सोमवार, 11 मार्च 2024

पुराने समय का कैलेण्डर

 लेखिका: शैली

 

एक महीना गया, साल का आखिरी माह आया। मैंने दीवार पर टँगे कैलेंडर का पन्ना फाड़ने के लिए हाथ बढ़ाया ही था, कि एक डरी हुई, कुछ मिन्नत करती हुई आवाज कानों में पड़ी, "अब मुझे और मत फाड़ो, बस पलट दो! एक माह ही जिन्दा रहना है, अकेला क्यों करती हो? तुम तो बुजुर्ग हो, काग़ज़ के कैलेण्डर पर ही दिन साल महीने देखे हैं। मुझे सुन कर गुस्सा आया कि सुबह सुबह कौन नामुराद मुझे बुज़ुर्ग कह रहा है! ध्यान से देखा तो सामने के कैलेंडर को हिलता और बोलता हुआ पाया। जिसका नवम्बर महीने का पन्ना मैं फाड़ कर अलग करने जा रही थी। चौंक कर ध्यान से उसकी बातें सुनाने लगी। दर्द भरी आवाज़ में कैलेंडर आगे कहने लगा - “तुम और तुम्हारी पीढ़ी तो जन्म से मुझे जानती है। तुम्हारे जन्म की तारीख़ और समय, मेरे ही किसी बुजुर्ग के सीने पर, तुम्हारे पिता ने लिखा होगा, तुम्हारी छठी, और बारहवीं की तारीखों को याद से घेरा होगा।कैसे तुम्हें याद नहीं रहा कि हर साल दिसम्बर से सभी नए कैलेंडर के जुगाड़ में लग जाते थे। कोई सामान खरीदना होता तो हिसाब लगाते थे कि थोड़ा रुक कर खरीदेंगे तो साथ में नए साल का कैलेंडर भी मिल जाएगा। घर में नया कैलेंडर आना किसी उत्सव जैसा होता था। घर के सभी सदस्य नए कैलेंडर में क्या बना है देखने के लिए जाते थे। वो भी क्या दिन थे, जब हम कैलेंडरों की भी आपनी हैसियत होती थी। ड्राइंग रूम, बेड रूम, और पूजा घर में हमारा स्थान सुरक्षित रहता था। जब नया कैलेंडर टाँगा जाता तभी पुराना उतरता था। अगर नया नहीं मिला तो कई घरों में पुराने की तारीखें हटा कर चित्र वाले हिस्से का उसी खूंटी पर अधिकार बना रहता था, मज़ाल थी कि हमारी जगह कोई और चीज़ टाँगी जाय।

 कैलेंडर भिन्न-भिन्न क़िस्म के होते थे, एक पन्ने, तीन पन्ने, छह पन्ने और सबसे क़ीमती बारह पन्ने वाले। किसी में भगवान की तस्वीर, कोई फूलों वाला। पहाड़ों, झरने और सीन-सीनरी वाला। बच्चों की, सुन्दरियों की फोटो वाले, तो सिनेमा के हीरो-हीरोइन के चित्रों वाले कैलेंडर भारी माँग में होते थे।

मर्फी रेडियो, बाटा, हिमालया, डाबर और डनलप वगैरह के कैलेंडर बहुत चर्चित रहते थे। दुकान वाले अपने नियमित ग्राहकों को बड़े गोपनीय ढंग से ये कैलेंडर पकड़ाते थे, ग्राहक भी धीरे से इन्हें बैग में सरकाते थे, हा! हा! हा! मानो कैलेंडर नहीं कोक की पुड़िया हो। सच, आज भी उन गौरवशाली दिनों की याद से सीना चौड़ा हो जाता है।

जब पिता घर में उस क़ीमती कैलेंडर साथ आते थे तो घर के माहौल में भी गर्मी जाती थी। जिस उत्सुकता से घर वाले डॉक्टर से पूछते हैं कि नवजात बेटी है या बेटा, उसी उत्सुकता से कैलेण्डर खोला जाता था। अगर 12 पन्नों का सुन्दर कलाकृति का कैलेंडर होता तो सभी के चेहरे खुशी से खिल जाते, मानो लाॅटरी लग गई हो। उसे ड्राइंग रूम में स्थान मिलता। अगर कहीं एक पन्ने का हुआ और भगवान की फोटो हुई, तो दादी की बाँछे खिल जातीं, हाथ जोड़ कर प्रणाम करती और उसे पूजा घर या अपने कमरे में पलंग के पास टांगतीं।

