लेखक: विनोद पाराशर
अपना
पड़ोसी भोलाराम सुबह-सुबह हमारे घर आ
धमका! उसका मूड उखड़ा हुआ था।
मैंने
पूछा-"क्या हुआ भोलाराम?"
वह
बोला -"अब क्या बताएं! ससुरी घर-घर में पॉलिटिक्स चल रही है।"
मैंने
उसे कुरेदा- "क्यों,अब क्या हुआ?"
उसने
बताना शुरू किया-
"अरे, वह लल्ला है ना,अयोध्या वाले,
रिश्ते में हमारे चाचा लगते हैं। उन्होंने अपना नया घर
बनाया है। उनके बिटवा नटवर हमारे दादा जी को गृह प्रवेश का निमंत्रण देने आये
थे।"
"यह
तो अच्छी बात है"-मैने कहा।
वो
झल्लाकर बोले-" अरे,क्या खाक अच्छी बात है!दादाजी को निमंत्रण
पत्र देकर कहते हैं कि निमंत्रण तो दे दिया है,लेकिन
उन्हें समारोह में नहीं आना है।"
"नहीं
आना!तो भाई निमंत्रण क्यों दिया ?" मैने
भोलाराम से पूछा।
"यही
तो-हमने भी उनसे पूछा था!"-भोला का जवाब।
"फिर,नटवर ने क्या कहा?"
मैने
पूछा।
उसने
कहा-"सर्दी बहुत है!दादाजी अब बूढ़े हो गये हैं। बूढ़े आदमी का इस उम्र में घर
से बाहर निकलना ठीक नहीं"
मैने
कहा -"तूने उसे समझाया नहीं कि जैसे
यहाँ बैठे रहते हैं,वैसे ही वहाँ बैठ जाएंगे,घर के किसी कोने में, कम्बल ओढ़कर!"
भोला
बोला-"समझाया था,लेकिन नटवर ने कहा कि ऐसे शुभ मौके पर ,यदि
इनकी वजय से कोई ऊंच-नीच हो गयी,तो
उनके लल्ला की तो सबके सामने नाक ही कट
जाएगी!"
मैं
बोला-"यह तो सरासर घर के बड़े बुजुर्गों का अपमान है! बूढ़े होने का मतलब यह तो
नहीं कि वे घर-परिवार में किसी खुशी के
मौके पर शामिल नहीं हो सकते!"
भोला
बोला-'अरे भईया हमने भी कभी सोचा नहीं था
कि हमारे ये लल्ला चाचा इतने स्वार्थी
निकलेंगे। दादाजी बता रहे थे कि जिस जगह पर लल्ला ने अपना नया घर बनाया है,उसपर पहले पड़ोसियों का कब्जा था।लल्ला के
दादाजी और हमारे दादाजी ने सालों कचहरी में लड़ झगड़कर यह जमीन पड़ोसियों से छुड़वायी
थी।"
मैंने
भोलाराम को सांत्वना देते हुए
समझाया-"जो हुआ उसे भूल जा भोला!आजकल की इस दुनिया में सभी मतलब के रिश्ते
हैं।मतलब निकलने पर कोई किसी को नहीं पूछता!घर हो या बहार सब जगह यही हाल
है!"
धन्यवाद|
लेखक: विनोद पाराशर

आनन्द आ गया पढ़ कर। साधुवाद अच्छे लेख के लिए
जवाब देंहटाएंसुंदर अच्छा लेख
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