रविवार, 10 मार्च 2024

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

 लेखक: प्रो. वी. पी. श्रीवास्तव

प्रकृति की गोद में पशु पक्षियों के समान जीवन: आहार, निद्रा, भय, मैथुन से आगे बढ़कर मानव ने अपने लिए सुखकर जीवन बनाया , संस्कृतियां पनपीं, मिटीं। भारतीय संस्कृति के लिए कहा जाता है:

यूरोप, मिस्र, रोमां सब मिट गए जहां से,

कुछ चीज़ है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी।

नहीं - ऐसा ना समझें। धरती ही खतरे में है , भारतीय संस्कृति की क्या कहें। शताब्दी के अंत तक समुद्र के अपनी तटीय मर्यादा के छोड़ने की भविष्यवाणी है। बात वही है," कुछ चीज़ है" जिसने हमारी हस्ती बचाए रखा था:"संयम"।  पता नहीं कब ये चीज़ हाथ से  निकलने लगी। सुनाई पड़ता है अब तो, कभी कभी ही सही  ,There is enough for every one's need but not enough for anyone's greed. अब तो greed भी आम हो चली है।

असंयम का शिकार महिला थी, अब भी है, अब धरती भी हो गई है। असंयमित पुरुष के लिए महिला उपभोग की वस्तु थी। जैसे ज़मीन, राज्य पाने के लिए युद्ध किए गए, वैसे ही औरत के लिए भी युद्ध किए गए।वर्तमान युग में , बाज़ार ने वस्तुओं के उपभोग को असंयमित करने के लिए, उपभोक्ता यानी जनसाधारण के लिए भी स्त्री के अमर्यादित रूप को सहज कर दिया। हम भले ही गीता पाठ करते रहें " ध्यायतो विषयानपुन्सह...." अर्थात कि विषयों का ध्यान करने से उनमें आसक्ति, और उनकी प्राप्ति ना होने से क्रोध, मतिभ्रष्टि... आदि, आदि होता है। आप चाहें ना चाहें,  मीडिया दिन रात बूढ़े , बच्चे, जवान को समभाव से विषयों में डुबकी डुबा डुब लगवाता रहता है। पद्मनी, रूपमती vitually बिना फौज के उपलब्ध हैं, शिकार वो हुई जो real world में पास में उपलब्ध हो। आज भारतवर्ष में औसतन  प्रति घंटे  बलात्कार की चार घटनाओं की शिकायत पुलिस में दर्ज होती हैं, वर्ष में 32000 मामले।जबकि इन घटनाओं की रिपोर्ट करने से अधिकांशतः लोग कतराते हैं। इसलिए ब्राजील की माहिला जब  लिखती है कि अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए वो अपने किसी पर विश्वास नहीं करती तो जानिए कि यह एक वैश्विक सत्य है। विश्वास किस पर ,ना पुलिस, ना कचहरी। समाज तो टूट ही रहा है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए बनाए नए कानून उसे और बेबस बना रहे हैं।

स्त्री हो या पुरुष, जो विवेकशील हैं और साहसी भी, वे मिलजुलकर अपने समय की मुख्य समस्याओं से जूझते हैं, बिना तुरंत परिणाम की चिंता किए। पर्यावरणीय संकट, युद्ध की विभीषिकाएं या महिला असुरक्षा जैसी ही नहीं परिवार और स्थानीय समाज की समस्याएं सभी महत्वपूर्ण होती हैं। महिलाओं को गांधीजी ने पुरुष से कभी पीछे नहीं समझा। तभी तो सत्याग्रह के सभी मोर्चे पर स्त्रियों को आगे रखा। उनमें नाम मात्र भर पढ़ी महिलाओं से लेकर उच्चतम योग्यता प्राप्त संभ्रांत घर की महिलाएं, हर धर्म की , देश विदेश की महिलाएं सभी शामिल थीं (बापू की महिला ब्रिगेड लेखक अरविंद मोहन की हाल में प्रकाशित पुस्तक)।नेताजी ने रानी झांसी ब्रिगेड में महिलाओं को बंदूक पकड़ा दी। इराम शर्मीला के हिंसा के प्रतिकार में लगभग 16 वर्ष का अन्न जल त्याग के आगे तो पौराणिक कथाएं भी छोटी पड़ जाती हैं। Non Violent Peace Force  में Adbusters.org में महिलाएं किसी से पीछे नहीं हैं। ध्यान रहे पर्यावरणीय संकट हो या दहेज की समस्या का मुख्य कारण उपभोक्तावाद है, और उसको बढ़ाने में पढ़ी लिखी महिलाओं का हाथ प्रमुख है। बिमल मित्र की एक दिल को दहला देने वाली कहानी है_ हत्या या आत्महत्या, जिसमें नायक पत्नी की दूसरों के सदृश गाड़ी, टीवी, आदि उपकरणों की फरमाइश से तंग  आकर सरकारी खजाने से चोरी करता है और पकड़े जाने के डर से आत्महत्या कर लेता है। वहां पहुंच कर लेखक को लगा कि उसे देख कर उसका मृतक शरीर उनसे अपनी व्यथा  चीख चीख कर सुना रहा है।लेखक घबड़ा कर आंख कान बंद कर के  भागने लगता है।लेखक को लगता है जैसे  बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के सारे हिंदुस्तान का सामूहिक क्रंदन उसका पीछा कर रहा है...।

