है डाक्टर पुनिता अरोड़ा 1968 में भारतीय सशस्त्र बलों में लेफ्टिनेंट जनरल और भारतीय नौसेना में वाइस एडमिरल के रूप में सर्वोच्च नम्बर तक पहुंचने  वाली पहली महिला है ।महिला अधिकारीयों को भारतिय नौसेना के युद्ध पोत पर नियुक्त किया गया है कैप्टन तानिया शेरगिल ने गणतंत्र दिवस परेड 2020 में पुरूष सैनिकों के दल का नेतृत्व किया।

        बिहार के बेगूसराय की भावना कंठ,मध्यप्रदेश के रीवा की अवनी चतुर्वेदी और बड़ोदरा की मोहना सिंह ये तीन महिलाएं 18 जून 2016 को देश की पहली महिला फाइटर के रूप हिन्दुस्तान के नभ को सुरक्षित बचा पाये।

         फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान भारत की तरफ से पाकिस्तान से लोहा लेकर कारगिल गर्ल का खिताब जीता।

       शांति तिग्गा ने 13 लाख सुरक्षा बलों के बीच बंदूक हैंडल कर निशानेबाजी में सर्वोच्च स्थान अर्जित किया ।

खुले आसमान में अपने पंख फैलाकर उड़ने की इच्छा रखने वाली सरला ठकराल जी जीवन विषम परिस्थिति से घिरा हुआ था।

 

* सरला ठाकरे जी का जीवन परिचय *

 

8 अगस्त 1914को ब्रिटिश भारत में जन्मी साड़ी पहनकर हवाई जहाज उड़ाकर अपना परचम लहराने  वाली पहली महिला पायलट सरला ठकराल जी थी ।

      सरला ठकराल 16 वर्ष की थी तभी उनका विवाह पी डी शर्मा जी से हुआ उसके परिवार में पहले से 9 सदस्य पायलट थे फिर उनके पति के साथ से परिवार की जिम्मेदारी के बाद के बाद भी सरला जी अपने सपने पूरे कर पाई।

21 वर्ष की आयु में 4 वर्ष के बेटी की मां 1936 में सरला जी ने जिप्सी मोंठ को अकेले उड़ाया। कराची से लाहौर बीच और उसके बाद 1000 घंटे लगातार उड़ान भरकर लाइसेंस "अ" हासिल किए।

       इन्हें इस रूप में देखकर लोग दांतो तले उंगली दबाते थे कहते आदमियों के पेशे में ये औरत क्यों कोई इसे बेशर्मी कह रहा था ।शायद लोगो की नजर ही लग गई जो सरला जी को ये दिन देखना पड़ा।

          पायलट बनने से पहले ही सरला जी को अपने पति की मौत के सदमे से आहत होकर जोधपुर से लाहौर आना पड़ा।

     विपरित परिस्थिती में सरला जी मेयो स्कूल आफ आर्ट में दाखिला लेकर पेंटिंग के साथ आर्ट में डिप्लोमा लिया। 1947 में भारत पाकिस्तान विभाजन हुआ तो अपनी बेटीयों के साथ भारत आकर पी पी ठकराल से शादी करके जीवन की नई शुरुआत की। देश की होनहार महिला पायलट ने बखुबी व्यवसाय करते हुए 15 मार्च 2008 मे दुनिया को अलविदा कह दिया ।उसके संघर्ष और साहस की कहानी आज के नारी के लिए प्रेरणा है।

  84 साल पहले इतिहास रचने वाली सरला जी की जिंदगी में 1939 में दो कारणो से बदलाव आया।पहला कारण विमान क्रेश में पति की मौत और दूसरा कारण उसी साल द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ। इसके बाद ठकराल जी की जिन्दगी का रूख मुड़ना स्वाभाविक था।

  2008 में आखिरी सांस लेते हुए सरला जी ने अपने बारे में बताते हुए कहा-

     "जब मैं स्कूल में थी तब मेरा मोटो था

     हमेशा खुश रहना ,मनुष्य के तौर पर सब जानवरो से अलग हमें कुदरत का वरदान हंसी के रूप में मिला है इसलिए खुश और हंसते रहना बहुत जरूरी है ,मेरे जीवन में जो भी तकलीफ आये तो इस मोटो ने मुझे हौंसला दिया।

हिंदुस्तान की ये छोटी सी चिड़ीया।

आसमान में उड़ रही वो नन्ही चिड़ीया।।

अपने पंखों से उड़ान भर जाने वाली।

विपरीत परिस्थिती में हिम्मत रखने वाली।।

रंगो की दुनिया में अपनी पहचान बनाई।

खुद के दम पर अपनी किस्मत को चमकाई।।

 

भारतिय नारी को समाज की बंदिशों से अगर आजाद कर दिया जाये तो आसमान में अपना घर बना सकती है अपना वर्चस्व फैला सकती है सरला ठकराल जी के जीवन से यही पता चल रहा है ।

धन्यवाद| 

 

अनामिका संजय अग्रवाल

ब्लॉग का अद्यतन पोस्ट :

कैसे लिखें, अच्छी कविता..? भाग 02

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