लेखक: प्राणेंद्र नाथ मिश्र
कविता लेखन पर एक धारावाहिक ब्लॉग जिसको कई भागो में प्रकाशित किया जाएगा| इसका श्रीगणेश "कविता क्या है?" से भाग 01 में किया जा रहा है| अनुक्रमणिका के हरेक अवयव का आगे आने वाले पोस्ट में विस्तार किया जाएगा| एक संग्रहनीय पोस्ट श्रृंखला, जो पाठको को कविता से जोड़ पाएगी| आप अपने सुझाव और प्रश्न, टिप्पणी के माध्यम से व्यक्त कर सकते है| लेखक उस पर अपने विचार जरूर देंगे|
ब्लॉग नियंत्रक: डॉ हिमांशु शेखर
अनुक्रमणिका :
1 कविता क्या है
2 कविता के घटक - संवेदना, शब्द, भाषा,
बिम्ब, प्रतीक, अलंकार, रस
3 कविता का स्वरूप
a बाह्य स्वरूप
aa छंद – मात्रा (meter), यति , गति, क्रम एवं तुकांत
b आंतरिक स्वरूप
bb भाव,
प्रयोजन, कल्पना शक्ति और उद्देश्य
काव्य का अंतर्वस्तु उसके बाह्य और आनतारिक स्वरूप से बनता है।
4 अंतःकरण की शक्ति –
रस,
अलंकार ,
शब्द शक्ति ,
अभिव्यंजना
5 शब्दों की ध्वन्यात्मकता – भाषा
6 छंद का ,महत्व
7 कविता के प्रकार- छंदमुक्त और
छंदयुक्त ,,, तुकांत अतुकांत
8 छंद के अंग :
छन्द के निम्नलिखित अंग है-
(1)चरण /पद /पाद
(2) वर्ण और मात्रा
(मात्रा कलन – ॐ नीरव )
(3) संख्या क्रम और गण
(4)लघु और गुरु
(5) गति
(6) यति /विराम
(7) तुक
9 छंदमुक्त कविता के गुण
10 ग़ज़ल एवं आजाद नज़्म
11 लुप्त मात्राएं एवं काव्य दोष
हम अक्सर यह सोचते हैं कि कविता क्या है,,,, कविता कैसे लिखें,,,, अच्छी कविता क्या होती है... आदि आदि। लेकिन अगर हम ध्यान दें तो पाएंगे
कि हम में से सभी प्रायः प्रायः कवि हैं। जब जन्म लेते हैं,
रोना शुरू करते हैं। इस रोने में एक लय होती है। शिशु जब भूख लगने पर रोता है, एक लय होती है, एक भावना होती है और उस भावना को
सुनकर, समझ कर माँ उसके लिए दूध ले आती है। बच्चों की खिलखिलाहट मे एक आनंद होता
है एक ताल एक लय होती है और एक आकर्षण होता है। हम उनके मन की बात समझ जाते हैं कि
वह क्यों हंस रहे हैं, खिलखिला रहे हैं या बच्चों को क्यों
क्रोध आ रहा है।
बच्चों की मनोवृत्ति हम समझ लेते हैं यद्यपि वे शब्द नहीं
बोलते,
सिर्फ ध्वनि और ध्वनि की शैली बदलते हैं। बच्चों के भाव हम समझ जाते हैं क्योंकि
वे उसी भाव को चित्रित करते हैं जो उनके मन मे होता है।
कैसे बनती है कविता/कविता कैसे लिखें:
मंद मंद हवा जब चलती है, पत्ते हिलते हैं,
देखने मे अच्छा लगता है, तितली के पंखों की गति देखना अच्छा
लगता है, नदी मे उठती तरंग देखना अच्छा लगता है, सागर की आती जाती हुई लहरें देखना अच्छा लगता है.... आप सोचिए की इन सभी
दृश्यों मे एक खासियत है और वह यह की हर एक की गति मे आवर्तन है वही गति बार बार
कई बार एक अंतराल के बाद होती है। यह आवर्तन हमे अच्छा लगता है आनंदित करता है। जब
हम टहलते हैं , चलते हैं हमारे हाथ पैर के साथ एक संतुलित
गति मे झूलते हुये चलते हैं.... असंतुलन मे हम नहीं चल पाते या दिक्कत होती है...