इसी तरह हनुमानजी का कैलेण्डर शाखा और अखाड़े जाने वाले भाई के हिस्से में, हीरो-हीरोइन वाले बड़ी दीदी के (किसी पुरुष सदस्य की हिम्मत नहीं होती थी कि उसकी माँग कर लें, बस ललचा के रह जाते थे), बच्चों या बाल कृष्ण, बाल- हनुमान आदि के कैलेंडर बच्चों के कमरे में स्थान पाते थे।

कुछ में सिर्फ़ तारीखें होती थीं, कोई चित्र आदि नहीं। ऐसे कैलेंडर ज्यादातर बैंकों के होते थे। इन्हें किचन में टाँगा जाता था, जिसपर दूध, अखबार का हिसाब,नौकर और कामवाली के नागे और किसी के घर की शादी, मुण्डन, जनेऊ आदि के निमंत्रण की तारीखें, अलग-अलग रंग के पेंसिलों से घेरी जाती थीं, (यानी आजकल के गूगल कैलेंडर के रिमाइंडर  का काम करती थीं)

एक और कैलेंडर होता था, पंचांग वाला, जिसमें, ठाकुर प्रसाद पंचाग-कैलेंडर सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय था। इसी से मिलते-जुलते कुछ और भी कैलेंडर होते थे, जो इसकी लोकप्रियता को भुनाने के मकसद से, इसी की नकल करके बनाए जाते थे। इससे तीज त्यौहार, व्रत-उपवास, दिशा-शूल, राहुकाल और छिटपुट शुभ मुहुर्त देखे जाते थे।

कैलेंडर घर की सजावट का हिस्सा होते थे जैसे आजकल पेंटिंग आदि होते हैं। किसी-किसी घर में में तो कैलेंडरों को बिल्कुल झण्डियों की लड़ी सा टाँगा जाता था। छोटे-मोटे ढाबे, चाय, पान-सिगरेट की ढाबलियों की दीवारें तो कैलेंडर से लगभग ढकी रहती थीं। इसमें वर्ष का कोई विचार नहीं किया जाता था,बहुत उदारता से नए कैलेंडर को पुराने वालों को ऊपर नीचे करके, जगह बना कर टाँग दिया जाता था, जैसे भीड़ भरी बस में नए यात्रियों को खड़े होने की जगह, लोग थोड़ा खिसक कर, दब कर बना देते हैं। यदि नहाती हुई सुन्दरी, प्रेमी युगल या सिने-तरीका की फोटो हो तो कैलेंडर फटने तक दीवार के साथ एकाकार हो जाता था। सच! हम कैलेंडर्स के जीवन का वह स्वर्णिम युग था।

अब तो उन दिनों की याद ही बाकी है…..ये मोबाइल क्या आया, लोग हमें भूल गए। गूगल कैलेंडर ने हमारी जगह लेली।रही सही कसर इस मुई एलेक्सा ने पूरी कर दी। अब किसी को हमारा बेसब्री से इंतजार नहीं रहता। कुछ पुराने ज़माने के लोग आज भी मुझे ले जाते हैं, पर घर के किसी गुमनाम कोने में टांग देते हैं, बस कभी-कदा गृहस्वामिनी हम पर कुछ लिख देती है, या मालिक बैंक हॉली-डे देख लेते हैं। हमारी तो कोई इम्पोर्टेंस ही नहीं रही!  हम दीन-हीन से टँगें किसी की आहट का इन्तजार करते रहते हैं। सुबह-सुबह कोई हमें प्यार से नहीं देखता। अब किसी बच्चे या किशोरी के मुलायम हाथ हमें नहीं छूते, ये जीना भी कोई जीना है लल्लू???