इस क्रंदन से हम सभी कहीं न कहीं प्रभावित हैं और इसका समाधान भी हमें ही करना है इसलिए हम वापस संयम के रास्ते पर चलें।

धन्यवाद| 

प्रो. वी. पी. श्रीवास्तव

शनिवार, 9 मार्च 2024

स्वतंत्र नारी

 लेखिका: रूबी शोम

 

स्वतंत्र नारी से आप क्या समझते हैं या कहें तो परतंत्र नारी । प्रत्येक नारी को जन्म से लेकर विवाह और फिर पुत्र सभी पर अधीन रहना पड़ता है नारी पहले पिता के घर पर अपने पिता के कहे अनुसार, विवाह के बाद पति के कहे अनुसार, उसे चलना पड़ता है और फिर पुत्र के कहे अनुसार, चलना पड़ता है दुनियां चाहे जितनी भी तरक्की कर ले पर नारी का कहां और कितना स्थान होता है, घर परिवार और समाज में यह बात किसी भी नारी से छुपी नहीं है।नारी को हर बात में चुप करा दिया जाता है, नारी स्त्री हर जगह पर मौन रहकर ही कार्य करती है नारी को अपनी बात कहने अपने विचारों को व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए यह बात पहले घर परिवार और समाज को समझनी चाहिए नारी की बात सुनकर उसके विचारों का सम्मान करना चाहिए तभी एक स्त्री अपने स्वतंत्र होने पर सभी कार्य कर सकती है और इसमें बहुत बड़ा योगदान एक नारी के लिए एक नारी का होना चाहिए जब तक एक स्त्री दूसरी स्त्री का साथ नहीं देगी उसको आगे नहीं बढ़ाएगी तब तक एक स्त्री आगे नहीं बढ़ सकती है हमें नारी के उत्थान के लिए स्त्री और पुरूष दोनों को मिलकर यह कार्य करना होगा तभी एक नारी आगे बढ़कर एक सशक्त नारी एक स्वतंत्र नारी बन सकती है इसमें पिता ,भाई ,पति और पुत्र को अहम भूमिका निभानी पड़ेगी तभी स्त्री एक स्वतंत्र नारी के रूप में अपना जीवन यापन कर सकती है।

धन्यवाद| 

रूबी शोम

शुक्रवार, 8 मार्च 2024

सेना के रूप में भारतीय नारी

 लेखिका: अनामिका संजय अग्रवाल

  

खुद के कर कमलों से सज्जित

ये जग की फुलवारी है।

घर आंगन को सजाती जहां को

महकाती ये तो नारी है ।।

मन से नाजुक पर अपनों के लिए

शक्ति रूप धारिणी  ये नारी है।

भारत की नारी है निराली  हर कष्ट

की वो तो तारण हारी है।।

      घर के अंदर हो या बाहर दोनों जगह नारी एक योद्धा की तरह हर परिस्थिति में परिवार को सुरक्षित रखती है।परिवार को हर आपदा से बचाती उसकी यही कोशिश होती है कि परिवार खुशहाल रहे। आज तो नारी घर के बाहर भी कितना कुछ कर रही है। आज की नारी सेना के हर क्षेत्र में अपना प्रतिनिधित्व निभा रही है।

