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गुरुवार, 27 जून 2024

कैसे लिखें, अच्छी कविता..? भाग 02

कविता कैसे लिखें – संवेदना, विषय और विचार 

लेखक: प्राणेंद्र नाथ मिश्र 


कविता लेखन पर एक धारावाहिक ब्लॉग जिसको कई भागो में प्रकाशित किया जाएगा| इसका श्रीगणेश "कविता क्या है?" से भाग 01 में किया गया| अनुक्रमणिका के हरेक अवयव का आगे आने वाले पोस्ट में विस्तार किया जाएगा| आज प्रस्तुत है भाग 02। एक संग्रहनीय पोस्ट श्रृंखला, जो पाठको को कविता से जोड़ पाएगी| आप अपने सुझाव और प्रश्न, टिप्पणी के माध्यम से व्यक्त कर सकते है| लेखक उस पर अपने विचार जरूर देंगे| 

ब्लॉग नियंत्रक: डॉ हिमांशु शेखर 

अनुक्रमणिका :
कविता क्या है
2 कविता के घटक
 - संवेदना, शब्द, भाषा, बिम्ब, प्रतीक, अलंकार, रस 
3 कविता का स्वरूप
    
बाह्य स्वरूप
       
aa छंद – मात्रा (meter), यति , गति, क्रम एवं तुकांत
    
b आंतरिक स्वरूप
       
bb भाव, प्रयोजन, कल्पना शक्ति और उद्देश्य

काव्य का अंतर्वस्तु उसके बाह्य और आनतारिक स्वरूप से बनता है।

4 अंतःकरण की शक्ति –
        रस,
        अलंकार ,
        शब्द शक्ति ,
        अभिव्यंजना  
5 शब्दों की ध्वन्यात्मकता – भाषा
छंद का ,महत्व

7  कविता के प्रकार- छंदमुक्त और छंदयुक्त ,,, तुकांत अतुकांत

8  छंद के अंग :

छन्द के निम्नलिखित अंग है-
(1)चरण /पद /पाद
(2) वर्ण और मात्रा  (मात्रा कलन  – ॐ नीरव )
(3) संख्या क्रम और गण
(4)लघु और गुरु
(5) गति
(6) यति /विराम
(7) तुक

9 छंदमुक्त कविता के गुण
10 ग़ज़ल एवं आजाद नज़्म
11 लुप्त मात्राएं एवं काव्य दोष

 

कविता लिखने से पहले रचनाकार को कुछ विचार आने चाहियें जैसे कि आप किस विषय पर कविता लिखना चाह रहे हैं, किस विधा मे लिखना चाह रहे हैं। जैसे दोहा, छंद, मुक्त छंद, चौपाई अकविता आदि। गद्यात्मक कविता, हरिगीतिका गीतिका या अन्य कोई छंद या ग़ज़ल आदि। 

जब एक विचार या विषय हमारे मस्तिष्क मे आ जाता है, तब हम उस पर सोचते हैं कि क्या लिखने से वह दृश्य शब्दों के माध्यम से दिखने लगेगा, किस तरह के शब्दों का प्रयोग करना चाहिए, ताकि प्रभावी लगे और शब्दों को किस क्रम मे रखें कि छंद, ताल और लय तथा गति बन सके। फिर हम लिखना आरंभ करके शब्दों को जोड़ते हैं, सोचते हैं, शब्द खोजते हैं, उन्हें “मैच” कराते हैं, शब्दों में भाव लाते हैं और अंत मे तुक लगा कर छंद बनाने की कोशिश करते हैं।  

अतः कविता लिखने के लिए कुछ मुख्य घटक आवश्यक हैं:

- 1. संवेदना, 2. शब्द, 3. भाषा, 4. बिम्ब, 5. प्रतीक, 6. अलंकार, 7. रस  

आइए, देखते हैं थोड़ा संवेदना के बारे मे और कुछ उदाहरणों से समझते हैं कि संवेदना या भाव किस तरह कविता की प्रेरणा होते हैं। 

1 संवेदना: 

साहित्य की मूल प्रेरणा संवेदना है। जब कोई मर्माहत व्यक्ति अपने मन की वेदना को शब्दों द्वारा किसी को नहीं बता देता, उसके मन को शांति नहीं मिलती। संवेदना का यही तत्व गायन और संगीत में भी देखा जाता है, जहां सुनने वाले भाव विभोर हो जाते हैं। 

कविता के मूल में संवेदना है, राग तत्व है। यही संवेदना कवि के हृदय को सृष्टि से जोड़ती है और वह ब्रह्मांड के किसी भी घटन या अघटन को कल्पित कर के अपने मन की संवेदना उसमे भरता है तथा उसे शब्दों के द्वारा दूसरे के मन तक पहुंवचाता है।

लेकिन, संवेदना क्या है.. किसी भी वस्तु, भाव और स्थति के हृदय पर पड़े प्रभाव को संवेदना कहते हैं। जब किसी कवि की वेदना इतनी घनीभूत हो जाती है कि उसमे मैं और दूसरे के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है तब वह यह समझने लगता है कि जैसे सब कुछ उसी पर घटित हो रहा है। ऐसी दशा मे वह शब्दों के द्वारा काव्य मे उसे चित्रित करता है जिसे सुनकर या पढ़कर कोई भी संवेदन शील व्यक्ति का हृदय उस रस मे मिल जाए तब कहा जाता है कि काव्य या रचना बहुत प्रभावी है। 

   मान लीजिए आप सड़क पर जा रहे हैं, चिलचिलाती धूप मे सड़क के किनारे एक अपाहिज, कमजोर और बूढ़ा भिखारी असहाय अवस्था मे आप की तरफ हाथ बढ़ाता है। उसकी स्थिति, उसके चेहरे के भाव को देख कर आप का मन पसीज जाता है और आप उसे कुछ रुपये निकाल कर दे देते हैं। यहाँ .. देखिए कि भिखारी को देखने से पहले आप के मन मे करुणा की कोई भवना नहीं थी, आप मस्ती मे अपनी धुन मे चले जा रहे थे, लेकिन भिखारी की दशा देखा कर आप के अंदर की संवेदना जग उठी और आप करुणा से भर गए। 

अब अगर यही दृश्य कविता मे लिख कर आप उस स्थति को शब्दों से बना सकें, तो आप की कविता संवेदनशील होगी और आप की रचना भावपूर्ण मानी जाएगी॥ निराला जी की कविता “भिक्षुक” मे ऐसा ही एक दृश्य शब्दों मे देखिए:

वह आता--

दो टूक कलेजे को करता, पछताता

पथ पर आता।

पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,

चल रहा लकुटिया टेक,

मुट्ठी भर दाने को — भूख मिटाने को

मुँह फटी पुरानी झोली को फैलाता —

दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए,

बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते,

और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाए।

भूख से सूख ओठ जब जाते

दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?

घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।

चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,

और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए !     (निराला)

एक भिखारी और उसके आस पास का दृश्य इन शब्दों से समपूर्ण चित्रित हो जाता है और ऐसा 

लगता है जैसे हम देख रहे हों, महसूस कर रहे हों..  

