रविवार, 28 अप्रैल 2024

होली , प्रकृति और आत्मा

लेखिका: डॉ.रश्मि चौबे

होली का दिन था ।सुबह से सभी बड़ों और छोटों को होली की बधाई देना लेना हो रहा था। आज रोशनी के घर उसकी कुछ सहेलियां आई हुई थीं होली मिलने रोशनी के पैर में चोट आने के कारण और उसके परिवार में  सूतक है(किसी की मृत्यु या जन्म होने पर 10या13दिन लगता है)।कल होली खेलने सोसाइटी में नहीं गई इसलिए वहां की सारी सखियां  मिलने चली आई थीं। रंगों में मिले केमिकल के कारण या खाने की वजह और गीले होने के कारण किसी को बुखार,तो किसी की आँख में रंग चला गया, चाय पीते हंसी ठहाकों के साथ सभी जिंदगी के रंगों और रूपों पर चर्चा कर रहे थे ।सभी कह रही थीं पिछली बार की होली कितनी अच्छी थी रोशनी सचमुच बहुत अच्छी व्यवस्था थी और हमने बहुत इंजॉय किया था । रोशनी अचानक उनके जाने के बाद एकांत में बैठी तो जैसे कलम ने कहा कि, विचारों के रंगों को पन्नों पर उडेल दो, होली है भाई। रोशनी पिछली होली की और इस बार की होली की तुलना करने लगी ।पिछले वर्ष अपने कर्तव्यों को निभाते हुए सोसायटी के लोग अच्छे से होली का आनंद उठा पाऐं इस व्यवस्था के कार्यभार को सुचारू रूप से निभाने में लगी हुई उसने  समाज में व्याप्त अनेक रंगों में स्त्री पुरुषों की मानसिकता समझी ।कुछ लोग सहयोग दे रहे थे उसके साथ तो, कुछ उसकी बनी बनाई बात को बिगाड़ने में लगे हुए थे ।सच ,आज समाज में एक के साथ एक ग्यारह नहीं बल्कि एक से घटकर शून्य करने की मानसिकता अधिक प्रबल है। स्वयं के नाम के लिए इंसान अच्छे से अच्छे कार्यक्रम में जहर फैलाने में माहिर दिखाई देते हैं । तभी उसे याद आया कि ,कुछ दिन पहले ही ज्यादातर युवा जो उससे मिले थे, उसके पूछते ही कि आप क्या कर रहे हैं? उत्तर में कहा कि, मनोविज्ञान में एम.ए. कर रहे हैं ,इसका बहुत स्कोप है आंटी।इन शब्दों का अर्थ शायद समझ आज आ रहा था । इस बार की होली में पैरों में चोट के कारण वह होली खेलने के लिए तो जा नहीं पाई।रोशनी ने सोचा बचपन से ही उसे होली कहां पसंद थी पर शादी के  बाद होली खेल लेती थी पर आज विचार उसे कुछ और ही समझना चाहते थे।

 उसे अचानक में घर में अलग-अलग तरह के रंग दिखाई देने लगे सर्वप्रथम उसे खाने की टेबल पर रखे हुए  हरेअंगूर और केसरिया संतरे, लाल सेब और पीला पपीता फलों में अलग-अलग रंग टेबल पर दिखाई देने लगे फिर जैसे ही वह भोजन की व्यवस्था देखने गई तो उसे दिखा कि, हरे रंग की मूंग दाल ,काले रंग की उड़द दाल, लाल रंग की मसूर और पीला चना और सब्जियां भी अलग-अलग रंग की रंगों से भरी हुई फ्रिज खुला तो लाल टमाटर, हरी मिर्च, बैगनी रंग का बैगन ,पीले रंग का नींबू अलग-अलग रंग दिखाई दे रहे थे।सतरंगों से सजा हुआ घर फिर जैसे ही वह बालकनी में गई तो प्रकृति कह उठी देखा, तुमने पौधों में पानी देकर मुझे पीले गेंदे ,नीली अपराजिता ,लाल रुकमणी के फूल ,सफेद सदाबहार और हरे पौधे से सतरंग कर दिया है तुमने मुझे रंग दिऐ हैं इसलिए आज मैंने  तुम्हारे घर को रंगों से भर दिया है । उसकी नजर हाथ में पहने नवरत्न और रंगे हुए नाखूनों पर भी पडी रंग ही रंग दिखाई देने लगे ।शाम हुई तो सामने चाँदनी की रोशनी के रंग दिखाई दिए।उसे याद आया सुबह सूरज भी होली खेलने आया था फिर ,सामने की भी चारों ओर जो कारें सड़क पर चल रही थीं उनकी लाइटें थीं। उसके प्रकाश ने उसका ध्यान आकर्षित किया, लाल रंग की और सफेद रंग की कार की लाइट दिख रही थी वो सब प्रकृति में रोशनी भरते हुए लग रहे  थे और कहीं ना कहीं रोशनी आत्मा को भी प्रकाशित कर रही थी।