मन से विजय माल्या के लिए आशीष निकलता है। किंग-फ़िशर कैलेंडर और कैलेंडर गर्ल्स ने एक बार मृतप्राय कैलेंडरों को कुछ साँसें दी थीं। हम उत्साहित थे कि कुछ लोग सबक लेंगे और पूनम पाण्डे नहीं तो राखी सावंत जैसी बोल्ड गर्ल्स को लेकर कुछ नए कैलेंडर आयेंगे। लेकिन हमारे दुर्भाग्य से वो देश छोड़ कर भागते वक्त वेंटीलेटर पर पड़े हमारे कुनबे की ऑक्सीजन बन्द कर गया

 भविष्य की कोई आशा ही नहीं रही। 2024 यानी डिजिटल दुनिया की ओर बढ़ता नहीं छलांग लगाता एक और कदम। फोर-जी, फाइव-जी के बाद ये AI…हमारे ताबूत पर आखि़री कील है। अब तो काग़ज़ पर प्रिंट का ज़माना ही बीता जा रहा है। न्यूज-पेपर, पत्र-पत्रिकायें भी अपने मौत की घड़ियाँ गिन रहे हैं। एक महीने बाद मैं इतिहास का हिस्सा बन जाऊँगा, तुम्हारी आने वाली नस्लें, हमें घर में नहीं शायद म्यूज़ियम में देखेंगी। मैं बहुत दुःखी हूँ, पल-पल अपनी मौत को आता हुआ देख रहा हूँ…., जिन्दगी के बचे दिनों को तुम्हारे परिवार के साथ काट लेने दो। पहली जनवरी को तो यूँ भी अलविदा कहना है। अभी मेरे इस पन्ने को मेरे साथ रहने दो। मैं कैलेंडर अब बीते वर्ष का नहीं, बीते समय की बात हूँ…..

 

धन्यवाद| 

शैली

रविवार, 10 मार्च 2024

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

 लेखक: प्रो. वी. पी. श्रीवास्तव

प्रकृति की गोद में पशु पक्षियों के समान जीवन: आहार, निद्रा, भय, मैथुन से आगे बढ़कर मानव ने अपने लिए सुखकर जीवन बनाया , संस्कृतियां पनपीं, मिटीं। भारतीय संस्कृति के लिए कहा जाता है:

यूरोप, मिस्र, रोमां सब मिट गए जहां से,

कुछ चीज़ है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी।

नहीं - ऐसा ना समझें। धरती ही खतरे में है , भारतीय संस्कृति की क्या कहें। शताब्दी के अंत तक समुद्र के अपनी तटीय मर्यादा के छोड़ने की भविष्यवाणी है। बात वही है," कुछ चीज़ है" जिसने हमारी हस्ती बचाए रखा था:"संयम"।  पता नहीं कब ये चीज़ हाथ से  निकलने लगी। सुनाई पड़ता है अब तो, कभी कभी ही सही  ,There is enough for every one's need but not enough for anyone's greed. अब तो greed भी आम हो चली है।

असंयम का शिकार महिला थी, अब भी है, अब धरती भी हो गई है। असंयमित पुरुष के लिए महिला उपभोग की वस्तु थी। जैसे ज़मीन, राज्य पाने के लिए युद्ध किए गए, वैसे ही औरत के लिए भी युद्ध किए गए।वर्तमान युग में , बाज़ार ने वस्तुओं के उपभोग को असंयमित करने के लिए, उपभोक्ता यानी जनसाधारण के लिए भी स्त्री के अमर्यादित रूप को सहज कर दिया। हम भले ही गीता पाठ करते रहें " ध्यायतो विषयानपुन्सह...." अर्थात कि विषयों का ध्यान करने से उनमें आसक्ति, और उनकी प्राप्ति ना होने से क्रोध, मतिभ्रष्टि... आदि, आदि होता है। आप चाहें ना चाहें,  मीडिया दिन रात बूढ़े , बच्चे, जवान को समभाव से विषयों में डुबकी डुबा डुब लगवाता रहता है। पद्मनी, रूपमती vitually बिना फौज के उपलब्ध हैं, शिकार वो हुई जो real world में पास में उपलब्ध हो। आज भारतवर्ष में औसतन  प्रति घंटे  बलात्कार की चार घटनाओं की शिकायत पुलिस में दर्ज होती हैं, वर्ष में 32000 मामले।जबकि इन घटनाओं की रिपोर्ट करने से अधिकांशतः लोग कतराते हैं। इसलिए ब्राजील की माहिला जब  लिखती है कि अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए वो अपने किसी पर विश्वास नहीं करती तो जानिए कि यह एक वैश्विक सत्य है। विश्वास किस पर ,ना पुलिस, ना कचहरी। समाज तो टूट ही रहा है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए बनाए नए कानून उसे और बेबस बना रहे हैं।