ये संवेदनाएं रस के नाम से पहचानी जाती हैं। हमारा मन करुणा, रौद्र, क्रोध, वीर, शोक, प्रेम, वियोग आदि भावनाओं से भरा रहता है। इन्हीं भावनाओं मे शब्द को ढालने से कविता का भाव दूसरे को मन को छूता है। 

संवेदना, भाव, रस, कविता के शब्दों मे दृश्य बनाते हैं और पाठक या श्रोता के पास भेजते हैं। रचनाकार अपने भावों, संवेदनाओं को शब्दों के माध्यम से शब्द चित्र बनाता है और पाठक के मन मस्तिष्क मे वह भाव उत्पन्न कर के, उस दृश्य को चित्रित करके उसके भावों को छू लेता है। 

जिस दिन अर्घ्य दिया तुमने  

आँसू से अपने, रो कर के

मैं पीठ मोड कर सुबक पड़ा 

तुमको जीवन मे खो कर के 

वह पीड़ा मेरी अंतिम थी ..  

वह कविता मेरी, अंतिम थी..                 (प्राणेन्द्र नाथ मिश्र)

यहाँ वियोग की धार कविता के इस छंद मे प्रतीत हो रही है। वियोग, बिछोह, करुणा शब्दों से प्रतीत हो रहे हैं। शब्दों की महत्ता, शब्दों का क्रम, भाव को उचित रूप से प्रेषित करता है। 

कविता की रचना करने से पहले वे विचार, जिनको लेकर कविता का स्वरूप देना है, पहले आना चाहिए और फिर शब्दों को चुनना चाहिए। आप देखेंगे कि कुछ शब्द करूण, कुछ हास्य, कुछ शोक, कुछ वीर, कुछ क्रोध, कुछ शांत आदि भावों की संवेदना प्रकट करते हैं। अतः विचार और भाव लाने के लिए अपना अगला कदम शब्दों पर जाना चाहिए।

संवेदनाएं, हमारे मन की अनुभूतियों को जागृत करती हैं। मनुष्य में क्रोध, घृणा, हास्य, करुणा, प्रेम, वियोग, वात्सल्य, भक्ति, वीरता, वैराग्य आदि अनुभूतियाँ समय समय पर परिस्थिति के अनुसार जागृत होती हैं। इन अनुभूतियों को जब रचनाकार अपनी रचना या काव्य के ज़रिए पाठकों या श्रोताओं मे जागृत कर देता है तब रचना उच्च कोटि की मानी जाती है।  

देखिए.. दो पंक्तियों में सुभद्रा कुमारी चौहान ने कितना सुंदर वीर रस का शब्द चित्र रखा है 

बुंदेले मुँहबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।

वहीं पर जीवन संघर्ष को राजस्थानी कवियत्री रजनी मोरवाल ने कितना मार्मिक दृश्य चित्रित किया है.. 

दिन दहाड़े भूख से नीलाम होती शर्म है 

भूख ही तो आदमी का धर्म है 

भूख बचपन, भूख यौवन, भूख जीवन की हवा  

भूख मे सिमटा बुढ़ापा, भूख मरघट की दवा     

                                                (रजनी मोरवाल)

सामाजिक विसंगतियाँ और भ्रूण हत्या के ऊपर कोख के अंदर पल रही बच्ची का मार्मिक कथन देखिए..

मेरी सूरत देखि न जानी, 

मेरी कीमत कुछ न जानी

बहुज्ञा- अभिशाप समझ के, 

कोख से फेंक देने की ठानी।     

भारतेन्दु जी ने भारत दुर्दशा पर टीस देते हुए कहा है.. 

रोवहउँ सब मिलि आवहउँ भारत भाई/ भारत दुर्दशा अब देखि न जाई । 

शोषित वर्ग के ऊपर चार पंक्तियाँ दिनकर जी की संवेदना देखिए:

श्वानों को मिलता दूध वस्त्र

भूखे बालक अकुलाते है

माँ की हड्डी से चिपक – ठिठुर, 

जाड़े की रात बिताते हैं।  

इसी तरह हास्य का दृश्य और शब्दों का प्रयोग देखिए 

आधुनिका पत्नी मिली, पट्टी के पड़ी नकेल 

वाक शास्त्र मे पास थी, पाक शास्त्र में फेल 

पाक शास्त्र मे फेल, रसोई कर दी चालू 

स्वेटर बुनने लगी, जल गए सारे आलू। 

पुस्तक खोली, पति से बोली – जल्दी आओ    

जले हुए आलुओं पर बरनॉल लगाओ।              (काका हाथरसी)

इस तरह सबसे पहले आप को कविता के विषय मे विचार करके, उसमे प्रयोग होने शब्दों को चुनना है और ऐसे शब्द हों जो आप के विचार के अनुसार आप के मन के भावों को कविता मे प्रस्तुत कर सकें। 

अगले पोस्ट मे हम शब्दों के प्रयोग के बारे मे देखेंगे कि किस तरह शब्द कविता के आचार, व्यवहार और विचार को बदल देते हैं! किस तरह शब्द अर्थ को अनर्थ कर सकते हैं और अनर्थ को सार्थक कर सकते हैं।  

.........

प्राणेंद्र नाथ मिश्र 


सोमवार, 17 जून 2024

उपमा कालिदासस्य

 लेखिका: सरोजिनी चौधरी


उपमा कालिदासस्य

निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु

प्रीतिर्मधुर-सान्द्रासु मंजरीष्विव जायते ।

      अर्थात कवि कालिदास की सुमधुर सूक्तियों में आम्रमंजरी के समान किसको आनन्द नहीं प्राप्त होगा?अपितु सभी को प्राप्त होता है।संस्कृत कविता कालिदास को पाकर अपने को  सौभाग्यशाली समझती है, कृतकृत्य मानती है।कविता की सुकुमारता,भावों की सागर सदृश गहराई और हिमालय तुल्य ऊँचाई पर चढ़ना और उतरना हो,शारदीय-ज्योत्स्यना तथा बासंती वैभव का सम्मिश्रण देखना हो, ग्रीष्म के धर्म बिंदुओं एवं शिशिर के तुहिन-कणों की विशिष्टता का एक साथ आकलन करना हो तो महाकवि कालिदास की कृतियों का अवलोकन हमें अवश्य करना चाहिए।

    संस्कृत साहित्य में अनेक ऐसी प्रशस्तियाँ उपलब्ध होती हैं जिसमें किसी कवि की किसी एक विशेषता की ओर मुख्य रूप से संकेत किया गया है। महाकवि कालिदास उपमा के सम्राट हैं।यद्यपि आपने सभी अलंकारों का प्रयोग दक्षता से किया है किन्तु उपमा पर आपका चामत्कारिक अधिकार है।संस्कृत जगत ही नहीं अपितु विश्व का भी ऐसा कोई कवि नहीं है जो कवि की उपमा कला की तुलना कर सके।

     रघुवंश हो या मेघदूत,कुमार संभव हो या ऋतुसंहार सर्वत्र उपमाओं की रसात्मिकता दृष्टिगोचर होती है।उनकी उपमा योजना सरलता ,रम्यता, विविधता,मार्मिकता,यथार्थता एवं वैज्ञानिकता की दृष्टि से बेजोड़ है।आपने बड़ी सरलता से भावों को पाठक के हृदय में उतारने का प्रयास किया है।

