सोमवार, 17 जून 2024

उपमा कालिदासस्य

 लेखिका: सरोजिनी चौधरी


उपमा कालिदासस्य

निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु

प्रीतिर्मधुर-सान्द्रासु मंजरीष्विव जायते ।

      अर्थात कवि कालिदास की सुमधुर सूक्तियों में आम्रमंजरी के समान किसको आनन्द नहीं प्राप्त होगा?अपितु सभी को प्राप्त होता है।संस्कृत कविता कालिदास को पाकर अपने को  सौभाग्यशाली समझती है, कृतकृत्य मानती है।कविता की सुकुमारता,भावों की सागर सदृश गहराई और हिमालय तुल्य ऊँचाई पर चढ़ना और उतरना हो,शारदीय-ज्योत्स्यना तथा बासंती वैभव का सम्मिश्रण देखना हो, ग्रीष्म के धर्म बिंदुओं एवं शिशिर के तुहिन-कणों की विशिष्टता का एक साथ आकलन करना हो तो महाकवि कालिदास की कृतियों का अवलोकन हमें अवश्य करना चाहिए।

    संस्कृत साहित्य में अनेक ऐसी प्रशस्तियाँ उपलब्ध होती हैं जिसमें किसी कवि की किसी एक विशेषता की ओर मुख्य रूप से संकेत किया गया है। महाकवि कालिदास उपमा के सम्राट हैं।यद्यपि आपने सभी अलंकारों का प्रयोग दक्षता से किया है किन्तु उपमा पर आपका चामत्कारिक अधिकार है।संस्कृत जगत ही नहीं अपितु विश्व का भी ऐसा कोई कवि नहीं है जो कवि की उपमा कला की तुलना कर सके।

     रघुवंश हो या मेघदूत,कुमार संभव हो या ऋतुसंहार सर्वत्र उपमाओं की रसात्मिकता दृष्टिगोचर होती है।उनकी उपमा योजना सरलता ,रम्यता, विविधता,मार्मिकता,यथार्थता एवं वैज्ञानिकता की दृष्टि से बेजोड़ है।आपने बड़ी सरलता से भावों को पाठक के हृदय में उतारने का प्रयास किया है।

   रघुवंश का तो प्रारंभ ही उपमा अलंकार से हुआ है।प्रथम सर्ग के प्रथम श्लोक में ही कवि ने उपमा के प्रयोग में अपनी अद्भुत काव्य-कला का परिचय दिया है—

   वागर्थाविव संपक्तो वागर्थाप्रतिपत्रये

     जगतपितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।

   अर्थात शब्द और अर्थ के यथार्थ ज्ञान के लिए मैं शब्द और अर्थ की तरह मिले हुए संसार के माता-पिता पार्वती और शिव की वंदना करता हूँ।

     इस प्रकार रघुवंश में इन्दुमती स्वयंवर के वर्णन के समय का निम्न श्लोक कितना सुंदर है-

संचारिणी दीपशिखेव रात्रि, यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा।

नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः।।

अर्थात् इन्दुमती स्वयंवर में आए हुए राजाओं का परिचय प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ती जाती है। इन्दुमती जिस-जिस राजा को छोड़कर आगे बढ़ जाती है,उस राजा की आशाओं पर तुषारापात हो जाता है और उसका मुख मलीन हो जाता है। जिस प्रकार रात्रि में चलती हुई दीपक की शिखा जिस प्रासाद को छोड़कर आगे बढ़ जाती है,वहीं महल अंधकार से मलीन हो जाता है।इस श्लोक में दीपशिखा के साथ इन्दुमती की उपमा अद्वितीय है ।इस श्लोक पर मुग्ध होकर विद्वानों ने कालिदास को दीपशिखा की उपाधि से विभूषित किया।

    संपूर्ण उपमा का एक और सुंदर दर्शन देखिए— सायंकाल दिलीप गाय लेकर लौट रहे हैं। लाल रंग की गाय आगे-आगे है और शुभ्र वसनधारी दिलीप पीछे-पीछे हैं।हरित वस्त्रधारिणी सुदक्षिणा अगवानी के लिए आगे बढ़ रही है।उपमा की यह कल्पना कितनी स्वाभाविक और यथार्थ है।रक्त वर्ण स्त्रीलिंग नन्दिनी संध्या है,तेजस्वी पुल्लिंग राजा दिलीप दिन हैं तथा स्त्रीलिंग सुदक्षिणा रात्रि के समान है—

पुरस्कृता वर्त्मनि पार्थिव्न प्रत्युदगता पार्थिवधर्मपल्या।

तदन्तरे सा विरराज धेनुर्दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्या।॥

    प्रकृति तत्व को अत्यधिक सूक्ष्मता से निहारने के कारण ही उनके काव्यों में पाठक को अद्वितीय सौंदर्य,नवीन चेतना और अपरिमेय सुखानुभूति सुलभ होती है।उन्होंने उपमा के माध्यम से मनुष्य और प्रकृति के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित करने का प्रयास किया है। मेघदूत में मेघ को दूत बनाने तथा वियुक्ता प्रिया को संदेश भेजने में महाकवि की दक्षता तथा अनुपमता स्पष्ट परिलक्षित होती है।

    अभिज्ञानशाकुन्तलम् में शकुन्तला को पुष्पित लता के समान बतला कर कवि ने उसके सौंदर्य में अनुपम मादकता भर दी।दुष्यंत की दृष्टि में शकुन्तला लता से तनिक भी कम नहीं है—

अधरः किसलयरागः कोमलविटपानुकारिणौ बाहू।

कुसुमामिव लोभनीय यौवन-भगडेषु सन्नध्दम्॥

   कवि कालिदास के प्रकृति वर्णन में प्रेमी-प्रेमिका और पति-पत्नी के दाम्पत्य जीवन के दर्शन होते हैं ।प्रकृति का कोई ऐसा पक्ष नहीं हैं जहाँ कवि की दृष्टि न गई हो।

    इस प्रकार हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि कवि की लेखनी ने किशोरावस्था की प्रथम प्रणय लीला का पूर्वाभ्यास हो या प्रौढ़ावस्था की ऊषा बेला में रस-क्रीड़ा का अभ्यास हो,सर्वत्र अपनी काव्य-प्रतिभा का अनूठा परिचय दिया है । बाह्य सरोवर से निकलने वाले सरयू की उपमा सांख्य-शास्त्र की अव्यक्त मूल प्रकृति से दी गई है ।अपनी अनुपम कल्पना-शक्ति से कवि ने अपनी कृतियों में उपमा की अद्भुत छटा बिखेरी है ।किसी प्रशंसक कवि ने महाकवि कालिदास की उपमा के विषय में सत्य ही कहा है—

 उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम्

  नैषधे पदलालित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणाः॥

     धन्यवाद|

लेखिका: सरोजिनी चौधरी

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