स्त्री हो या पुरुष, जो विवेकशील हैं और साहसी भी, वे मिलजुलकर अपने समय की मुख्य समस्याओं से जूझते हैं, बिना तुरंत परिणाम की चिंता किए। पर्यावरणीय संकट, युद्ध की विभीषिकाएं या महिला असुरक्षा जैसी ही नहीं परिवार और स्थानीय समाज की समस्याएं सभी महत्वपूर्ण होती हैं। महिलाओं को गांधीजी ने पुरुष से कभी पीछे नहीं समझा। तभी तो सत्याग्रह के सभी मोर्चे पर स्त्रियों को आगे रखा। उनमें नाम मात्र भर पढ़ी महिलाओं से लेकर उच्चतम योग्यता प्राप्त संभ्रांत घर की महिलाएं, हर धर्म की , देश विदेश की महिलाएं सभी शामिल थीं (बापू की महिला ब्रिगेड लेखक अरविंद मोहन की हाल में प्रकाशित पुस्तक)।नेताजी ने रानी झांसी ब्रिगेड में महिलाओं को बंदूक पकड़ा दी। इराम शर्मीला के हिंसा के प्रतिकार में लगभग 16 वर्ष का अन्न जल त्याग के आगे तो पौराणिक कथाएं भी छोटी पड़ जाती हैं। Non Violent Peace Force  में Adbusters.org में महिलाएं किसी से पीछे नहीं हैं। ध्यान रहे पर्यावरणीय संकट हो या दहेज की समस्या का मुख्य कारण उपभोक्तावाद है, और उसको बढ़ाने में पढ़ी लिखी महिलाओं का हाथ प्रमुख है। बिमल मित्र की एक दिल को दहला देने वाली कहानी है_ हत्या या आत्महत्या, जिसमें नायक पत्नी की दूसरों के सदृश गाड़ी, टीवी, आदि उपकरणों की फरमाइश से तंग  आकर सरकारी खजाने से चोरी करता है और पकड़े जाने के डर से आत्महत्या कर लेता है। वहां पहुंच कर लेखक को लगा कि उसे देख कर उसका मृतक शरीर उनसे अपनी व्यथा  चीख चीख कर सुना रहा है।लेखक घबड़ा कर आंख कान बंद कर के  भागने लगता है।लेखक को लगता है जैसे  बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के सारे हिंदुस्तान का सामूहिक क्रंदन उसका पीछा कर रहा है...।

इस क्रंदन से हम सभी कहीं न कहीं प्रभावित हैं और इसका समाधान भी हमें ही करना है इसलिए हम वापस संयम के रास्ते पर चलें।

धन्यवाद| 

प्रो. वी. पी. श्रीवास्तव

शनिवार, 9 मार्च 2024

स्वतंत्र नारी

 लेखिका: रूबी शोम

 

स्वतंत्र नारी से आप क्या समझते हैं या कहें तो परतंत्र नारी । प्रत्येक नारी को जन्म से लेकर विवाह और फिर पुत्र सभी पर अधीन रहना पड़ता है नारी पहले पिता के घर पर अपने पिता के कहे अनुसार, विवाह के बाद पति के कहे अनुसार, उसे चलना पड़ता है और फिर पुत्र के कहे अनुसार, चलना पड़ता है दुनियां चाहे जितनी भी तरक्की कर ले पर नारी का कहां और कितना स्थान होता है, घर परिवार और समाज में यह बात किसी भी नारी से छुपी नहीं है।नारी को हर बात में चुप करा दिया जाता है, नारी स्त्री हर जगह पर मौन रहकर ही कार्य करती है नारी को अपनी बात कहने अपने विचारों को व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए यह बात पहले घर परिवार और समाज को समझनी चाहिए नारी की बात सुनकर उसके विचारों का सम्मान करना चाहिए तभी एक स्त्री अपने स्वतंत्र होने पर सभी कार्य कर सकती है और इसमें बहुत बड़ा योगदान एक नारी के लिए एक नारी का होना चाहिए जब तक एक स्त्री दूसरी स्त्री का साथ नहीं देगी उसको आगे नहीं बढ़ाएगी तब तक एक स्त्री आगे नहीं बढ़ सकती है हमें नारी के उत्थान के लिए स्त्री और पुरूष दोनों को मिलकर यह कार्य करना होगा तभी एक नारी आगे बढ़कर एक सशक्त नारी एक स्वतंत्र नारी बन सकती है इसमें पिता ,भाई ,पति और पुत्र को अहम भूमिका निभानी पड़ेगी तभी स्त्री एक स्वतंत्र नारी के रूप में अपना जीवन यापन कर सकती है।