   रघुवंश का तो प्रारंभ ही उपमा अलंकार से हुआ है।प्रथम सर्ग के प्रथम श्लोक में ही कवि ने उपमा के प्रयोग में अपनी अद्भुत काव्य-कला का परिचय दिया है—

   वागर्थाविव संपक्तो वागर्थाप्रतिपत्रये

     जगतपितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।

   अर्थात शब्द और अर्थ के यथार्थ ज्ञान के लिए मैं शब्द और अर्थ की तरह मिले हुए संसार के माता-पिता पार्वती और शिव की वंदना करता हूँ।

     इस प्रकार रघुवंश में इन्दुमती स्वयंवर के वर्णन के समय का निम्न श्लोक कितना सुंदर है-

संचारिणी दीपशिखेव रात्रि, यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा।

नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः।।

अर्थात् इन्दुमती स्वयंवर में आए हुए राजाओं का परिचय प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ती जाती है। इन्दुमती जिस-जिस राजा को छोड़कर आगे बढ़ जाती है,उस राजा की आशाओं पर तुषारापात हो जाता है और उसका मुख मलीन हो जाता है। जिस प्रकार रात्रि में चलती हुई दीपक की शिखा जिस प्रासाद को छोड़कर आगे बढ़ जाती है,वहीं महल अंधकार से मलीन हो जाता है।इस श्लोक में दीपशिखा के साथ इन्दुमती की उपमा अद्वितीय है ।इस श्लोक पर मुग्ध होकर विद्वानों ने कालिदास को दीपशिखा की उपाधि से विभूषित किया।

    संपूर्ण उपमा का एक और सुंदर दर्शन देखिए— सायंकाल दिलीप गाय लेकर लौट रहे हैं। लाल रंग की गाय आगे-आगे है और शुभ्र वसनधारी दिलीप पीछे-पीछे हैं।हरित वस्त्रधारिणी सुदक्षिणा अगवानी के लिए आगे बढ़ रही है।उपमा की यह कल्पना कितनी स्वाभाविक और यथार्थ है।रक्त वर्ण स्त्रीलिंग नन्दिनी संध्या है,तेजस्वी पुल्लिंग राजा दिलीप दिन हैं तथा स्त्रीलिंग सुदक्षिणा रात्रि के समान है—

पुरस्कृता वर्त्मनि पार्थिव्न प्रत्युदगता पार्थिवधर्मपल्या।

तदन्तरे सा विरराज धेनुर्दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्या।॥

    प्रकृति तत्व को अत्यधिक सूक्ष्मता से निहारने के कारण ही उनके काव्यों में पाठक को अद्वितीय सौंदर्य,नवीन चेतना और अपरिमेय सुखानुभूति सुलभ होती है।उन्होंने उपमा के माध्यम से मनुष्य और प्रकृति के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित करने का प्रयास किया है। मेघदूत में मेघ को दूत बनाने तथा वियुक्ता प्रिया को संदेश भेजने में महाकवि की दक्षता तथा अनुपमता स्पष्ट परिलक्षित होती है।

    अभिज्ञानशाकुन्तलम् में शकुन्तला को पुष्पित लता के समान बतला कर कवि ने उसके सौंदर्य में अनुपम मादकता भर दी।दुष्यंत की दृष्टि में शकुन्तला लता से तनिक भी कम नहीं है—

अधरः किसलयरागः कोमलविटपानुकारिणौ बाहू।

कुसुमामिव लोभनीय यौवन-भगडेषु सन्नध्दम्॥

   कवि कालिदास के प्रकृति वर्णन में प्रेमी-प्रेमिका और पति-पत्नी के दाम्पत्य जीवन के दर्शन होते हैं ।प्रकृति का कोई ऐसा पक्ष नहीं हैं जहाँ कवि की दृष्टि न गई हो।

    इस प्रकार हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि कवि की लेखनी ने किशोरावस्था की प्रथम प्रणय लीला का पूर्वाभ्यास हो या प्रौढ़ावस्था की ऊषा बेला में रस-क्रीड़ा का अभ्यास हो,सर्वत्र अपनी काव्य-प्रतिभा का अनूठा परिचय दिया है । बाह्य सरोवर से निकलने वाले सरयू की उपमा सांख्य-शास्त्र की अव्यक्त मूल प्रकृति से दी गई है ।अपनी अनुपम कल्पना-शक्ति से कवि ने अपनी कृतियों में उपमा की अद्भुत छटा बिखेरी है ।किसी प्रशंसक कवि ने महाकवि कालिदास की उपमा के विषय में सत्य ही कहा है—

 उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम्

  नैषधे पदलालित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणाः॥

     धन्यवाद|

लेखिका: सरोजिनी चौधरी

गुरुवार, 13 जून 2024

कैसे लिखें, अच्छी कविता..? भाग 01

लेखक: प्राणेंद्र नाथ मिश्र 

कविता लेखन पर एक धारावाहिक ब्लॉग जिसको कई भागो में प्रकाशित किया जाएगा| इसका श्रीगणेश "कविता क्या है?" से भाग 01 में किया जा रहा है| अनुक्रमणिका के हरेक अवयव का आगे आने वाले पोस्ट में विस्तार किया जाएगा| एक संग्रहनीय पोस्ट श्रृंखला, जो पाठको को कविता से जोड़ पाएगी| आप अपने सुझाव और प्रश्न, टिप्पणी के माध्यम से व्यक्त कर सकते है| लेखक उस पर अपने विचार जरूर देंगे| 

ब्लॉग नियंत्रक: डॉ हिमांशु शेखर 

अनुक्रमणिका :
1 कविता क्या है
2 कविता के घटक
- संवेदना, शब्द, भाषा, बिम्ब, प्रतीक, अलंकार, रस 
3 कविता का स्वरूप
   
a बाह्य स्वरूप
      
aa छंद – मात्रा (meter), यति , गति, क्रम एवं तुकांत
   
b आंतरिक स्वरूप
      
bb भाव, प्रयोजन, कल्पना शक्ति और उद्देश्य

काव्य का अंतर्वस्तु उसके बाह्य और आनतारिक स्वरूप से बनता है।

4 अंतःकरण की शक्ति –
        रस,
        अलंकार ,
        शब्द शक्ति ,
        अभिव्यंजना  
5 शब्दों की ध्वन्यात्मकता – भाषा
6 छंद का ,महत्व

7  कविता के प्रकार- छंदमुक्त और छंदयुक्त ,,, तुकांत अतुकांत

8  छंद के अंग :

छन्द के निम्नलिखित अंग है-
(1)चरण /पद /पाद
(2) वर्ण और मात्रा  (मात्रा कलन  – ॐ नीरव )
(3) संख्या क्रम और गण
(4)लघु और गुरु
(5) गति
(6) यति /विराम
(7) तुक

9 छंदमुक्त कविता के गुण
10 ग़ज़ल एवं आजाद नज़्म
11 लुप्त मात्राएं एवं काव्य दोष

 

 कविता क्या है:

