शनिवार, 10 फ़रवरी 2024

सतरंगी सूरज

लेखिका: डॉ. रश्मि चौबे

 

कई वर्षों से इच्छा थी , पिता तुल्य सूरज को करीब से देखूं। पर उसकी वाणी रूपी तपिश मुझे जला दिया करती थी। माँ कहती थीं कि, सूरज के पास चेहरा ढककर जाना। पर आज डूबते सूरज की तपिश कम थी। तो मुझे महसूस हुआ। आज उसका आशीर्वाद मुझे मिल सकता है। सो आज मैने उस देवता को करीब से देखा।


आज तपिश कम थी, क्यूंकि सूरज अब डूब रहा था , कुछ स्वयं में खोया हुआ था पर स्वाभिमान कम न हुआ था। वह अकड लिए कह रहा था कि, डूब भले ही रहा हूं पर मै भी बड़ा हूं जो चाहे करूं। उसकी कमजोरियॉं उसके साथ-साथ सबको नज़र आ रही थीं। पर वह मानने को तैयार न था।

पहले उसकी तपिश इतनी थी कि, घर में वह नियत स्थान पर ही चलता था । पर आज थका-हारा, निढाल, स्वयं के जीवन की समीक्षा करते हुए न जाने कैसी-कैसी बातें करता। कभी जीवन में बच्चों से खुश होकर इतराता तो कभी स्वयं की इक्छा पूरी न कर पाने पर झुंझलाया सूरज संध्या से बिछुडने का दुःख सहन नहीं कर पा रहा था सूरज। उसके दुःख से दुःखी होकर उसकी आँखों में तो लाली थी, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे दसों दिशाऐं भी लाल हो गयीं, आस -पास खडे़ बादल भी लाल थे, हाय ये डूबता लाल सूरज ।ढलता सूरज अब जवानी के उन क्षणों को याद कर रहा था जब, उसकी तपिश से लोग जल जाते थे। हम उस वक्त उसके पास नहीं गये, और वह अपनी बात मानने पर मजबूर करता। कुछ उसके ताप से मजबूर होकर, कुछ उसके प्रभाव से बात मान लिया करते ।



कभी-कभी वह स्वयं के उस आशीर्वाद की बात करता जिसको पाने के लिए लोग सुबह-सुबह सूर्य नमस्कार करते थे। कुछ गायत्री मंत्र बोलते -'ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेनियम भर्गो देवस्य धीमही धियो योनः प्रचोदयात' और आशा करते कि उसका आशीर्वाद हमेशा उनके साथ रहेगा । जब वे ही लोग शाम को उसकी ओर देखे बिना अपने घर की ओर देखने लगे तब वह सूरज उपेक्षित सा महसूस करने लगा और अपने दोपहर के रूप को याद करता जब वह सफेद चमचमाता था। वह सोचता क्या अब मेरी रोशनी कम हो गयी है, विश्वास नहीं कर पाता। अब उसे लगने लगा था कि प्रकृति उसे धकेल रही है, मृत्यु की ओर और सच है मृत्यु। इंसान जीता ऐसे ही है जैसे मरेगा ही नहीं। सूरज ने भी तो ऐसा ही सोचा था और अब वह आश्रित होना नहीं चाहता था । वो सोचता कि आज भी मैं जैसे चाहूं रहूं और जो चाहूं खाऊं ।

 


लेकिन परिवर्तन प्रकृति का नियम है। ब्रह्माण्ड में कई सूर्य हैं। कुछ दूसरे उदय होने का लुफ्त़ उठाते हैं। प्रकृति उनके साथ नाचती है। परंतु इसके साथ शान्त स्तब्ध खड़ी थी। इसके साथ चारों ओर का वातावरण लालिमा लिये था। सूरज अब भी सतरंगी छटा बिखेरने की कोशिश में था। लोग ढलते सूरज के सौंदर्य को निहार रहे थे। कुछ कहते देखो लाल रंग, कुछ कहते पीला , कुछ कहते केसरिया, कुछ सुनहरा ,कुछ जामुनी। ज़माना अपने-अपने रंग ढूंढ रहा था। सूरज नीले क्षितिज़ में दूर जा रहा था। शांत ढलता सूरज जैसे जाते-जाते प्रकृति को रंगों रूपी गुलाल उपहार में देना चाहता हो। ऐसा लग रहा था , जैसे उसने जितना सोचा था उतना कर नहीं पाया, इसलिये कल फिर आएगा।

धन्यवाद |

                                                        

डॉ. रश्मि चौबे

लेखक आलेख में प्रस्तुत विचारों, व्याकरण और त्रुटियों के लिए उत्तरदायी है| पटल ने बस एक प्लेटफ़ॉर्म दिया है|

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