       भारत में नारी को शक्ति का रूप माना गया है। भारतिय सेना में 6807 से अधिक महिलाएं काम कर रही है डाक्टर पुनिता अरोड़ा 1968 में भारतीय सशस्त्र बलों में लेफ्टिनेंट जनरल और भारतीय नौसेना में वाइस एडमिरल के रूप में सर्वोच्च नम्बर तक पहुंचने  वाली पहली महिला है ।महिला अधिकारीयों को भारतिय नौसेना के युद्ध पोत पर नियुक्त किया गया है कैप्टन तानिया शेरगिल ने गणतंत्र दिवस परेड 2020 में पुरूष सैनिकों के दल का नेतृत्व किया।

        बिहार के बेगूसराय की भावना कंठ,मध्यप्रदेश के रीवा की अवनी चतुर्वेदी और बड़ोदरा की मोहना सिंह ये तीन महिलाएं 18 जून 2016 को देश की पहली महिला फाइटर के रूप हिन्दुस्तान के नभ को सुरक्षित बचा पाये।

         फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान भारत की तरफ से पाकिस्तान से लोहा लेकर कारगिल गर्ल का खिताब जीता।

       शांति तिग्गा ने 13 लाख सुरक्षा बलों के बीच बंदूक हैंडल कर निशानेबाजी में सर्वोच्च स्थान अर्जित किया ।

खुले आसमान में अपने पंख फैलाकर उड़ने की इच्छा रखने वाली सरला ठकराल जी जीवन विषम परिस्थिति से घिरा हुआ था।

 

* सरला ठाकरे जी का जीवन परिचय *

 

8 अगस्त 1914को ब्रिटिश भारत में जन्मी साड़ी पहनकर हवाई जहाज उड़ाकर अपना परचम लहराने  वाली पहली महिला पायलट सरला ठकराल जी थी ।

      सरला ठकराल 16 वर्ष की थी तभी उनका विवाह पी डी शर्मा जी से हुआ उसके परिवार में पहले से 9 सदस्य पायलट थे फिर उनके पति के साथ से परिवार की जिम्मेदारी के बाद के बाद भी सरला जी अपने सपने पूरे कर पाई।

21 वर्ष की आयु में 4 वर्ष के बेटी की मां 1936 में सरला जी ने जिप्सी मोंठ को अकेले उड़ाया। कराची से लाहौर बीच और उसके बाद 1000 घंटे लगातार उड़ान भरकर लाइसेंस "अ" हासिल किए।

       इन्हें इस रूप में देखकर लोग दांतो तले उंगली दबाते थे कहते आदमियों के पेशे में ये औरत क्यों कोई इसे बेशर्मी कह रहा था ।शायद लोगो की नजर ही लग गई जो सरला जी को ये दिन देखना पड़ा।

          पायलट बनने से पहले ही सरला जी को अपने पति की मौत के सदमे से आहत होकर जोधपुर से लाहौर आना पड़ा।

     विपरित परिस्थिती में सरला जी मेयो स्कूल आफ आर्ट में दाखिला लेकर पेंटिंग के साथ आर्ट में डिप्लोमा लिया। 1947 में भारत पाकिस्तान विभाजन हुआ तो अपनी बेटीयों के साथ भारत आकर पी पी ठकराल से शादी करके जीवन की नई शुरुआत की। देश की होनहार महिला पायलट ने बखुबी व्यवसाय करते हुए 15 मार्च 2008 मे दुनिया को अलविदा कह दिया ।उसके संघर्ष और साहस की कहानी आज के नारी के लिए प्रेरणा है।

  84 साल पहले इतिहास रचने वाली सरला जी की जिंदगी में 1939 में दो कारणो से बदलाव आया।पहला कारण विमान क्रेश में पति की मौत और दूसरा कारण उसी साल द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ। इसके बाद ठकराल जी की जिन्दगी का रूख मुड़ना स्वाभाविक था।

  2008 में आखिरी सांस लेते हुए सरला जी ने अपने बारे में बताते हुए कहा-

     "जब मैं स्कूल में थी तब मेरा मोटो था

     हमेशा खुश रहना ,मनुष्य के तौर पर सब जानवरो से अलग हमें कुदरत का वरदान हंसी के रूप में मिला है इसलिए खुश और हंसते रहना बहुत जरूरी है ,मेरे जीवन में जो भी तकलीफ आये तो इस मोटो ने मुझे हौंसला दिया।