धन्यवाद| 

रूबी शोम

शुक्रवार, 8 मार्च 2024

सेना के रूप में भारतीय नारी

 लेखिका: अनामिका संजय अग्रवाल

  

खुद के कर कमलों से सज्जित

ये जग की फुलवारी है।

घर आंगन को सजाती जहां को

महकाती ये तो नारी है ।।

मन से नाजुक पर अपनों के लिए

शक्ति रूप धारिणी  ये नारी है।

भारत की नारी है निराली  हर कष्ट

की वो तो तारण हारी है।।

      घर के अंदर हो या बाहर दोनों जगह नारी एक योद्धा की तरह हर परिस्थिति में परिवार को सुरक्षित रखती है।परिवार को हर आपदा से बचाती उसकी यही कोशिश होती है कि परिवार खुशहाल रहे। आज तो नारी घर के बाहर भी कितना कुछ कर रही है। आज की नारी सेना के हर क्षेत्र में अपना प्रतिनिधित्व निभा रही है।

       भारत में नारी को शक्ति का रूप माना गया है। भारतिय सेना में 6807 से अधिक महिलाएं काम कर रही है डाक्टर पुनिता अरोड़ा 1968 में भारतीय सशस्त्र बलों में लेफ्टिनेंट जनरल और भारतीय नौसेना में वाइस एडमिरल के रूप में सर्वोच्च नम्बर तक पहुंचने  वाली पहली महिला है ।महिला अधिकारीयों को भारतिय नौसेना के युद्ध पोत पर नियुक्त किया गया है कैप्टन तानिया शेरगिल ने गणतंत्र दिवस परेड 2020 में पुरूष सैनिकों के दल का नेतृत्व किया।

        बिहार के बेगूसराय की भावना कंठ,मध्यप्रदेश के रीवा की अवनी चतुर्वेदी और बड़ोदरा की मोहना सिंह ये तीन महिलाएं 18 जून 2016 को देश की पहली महिला फाइटर के रूप हिन्दुस्तान के नभ को सुरक्षित बचा पाये।

         फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान भारत की तरफ से पाकिस्तान से लोहा लेकर कारगिल गर्ल का खिताब जीता।

       शांति तिग्गा ने 13 लाख सुरक्षा बलों के बीच बंदूक हैंडल कर निशानेबाजी में सर्वोच्च स्थान अर्जित किया ।

खुले आसमान में अपने पंख फैलाकर उड़ने की इच्छा रखने वाली सरला ठकराल जी जीवन विषम परिस्थिति से घिरा हुआ था।

 

* सरला ठाकरे जी का जीवन परिचय *

 

8 अगस्त 1914को ब्रिटिश भारत में जन्मी साड़ी पहनकर हवाई जहाज उड़ाकर अपना परचम लहराने  वाली पहली महिला पायलट सरला ठकराल जी थी ।

      सरला ठकराल 16 वर्ष की थी तभी उनका विवाह पी डी शर्मा जी से हुआ उसके परिवार में पहले से 9 सदस्य पायलट थे फिर उनके पति के साथ से परिवार की जिम्मेदारी के बाद के बाद भी सरला जी अपने सपने पूरे कर पाई।

21 वर्ष की आयु में 4 वर्ष के बेटी की मां 1936 में सरला जी ने जिप्सी मोंठ को अकेले उड़ाया। कराची से लाहौर बीच और उसके बाद 1000 घंटे लगातार उड़ान भरकर लाइसेंस "अ" हासिल किए।

       इन्हें इस रूप में देखकर लोग दांतो तले उंगली दबाते थे कहते आदमियों के पेशे में ये औरत क्यों कोई इसे बेशर्मी कह रहा था ।शायद लोगो की नजर ही लग गई जो सरला जी को ये दिन देखना पड़ा।

          पायलट बनने से पहले ही सरला जी को अपने पति की मौत के सदमे से आहत होकर जोधपुर से लाहौर आना पड़ा।

     विपरित परिस्थिती में सरला जी मेयो स्कूल आफ आर्ट में दाखिला लेकर पेंटिंग के साथ आर्ट में डिप्लोमा लिया। 1947 में भारत पाकिस्तान विभाजन हुआ तो अपनी बेटीयों के साथ भारत आकर पी पी ठकराल से शादी करके जीवन की नई शुरुआत की। देश की होनहार महिला पायलट ने बखुबी व्यवसाय करते हुए 15 मार्च 2008 मे दुनिया को अलविदा कह दिया ।उसके संघर्ष और साहस की कहानी आज के नारी के लिए प्रेरणा है।