हम अक्सर यह सोचते हैं कि कविता क्या है,,,, कविता कैसे लिखें,,,, अच्छी कविता क्या होती है... आदि आदि। लेकिन अगर हम ध्यान दें तो पाएंगे कि हम में से सभी प्रायः प्रायः कवि हैं। जब जन्म लेते हैं, रोना शुरू करते हैं। इस रोने में एक लय होती है। शिशु जब भूख लगने पर रोता है, एक लय होती है, एक भावना होती है और उस भावना को सुनकर, समझ कर माँ उसके लिए दूध ले आती है। बच्चों की खिलखिलाहट मे एक आनंद होता है एक ताल एक लय होती है और एक आकर्षण होता है। हम उनके मन की बात समझ जाते हैं कि वह क्यों हंस रहे हैं, खिलखिला रहे हैं या बच्चों को क्यों क्रोध आ रहा है।

बच्चों की मनोवृत्ति हम समझ लेते हैं यद्यपि वे शब्द नहीं बोलते, सिर्फ ध्वनि और ध्वनि की शैली बदलते हैं। बच्चों के भाव हम समझ जाते हैं क्योंकि वे उसी भाव को चित्रित करते हैं जो उनके मन मे होता है।

अब ..... प्रश्न उठता है कि आखिर कविता क्या है... क्या कोई जटिल प्रक्रिया है...?दूसरे की कविता हमारे मन को कैसे झिझोड़ देती है... कैसे हमे आह्लादित करती है... इसमे ऐसा क्या होता है जो हमारे, मन को छू लेती है... तो उत्तर यही होगा कि कविता मे संवेदना है, राग तत्व है,,,, यह संवेदना अपने लिए ही नहीं पूरे सृष्टि के लिए होती है.... कवि को पूरी सृष्टि  अपनी लगने लगती है... रास्ते पड़ा हुआ भिखारी भी अपना लगने लगता है और तब कवि का हृदय उस भिखारी मे डूब जाता है तथा कह उठता है... वह आता..  दो टूक कलेजे के करता....  रत्नाकर डाकू ने जब सरोवर के किनारे क्रौंच जोड़े मे से एक को व्याध से आहत देखा था तब क्रौंची की आह से उनका मन पीड़ा से भर गया था... उनके भाव उस निरीह पक्षी के लिए भर उठे और वह कह उठे... मा निषाद....

कैसे बनती है कविता/कविता कैसे लिखें:

मंद मंद हवा जब चलती है, पत्ते हिलते हैं, देखने मे अच्छा लगता है, तितली के पंखों की गति देखना अच्छा लगता है, नदी मे उठती तरंग देखना अच्छा लगता है, सागर की आती जाती हुई लहरें देखना अच्छा लगता है.... आप सोचिए की इन सभी दृश्यों मे एक खासियत है और वह यह की हर एक की गति मे आवर्तन है वही गति बार बार कई बार एक अंतराल के बाद होती है। यह आवर्तन हमे अच्छा लगता है आनंदित करता है। जब हम टहलते हैं , चलते हैं हमारे हाथ पैर के साथ एक संतुलित गति मे झूलते हुये चलते हैं.... असंतुलन मे हम नहीं चल पाते या दिक्कत होती है... हमारा हृदय एक आवर्तित गति से धड़कता है। हर वह गति जो कुछ अंतराल मे पुनः होती है आकर्षित करती है, चाहे वह सूर्य का निकलना हो या चाँदनी का पूर्णिमा मे विस्तारित होना। ग्रहों का एक गति से चलना हो या धरती का एक गति से घूमना।

गति आनंदित करती है संतुलन आनंदित करता है ...ब्रह्मांड की हर वस्तु गतिशील है इसीलिए आनंद देती है।  यही बात अगर शब्दों मे कर दी जाय तो शब्द भी आनंदित करते हैं चाहे वह बच्चों की बिना मतलब की कवितायें हों या रामचरितमानस की चौपाई या रहीम के दोहे।  अब देखिये न... अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ.... क्या मतलब हुआ॥ लेकिन शब्दों मे क्रम है, संतुलन है और गति है, तुकांत है इसलिए बच्चों का सबसे प्रिय गीत भी या पहली कविता भी.... 

दुनिया भर के सारे बच्चों की पहली सीख नर्सरी गानों से शुरू होती है। बच्चे हर गाने के साथ सिर हिलाते हैं पैर झुलाते हैं गाते हैं और आनंदित होते हैं। यह उनका भावनात्मक जुड़ाव या emotional attachment होता है। कविता उनकी संवेदनाओं को छूती है और वे कविता मे झूमने लगते हैं.... बच्चे हों या बड़े, जब कभी कोई रचना उनके मन को छू लेती है, वे आनंदित हो उठते हैं यही मन को छूने वाली, संवेदनाओं को छेड़ने वाली कला जो शब्दों मे लिखी जाती है या गयी जाती, कविता कहलाती है। कविता मन को झकझोर देती है, क्योंकि उसमे संवेदना है, राग तत्व है, और इसी संवेदना द्वारा सृष्टि के प्रत्येक अवयव को सोच लेने का बोध है। 

 आज का व्यक्ति संवेदनहीन होता जा रहा है। दिन भर की आपाधापी और तेजी से बढ़ते हुए भौतिक वातावरण मे, आज की ज़िदगी में कविता की जरूरत है। पहले से कहीं ज़्यादा है। लेकिन ज़िंदगी से कविता सुकून की तरह ग़ायब हो गई है। लोग कविताओं की तलाश कर रहे हैं। कविता लिखने का फार्मूला खोज रहे हैं। इसे कविताओं के प्रति आत्म समर्पण या प्रेम का प्रदर्शन भी कह सकते हैं। लोग अपनी संवेदनाओं को वापस पाना चाहते हैं। शायद इसीलिए कविता लिखने की होड लग गई है, कविताओं की हाट लगी है। हर कोई अपने को व्यक्त करना चाहता है। मानव बने रहना चाहता है, भावनाओं से जुड़े रहना चाहता है।

कविता किसी फॉर्मूले से नहीं लिखी जाती। लिखने का काम श्रमसाध्य है। मेहनत माँगता है। धैर्य माँगता है। छोटी-छोटी बातों को भावनाओं की नज़र से देखने की दरकार होती है। टूटी-फूटी भाषा में भी मन की बात रखने की जरूरत होती है। ज़िंदगी में यथार्थ के बंधनों की कल्पना की ऊंची उड़ान से पार करने की जरूरत होती है। लेकिन इसके लिए कुछ करना नहीं होतालोग तो कहते हैं कि दर्द जब हद से गुजर जाता हैदवा बन जाता है। और जब मन की पीड़ा बेइंतहा हो जाती है, कविता बन कर उभरने लगती है।

जीवन में जब सवालों का तूफ़ान उठने लगता है। मोहब्बत की भावनाएं उफान मारने लगती है। अंदर कुछ कहने की लालसा होती है तो शब्दों द्वारा भाव को पूरा करने के लिए कविता का उतारने लगती है। कविताएं चुपचाप चली आती हैं। भाषा और व्याकरण की दीवारों को तोड़ते हुए। कविताएं जीवन को अपनी मौजूदगी से तरंगित कर जाती हैं। जीवन के समंदर में कविताओं के गिरने से उठने वाली लहरें जीवन को संवेदनाओं के बड़े सूक्ष्म स्तर पर प्रभावित करती है। कविताएं जीवन का दर्पण बन जाती हैं, और रचनाकार अपने मन को उसमे देखने लगता है। कविताएं लिखने की शुरूआत भले ही तुकंबदी के फार्मूले से होती हो, लेकिन धीरे-धीरे छोटी-छोटी बातों को लयात्मक अंदाज़ में गुनने-बुनने और साझा करने से भी कविताओं के बनने का सिलसिला शुरू होता है।

