लेखिका: रेखा अस्थाना
सुखद विविधताओं की मेरी जन्मभूमि भारत🌷🌹🌸🌺
ईश्वरीय कृपा से भारत एक विशाल देश है और इसमें छः ॠतुएँ क्रमवार आती
जाती हैं। सभी का अद्भुत नजारा होता है।कोई किसी से कम नहीं।वर्ष के 365
दिनों में 365पर्व मनाए जाते हैं।पर कुछ खास पर्व
जैसे होली,दिवाली,दशहरा।पर्व सदा से ही
खुशहाली का कारण होते आए हैं।क्योंकि इनका सीधा संबंध फसलों से होता है।
आज मैं केवल अपने बचपन की होली वह भी प्रयागराज जो पहले इलाहाबाद के
नाम से जाना जाता था ।आज से कई दशक पहले की बात है तब तीज त्योहार की अपनी ही रौनक
व गरिमा होती थी।पूरा मोहल्ला एक होता था।सभी अपने अपने घरों से चंदा देते व
लकड़ियां लाकर बीच चौराहे में जहाँ होलिका
दहन निश्चित किया जाता था जमा करते थे।
टेसू के फूल लाए जाते थे बढ़िया अबीर-गुलाल चंदे के पैसों से मंगवाया
जाता था। वैसे तो होली की तैयारी महीनों पहले से शुरु की जाती थी।घर पर स्त्रियाँ
पापड़,चिप्स,कचरी बनाकर रखती थी ।चार
-पाँच दिन पहले से गुजिया भी बनने लगती थी।घर पर ही नमकीन बनाया करती थी।
होली का नाम होली कैसे पड़ाअब मैंआपको इसके बारे में
बताऊँगी।बिष्णुभक्त प्रह्लाद भगवान को सबसे बड़ा मानता था जब कि प्रह्लाद के पिता
हरिण्याकश्पु का कहना था कि उसके आगे संसार में
कोई नहीं है बसवही भगवान है।प्रह्लाद के न मानने पर उसे नानाप्रकार के कष्ट
दिए।पर भक्त के आगे तो भगवान रहते ही हैं।अंत में अपनी बहन जिसका नाम होलिका था
उसको वरदान था कि वह आग में नहीं जल सकती जब वह प्रह्लाद को गोद में लेकर बैठी तो
खुद जल गई और प्रह्लाद बच गए। तभी से होलिका दहन का रिवाज चल पड़ा कि इस अग्नि में
प्रतिज्ञा कर अपनी सभी बुराइयों को त्याग
दो या जला दो।
तो मैं बात कर रही थी प्रयागराज के होलिकोत्सव की।हम सब बच्चे तो कितने दिन पहले से ही होली
मनाते थे पर उस खासदिन टेसू के फूलों में गर्म पानी डालकर रखा जाता था सभी लोग अपने अपने पुराने
पोशाक में दोपहर एक बजे तक होली खेलते फिर
घर आकर नहा-धोकर पकवान खाते।
अब आइए शाम के समय का दृश्य
क्योंकि यह एक सामाजिक पर्व है तो आपसी भाईचारा भी जरूरी है।हम सब नए
वस्त्र पहनकर एक दूसरे घर जाते जहाँ हमें
मुँह पर गुलाल लगाकर कान में इत्र का फाहा रखा जाता था।बिना किसी भेदभाव के सबसे
बड़े प्रेम से गले मिला जाता था।पूरे साल का राग-द्वेष मिट जाता था ।फिर हम खुशी
खुशी गुजिया खा कर घर लौटते थे। तब प्लास्टिक का चलन न था पीतल की पिचकारी होती
थी।होलिकोत्सव मिलन समारोह हफ्तों चलता था।आज जब मैं यहाँ गाजियाबाद की हालत देखती
हूँ तो बस यही कहना पड़ता है----देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान , कितना बदल गया इंसान।
अहंकार और अहं जिसमें भी आ गया उसका अंत निश्चित जानों।क्योंकि
हिरण्याकश्पु स्वयं को भगवान मानने लगा था
तो उसने प्रह्लाद को मरवाने के लिए एक लोहे के खंभे को खूब लाल कर गर्म किया और
प्रह्लाद से कहा क्या तेरे भगवान इस खंभे
में भी हैं तब उसने कहा सर्वत्र।तो आज्ञा मिली इसे गले लगाओ ।कुछ पल प्रह्लाद ने
खंभे को निहारा उसे एक छोटी चींटी आती जाती दिखाई दी तब प्रह्लाद ने सोचा अवश्य ही
यह भगवान का संकेत है।वह खंभे से लिपट गया
खंभा फटा और नृसिंह भगवान अवतरित हुए उन्होंने हिरण्याकश्पु को अपनी जांघ में लिटा
कर उसका पेट चीर दिया और एक अहंकारी राक्षस का अंत हो गया।सच ही कहा गया है--
भक्तों के सिर पर भगवान का हाथ होता है।
जाको राखे साईयाँ मार सके न कोई।
अब आते हैं हम होली बसन्त ऋतु की पूर्णिमा को मनाई जाती उसके पश्चात
हिन्दू नववर्ष प्रारम्भ होता है।मौसम सुहावना व सुखद होता है चारों ओर की सुन्दरता
देखते ही बनती है। रबी की फसल पकने को तैयार है ।इसी कारण लोग गेहूँ व चने की
बालें लाकर होलिका को समर्पित करते हैं ।गाँव में रात में फाग गाए जाते हैं।गेहूँ
और चने की बालों होलिका में समर्पित करते हैं फिर उसका प्रसाद सभी को देते
हैं।इसमें भाव यह होता है जो प्रभु तुमने
दिया वह तुमको समर्पित। 'इदम
न मम'आज के युग में न संस्कार न संस्कृति न हर्ष न उल्लास ।सबके मनोरंजन के अपने अपने साधन
हैं।हमारा बचपन जिसे आज भी हम हृदय से न निकाल पाए अभी तक।अब किसी भी त्योहार में
खुशी कम दिखावा ज्यादा।चने के बालों को भूनने से उसका नाम होरहा पड़ गया।
क्योंकि होली का पर्व आने वाला है इस कारण मुझे अपने बचपन की याद आ गई ।इसलिए यह लेख लिखा।
धन्यवाद|
रेखा अस्थाना

बहुत सुंदर लेख
जवाब देंहटाएंधन्यवाद पूजाजी व हिमांशु शेखर जी को मेरा लेख पसन्द आया।और अपने ब्लाग में स्थान दिया।
जवाब देंहटाएंमुझे मेरे बच्चे का बचपन ज्यादा याद आता है।
जवाब देंहटाएंआपका लेख पढ़ कर मुझे अपने बचपन में इलाहाबाद में खेली होली याद आ गई 👏👏👏👏👏
जवाब देंहटाएंबेहद खूबसूरत लिखा है 👌👌
जवाब देंहटाएंसुंदर लेख ,बड़ी सुंदरता से त्यौहार का वर्णन(सरोजिनी)
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर लिखा है 🌹
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