हिंदुस्तान की ये छोटी सी चिड़ीया।

आसमान में उड़ रही वो नन्ही चिड़ीया।।

अपने पंखों से उड़ान भर जाने वाली।

विपरीत परिस्थिती में हिम्मत रखने वाली।।

रंगो की दुनिया में अपनी पहचान बनाई।

खुद के दम पर अपनी किस्मत को चमकाई।।

 

भारतिय नारी को समाज की बंदिशों से अगर आजाद कर दिया जाये तो आसमान में अपना घर बना सकती है अपना वर्चस्व फैला सकती है सरला ठकराल जी के जीवन से यही पता चल रहा है ।

धन्यवाद| 

 

अनामिका संजय अग्रवाल

गुरुवार, 7 मार्च 2024

जौहर क्या है?

 लेखिका: डॉ पूजा भारद्वाज

जौहर  क्या है ,क्यों किया जाता था ,क्या वजह रही होगी इस दर्द को सहने करने की , क्यों एक इंसान मानव जीवन पा कर भी एक वहशी बन जाता है और उससे डर लगने लगता है ,जहां खूंखार जानवर भी शांत प्रतीत होता है वहीं इंसान इंसान से ही डरता है कुछ मलेच्छ जीत के बाद क्यों इतने वहशी बन जाते थे कि रानियों  को मरा हुआ देख गुस्से से पागल हो जाते थे और कई बार तो यह भी बताया गया है कि उस मृत शरीर के साथ भी क्रूरता की जाती थी।

कई बार मृत शरीर के अंगों को काट डाला जाता था। यह तब होता था जब महिलाएं तथा महारानियां अपने प्राण त्याग नही देती थी । सोचो जब वो जीवित पकड़ी जाती , तो उनके साथ कैसा सुलूक किया जाता होगा। ऐसे में महिलाओं ने अपने शरीर को समाप्त करने ,पंचतत्व में विलीन कर देने या  जौहर  करने के अलावा कुछ नही बचता था ।

जौहर भारत में की जाने वाली एक हिंदू राजपूत प्रथा थी|

जौहर पुराने समय में भारत में स्त्रियों द्वारा की जाने वाली क्रिया थी। जब युद्ध में हार निश्चित हो जाती थी, वीरगति प्राप्त करने निकल जाते थे तथा स्त्रियाँ जौहर कर लेती थीं अर्थात जौहर कुंड में आग लगाकर खुद भी उसमें कूद जाती थी।आखिर क्यों !

क्योंकि उनको रक्षा करनी थी अपने मान, सम्मान अपनी देहरी,अपने समाज की रक्षा।

कितनी दर्दनाक क्रिया होती थी,जब जलती हुई लपटे अपने शरीर पर पड़ती है  शरीर पर फफोलें पड़ना ,अपने आपको अग्नि में झुलसा देना पीड़ा का भी एहसास न होना ,पर वो अग्नि भी शीतल लगती थी ,जब अपना आत्मसम्मान दांव पर लगा हो , जौहर एक पवित्र अग्नि

इसको हम सामूहिक दाह संस्कार भी कह सकते हैं

पिता अपनी नाबालिग बच्ची के माथे को चूम कर ,एक पति अपनी पत्नी की आखरी बार मांग भर कर , नासमझ बच्चों को और मांओं को जौहर की अनुमति देते थे ,सही मायने में वो इतिहास रचते थे ,एक दर्दनाक इतिहास जिसे सालों साल भुलाया नहीं जा सकता था ,वो थी एक रणभूमि में भी हार कर जीत का इतिहास लिखना और राजपूतों की आन बान और शान की मर्यादा कायम रखने का इतिहास।

भारत का प्रथम जौहर सन १३०१ में रणथंभौर अलाउद्दीन खिलजी के ऐतिहासिक आक्रमण के दौरान हुआ था। जिस में हम्मीर देव चौहान के विश्वासघात के परिणामस्वरूप वीरगति को प्राप्त हुआ और उसकी पत्नी रंगदेवी ने जौहर किया। इसे राजस्थान के गौरवशाली इतिहास का प्रथम साका जौहर कहा जाता है

१३०३ में रानी पद्मावती ने जौहर किया,अपनी लाज और मेवाड़ के आत्मसम्मान की खातिर और उन्होंने अपनी विश्वास पात्र २०००० दासियों के साथ मिलकर ये जौहर किया था ,जो भारत का सबसे बड़ा जौहर था,ये जौहर तब हुआ जब दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश की हमलावर सेना का सामना करना पड़ा था और राजा राणा रतन सिंह जी को धोखे से मारा गया था