    अब आइये हम अपने भाव देखें। हमारे मन मे जब कोई भाव उत्पन्न होता है और हम बोलते हैं तो वह दूसरा व्यक्ति समझ जाता है। इसका मतलब, हम अपनी भावना उस तक पहुंचा पाये। अब अगर हम अपने भावों को लिख कर किसी व्यक्ति को पढ़ने के लिए दें और वह उसी तरह समझे जो हम सोच रहे हैं तब भी हम अपने लेखन मे सफल हो जाते हैं।

यह लेखन गद्य या पद्य मे हो सकता है। अब इस लेखन के लिए आप को सबसे पहले शब्द की आवश्यकता होगी, फिर वह चित्र, शब्दों के माध्यम से बनाना पड़ेगा जिससे दूसरा व्यक्ति समझ जाये।आचार्य राम चन्द्र शुक्ल कहते हैं कि मानव संसार के झंझटों से हट कर समाज, संसार और ब्रह्मांड के भाव की  अनुभूति कर के उसमे डूब जाता है तब वह अनुभूति मात्र रह जाता है , उसका मुक्तहृदय हो जाता है। आत्मा जब मुक्त दशा मे होती है, ज्ञान दशा मे चली जाती है उसी तरह हृदय जब मुक्त अवस्था मे होता है, रस अवस्था मे चला जाता है। हृदय की इसी मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती है, उसे कविता कहते हैं। 

कविता हमारे मन मे बसी होती है, भावनाओं के रूप मे। जब हम अपनी भावनाओं से किसी के मन को छू लेते हैं, हम उसे प्रभावित करते हैं। इन्हीं भावनाओं को शब्दों मे पिरो कर दूसरों के पास पहुंचाना ही कविता है और यह आनंदमयी तब और हो जाती है जब यह छंदात्मक होती है।


अतः कविता लिखने के लिए कुछ मुख्य घटक आवश्यक हैं:

- 1. संवेदना, 2. शब्द, 3. भाषा, 4. बिम्ब, 5. प्रतीक, 6. अलंकार, 7. रस 
लेकिन ये घटक कविता का आंतरिक रूप ही देते हैं बाह्य रूप नहीं।  बाह्य रूप के लिए कविता का आकार, छंद, मात्रा, यति, गति, लय, प्रयोजन और शब्द क्रम की आवश्यकता पड़ती है।
आइए, अगले भाग मे हम इनके बारे मे जानें।

धन्यवाद |

लेखक: प्राणेंद्र नाथ मिश्र 

सोमवार, 22 अप्रैल 2024

संत कबीरदास

 लेखिका: डॉ.रश्मि चौबे

संत कबीरदास ऐसे व्यक्तित्व के धनी हैं , जो इतिहासकार वर्कले के इस कथन की सत्यता के प्रमाण हैं कि,” युग की महान विभूतियां काल प्रसूत होती हैं ,जिसमें जनजीवन की आत्मा को जीवित रखने के लिए विरोधी शक्तियों से खुलकर संघर्ष किया, जिसका व्यक्तित्व स्वयं ही जलती मशाल था। जिसकी चमक से युग धर्म और विरोधी शक्तियां सिहर उठीं इतना ही नहीं यह कभी रहस्यवाद का अमर गायक तथा ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया ‘जैसे पदों में मानव शरीर रचना की हड्डियों की व्याख्या करता है। जो राम को अपना प्रियतम और स्वयं को उसकी बहुरिया मानता है। एक प्रियतमा के रूप में वे अपने प्रियतम पर मुग्ध हैं। उसके विरह में व्याकुल है । उनमें अनुभूति की तीव्रता और वेदना की पुकार है । इसी वियोग में अपनी सृष्टि को रंगा देखते हैं ।

सचमुच कबीर वे कवि हैं, जिनकी पताका को धर्म लोक में फहराती देखकर पीपा और रयदास विस्मय से पुकार उठे नाव नवखंड पर सिद्ध कबीरा अनेकता को मिथ्या सिद्ध करके एकता का प्रतिपादन करने वाले सारगृही महात्मा थे। उनका लक्ष्य हृदयलोक से निकलकर ज्ञानलोक ले जाना है । भावनाओं को आधार बना वे ज्ञानशिखर पर आरोहण करते हैं ।

उनके पास क्रांति दृष्टि होने के साथ ही अनंतर दृष्टि भी उपलब्ध थी। जो उस युग की विषम परिस्थितियों को भेदकर मनुष्य की पीड़ा को पहचान ही नहीं सकती थी वरना, अभिव्यक्ति भी दे सकती थी। उग्रता के साथ उनकी साधना में मस्ती है और अभिव्यक्ति में अर्थ भेदी पारदर्शिता। उनकी अखंडता और लापरवाही में उनकी सच्ची साधुता और चिंतन शीलता प्रतिबिंबित है।

कबीर जी की भाषा तो सधुक्कडी भाषा थी और उनकी भाषा में ब्रज, पंजाबी, अरबी, फारसी , राजस्थानी , तुर्की सभी के शब्द मिलते थे और वे कहते थे कि संस्कृत है कूप जल, भाषा बहता नीर। ज्यादातर संतों का सारा साहित्य मुक्तक है। दोहा शब्द रमैनी आदि में इनकी कविता आम जनता की आत्मा को झकझोर देती थी। ठेठ बोली में बिना लपेट के अपनी अनुभूति को वे इस तत्परता से रख देते थे कि, उनकी उक्तियों, रूपकों, मुहावरों में कवित्व निखर उठता है।

‘मसि कागद छुओ’ वाले कवि ‘केवल ढाई आखर प्रेम का’ पढ़े थे। कबीर की अभिव्यक्ति सिद्ध करती है कि , कबीर ज्ञान भक्ति एवं प्रेम के अगाध भंडार हैं। उनके काव्य में न शब्दों की जटिलता है न , अलंकारों का धटाटोप और न छन्दों की उछल कूद । सब कुछ स्वभाविक मानव उलट वासियों में जीवन के सत्य की यथार्थ सीधी सुरीली मधुर वंशी बज रही है । ये उलट बासियां सुलटकर जीवन का राग सुना रही हैं।

डॉ रामकुमार वर्मा के शब्दों में_” उनकी युगांतकारी कविता भक्ति की विनय शीलता और आत्मरक्षा के बीच में स्पष्ट कंठ से कही गई धार्मिक और सामाजिक जीवन की पक्षपात रहित विवेचना है।”

यह एवेलिन अंडर विल के शब्दों में-“कबीर आत्मा विस्मयकारी और परम उल्लास में साक्षात्कार के समय दैनन्दिन व्यवहार की दुनिया छोड़ नहीं जाते और साधारण मानव जीवन को भुला नहीं देते उनके पैर मजबूती के साथ धरती पर जमे रहते हैं उनके महिमासमन्वित और आवेगमय विचार दीन और सजीव बुद्धि तथा सहज भाव द्वारा नियंत्रित होते रहते हैं जो सच्चे मार्ग मर्मी कवियों में ही मिलते हैं।”