  84 साल पहले इतिहास रचने वाली सरला जी की जिंदगी में 1939 में दो कारणो से बदलाव आया।पहला कारण विमान क्रेश में पति की मौत और दूसरा कारण उसी साल द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ। इसके बाद ठकराल जी की जिन्दगी का रूख मुड़ना स्वाभाविक था।

  2008 में आखिरी सांस लेते हुए सरला जी ने अपने बारे में बताते हुए कहा-

     "जब मैं स्कूल में थी तब मेरा मोटो था

     हमेशा खुश रहना ,मनुष्य के तौर पर सब जानवरो से अलग हमें कुदरत का वरदान हंसी के रूप में मिला है इसलिए खुश और हंसते रहना बहुत जरूरी है ,मेरे जीवन में जो भी तकलीफ आये तो इस मोटो ने मुझे हौंसला दिया।

हिंदुस्तान की ये छोटी सी चिड़ीया।

आसमान में उड़ रही वो नन्ही चिड़ीया।।

अपने पंखों से उड़ान भर जाने वाली।

विपरीत परिस्थिती में हिम्मत रखने वाली।।

रंगो की दुनिया में अपनी पहचान बनाई।

खुद के दम पर अपनी किस्मत को चमकाई।।

 

भारतिय नारी को समाज की बंदिशों से अगर आजाद कर दिया जाये तो आसमान में अपना घर बना सकती है अपना वर्चस्व फैला सकती है सरला ठकराल जी के जीवन से यही पता चल रहा है ।

धन्यवाद| 

 

अनामिका संजय अग्रवाल

गुरुवार, 7 मार्च 2024

जौहर क्या है?

 लेखिका: डॉ पूजा भारद्वाज

जौहर  क्या है ,क्यों किया जाता था ,क्या वजह रही होगी इस दर्द को सहने करने की , क्यों एक इंसान मानव जीवन पा कर भी एक वहशी बन जाता है और उससे डर लगने लगता है ,जहां खूंखार जानवर भी शांत प्रतीत होता है वहीं इंसान इंसान से ही डरता है कुछ मलेच्छ जीत के बाद क्यों इतने वहशी बन जाते थे कि रानियों  को मरा हुआ देख गुस्से से पागल हो जाते थे और कई बार तो यह भी बताया गया है कि उस मृत शरीर के साथ भी क्रूरता की जाती थी।

कई बार मृत शरीर के अंगों को काट डाला जाता था। यह तब होता था जब महिलाएं तथा महारानियां अपने प्राण त्याग नही देती थी । सोचो जब वो जीवित पकड़ी जाती , तो उनके साथ कैसा सुलूक किया जाता होगा। ऐसे में महिलाओं ने अपने शरीर को समाप्त करने ,पंचतत्व में विलीन कर देने या  जौहर  करने के अलावा कुछ नही बचता था ।

जौहर भारत में की जाने वाली एक हिंदू राजपूत प्रथा थी|

जौहर पुराने समय में भारत में स्त्रियों द्वारा की जाने वाली क्रिया थी। जब युद्ध में हार निश्चित हो जाती थी, वीरगति प्राप्त करने निकल जाते थे तथा स्त्रियाँ जौहर कर लेती थीं अर्थात जौहर कुंड में आग लगाकर खुद भी उसमें कूद जाती थी।आखिर क्यों !

क्योंकि उनको रक्षा करनी थी अपने मान, सम्मान अपनी देहरी,अपने समाज की रक्षा।

कितनी दर्दनाक क्रिया होती थी,जब जलती हुई लपटे अपने शरीर पर पड़ती है  शरीर पर फफोलें पड़ना ,अपने आपको अग्नि में झुलसा देना पीड़ा का भी एहसास न होना ,पर वो अग्नि भी शीतल लगती थी ,जब अपना आत्मसम्मान दांव पर लगा हो , जौहर एक पवित्र अग्नि

इसको हम सामूहिक दाह संस्कार भी कह सकते हैं

पिता अपनी नाबालिग बच्ची के माथे को चूम कर ,एक पति अपनी पत्नी की आखरी बार मांग भर कर , नासमझ बच्चों को और मांओं को जौहर की अनुमति देते थे ,सही मायने में वो इतिहास रचते थे ,एक दर्दनाक इतिहास जिसे सालों साल भुलाया नहीं जा सकता था ,वो थी एक रणभूमि में भी हार कर जीत का इतिहास लिखना और राजपूतों की आन बान और शान की मर्यादा कायम रखने का इतिहास।

