लेखिका: डॉ पूजा भारद्वाज
आज हम एक फिल्म देखने गये, थोडा सा देर से पहुंचे
थे मगर पहला सीन देखते ही रूह कांप गईं। जब एक आतंकी ने बच्चे पर गोली चलाई । वो
भी सिर्फ इसलिए कि उसके धर्म को दूसरे धर्म में परिवर्तित करने से मना किया गया
आयर इनकार का अंजाम था गोली।
आखिर ये लड़ाई क्यों? सिर्फ ये कश्मीर मेरा है या
तेरा? क्यों एक जन्नत पाने के
लिए देश को जहन्नुम बनाया गया ? कौन थे वो लोग, जो ना हिंदू थे, ना मुस्लमान ? कोई ये नहीं जानता | दरअसल आतंक की
कोई शक्ल ही नही होती।
आंखे आंसुओं से भीगी थी। हॉल सिसकियों से भरा था | ऐसा
लग रहा था मानो आज भी ज़ख्म ताज़ा हो। पर बड़े मन से जिद्द कर के ये फिल्म देखने
आई थी, पर अब सवाल ये था की क्या मैं ये पूरी फिल्म देख पाऊंगी? क्योंकि मैंने तो
एक आज़ाद भारत में जन्म लिया था और बचपन से सुना था कि कश्मीर को जन्नत कहा जाता
है। प्राचीन काल में कश्मीर हिन्दू और बौद्ध संस्कृतियों का पालना रहा है। माना
जाता था कि यहाँ पर भगवान शिव की पत्नी देवी सती रहा करती थीं और उस समय ये वादी
पूरी पानी से ढकी हुई थी। यहाँ एक राक्षस नाग भी रहता था, जिसे वैदिक ऋषि कश्यप
और देवी सती ने मिलकर हरा दिया और ज़्यादातर पानी वितस्ता (झेलम) नदी के रास्ते
बहा दिया। इस तरह इस जगह का नाम सतीसर से कश्मीर पड़ा। यह धारणा है कि
विष्णुधर्मोत्तर पुराण एवं योग वशिष्ठ यहीं लिखे गए थे , पर एक चलचित्र के
द्वारा कश्मीर का कुछ अलग ही इतिहास देख तो मैं नि:शब्द हो गई। 1990 में कश्मीर के लोग
क्या झेल रहे थे जिससे हम सब और देश की बाकी जनता सब अनजान थे।
मुझे एक घटना याद आई जो मेरे सामने घटी थी| एक आदमी चाकू
लेकर दूसरे आदमी के पीछे भाग रहा था| जब आगे वाला आदमी, पीछे वाले की जद में पहुँच
गया तब, पीछे वाले आदमी ने धार वाला चाकू फेंक कर उसका कान काट दिया था| तब मैं डर
के कारण कई रात नही सो सकी थी| कश्मीर में तो पानी की तरह खून की नदियां बह रही
थी। क्या मंजर रहा होगा, जब उनके घर के सभी सदस्यों
को प्रताड़ित कर, उनके सामने घर की स्त्रियों का
जबरदस्ती निकाह किया जा रहा था, उनके साथ बलात्कार किए गए| एक घर जो हर किसी
का सपना होता है, अपनी एक प्यारी सी महफूज़ जगह, जहां अपने परिवार के साथ वो सपने
देखता है| एक मकान को घर बनाते ,वो बच्चों की किलकारियाँ, जो बड़ो का आशीर्वाद से
फलता फूलता है और उसी घर से उनको बेघर कर दिया गया। एक पहचान जो उन से छीनी जा रहा
थी| उन सब बातों को कुछ शब्दों में बताना बड़ा मुश्किल है । आज बहुत कुछ बदला है
कश्मीर में, पर आज भी एक दहशत और डर है, सुकून और शांति नहीं है। क्योंकि कुछ
बदलाव को अंजाम तक पहुँचाने में समय लगता है। डर आज भी है की हम घूमने जाए और किसी
गोली पर हमारा नाम लिखा हो ।
नमन है उन माता और बहनों को जो अपने बेटे और भाई को सेना
में सहर्ष भेजते है| वो आज भी इस डर और
दहशत के माहौल में एक सैनिक के रूप में लोगो की सुरक्षा के लिए तैनात हैं। वहीं
मुझे आज भी कई दर्दनाक दास्ताने याद है जिन्हें सोच कर आज भी रूह कांप उठती है। जब
कुछ आतंकी भारत की सरज़मीन पर आ कर मौत और दहशत का तांडव मचाते है। जैसा 26/11/2008 में मुंबई पर एक आतंकी
हमला वही गोली की बारिश वही खून का पानी की तरह बहना।
ना जाने कब इन आतंकियों का सफाया होगा क्योंकि आतंक
की कोई शक्ल नहीं होती ।
काश जो सुना है सबने कश्मीर के लिए वो एक बार फिर सच
हो जाए.....
इस प्रदेश को धरती का स्वर्ग कहा गया है। एक नहीं कई
कवियों ने बार बार कहा है :
"गर फ़िरदौस बर रुए
ज़मीं अस्त,
हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त।"
सभी उस समय के पीड़ित कश्मीरी भाईयों और बहिनों को
सादर समर्पित ..
धन्यवाद|
डॉ पूजा भारद्वाज

विचारोत्तेजक लेख, बधाई और शुभकामनायें
जवाब देंहटाएंThank you so much sheli ji
हटाएंकुछ दशक पहले के कश्मीर और हाल के कश्मीर में कितना फ़र्क हो गया है! पहले भारतीय फिल्मों की यहां शूटिंग होती थी और खूबसूरत वादियों को लोग देख कर आनंद उठाते थे, अपने देश पर फक्र करते थे,,, लेकिन समय के साथ विचारों में बदलाव हुआ और कहानी खूनी हो गई। बहुत सुंदर तरीके से बयान किया है वहां की कहानी पूजा जी ने,, आशा है पहले जैसी रौनक कश्मीर में फिर लौटेगी,,, बधाई एवं शुभकामनाएं इस आलेख के लिए! सादर,,,, प्राणेंद्र नाथ मिश्र
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार सर आपने लेख पढ़ा और
हटाएंसुंदर प्रतिक्रिया दी 🙏🙏
जी सर सही कहा आज बहुत कुछ बदल गया है
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार सर अपना कीमती समय दिया🙏🙏💐
बिलकुल सही कहा आपने पूजा जी 👌👌👌👌
जवाब देंहटाएंबहुत ही शानदार। ख़ास बात यह है कि इसमें आपने किसी भी मज़हब, संप्रदाय की तरफ़ से कोई बात नहीं की है, एक लेखक का ईमानदार पक्ष प्रस्तुत किया है।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
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