कबीर जी पेसे से बुनकर थे पर यह समाज के लिए 600 साल पहले ऐसी बातें बुनकर चले गए कि उनके बगैर भारत की कहानी अधूरी है। कहते हैं -कबीर हर इंसान के अंदर हैं जरूरत है उन्हें ढूंढने की । कबीर ना हिंदू हैं ना मुस्लिम हैं, ना अमीर हैं ना गरीब हैं, कुछ लोग तो इन्हें भगवान का अवतार मानते हैं और कहते हैं ‘सब पीरन के पीर’ कुछ निर्गुण संत, कुछ लोग सतगुरु, तो कुछ कवि, तो कुछ राम के भक्त कुछ लोग फकीर कहते हैं । कबीर दास जी बनारस के थे । काशी के पास लहरतारा तालाब है । जहां कबीर की मूर्ति है । जो कमल के फूल पर है। कहते हैं, विधवा ब्राह्मणी की कोख से पैदा हुए और वो उनको छोड़कर चली गयी ।कबीर जी लहरतारा तालाब में कमल पुष्प पर बाल स्वरूप में नीरू और नीमा को प्राप्त हुए थे । ऐसा कहना है। परंतु यहां कोई ऐतिहासिक तथ्य की व्यंजना प्रस्तुत नहीं हुई । वे मुस्लिम थे या हिंदू थे या तुर्क थे इससे कबीर दास जी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

ज्ञानामार्गी शाखा के कवि जैसे कि, कबीर दास जी मलूक दास जी सूरदास जी नानक देव जी इन की विचार धारा क्रांतिकारी विचारधारा के रूप में विख्यात है। यह किसी निश्चित दार्शनिक मत का प्रतिपादन नहीं करते। उनकी जो रचना है वह लोक भाषा और लोग जगत के घटनाओं पर आधारित है और यह कहते हैं कि- तू कहता कागज की लेखी ,मैं कहता आंखन की देखी।संत काव्य धारा में गुरु को ईश्वर से भी ऊपर रखा है -गुरु गोविंद दोऊ खड़े ,काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो बताए।।कबीर जी के गुरु रामानंद जी थे। जिन्होंने पहले तो इन्हें शिष्य बनाने से मना कर दिया लेकिन बाद में इनसे प्रभावित हुए और शिष्य बनाया। कबीर दास जी का कहना है कि, अनुभव ही सबसे बड़ा गुरु है। अक्षर ज्ञान प्राप्त नहीं किया था परंतु जब भी वे सत्संग करते थे तब समाज के निचले दवे लोगों की भीड़ होती थी। सत्संग बहुत ही सुंदर होता था। कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लकुटिया हाथ। जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ।।

कबीर दास जी के समय समाज में बहुत उथल-पुथल मची थी। भीष्म साहनी ने ‘कबीरा खड़ा बाजार में’ में तब के हालात का वर्णन किया है। कवि ने जो समाज में देखा उस में तरह-तरह की विशेषताएं थी। उस समय इंसान को बड़े या छोटे होने का मापदंड भाग्य तय करता था। कौन किस कुल में जन्मा है ,वही बहुत कुछ तय करता था । कवि ने कहा -जात पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि को होई।

कबीर दास जी आडंबर विरोधी थे। इन्होंने समाज में फैली अनेक प्रकार की बुराइयों का विरोध किया उन्होंने जाति प्रथा वर्ग भेद और मूर्ति पूजा, नामाज ,व्रत ,रोजा, बांग लगाना ,तीर्थयात्रा, तिलक और माला सभी का विरोध किया। उनके लिए यह सब आडंबर है। उनके अनुसार ईश्वर कण-कण में व्याप्त है।और कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा-

कांकर पाथर जोड़ कर ,मस्जिद लई बनाय। 

ता चढ मुल्ला बांग दे क्या, बहरा हुआ खुदाय।


कबीर ने ब्राह्मण को नहाते हुए देखकर कहा- 

नहाए धोए का भया जो मन मैल ना जाए, 

मीन सदा जल में रहे धोए बास ना जाए।


और माला फेरने के लिए उनके विचार थे-

माला फेरत युग गया, गया न मन का फेर ।

मन का मनका डार के, मन का मनका फेर।।


उन्होंने जीव हत्या को पाप कहा और कहा कि-

दिन भर रोजा रखत है, रात हनत हैं गाय। 

यह तो खून वो बंदगी, कैसी खुशी खुदाय।।


सन्यासियों पर व्यंग करते हुए कहते हैं-

नारी मुई धन-संपत्ति नासी, मूड मुड़ाए भीए सन्यासी।।


हठ योग साधना का विरोध किया और कहा कि- ईश्वर को सरलता से प्राप्त किया जा सकता है।

भारत जिन तत्वों से मिलकर बना है। उसमें से एक तत्व है कबीर मतलब जो दिया है । वह मान्य नहीं है। इसलिए वे कहते हैं कि- ‘दुई जगदीश कहां से आए ‘ईश्वर एक है कबीर जी की पंडित और मौलवियों से लगातार टक्कर रहती थी और वह निर्भय होकर निर्गुण की उपासना करते थे । इसीलिए वह कहते थे कि’ मोको कहां ढूंढे बंदे मैं तो तेरे पास में…. इन सांसो की सांस में ‘आध्यात्मिक क्रांति और दोनों में जनतांत्रिकरण है। हर व्यक्ति को ईश्वर तक पहुंचने का अधिकार है। ऐसा भी मानते थे। कबीरदास जी कहते हैं कि ,जात पात पूछा नहीं कोई ,हरि को भजे सो हरि को होई।।

कबीर जी सिकंदर लोदी के समय के थे और कहा जाता है कि इनकी शिकायत कर दी गई थी । लोधी जी से तब उसने 52 परीक्षा के लिए सैनिकों और पीरों को आदेश दिया था ।उसके लिए और इनको दरबार में बुलाया गया । इनको सुबह बुलाया था यह शाम को पहुंचे और उन्होंने कहा वहां जाकर कि ‘कबीर सोई पीर है जो जाने पर पीर और कहते हैं कि लोधी जी इन से प्रभावित हुए और इनको छोड़ दिया।

कविता बौद्धिक अभिव्यक्ति का माध्यम है ।विचारों के प्रवाह का जरिया रही है ।जो समाज का दर्पण है ।प्राचीन भारत में कविता राजनीतिक इतिहास और समाज सब के विचार लिए हुए होती थी। कबीर की भक्ति आंदोलन के मशहूर कवि हैं और इनको समाज सुधारक के रूप में मैं देखती हूं । सर्वप्रथम जो दवे कुचले लोगों की आवाज लेकर खड़े हुए, व्यक्ति के रूप में हैं। निडर और निर्भीक। उनकी रचना साकी,शब्द,रमैनी के माध्यम से कबीर आज भी हमारे बीच जिन्दा हैं। यहीं अपनी लेखनी को विराम देती हूं।

