रविवार, 3 मार्च 2024

कविता का सौंदर्य

 लेखक: प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

छन्द (Metres) क्या है:

वर्णो या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आह्लाद पैदा हो, तो उसे छंद कहते है।

दूसरे ढंग से यदि छंद के बारे मे कहा जाये तो - अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रागणना तथा यति-गति से सम्बद्ध कुछ खास नियमों को ध्यान मे रखते हुये जो रचना की जाती है वह पद्य का रूप ले लेती है और छंद कहलाती है।

महर्षि पाणिनी के अनुसार जो आह्लादित करे, प्रसन्न करे, वह छंद है (चन्दति हष्यति येन दीप्यते वा तच्छन्द) ।

उनके विचार से छंद 'चदि' धातु से निकला है। यास्क ने निरुक्त में 'छन्द' की व्युत्पत्ति 'छदि' धातु से मानी है जिसका अर्थ है 'संवरण या आच्छादन' (छन्दांसि छादनात्) ।

इन दोनों अतिप्राचीन परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि छंदोबद्ध रचना केवल आहलादकारिणी ही नहीं होती, वरन् वह चिरस्थायिनी भी होती है। जो रचना छंद में बँधी नहीं है उसे हम याद नहीं रख पाते और जिसे याद नहीं रख पाते, उसका नष्ट हो जाना स्वाभाविक ही है। इन परिभाषाओं के अतिरिक्त सुगमता के लिए यह समझ लेना चाहिए कि जो पदरचना अक्षर, अक्षरों की गणना, क्रम, मात्रा, मात्रा की गणना, यति-गति आदि नियमों से नियोजित हो, वह छंदोबद्ध कहलाती है।

छंद शब्द 'छद्' धातु से बना है जिसका अर्थ है 'आह्लादित करना', 'खुश करना।' 'छंद का दूसरा नाम पिंगल भी है। इसका कारण यह है कि छंद-शास्त्र के आदि प्रणेता पिंगल नाम के ऋषि थे।

छंद की चर्चा ऋग्वेद मे की गयी है। गद्य मे व्याकरण के कड़े नियम हैं लेकिन छंद मे सरलता है, सरसता है, हृदयग्राही है और व्याकरण के नियमों मे पूरी तरह जकड़ा नहीं है। इसमे स्वच्छंदता है जो छंद शास्त्र के नियमों को मान कर चलती है। इसके नियम हृदय के करीब होते हैं, भावनाओं के करीब होते हैं, मानवता के करीब होते हैं अतः यह हृदय मे बस जाती है, याद रहती है।

जो बात हृदय मे बस जाय, याद रहे वह चिरकाल तक जीवित रहती है। छंद के यही गुण इस बात का प्रमाण देते हैं हैं कि हजारों सालों बाद भी आज पुरानी कवितायें , श्लोक आदि पढे जाते हैं गए जाते हैं और आनंद देते हैं। गद्य की बातें हवा में उड़ जाती है, लेकिन छन्दों में कही गयी कोई बात हमारे हृदय पर अमिट छाप छोड़ती है। मानवीय भावों को आकृष्ट करने और झंकृत करने की अदभुत क्षमता छन्दों में होती है। छन्दाबद्ध रचना में स्थायित्व अधिक है।

इन्हीं कारणों से हिन्दी के कवियों ने छन्दों को इतनी सहृदयता से अपनाया। अतः छन्द अनावश्यक और निराधार नहीं हैं। इनकी भी अपनी उपयोगिता और महत्ता है। हिन्दी में छन्दशास्त्र का जितना विकास हुआ, उतना किसी भी देशी-विदेशी भाषा में नहीं हुआ।

हृदय ग्राही छंद की रचना करने के लिए कुछ नियम भी होने चाहिएन जो अहलादित कर सकें। इन नियमों को हम छंद के अंग के रूप मे कह सकते हैं। छंद का प्रत्येक अंग अगर अपना काम सुचारु रूप से करे तो छंद अहलादित कर देने वाल होगा ही। आइये देखें, छंद के अंग:   

छन्द के निम्नलिखित अंग है-

(1) चरण /पद

(2) वर्ण और मात्रा

(3) संख्या क्रम और गण

(4) लघु और गुरु

(5) गति

(6) यति /विराम

(7) तुक

आइये, एक एक कर के इन्हें समझें:

1..... चरण/पद: अधिकतर छंदों के चार चरण होते हैं। प्रायः ये समान होते लेकिन आसमान भी हो सकते हैं। जैसे –

कंकण किंकिन नूपुर धुनि सुनि/ कहहिं लखन
 (1)                         (2)

सन राम हृदय गुनि/ मनहुं मदन दुंदुभि दीन्ही/ मनसा बिस्व बिजय कर लीन्ही।
                          (3)                  (4)

यह एक चौपाई चार चरण या पदों मे है।

वही पर एक दोहे को देखिये:

सुनहुं भरत भावी प्रबल/ बिलखि कह्यो मुनिनाथ/हानि लाभ जीवन मरण/ यश
      (1)                         (2)                 (3)   