चित्तौड़गढ़ में जौहर मेला नामक वीरता का एक वार्षिक उत्सव होता है जहां स्थानीय लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं

आप सभी को  एक और वीरता का इतिहास सुनाना चाहूंगी,वो था वीरांगना हाडी रानी का ,बहुत से लोग इस इतिहास से अपरिचित होंगे ,आखिर हाड़ी रानी ने क्या किया था ,हांडी रानी हाड़ा चौहान की पुत्री थी उनका विवाह राजा रतन सिंह चूड़ावत के साथ हुआ था ,वह मेवाड़ के सलुम्बर के सरदार थे। विवाह को एक सप्ताह ही हुआ था अचानक मुगल गवर्नर  के विरुद्ध विद्रोह करने के लिये युद्ध का आह्वान किया, रतन सिंह जी सकुंचा रहे थे की हांडी रानी को कैसा लगेगा की शादी को एक सप्ताह हुआ और मुझे युद्ध में जाना पड़ रहा है ,जहां से मैं वापस आऊंगा या नहीं,सोचते हुए युद्ध के लिए चले गए,आधे रास्ते से ही उन्होंने अपने सैनिक को रानी के पास संदेश भेजा,रानी तुम मुझे याद रखना मैं वापस लौटकर आऊंगा, ऐसे ही एक,दो और तीन दिन बीत गए मगर इस बार रानी के नाम सरदार का पत्र था ,हाड़ी रानी पत्र को पढ़कर सोच में पड़ गयीं। युद्धरत राजा का मन यदि मेरी याद में ही रमा रहा उनके नेत्रों के सामने यदि मेरा ही मुखड़ा घूमता रहा तो वह शत्रुओं से कैसे लड़ेंगे। विजय श्री का वरण कैसे करेंगे?हांडी रानी के मन में एक विचार कौंधा। वह सैनिक से बोली वीर , मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशानी दे रही हूं। इसे ले जाकर उन्हें दे देना। थाल में सजाकर सुंदर वस्त्र से ढककर अपने वीर सेनापति के पास पहुंचा देना। किन्तु इसे कोई और न देखे। राजा  ही खोल कर देखें। साथ में मेरा यह पत्र भी दे देना। हाड़ी रानी के पत्र में लिखा था प्रिय। मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशानी भेज रही हूं। तुम्हारे मोह के सभी बंधनों को काट रही हूं। अब आप अपने कर्तव्य का पालन करें मैं तो चली... स्वर्ग में तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगी । पलक झपकते ही हाड़ी रानी ने अपने कमर से तलवार निकाल, एक झटके में अपने सिर को उड़ा दिया।

हाडी रानी के शब्द थे

                    "चुण्डावत मांगी सैनाणी,

                            सिर काट दे दियो क्षत्राणी"

 

मगर आज की नारी झुलसती नहीं,अपने तेज से जला देती है ,हाथ उठे जो उस पर, उस को मिट्टी में मिला देती है जिस का एक  साक्षात प्रमाण थी रानी लक्ष्मीबाई।

धन्यवाद| 

डॉ पूजा भारद्वाज

बुधवार, 6 मार्च 2024

अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस

 लेखिका: सरोजिनी चौधरी

 

किसी ने ठीक ही कहा है-

बिन नारी बनता नहीं एक सुखी परिवार

नारी का सम्मान कर नारी का अधिकार।

 

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस प्रतिवर्ष, 8 मार्च को विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान, प्रशंसा और प्रेम प्रकट करते हुए, महिलाओं के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों एवं कठिनाइयों की सापेक्षता के उपलक्ष्य में उत्सव के तौर पर मनाया जाता है। पूरे माह कार्यक्रम चलता रहता है। महिला माह महिलाओं द्वारा निभाई जाने वाली महत्वपूर्ण भूमिकाओं का जश्न मनाता है । अब समय आ गया है कि उनके परिवारों और समाज में उनके योगदान का सम्मान किया जाए और उसकी सराहना की जाए।

 

महिला माह मनाने का कारण

1.      लैंगिक समानता का समर्थन करें,

महिलाओं को अब कमजोर लिंग नहीं माना जाता। उन्हें समान अधिकार और अवसर दिए जाने चाहिए ताकि वे अपने जीवन को आकार देने की शक्ति प्राप्त कर सकें।