धन्यवाद।

डॉ.रश्मि चौबे

रविवार, 3 मार्च 2024

कविता का सौंदर्य

 लेखक: प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

छन्द (Metres) क्या है:

वर्णो या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आह्लाद पैदा हो, तो उसे छंद कहते है।

दूसरे ढंग से यदि छंद के बारे मे कहा जाये तो - अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रागणना तथा यति-गति से सम्बद्ध कुछ खास नियमों को ध्यान मे रखते हुये जो रचना की जाती है वह पद्य का रूप ले लेती है और छंद कहलाती है।

महर्षि पाणिनी के अनुसार जो आह्लादित करे, प्रसन्न करे, वह छंद है (चन्दति हष्यति येन दीप्यते वा तच्छन्द) ।

उनके विचार से छंद 'चदि' धातु से निकला है। यास्क ने निरुक्त में 'छन्द' की व्युत्पत्ति 'छदि' धातु से मानी है जिसका अर्थ है 'संवरण या आच्छादन' (छन्दांसि छादनात्) ।

इन दोनों अतिप्राचीन परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि छंदोबद्ध रचना केवल आहलादकारिणी ही नहीं होती, वरन् वह चिरस्थायिनी भी होती है। जो रचना छंद में बँधी नहीं है उसे हम याद नहीं रख पाते और जिसे याद नहीं रख पाते, उसका नष्ट हो जाना स्वाभाविक ही है। इन परिभाषाओं के अतिरिक्त सुगमता के लिए यह समझ लेना चाहिए कि जो पदरचना अक्षर, अक्षरों की गणना, क्रम, मात्रा, मात्रा की गणना, यति-गति आदि नियमों से नियोजित हो, वह छंदोबद्ध कहलाती है।

छंद शब्द 'छद्' धातु से बना है जिसका अर्थ है 'आह्लादित करना', 'खुश करना।' 'छंद का दूसरा नाम पिंगल भी है। इसका कारण यह है कि छंद-शास्त्र के आदि प्रणेता पिंगल नाम के ऋषि थे।

छंद की चर्चा ऋग्वेद मे की गयी है। गद्य मे व्याकरण के कड़े नियम हैं लेकिन छंद मे सरलता है, सरसता है, हृदयग्राही है और व्याकरण के नियमों मे पूरी तरह जकड़ा नहीं है। इसमे स्वच्छंदता है जो छंद शास्त्र के नियमों को मान कर चलती है। इसके नियम हृदय के करीब होते हैं, भावनाओं के करीब होते हैं, मानवता के करीब होते हैं अतः यह हृदय मे बस जाती है, याद रहती है।

जो बात हृदय मे बस जाय, याद रहे वह चिरकाल तक जीवित रहती है। छंद के यही गुण इस बात का प्रमाण देते हैं हैं कि हजारों सालों बाद भी आज पुरानी कवितायें , श्लोक आदि पढे जाते हैं गए जाते हैं और आनंद देते हैं। गद्य की बातें हवा में उड़ जाती है, लेकिन छन्दों में कही गयी कोई बात हमारे हृदय पर अमिट छाप छोड़ती है। मानवीय भावों को आकृष्ट करने और झंकृत करने की अदभुत क्षमता छन्दों में होती है। छन्दाबद्ध रचना में स्थायित्व अधिक है।

इन्हीं कारणों से हिन्दी के कवियों ने छन्दों को इतनी सहृदयता से अपनाया। अतः छन्द अनावश्यक और निराधार नहीं हैं। इनकी भी अपनी उपयोगिता और महत्ता है। हिन्दी में छन्दशास्त्र का जितना विकास हुआ, उतना किसी भी देशी-विदेशी भाषा में नहीं हुआ।

हृदय ग्राही छंद की रचना करने के लिए कुछ नियम भी होने चाहिएन जो अहलादित कर सकें। इन नियमों को हम छंद के अंग के रूप मे कह सकते हैं। छंद का प्रत्येक अंग अगर अपना काम सुचारु रूप से करे तो छंद अहलादित कर देने वाल होगा ही। आइये देखें, छंद के अंग:   

छन्द के निम्नलिखित अंग है-

(1) चरण /पद

(2) वर्ण और मात्रा

(3) संख्या क्रम और गण

(4) लघु और गुरु

(5) गति

(6) यति /विराम

(7) तुक

आइये, एक एक कर के इन्हें समझें:

1..... चरण/पद: अधिकतर छंदों के चार चरण होते हैं। प्रायः ये समान होते लेकिन आसमान भी हो सकते हैं। जैसे –

कंकण किंकिन नूपुर धुनि सुनि/ कहहिं लखन
 (1)                         (2)

सन राम हृदय गुनि/ मनहुं मदन दुंदुभि दीन्ही/ मनसा बिस्व बिजय कर लीन्ही।
                          (3)                  (4)

यह एक चौपाई चार चरण या पदों मे है।

वही पर एक दोहे को देखिये:

सुनहुं भरत भावी प्रबल/ बिलखि कह्यो मुनिनाथ/हानि लाभ जीवन मरण/ यश
      (1)                         (2)                 (3)   

अपयश विधि हाथ।

       (4)

इन दोनों मे चार चरण हैं लेकिन दोनों के संतुलन मे अंतर है। चौपाई मे चारों चरण समान हैं लेकिन दोहे मे पहले के साथ तीसरा तथा दूसरे के साथ चौथा चरण समान है।   

वर्ण एवं मात्रा:

2...वर्ण/अक्षर

  • एक स्वर वाली ध्वनि को वर्ण कहते हैं, चाहे वह स्वर हस्व हो या दीर्घ।
  • जिस ध्वनि में स्वर नहीं हो (जैसे हलन्त शब्द राजन् का 'न्', संयुक्ताक्षर का पहला अक्षर- कृष्ण का 'ष्') उसे वर्ण नहीं माना जाता।
  • वर्ण ही अक्षर कहलाता है।

वर्ण 2 प्रकार के होते हैं-
(i)हस्व स्वर वाले वर्ण (हस्व वर्ण): अ, , , ; , कि, कु, कृ
(ii)दीर्घ स्वर वाले वर्ण (दीर्घ वर्ण) : आ, , , , , , ; का, की, कू, के, कै, को, कौ

वर्ण और मात्रा की गणना

वर्ण की गणना

  • हस्व स्वर वाले वर्ण (हस्व वर्ण)- अ, , , ; , कि, कु, कृ
  • दीर्घ स्वर वाले वर्ण (दीर्घ वर्ण)- आ, , , , , , ; का, की, कू, के, कै, को, कौ

नोट: 'वर्णिक छंद' में चाहे हस्व वर्ण हो या दीर्घ- वह एक ही वर्ण माना जाता है; जैसे- राम, रामा, रम, रमा इन चारों शब्दों में दो-दो ही वर्ण हैं।)

मात्रा की गणना

  • हस्व स्वर- एकमात्रिक- अ, , ,
    दीर्घ स्वर- द्विमात्रिक- आ, , , , , ,
  • वर्णो और मात्राओं की गिनती में स्थूल भेद यही है कि वर्ण 'सस्वर अक्षर' को और मात्रा 'सिर्फ स्वर' को कहते है।