हमारा हृदय एक आवर्तित गति से धड़कता है। हर वह गति जो कुछ अंतराल मे पुनः होती है
आकर्षित करती है, चाहे वह सूर्य का निकलना हो या चाँदनी का
पूर्णिमा मे विस्तारित होना। ग्रहों का एक गति से चलना हो या धरती का एक गति से
घूमना।
दुनिया भर के सारे बच्चों की पहली सीख नर्सरी गानों से शुरू होती है। बच्चे हर गाने के साथ सिर हिलाते हैं पैर झुलाते हैं गाते हैं और आनंदित होते हैं। यह उनका भावनात्मक जुड़ाव या emotional attachment होता है। कविता उनकी संवेदनाओं को छूती है और वे कविता मे झूमने लगते हैं.... बच्चे हों या बड़े, जब कभी कोई रचना उनके मन को छू लेती है, वे आनंदित हो उठते हैं यही मन को छूने वाली, संवेदनाओं को छेड़ने वाली कला जो शब्दों मे लिखी जाती है या गयी जाती, कविता कहलाती है। कविता मन को झकझोर देती है, क्योंकि उसमे संवेदना है, राग तत्व है, और इसी संवेदना द्वारा सृष्टि के प्रत्येक अवयव को सोच लेने का बोध है।
आज का व्यक्ति संवेदनहीन होता जा रहा है। दिन भर की आपाधापी और तेजी से बढ़ते हुए भौतिक वातावरण मे, आज की ज़िदगी में कविता की जरूरत है। पहले से कहीं ज़्यादा है। लेकिन ज़िंदगी से कविता सुकून की तरह ग़ायब हो गई है। लोग कविताओं की तलाश कर रहे हैं। कविता लिखने का फार्मूला खोज रहे हैं। इसे कविताओं के प्रति आत्म समर्पण या प्रेम का प्रदर्शन भी कह सकते हैं। लोग अपनी संवेदनाओं को वापस पाना चाहते हैं। शायद इसीलिए कविता लिखने की होड लग गई है, कविताओं की हाट लगी है। हर कोई अपने को व्यक्त करना चाहता है। मानव बने रहना चाहता है, भावनाओं से जुड़े रहना चाहता है।
कविता किसी फॉर्मूले से नहीं लिखी जाती। लिखने का काम श्रमसाध्य है। मेहनत माँगता
है। धैर्य माँगता है। छोटी-छोटी बातों को भावनाओं की नज़र से देखने की दरकार होती
है। टूटी-फूटी भाषा में भी मन की बात रखने की जरूरत होती है। ज़िंदगी में यथार्थ
के बंधनों की कल्पना की ऊंची उड़ान से पार करने की जरूरत होती है। लेकिन इसके लिए
कुछ करना नहीं होता…लोग
तो कहते हैं कि दर्द जब हद से गुजर जाता है, दवा बन
जाता है। और जब मन की पीड़ा बेइंतहा हो जाती है, कविता बन कर उभरने लगती है।
जीवन में जब सवालों का तूफ़ान उठने लगता है। मोहब्बत की
भावनाएं उफान मारने लगती है। अंदर कुछ कहने की लालसा होती है तो शब्दों द्वारा भाव
को पूरा करने के लिए कविता का उतारने लगती है। कविताएं चुपचाप चली आती हैं। भाषा
और व्याकरण की दीवारों को तोड़ते हुए। कविताएं जीवन को अपनी मौजूदगी से तरंगित कर
जाती हैं। जीवन के समंदर में कविताओं के गिरने से उठने वाली लहरें जीवन को संवेदनाओं
के बड़े सूक्ष्म स्तर पर प्रभावित करती है। कविताएं जीवन का दर्पण बन जाती हैं, और
रचनाकार अपने मन को उसमे देखने लगता है। कविताएं लिखने की शुरूआत भले ही तुकंबदी
के फार्मूले से होती हो, लेकिन धीरे-धीरे छोटी-छोटी बातों को लयात्मक अंदाज़ में
गुनने-बुनने और साझा करने से भी कविताओं के बनने का सिलसिला शुरू होता है।
अब आइये हम अपने भाव देखें। हमारे मन मे जब कोई भाव उत्पन्न होता है और हम बोलते हैं तो वह दूसरा व्यक्ति समझ जाता है। इसका मतलब, हम अपनी भावना उस तक पहुंचा पाये। अब अगर हम अपने भावों को लिख कर किसी व्यक्ति को पढ़ने के लिए दें और वह उसी तरह समझे जो हम सोच रहे हैं तब भी हम अपने लेखन मे सफल हो जाते हैं।
यह लेखन गद्य या पद्य मे हो सकता है। अब इस लेखन के लिए आप को सबसे पहले शब्द की आवश्यकता होगी, फिर वह चित्र, शब्दों के माध्यम से बनाना पड़ेगा जिससे दूसरा व्यक्ति समझ जाये।आचार्य राम चन्द्र शुक्ल कहते हैं कि मानव संसार के झंझटों से हट कर समाज, संसार और ब्रह्मांड के भाव की अनुभूति कर के उसमे डूब जाता है तब वह अनुभूति मात्र रह जाता है , उसका मुक्तहृदय हो जाता है। आत्मा जब मुक्त दशा मे होती है, ज्ञान दशा मे चली जाती है उसी तरह हृदय जब मुक्त अवस्था मे होता है, रस अवस्था मे चला जाता है। हृदय की इसी मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती है, उसे कविता कहते हैं।
कविता हमारे मन मे बसी होती है, भावनाओं के रूप मे। जब हम अपनी भावनाओं से किसी के मन को छू लेते हैं, हम उसे प्रभावित करते हैं। इन्हीं भावनाओं को शब्दों मे पिरो कर दूसरों के पास पहुंचाना ही कविता है और यह आनंदमयी तब और हो जाती है जब यह छंदात्मक होती है।
अतः कविता लिखने के लिए कुछ मुख्य घटक आवश्यक हैं:
- 1. संवेदना, 2. शब्द, 3. भाषा, 4. बिम्ब, 5. प्रतीक, 6. अलंकार, 7. रस
लेकिन ये घटक कविता का आंतरिक रूप ही देते हैं बाह्य रूप नहीं। बाह्य रूप के लिए कविता का आकार, छंद, मात्रा,
यति, गति, लय, प्रयोजन और शब्द क्रम की आवश्यकता पड़ती है।
आइए, अगले भाग मे हम इनके बारे मे जानें।
धन्यवाद |
लेखक: प्राणेंद्र नाथ मिश्र

बहुत अच्छी जानकारी गुरु जी
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