अपयश विधि हाथ।

       (4)

इन दोनों मे चार चरण हैं लेकिन दोनों के संतुलन मे अंतर है। चौपाई मे चारों चरण समान हैं लेकिन दोहे मे पहले के साथ तीसरा तथा दूसरे के साथ चौथा चरण समान है।   

वर्ण एवं मात्रा:

2...वर्ण/अक्षर

  • एक स्वर वाली ध्वनि को वर्ण कहते हैं, चाहे वह स्वर हस्व हो या दीर्घ।
  • जिस ध्वनि में स्वर नहीं हो (जैसे हलन्त शब्द राजन् का 'न्', संयुक्ताक्षर का पहला अक्षर- कृष्ण का 'ष्') उसे वर्ण नहीं माना जाता।
  • वर्ण ही अक्षर कहलाता है।

वर्ण 2 प्रकार के होते हैं-
(i)हस्व स्वर वाले वर्ण (हस्व वर्ण): अ, , , ; , कि, कु, कृ
(ii)दीर्घ स्वर वाले वर्ण (दीर्घ वर्ण) : आ, , , , , , ; का, की, कू, के, कै, को, कौ

वर्ण और मात्रा की गणना

वर्ण की गणना

  • हस्व स्वर वाले वर्ण (हस्व वर्ण)- अ, , , ; , कि, कु, कृ
  • दीर्घ स्वर वाले वर्ण (दीर्घ वर्ण)- आ, , , , , , ; का, की, कू, के, कै, को, कौ

नोट: 'वर्णिक छंद' में चाहे हस्व वर्ण हो या दीर्घ- वह एक ही वर्ण माना जाता है; जैसे- राम, रामा, रम, रमा इन चारों शब्दों में दो-दो ही वर्ण हैं।)

मात्रा की गणना

  • हस्व स्वर- एकमात्रिक- अ, , ,
    दीर्घ स्वर- द्विमात्रिक- आ, , , , , ,
  • वर्णो और मात्राओं की गिनती में स्थूल भेद यही है कि वर्ण 'सस्वर अक्षर' को और मात्रा 'सिर्फ स्वर' को कहते है।

वर्ण और मात्रा में अंतर- वर्ण में हस्व और दीर्घ रहने पर वर्ण-गणना में कोई अंतर नहीं पड़ता है, किंतु मात्रा-गणना में हस्व-दीर्घ से बहुत अंतर पड़ जाता है। उदाहरण के लिए, 'भरत' और 'भारती' शब्द कोलें। दोनों में तीन वर्ण हैं, किन्तु पहले में तीन मात्राएँ और दूसरे में पाँच मात्राएँ हैं।

3…संख्या क्रम और गण

वर्णो और मात्राओं की सामान्य गणना को संख्या कहते हैं, किन्तु कहाँ लघुवर्ण हों और कहाँ गुरुवर्ण हों- इसके नियोजन को क्रम कहते है।
छंद-शास्त्र में तीन मात्रिक वर्णो के समुदाय को गण कहते है।

वर्णिक छंद में न केवल वर्णों की संख्या नियत रहती है वरन वर्णो का लघु-गुरु-क्रम भी नियत रहता है।
मात्राओं और वर्णों की 'संख्या' और 'क्रम' की सुविधा के लिए तीन वर्णों का एक-एक गण मान लिया गया है। इन गणों की संख्या आठ है। इनके ही उलटफेर से छन्दों की रचना होती है।

लघु मात्रा का चिन्ह I और दीर्घ का s होता है।

आइये देखें, इन गणों के नाम, लक्षण, चिह्न और उदाहरण-

 


इनमे तगण, रगण, जगण तथा सगण अशुभ कहलाते हैं बाकी गण शुभ कहलाते हैं। अशुभ गण के अक्षरों से छंदों की शुरुआत करने पर लय या उच्चारण मे कठिनता होती है, शायद इसीलिए ये अशुभ गण कहलाते हैं। 

4...लघु और गुरु;

लघु-

(i) , , उ- ये हस्व स्वर तथा इनसे मिले एक व्यंजन या संयुक्त व्यंजन को 'लघु' समझा जाता है। जैसे- रमण; इसमें तीनों वर्ण लघु हैं। इस शब्द का मात्राचिह्न हुआ- ।।।

(ii) चन्द्र बिन्दुवाले हस्व स्वर भी लघु होते हैं। जैसे- 'हँ'

गुरु-

(i) , , ऊ और ऋ इत्यादि दीर्घ स्वर और इनसे युक्त व्यंजन गुरु होते है। जैसे- नाना, पापा, दीदी, दादी इत्यादि। इन तीनों शब्दों का मात्राचिह्न हुआ- ऽऽ
(ii) , , , औ- ये संयुक्त स्वर और इनसे मिले व्यंजन भी गुरु होते हैं। जैसे- ऐसा(ss),ओला(ss), औरत (SII), नौका(SS) इत्यादि।
(iii) अनुस्वारयुक्त वर्ण गुरु होता है। जैसे- संसार (SSI)। लेकिन, चन्द्रबिन्दुवाले वर्ण गुरु नहीं होते जैसे जंगल (III)
(iv) विसर्गयुक्त वर्ण भी गुरु होता है। जैसे- स्वतः, दुःख; - (।ऽ), (ऽ।)
(v) संयुक्त वर्ण के पूर्व का लघु वर्ण गुरु होता है। जैसे- सत्य, भक्त, दुष्ट, धर्म इनमे प्रत्येक की मात्रा है (ऽ।)