वर्ण और मात्रा में अंतर- वर्ण में हस्व और दीर्घ रहने पर वर्ण-गणना में कोई अंतर नहीं पड़ता है, किंतु मात्रा-गणना में हस्व-दीर्घ से बहुत अंतर पड़ जाता है। उदाहरण के लिए, 'भरत' और 'भारती' शब्द कोलें। दोनों में तीन वर्ण हैं, किन्तु पहले में तीन मात्राएँ और दूसरे में पाँच मात्राएँ हैं।

3…संख्या क्रम और गण

वर्णो और मात्राओं की सामान्य गणना को संख्या कहते हैं, किन्तु कहाँ लघुवर्ण हों और कहाँ गुरुवर्ण हों- इसके नियोजन को क्रम कहते है।
छंद-शास्त्र में तीन मात्रिक वर्णो के समुदाय को गण कहते है।

वर्णिक छंद में न केवल वर्णों की संख्या नियत रहती है वरन वर्णो का लघु-गुरु-क्रम भी नियत रहता है।
मात्राओं और वर्णों की 'संख्या' और 'क्रम' की सुविधा के लिए तीन वर्णों का एक-एक गण मान लिया गया है। इन गणों की संख्या आठ है। इनके ही उलटफेर से छन्दों की रचना होती है।

लघु मात्रा का चिन्ह I और दीर्घ का s होता है।

आइये देखें, इन गणों के नाम, लक्षण, चिह्न और उदाहरण-

 


इनमे तगण, रगण, जगण तथा सगण अशुभ कहलाते हैं बाकी गण शुभ कहलाते हैं। अशुभ गण के अक्षरों से छंदों की शुरुआत करने पर लय या उच्चारण मे कठिनता होती है, शायद इसीलिए ये अशुभ गण कहलाते हैं। 

4...लघु और गुरु;

लघु-

(i) , , उ- ये हस्व स्वर तथा इनसे मिले एक व्यंजन या संयुक्त व्यंजन को 'लघु' समझा जाता है। जैसे- रमण; इसमें तीनों वर्ण लघु हैं। इस शब्द का मात्राचिह्न हुआ- ।।।

(ii) चन्द्र बिन्दुवाले हस्व स्वर भी लघु होते हैं। जैसे- 'हँ'

गुरु-

(i) , , ऊ और ऋ इत्यादि दीर्घ स्वर और इनसे युक्त व्यंजन गुरु होते है। जैसे- नाना, पापा, दीदी, दादी इत्यादि। इन तीनों शब्दों का मात्राचिह्न हुआ- ऽऽ
(ii) , , , औ- ये संयुक्त स्वर और इनसे मिले व्यंजन भी गुरु होते हैं। जैसे- ऐसा(ss),ओला(ss), औरत (SII), नौका(SS) इत्यादि।
(iii) अनुस्वारयुक्त वर्ण गुरु होता है। जैसे- संसार (SSI)। लेकिन, चन्द्रबिन्दुवाले वर्ण गुरु नहीं होते जैसे जंगल (III)
(iv) विसर्गयुक्त वर्ण भी गुरु होता है। जैसे- स्वतः, दुःख; - (।ऽ), (ऽ।)
(v) संयुक्त वर्ण के पूर्व का लघु वर्ण गुरु होता है। जैसे- सत्य, भक्त, दुष्ट, धर्म इनमे प्रत्येक की मात्रा है (ऽ।)

5…गति

यति और गति को हम अपनी पोस्ट मे दे चुके हैं। कुछ बातें जो उससे इतर हैं यहाँ दे रहे हैं।

छंद के पढ़ने के प्रवाह या लय को गति कहते हैं।

वर्णिक छंदों मे इसकी आवश्यकता नहीं है, किन्तु मात्रिक छंदों में इसकी आवश्यकता पड़ती है। “बहुरि रघुराया आगे चले' में ९६ मात्राएँ हैं, लेकिन इसे हम चौपाई का एक चरण नहीं मान सकते, क्योंकि इसमें गति नहीं है। गति ठीक करने के लिए इसे 'आगे चले बहुरि रघुराया' लिखना पड़ेगा।

गति का महत्व वर्णिक छंदों की अपेक्षा मात्रिक छंदों में अधिक है। मात्राओं की संख्या ठीक रहने पर भी चरण की गति (प्रवाह) में बाधा पड़ सकती है।

जैसे: सुनहुं भरत भावी प्रबल, बिलखि कह्यो मुनिनाथ
     हानि लाभ जीवन मरण
, यश अपयश विधि हाथ

यह एक दोहा है जिसमे 13, 11/13,11 मात्राएं चरो चरण मे हैं। ऊपर की पंक्ति मे 24 और नीचे भी 24 मात्राएं हैं।

अब अगर इसमे परिवर्तन कर के लिखें

 बिलखि कह्यो मुनिनाथ, सुनहुं भरत भावी प्रबल
 यश अपयश विधि हाथ
, हानि लाभ जीवन मरण।

तो भी ऊपर और नीचे की पंक्तियों मे 24 , 24 मात्राएं हैं लेकिन प्रत्येक चरण की मात्राएं बादल जाने से इसकी गति मे परिवर्तन हो गया और अब दोहा से इसने सोरठा रुओ ले लिया है।

गति भेद से ये छंद परस्पर भिन्न हो जाते हैं।

अतएव, मात्रिक छंदों का दोष रहित प्रयोग गति के लिए अत्यन्त आवश्यक है। भाषा की प्रकृति, नाद के परिज्ञान एवं अभ्यास से गति निर्दोष हो सकते हैं।

6... यति या विराम: छंद में नियमित वर्ण या मात्रा पर साँस लेने के लिए रूकना पड़ता है, इसी रूकने के स्थान को यति या विराम कहते है। छोटे छंदों में साधारणतः यति चरण के अन्त में होती है; पर बड़े छंदों में एक ही चरण में एक से अधिक यति या विराम होते है।
सुनहुं भरत भावी प्रबल, (यति) बिलखि कह्यो मुनिनाथ (यति/विराम)

अवधेस के द्वारे सकारे गई (यति) सुत गोद में भूपति लै निकसे(यति/विराम)

मनहर घनाक्षरी छंद मे 31 वर्ण के चार चरण होते हैं और 8, 8, 8, 7 पर यति या विराम होता है जैसे:

 नैनों में अंगार भरो, कर में कटार धरो  (8,8)
बढ़ चलो बेटों तुम, बैरियों को मारने।      (8,7)

धरती भी कहती है, गगन भी कहता है, (8.8)
अब तो हवा भी जैसे, लगी है पुकारने॥  (8.7)

7….तुक

छंद के चरणों के अंत में समान स्वरयुक्त व्यवस्था को 'तुक' कहते हैं।
जैसे- आई, जाई/ रवाना बनाना, ठिकाना आदि से चरण समाप्त करने पर कहा जाता है कि कविता तुकांत है।

जिस छंद के अंत में तुक हो उसे तुकान्त छंद और जिसके अन्त में तुक न हो उसे अतुकान्त छंद कहते हैं।

अगली पोस्ट मे देखेंगे ---- छंद के भेद ....

धन्यवाद| 

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

ब्लॉग का अद्यतन पोस्ट :

कैसे लिखें, अच्छी कविता..? भाग 02

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