लेखक: प्राणेंद्र नाथ मिश्र
कविता में लय का बहुत महत्व है। लय के कारण ही कविता
सुर और ताल में गढ़ी जा सकती है। सुर और ताल तभी कर्ण प्रिय होते हैं जब वे एक
निश्चित गति से, एक समान उतार चढ़ाव और ताल से मिलते रहें। बेतरतीब कही गई कविता, भावों का प्रभाव नहीं
दे पाती।
छंद के प्रत्येक चरण में, लय की रफ्तार को कविता
की गति या चाल कहते हैं, जिसे अंग्रेज़ी में स्पीड कहा जाता है।
इस तरह सारे चरणों में एक निर्धारित गति , पूरे छंद में संभव होने
से कविता पूर्णतया गेय हो जाती है और उसका लालित्य बढ़ जाता है
उदाहरण के लिए ,
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी।
बूढ़े भारत में आई, फिर से नई जवानी थी।
इस तरह के कविता को गाने की शैली, जोश खरोश से और तीव्र
गति के साथ होगी। राजवंशों और आई पर एक खिंचाव लाकर प्रत्येक चरण को एक समान गति
देनी पड़ती है। एक विशेष गति में गाने से यह कविता वीर रस को उद्दीप्त करती है।
उसी जगह
राम राम कहि, राम कहि, राम राम कहि राम
दशरथ सुरपुर को गयो, त्याग दिए एही धाम।
यह करुण दृश्य, सुमंत के बाद, बिना राम के आने का है, जब दशरथ की राम विरह से
मृत्यु हो जाती है।
इन दोनो छंदों में पहले छंद की गति तेज और दूसरे की
धीमी तथा करुण विलाप में होगी। लेकिन दोनो छंदों में सभी चरणों की गति, जो एक बार आरंभ हुई, वही रहेगी।
छंदों की गति, उनके बोलते समय जिन जिन शब्दों पर उतार चढ़ाव
ले जाते हैं, वे प्रत्येक चरण में समान होते हैं, और मन में विभिन्न भाव पैदा करती है।
छंदों में, प्रत्येक चरण में, मात्रा के निर्धारण से, छंद की गति नियंत्रित
होती है।
यति या विराम:
मेरी ही एक कविता से
मधुसूदन! छत्तीस वर्ष बाद
आपस में लड़ेंगे, यदुवंशी
होंगी विधवाएं, कोख हीन
मेरे जैसी, सब निर्वंशी।
यहां "गांधारी का कृष्ण को शाप" का प्रसंग
है। मधुसूदन कहते हुए, गांधारी चीखती है और दो तीन बार मधुसूदन का संबोधन
करती हुई आगे बोलती है। अतः मधुसूदन के बाद एक विराम, भाव की तीव्रता बढ़ाता
है और कविता को भाव प्रवण बनाता है।
छत्तीस वर्ष बाद कह कर विराम देने से पाठक के मन में
उत्सुकता जागती है कि क्या होगा? अतः यहां विराम जरूरी है जो कविता के लालित्य को बढ़ाता
है।
यति का गति से संबंध इसलिए होता है क्योंकि एक चरण
में किसी किसी शब्द के बाद विराम लेकर आगे बढ़ना पड़ता है। कविता सर्राटे में नही
पढ़ी या बोली जाती वरना किस शब्द के साथ कौन सा शब्द जुड़ा है, वह तारतम्य खो जाता है।
छंद के किसी भी चरण के अंत में एक विराम लेना ही पड़ता है, और इसके लिए उस चरण का
आखिरी शब्द आते आते, एक वाक्य या उपवाक्य बन जाना चाहिए, तभी अगले चरण में
मात्राओं को सटीक पूरा करके गति दी जा सकेगी।
मात्रा और वर्ण योजना के अनुसार, छंद के दो भेद हैं, मात्रिक छंद तथा वर्णिक
छंद|
मात्रिक छंदों में केवल मात्राओं का बंधन होता है।
चौपाइ में चार, दोहे में चार कुंडलियों में छः आदि चरण होते हैं। इन मात्रिक छंदों के
चरणों के बीच, विराम स्थल स्वीकृत हैं जहां पर थोड़ा रुका जाता है, इसी रुकने को विराम या
यति कहते हैं।
जैसे, काका हाथरसी जी की कुंडलियां में (पूरी याद
नहीं)
गौरी बैठी छत पर, कूदन को तैयार,,,,,,पहला चरण तथा विराम
नीचे पक्का फर्श है, भली करे करतार,,,,दूसरा चरण तथा विराम
(यति)
भली करे करतार न दे दे कोई धक्का,,,तीसरा चरण विराम (यति)
ऊपर मोटी नारी, कि नीचे पतरे कक्का,,,,चौथा चरण तथा यति या
विराम।
वैसे तो छंदों के मात्राओं पर निर्धारित होने से गति
सम हो जाती है लेकिन आधुनिक कविताओं में छंद के चरण विषम मात्राओं में भी होने लगे
हैं,
फिर भी यति या विराम
ऐसी जगह रखा जाता है कि लय में गेय भाव न होने पर भी कोई दोष न दिखे जैसे
जो खत
लिखे थे तुमने
तीस साल पहले,,,,,,(यति या विराम)
वे
डिग्रियों के पीछे से
फटे हाल निकले।
यहां विषम गति के कारण, लय समान रूप से गेय तो
नही है,
लेकिन विराम या यति' के कारण और अंत में
तुकबंदी की वजह से ,,,,"पहले तथा निकले" के कारण बोलने पर या
पढ़ने पर दोषपूर्ण नही लग रहे हैं और कविता के आत्मा ( भाव) को पूरी तरह प्रस्तुत
कर रहे हैं। बीच बीच में शब्द के बाद, एक ही चरण में विराम से भाव भी उभर रहे हैं
तथा शब्दों का प्रभाव उचित छाप दे रहा है।
लय को और अच्छी तरह समझने में मात्रिक तथा वर्णिक
छंदों को विस्तृत रूप में बताना उचित होता, लेकिन लेख की सीमा बांधते हुए, संक्षेप तथा सरल भाषा
में,
जो मैं समझा था, वही कह रहा हूं।
मात्राओं को कैसे गिनें और चरण की माप कैसे लें,,, यह अन्य लेख में,,,
धन्यवाद |
प्राणेंद्र नाथ मिश्र
लेखक
आलेख में प्रस्तुत विचारों,
व्याकरण और त्रुटियों के लिए उत्तरदायी
है| पटल ने बस एक प्लेटफ़ॉर्म दिया है|

बहुत सुंदर जानकारी सर
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