2.      अधिक महिलाओं को प्रेरित करें,

महिला माह महिलाओं को पहचानने और उनकी सराहना करने का एक अवसर है। इससे जागरूकता फैलाने में मदद मिल सकती है ।

3.      महिलाओं के लिए वित्तीय स्वतंत्रता के लिए 3 कदम- (i) पैसे बचाना, (ii) निवेश करना तथा (iii) पेशेवर सलाह लेना।

प्रतिवर्ष महिला दिवस का एक थीम निश्चित किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2024 अभियान का विषय 'इंस्पायर इंक्लूजन' है। जब हम दूसरों को महिलाओं के समावेशन को समझने और महत्व देने के लिए प्रेरित करते हैं, तो हम एक बेहतर दुनिया का निर्माण करते हैं। और जब महिलाओं को स्वयं शामिल होने के लिए प्रेरित किया जाता है, तो अपनेपन, प्रासंगिकता और सशक्तिकरण की भावना आती है। आइए सामूहिक रूप से महिलाओं के लिए एक अधिक समावेशी विश्व का निर्माण करें, IWD (International Women’s Day) 2024 के लिए शामिल हों|

एक सदी से अधिक के इतिहास और परिवर्तन के साथ, पहला अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (IWD) मार्च 1911 में आयोजित किया गया था। IWD किसी देश, समूह या संगठन के लिए विशिष्ट नहीं है। यह सामूहिक वैश्विक सक्रियता और उत्सव का दिन है जो महिलाओं की समानता के लिए प्रतिबद्ध सभी लोगों का है।

विश्व प्रसिद्ध नारीवादी, पत्रकार और कार्यकर्ता, ग्लोरिया स्टीनम ने कथित तौर पर एक बार समझाया था: "समानता के लिए महिलाओं के संघर्ष की कहानी किसी एक नारीवादी या किसी एक संगठन की नहीं बल्कि उन सभी के सामूहिक प्रयासों की है जो मानवाधिकारों की परवाह करते हैं।"

 

तो आइए हम सब मिलकर अच्छी लड़ाई लड़ने में मदद करें। सभी IWD गतिविधियाँ वैध हैं, यही बात IWD को इतना समावेशी बनाती है। इसमें शामिल हों और महिलाओं को समर्थन देने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए जो कुछ भी आप कर सकते हैं वह करके IWD को अपना दिन बनाएं।

संगठनात्मक या समूह आधार पर, यह सुनिश्चित करने के कई तरीके हैं कि महिलाओं और लड़कियों की जरूरतों, हितों और आकांक्षाओं को महत्व दिया जाए और उन्हें शामिल किया जाए। संगठन और समूह निम्नलिखित क्षेत्रों में कार्रवाई के माध्यम से समावेश को प्रेरित कर सकते हैं:

 

1.      महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना

2.      महिला प्रतिभाओं को भर्ती करना, बनाए रखना और विकसित करना ,

3.      नेतृत्व, निर्णय लेने, व्यवसाय और एसटीईएम में महिलाओं और लड़कियों का समर्थन करना

4.      महिलाओं और लड़कियों की जरूरतों को पूरा करने वाले बुनियादी ढांचे का डिजाइन और निर्माण,

5.      महिलाओं और लड़कियों को उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारीपूर्ण निर्णय लेने में मदद करना,

6.      टिकाऊ कृषि और खाद्य सुरक्षा में महिलाओं और लड़कियों को शामिल करना,

7.      महिलाओं और लड़कियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रशिक्षण तक पहुंच प्रदान करना

8.      खेल में महिलाओं और लड़कियों की भागीदारी और उपलब्धि को बढ़ाना,

9.      महिलाओं और लड़कियों की रचनात्मक और कलात्मक प्रतिभा को बढ़ावा देना,

10.  महिलाओं और लड़कियों की उन्नति का समर्थन करने वाले अन्य क्षेत्रों को संबोधित करना।

 

हर जगह हर कोई महिलाओं और लड़कियों के लिए सकारात्मक बदलाव लाने में मदद करने के लिए आईडब्ल्यूडी के सदियों पुराने इतिहास का लाभ उठा सकता है।

 

धन्यवाद| 

 

सरोजिनी चौधरी

ब्लॉग का अद्यतन पोस्ट :

कैसे लिखें, अच्छी कविता..? भाग 02

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