गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024

कविता में मात्रा: दोहे

लेखक: प्राणेंद्र नाथ मिश्र


भाषा पहले जन्म लेती है, व्याकरणबद्ध बाद में होती है। यह वैसे ही है जैसे समाज का निर्माण होने के बाद, सामाजिक नियम कानून बनाए जाते हैं।

दोहा लयबद्ध पद हैं, चतुष्पदी है। कबीर, रहीम और तुलसी के दोहे प्रसिद्ध हैं। कवि जब कुछ छन्दबद्ध कर के लिखता है, वह मात्रा नहीं गिनता और न ही मात्रा से मिलाता है। लेकिन यह जरूर है कि हर रचनाकार, अपनी कविता ( छंद) लिख कर मन ही मन दोहराता जरूर है। इसी दोहराने पर उसे अपनी कविता और उसके संतुलन का एहसास हो जाता है। संतुलित कविता गाने योग्य हो जाती है और जो कुछ भी गाया जा सके उसके पदों में मात्राएं संतुलित रूप से रहती हैं अन्यथा वह गेय नही होगा।

मात्राएं हमारे बोलने की शैली बताती हैं। शब्दों के बीच के विराम या समय को यति कहते हैं लेकिन शब्दों में रह रहे वर्ण, उच्चारण में कितना समय लेते हैं, उसे मात्रा कहते हैं।

छंद, मात्राओं से मिलाकर लिखे जाते हैं और वर्ण मिलाकर भी । मात्राओं मे संतुलित छंद, मात्रिक छंद कहलाते हैं तथा वर्णों से संतुलित वर्णिक छंद....... हम यहाँ मात्रिक छंदों की ही बात करेंगे......

'' और '' कहने में अलग अलग पल (समय) लगता है। अप और आप कह कर देखिए, अप में कम और आप में अधिक समय लगता है। दोनो में फर्क "अ" और " आ" का है। " प" दोनो में बराबर समय लेता है। क्यों कि '' की मात्रा यदि एक है तो '' की दो । यानि दीर्घ बोलने मे ह्रस्व की अपेक्षा दुगुना समय लगता है..... संगीत मे इसी आधार पर सुर बनाए जाते हैं....ह्रस्व की मात्रा को जितना समय देंगे, दीर्घ को उससे दुगुना... यही मात्राओं का आधार है...

इससे सिद्ध हुआ कि दीर्घ स्वर या इनसे जुड़े, दीर्घ व्यंजन अधिक समय लेते हैं। दोहे, पद से बनते हैं, पद, शब्दों से बनते हैं और शब्द स्वर या स्वर युक्त व्यंजनों से बनते हैं। अतः प्रत्येक पद को बोलने मे कितना समय, कितने पल, इस पर निर्भर करता है कि वह "छोटा अ" की तरह बोला जाने वाला समय लेता है या "बड़ा आ" जैसा समय।

जो वर्ण या स्वर "छोटा अ" जैसा समय लेते हैं उनकी मात्रा "लघु" कहलाती है और जो "बड़ा आ" जैसा, उनकी मात्रा "गुरु" कहलाती है इन्हें (I) और (S) से चिन्हित किया जाता है। लघु की एक मात्रा गुरु की दो मात्राएं मानी जाती हैं..... जैसे

'अपनी' मे '' लघु, '' लघु और 'नी' गुरु है| अतः ये एक एक दो (IIS) चार मात्राओं वाला शब्द है।

 

1...., , , , की लघु मात्राएं है, बाकी की गुरु होती हैं|

2.... संयुक्ताक्षर मे यदि प्रारम्भ का वर्ण आधा है, तो उसकी गणना नहीं होती, लेकिन यदि संयुक्ताक्षर मे, मध्य आधा अक्षर होने पर, पूर्व का वर्ण यदि लघु हो तो, उसे "गुरु" माना जाता है जैसे, "अन्वेषण" मे यद्यपि अ लघु है पर उसके बाद आधा न है तो इन दोनों को मिलाकर "गुरु हो जाएगा। इस तरह इसमे गुरु, गुरु, लघु लघु (SSII) 6 मात्राएं हुईं । इसी तरह भक्त मे, गुरु लघु (SI) तीन मात्राएं हुयी।

