लेखक: प्राणेंद्र नाथ मिश्र
समुद्री जहाजो का इतिहास बहुत पुराना है। पुराने समय में टेक्नोलॉजी इतना आगे नहीं थी कि विशाल समुद्री यात्राओं को हर तरह से सुरक्षित बनाया जाता। यात्रा में समय भी इतना लगता था कि मौसम बदलने की अग्रिम सूचना पाने का और संभलने का कोई जरिया नहीं था। अतः नियति और ईश्वर पर विश्वास करना तथा शुभ समय में प्रस्थान करना, एक नियम बन गया था ताकि कोई विपदा रास्ते में न आए। इसलिए देवी देवताओं के नाम से समुद्री जहाजों को जाना जाता था। उनके नामकरण के पीछे यह खास कारण था। वही परिपाटी आज भी जारी है।
आजकल भीषण बवंडरों और तूफानों का भी नामकरण होता है और मजे की बात यह कि यह नामकरण, ऐसी प्राकृतिक विपदाओं के आने से पहले ही कर दिया जाता है। इन्हें तारीखों के बजाय नाम से याद करने पर अधिक पहचान मिलती है, शायद यह कारण इनके नामकरण का रहा होगा। " लैला, गोनू, एम्फन आदि" हमे याद हैं, तारीखें नहीं। लिकन इनकी संख्या भी विमानों की तरह ज्यादा नहीं है।
हवाई जहाज कमर्शियल तौर पर प्रायः सिर्फ एक ही शताब्दी से उड़ रहे हैं। इनका शुरू में प्रयोग, विश्व युद्ध के दौरान हुआ और उसके बाद उत्तरोत्तर टेक्निकली एडवांस होते गए। प्रत्येक हवाई जहाज निर्माता ने अपने विमानों के फ्लीट या बेड़े का नामकरण किया हुआ है। डिजाइन बदलने से ही फ्लीट का नाम बदल जाता है। जैसे एयरबस कंपनी ने एयर बस ३०० सीरीज में एयर बस ३००, एयरबस ३१०, एयर बस ३३०, एयर बस ३४० एयरबस ३५० नाम दिए हैं। एयरबस३८० इस समय का सबसे बड़ा पैसेंजर विमान है।
इसी तरह मीडियम साइज में एयरबस ३१९, एयरबस ३२०, एयरबस ३२१ विमान की डिज़ाइन एक है लेकिन यात्री क्षमता अलग अलग है। एक ही तरह का इंजन तीनों में लगाया जा सकता है। इनके कई कंपोनेंट्स भी कॉमन हैं, अतः इसे एयरबस ३२० फैमिली कहते हैं।
बोइंग ने भी ड्रीमलाइनर आदि नाम अपने विमानों के फ्लीट के लिए रखे हैं जिसे दूसरी भाषा में हैं बोइंग ७८७ कहते हैं।
तो, फ्लीट का नामकरण सारे विमानों में है, क्यों कि वे एक ही
डिजाइन के हैं।
कोई भी नाम, पहचान के लिए दिया जाता है। विमानों की पहचान उनके रजिस्ट्रेशन के नाम से होती है। किसी भी देश में रजिस्टर्ड विमान का सांकेतिक नाम अक्षर और नंबरों का मेल होता है। पहले दो अक्षर या/और अंक, उस देश की पहचान बताते है, जैसे हमारे देश में रजिस्टर्ड विमानों में VT, भारत की पहचान है, और उसके बाद के अक्षर उस विमान के फ्लीट के अनुसार रखे जाते हैं, जिसे विमानन कम्पनियां रखती हैं। विमानों की संख्या, हजारों में है और दिन ब दिन सैंकड़ों विमान बन रहे हैं अतः हर विमान को अतिरिक्त नाम देकर पहचान देना मुश्किल हो जायेगा।
सिर्फ यही नहीं, विमानों के रजिस्ट्रेशन से नाम की पहचान, पूरे विश्व को दी जाती है। ATC अथवा अन्य विमानों से संपर्क करने के लिए भी रजिस्ट्रेशन नंबर का ही प्रयोग होता है, वह भी खास भाषा में। अतः ऐसे में दूसरा नाम किसी को भी कन्फ्यूज कर सकता है।
परिपाटी के अनुसार अभी भी विमानों की उड़ान ऊंचाई तथा गति फीट तथा नॉट में दी जाती है ताकि किसी को कन्फ्यूजन न हो। क्योंकि जब विमान बने थे फुट और नॉट का ही चलन था।
फिर भी ऐसा नहीं नही है कि विमानों के नाम नही होते।
अमेरिका ने राइट ब्रदर्स से पहला विमान जो खरीदा था, उसका नाम "कोलंबिया प्रिंसेस" रखा
था।
आप को याद होगा, १९८५ में जब एयर इंडिया का कनाडा से भारत आने वाला जंबो जेट ( बोइंग ७४७) मिड एयर एक्सप्लॉड किया था, उसका नाम " कनिष्क," था। एयर इंडिया के संस्थापक, जे आर डी टाटा ने प्रत्येक विमानों को एक अलग नाम दिया था, एयर इंडिया में अभी भी कुछ विमानों के नाम भारत के पर्यटक स्थानों के ऊपर रखे जाते हैं, जैसे खजुराहो, मालाबार प्रिंसेस, मदुरै प्रिंसेस, कश्मीर प्रिंसेस आदि। कतार ने भी अपने जहाजों का नाम करण किया है। हो सकता है कुछ लोग इस नाम से पहचाने लेकिन ये नाम, समुद्री जहाजों की तरह प्रसिद्ध नही होते।
विमानों में यात्रा करना आम बात हो गई है अतः नाम क्या, लोग तो फ्लाइट नंबर भी भूल जाते हैं। समुद्री यात्रा और बवंडर आदि कभी कभी होते हैं, उसे याद रखना सरल है।
फिर भी यह नहीं कहा जा सकता की विमानों का नाम करण
नहीं होता। कई विमानों के नाम हैं लेकिन प्रचलित नही हैं।
धन्यवाद|
लेखक
आलेख में प्रस्तुत विचारों,
व्याकरण और त्रुटियों के लिए उत्तरदायी
है| पटल ने बस एक प्लेटफ़ॉर्म दिया है|

वाकई आप को पढ़कर ज्ञान का विस्तार होगा
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