5…गति

यति और गति को हम अपनी पोस्ट मे दे चुके हैं। कुछ बातें जो उससे इतर हैं यहाँ दे रहे हैं।

छंद के पढ़ने के प्रवाह या लय को गति कहते हैं।

वर्णिक छंदों मे इसकी आवश्यकता नहीं है, किन्तु मात्रिक छंदों में इसकी आवश्यकता पड़ती है। “बहुरि रघुराया आगे चले' में ९६ मात्राएँ हैं, लेकिन इसे हम चौपाई का एक चरण नहीं मान सकते, क्योंकि इसमें गति नहीं है। गति ठीक करने के लिए इसे 'आगे चले बहुरि रघुराया' लिखना पड़ेगा।

गति का महत्व वर्णिक छंदों की अपेक्षा मात्रिक छंदों में अधिक है। मात्राओं की संख्या ठीक रहने पर भी चरण की गति (प्रवाह) में बाधा पड़ सकती है।

जैसे: सुनहुं भरत भावी प्रबल, बिलखि कह्यो मुनिनाथ
     हानि लाभ जीवन मरण
, यश अपयश विधि हाथ

यह एक दोहा है जिसमे 13, 11/13,11 मात्राएं चरो चरण मे हैं। ऊपर की पंक्ति मे 24 और नीचे भी 24 मात्राएं हैं।

अब अगर इसमे परिवर्तन कर के लिखें

 बिलखि कह्यो मुनिनाथ, सुनहुं भरत भावी प्रबल
 यश अपयश विधि हाथ
, हानि लाभ जीवन मरण।

तो भी ऊपर और नीचे की पंक्तियों मे 24 , 24 मात्राएं हैं लेकिन प्रत्येक चरण की मात्राएं बादल जाने से इसकी गति मे परिवर्तन हो गया और अब दोहा से इसने सोरठा रुओ ले लिया है।

गति भेद से ये छंद परस्पर भिन्न हो जाते हैं।

अतएव, मात्रिक छंदों का दोष रहित प्रयोग गति के लिए अत्यन्त आवश्यक है। भाषा की प्रकृति, नाद के परिज्ञान एवं अभ्यास से गति निर्दोष हो सकते हैं।

6... यति या विराम: छंद में नियमित वर्ण या मात्रा पर साँस लेने के लिए रूकना पड़ता है, इसी रूकने के स्थान को यति या विराम कहते है। छोटे छंदों में साधारणतः यति चरण के अन्त में होती है; पर बड़े छंदों में एक ही चरण में एक से अधिक यति या विराम होते है।
सुनहुं भरत भावी प्रबल, (यति) बिलखि कह्यो मुनिनाथ (यति/विराम)

अवधेस के द्वारे सकारे गई (यति) सुत गोद में भूपति लै निकसे(यति/विराम)

मनहर घनाक्षरी छंद मे 31 वर्ण के चार चरण होते हैं और 8, 8, 8, 7 पर यति या विराम होता है जैसे:

 नैनों में अंगार भरो, कर में कटार धरो  (8,8)
बढ़ चलो बेटों तुम, बैरियों को मारने।      (8,7)

धरती भी कहती है, गगन भी कहता है, (8.8)
अब तो हवा भी जैसे, लगी है पुकारने॥  (8.7)

7….तुक

छंद के चरणों के अंत में समान स्वरयुक्त व्यवस्था को 'तुक' कहते हैं।
जैसे- आई, जाई/ रवाना बनाना, ठिकाना आदि से चरण समाप्त करने पर कहा जाता है कि कविता तुकांत है।

जिस छंद के अंत में तुक हो उसे तुकान्त छंद और जिसके अन्त में तुक न हो उसे अतुकान्त छंद कहते हैं।

अगली पोस्ट मे देखेंगे ---- छंद के भेद ....

धन्यवाद| 

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

2 टिप्‍पणियां:

  1. गुरु जी का नमन बहुत सुंदर छंद आलेख

    जवाब देंहटाएं
  2. आदरणीय प्राणेन्द्र सर, हिंदी भाषा की सरलता को इतने सहज ढ़ंग से सिर्फ आप ही प्रस्तुत कर सकतें हैं। कविता के हर अंग का इतना सुंदर और समग्र वर्णन आपकी लेखनी से ही संभव है। सभी कवियों को कविता या छंदबद्ध पद्यों के जिन अवयवों पर ध्यान देना चाहिए, सारे यहाँ उपलब्ध हैं। नमन आपकी लेखनी को, गागर में सागर भर ज्ञान समेटने की प्रतिभा को। शुभकामनाएं और धन्यवाद। हिमांशु

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