3.... अनुस्वार और विसर्ग युक्त वर्ण यदि लघु हों तो तो उन्हे गुरु मानते हैं जैसे अंगूर SSI = 5 मात्रा लेकिन अगर अनुस्वार की जगह चन्द्रबिन्दु हो तो लघु वर्ण, लघु ही रहेगा, जैसे, हँसना = IIS = 4 मात्रा

4.... जिस वर्ण पर "रेफ" लगा हो, उसके पूर्व का वर्ण, लघु होने पर भी, गुरु हो जाता है जैसे "कर्म" = SI = 3 मात्रा

 

इस तरह मात्राओं की गिनती की जाती है लेकिन जब आप किसी छंद को गुनगुनाएँ, मात्रा का असंतुलन अपने आप पता चल जात है।

आप स्वयं गुनगुना कर देख लीजिये ...........

1,,, "क़हत कबीर, सुनो भइ साधो, बात कहूँ मैं खरी" तथा

1A,,, "क़हत कबीरा, सुनो भइ साधो, बात कहूँ मैं खरी

कबीर को कबीरा लिख देने से, पद लय बदध नहीं हो रहा है.... इसमे म्यूजिक कोम्पोजर, लिखने वाले से, शब्दों को हेर फेर के लिए कहेगा.... ये लोग बोलने के वजन को तौल कर संगीत बद्ध कर लेंगे,,,अब इसे व्याकरण की दृष्टि से देखते हैं.....

.....दोहे चतुष्पदी होते हैं .....चार पद ..... पहले और तीसरे पद (विषम पद) मे 13, 13 और दूसरे तथा चौथे पदों मे 11, 11 मात्राएं होनी चाहिए ......... जैसे

रहिमन अँसुआ नैन ढरि = IIII IIS SI II = 4 + 4+ 3+ 2 = 13 मात्रा

जिय दुख प्रकट करेइ = II II III ISI = 2+2+3+4 = 11 मात्रा

जाहि निकारो गेह ते = SI ISS SI S = 3+5+3+2 = 13 मात्रा

कस न भेद कहि देइ =  II I SI II SI = 2+1+3+2+3 = 11 मात्रा

 

पहले और तीसरे पद के अंत में त्रिकाल होना चाहिए अर्थात अंत में (लघु, लघु लघु : III), या ( लघु, गुरु : IS) या (गुरु, लघु : SI) होना चाहिए| साथ ही दूसरा और तीसरा पद समान्त होना चाहिए और अंत में (गुरु, लघु : SI) होना भी अनिवार्य है| अंत की शर्तो का पालन न करने के कारण, नीचे लिखी चतुष्पदी दोहा नही कहलाएगी|

अंत सही समझे नही, लिखे है जो दोहा| ....  SI IS IIS IS: 13, IS S S SS: 11

मात्रा गिनना सीखते, कहे जल को लोहा|| .... SS IIS SIS: 13, IS II S SS: 11

 

एक हास्य कवि के दुमदार दोहे मुझे बहुत पसंद हैं...आइये उदाहरण के तौर पर एक को देखें......

सास बहू मे छिड़ गयी, लड़ते बीती रात = SI SI S II IS = 13 मात्रा .... IIS SS SI = 11 मात्रा

बढ़ते बढ़ते बढ़ गयी , एक ज़रा सी बात = IIS IIS II IS = 13 मात्रा .....SI IS S SI = 11 मात्रा

.खटोला यहीं बिछेगा ......... (यह दुम है)

 

नोट: छंद किसी भी लयबद्ध कविता को कहते हैं जिनमे चौपाई, सोरठा, कुंडली, आल्हा, सवैया आदि कई तरह के छंद हैं, जिन्हें अलग अलग मात्राओं मे लिख कर अलग अलग राग मे लयबद्ध किया जाता है......

धन्यवाद|

 


प्राणेंद्र नाथ मिश्र 

3 टिप्‍पणियां:

  1. जानकारी बढ़ाता आलेख, हार्दिक बधाई व शुभकामनायें

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  2. बहुत सुंदर हिंदी की जानकारी

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  3. बहुत ही सुन्दर व्याख्या मिश्रा जी 👏👏👏

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