रविवार, 17 मार्च 2024

पतंग

 

लेखक: हरि प्रकाश गुप्ता सरल

 

कहां जा रहे हो बदलू ने पूंछा मैंने कहा सकूर भाई की दुकान जा रहा हूं। वहां से पतंग और मांझा लेकर आयेंगे।आज छुट्टी का दिन है तो आज तो सामने वाली पहाड़ी पर पतंगबाजी होगी। इसलिए जल्दी जा रहा हूं क्योंकि सकूर भाई तो खुद हाथों से शानदार पतंग और मंजा बनाते हैं। लच्छू की दुकान में तो मशीन से बनी पतंगें और मांझा बिकता है। हाथों से बनाया गया मांझा और पतंग की बात ही कुछ और है। हवा में बहुत लहराती है।

हमने बदलू से कहा तुम भी चलो यार दोनों पतंग और मांझा खरीद कर पहाड़ी पर चलेंगे और पतंगबाजी का मजा लेंगे। बदलू को कहने की देर थी कि तुरंत अब्बा से पैसे लेकर सकूर भाई की दुकान हम दोनों चल दिए।सकूर भाई के घर के पास भी मैदान में उन्हीं की बनाई पतंगें उड़ती और आसमान को छूते हुए दिखाई दे रहीं थीं। पतंगों को आसमान में उड़ता देख ऐसा कौन होगा जिसे आनंद न आता हो।हम और बदलू तो पतंगबाजी के दीवाने कहलाते थे। स्कूल से आये और बस्ता पटका खटिया पर, न खाने की फिक्र और न नहाने की। कभी कभी पतंग पहले की होती तो लेकर चले जाते उड़ाने मैदान में और मित्रों के साथ आसमां में उड़ाते और आपस में पतंगों को लड़ाते।बदलू की पतंग सदा कट कर जमीन में गिर जाती और मेरी पतंग भी कभी कभी कट जाती और दूर जाकर गिरती।जिसे लेने के लिए मोहल्ले के बालक दौड़ कर जाते और पतंग को ले आते। कभी कभी की बालक मिलकर उसे अपनी ओर खींच तान करते जिससे वो फट जाती और बेकार हो जाती। आज सकूर भाई

तो जिंदा नहीं हैं पर उनका पतंग बाजी का धंधा चल रहा या बंद हो गया।पर आज भी जब पतंग की बात चलती तो बचपन के वो सुहावने दिन याद करते करते आंखों में आंसू आ जाते क्यों कि न तो बदलू का कई सालों से पता और न सकूर भाई  का।

धन्यवाद|

 

हरि प्रकाश गुप्ता सरल

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