भारत का प्रथम जौहर सन १३०१ में रणथंभौर अलाउद्दीन खिलजी के ऐतिहासिक आक्रमण के दौरान हुआ था। जिस में हम्मीर देव चौहान के विश्वासघात के परिणामस्वरूप वीरगति को प्राप्त हुआ और उसकी पत्नी रंगदेवी ने जौहर किया। इसे राजस्थान के गौरवशाली इतिहास का प्रथम साका जौहर कहा जाता है

१३०३ में रानी पद्मावती ने जौहर किया,अपनी लाज और मेवाड़ के आत्मसम्मान की खातिर और उन्होंने अपनी विश्वास पात्र २०००० दासियों के साथ मिलकर ये जौहर किया था ,जो भारत का सबसे बड़ा जौहर था,ये जौहर तब हुआ जब दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश की हमलावर सेना का सामना करना पड़ा था और राजा राणा रतन सिंह जी को धोखे से मारा गया था

चित्तौड़गढ़ में जौहर मेला नामक वीरता का एक वार्षिक उत्सव होता है जहां स्थानीय लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं

आप सभी को  एक और वीरता का इतिहास सुनाना चाहूंगी,वो था वीरांगना हाडी रानी का ,बहुत से लोग इस इतिहास से अपरिचित होंगे ,आखिर हाड़ी रानी ने क्या किया था ,हांडी रानी हाड़ा चौहान की पुत्री थी उनका विवाह राजा रतन सिंह चूड़ावत के साथ हुआ था ,वह मेवाड़ के सलुम्बर के सरदार थे। विवाह को एक सप्ताह ही हुआ था अचानक मुगल गवर्नर  के विरुद्ध विद्रोह करने के लिये युद्ध का आह्वान किया, रतन सिंह जी सकुंचा रहे थे की हांडी रानी को कैसा लगेगा की शादी को एक सप्ताह हुआ और मुझे युद्ध में जाना पड़ रहा है ,जहां से मैं वापस आऊंगा या नहीं,सोचते हुए युद्ध के लिए चले गए,आधे रास्ते से ही उन्होंने अपने सैनिक को रानी के पास संदेश भेजा,रानी तुम मुझे याद रखना मैं वापस लौटकर आऊंगा, ऐसे ही एक,दो और तीन दिन बीत गए मगर इस बार रानी के नाम सरदार का पत्र था ,हाड़ी रानी पत्र को पढ़कर सोच में पड़ गयीं। युद्धरत राजा का मन यदि मेरी याद में ही रमा रहा उनके नेत्रों के सामने यदि मेरा ही मुखड़ा घूमता रहा तो वह शत्रुओं से कैसे लड़ेंगे। विजय श्री का वरण कैसे करेंगे?हांडी रानी के मन में एक विचार कौंधा। वह सैनिक से बोली वीर , मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशानी दे रही हूं। इसे ले जाकर उन्हें दे देना। थाल में सजाकर सुंदर वस्त्र से ढककर अपने वीर सेनापति के पास पहुंचा देना। किन्तु इसे कोई और न देखे। राजा  ही खोल कर देखें। साथ में मेरा यह पत्र भी दे देना। हाड़ी रानी के पत्र में लिखा था प्रिय। मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशानी भेज रही हूं। तुम्हारे मोह के सभी बंधनों को काट रही हूं। अब आप अपने कर्तव्य का पालन करें मैं तो चली... स्वर्ग में तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगी । पलक झपकते ही हाड़ी रानी ने अपने कमर से तलवार निकाल, एक झटके में अपने सिर को उड़ा दिया।

हाडी रानी के शब्द थे

                    "चुण्डावत मांगी सैनाणी,

                            सिर काट दे दियो क्षत्राणी"

 

मगर आज की नारी झुलसती नहीं,अपने तेज से जला देती है ,हाथ उठे जो उस पर, उस को मिट्टी में मिला देती है जिस का एक  साक्षात प्रमाण थी रानी लक्ष्मीबाई।

धन्यवाद| 

डॉ पूजा भारद्वाज

ब्लॉग का अद्यतन पोस्ट :

कैसे लिखें, अच्छी कविता..? भाग 02

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