 अचानक गुड़िया ने कहा आंटी आपकी चाय और अंकल की कॉफी दोनों एक ही टेबल पर  रख दिए हैं और साथ ही साथ मोबाइल पर ग़ज़ल गूंज रही थी और  पति साथ-साथ गा रहे थे ‘आप जिनके करीब होते हैं ,वह बड़े खुशनसीब होते हैं ।समझ में आ गया था ईश्वर ने समझा दिया था कि, होली तन को नहीं मन को भी रंगती है।रोशनी को महसूस हो रहा था कि , परमात्मा के रंगों ने चारों ओर से रंग दिया है । बेटे ने भी वीडियो काल पर इंद्रधनुष (रेनवो) दिखाकर कहा माँ विदेश में होली नहीं होती पर ये रंग आपके लिए हैं। रोशनी भाव विभोर हुई।दूसरे दिन सुबह-सुबह रोशनी की भाभी (जोदिल्ली वीजा बनवाने आई थी रोशनी के घर ठहरी थी)ने उठकर कहा कि,दीदी मैं आपके मंदिर में पूजा कर देती हूं। रोशनी के कहा ,कहा सब रंगों के फूल तोड़कर प्रभु को अर्पित कर दो और फिर वो गाने लगी ‘आप जिनके करीब होते हैं, वह बड़े खुशनसीब होते हैं ‘पंकज उदास कलाकार तो चले गए पर उनके गाए शब्द बहुत कुछ समझा गए।

जिस दिन मैंने ये लेख लिखा मेरे पतिदेव ने एयरपोर्ट से फूलों की पिचकारी का फोटो भेजा जैसे मेरे लेख पर मोहर लग गयी।

धन्यवाद।

डॉ.रश्मि चौबे , गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत

गुरुवार, 25 अप्रैल 2024

वनवासा रिसार्ट

लेखिका: डॉ पूजा भारद्वाज


दोस्तों  तो हम और हमारी धन्नो  (टोयोटा इनोवा क्रिस्टा)  निकल चुके है ,एक नई मंजिल की ओर जहां मिलेंगी  कुछ मन लुभाने वाली यादें और नए चेहरे मुस्कान लिए हुए 

अरे अरे ये बताना तो भूल ही  गई कि हम जा कहां रहे हैं, हम जा रहे हैं देवभूमि उत्तराखण्ड के ऋषि कन्न्व की नगरी कोटद्वार के पास  "वनवासा " जो एक बहुत खूब सूरत रिजॉर्ट जो स्थित है  कोटद्वार से कुछ किलोमीटर दूर काला गढ़ टाइगर रिजर्व में, तो देरी किस बात की शुरुवात करते है अपने सफर की...

28/3/2024 को हम  सुबह ६ बजे  बजे निकल पड़े , मेरठ होते हुए  करीब 8:30 से हम चीतल ग्रैंड होटल पहुंच गए,पर किसी को भूख नही लग रही थी,तो हमने सिर्फ प्रसाधन इस्तेमाल किया और आगे निकल गए , खतौली चीनी मिल हमारे रास्ते में पड़ी और जगह जगह पर गुड बनाने वाले कोल्हू चल रहे थे , हम 90s के गीत सुनते और गुनगुनाते हुए जा रहे थे ,अब करीब 10:00 बजे  बिजनौर से आगे भूख लगने लगी उसके बाद हमें अच्छा ढाबा या कोई  रेस्ट ओ रेंट नहीं मिला , खाना खाना करते हुए हम पहुंचे कीरतपुर वहां मिला हमको एक पंजाबी ढाबा और बस आलू प्याज के स्वादिष्ट परांठा और छाछ मीठी लस्सी अब पेट भरा और जान में जान आई।

11:30 बजे हम कणव नगरी कोटद्वार पहुंच गए ,कोटद्वार में हनुमान जी का प्रसिद्ध मंदिर भी है , सिद्धबली मंदिर जिसकी मान्यता है की यहां जो कोई अपना बोला हुआ प्रसाद भूल जाता है तो यहां आ कर प्रसाद बांटने से सब काम सिद्ध हो जाते है ,जय बजरंग बली


कोटद्वार से शुरू होती है पहाड़ों की चढ़ाई , क्योंकि वहां से 70 किलोमीटर दूर था   वनवासा रिजॉर्ट और यहां पहुंचने का रास्ते काला गढ़ टाइगर रिजर्व से हो कर गुजरता है,आगे चले तो कुछ छोटे छोटे गांव मिले और फिर शुरू होता है "कालागढ़ टाइगर रिजर्व " जिस के बीच में से होते हुए अपनी मंजिल तक पहुंचना था,रास्ते में जंगल के बीच हमने यादें संजोने के लिए कुछ तस्वीरें ली।


और करीब 2:20 पर हम रिजॉर्ट  पहुंचने वाले ही थे कि देखा  वहां भू स्खलन होने की वजह से एक विशाल पत्थर सड़क के बीच में पड़ा है और उसको हटाने के लिए विस्फोट की तयारी हो रखी है , वहा एक आदमी खड़ा था  वो पास आया और बोला की आप अपनी गाड़ी पीछे ले जाओ ,यहां ब्लास्ट किया जा रहा है ,पहले तो लगा आना बेकार हो गया पर उसने कहा ब्लास्ट के बाद आप जा सकते हो ,अब गाड़ी यू टर्न तो हो नहीं सकता था तो सब ने गाड़ी रिवर्स लेली ,और कुछ ही सेकंड में इतनी जोरदार धमाका हुआ की सब डर गए , फिर रास्ता साफ हुआ और हम सभी  पहुंच गए अंततः अपने वनवासा रिजॉर्ट 😀 आ कर स्वागत पेय से स्वागत हुआ और कमरे दिए गए सामान रखा और लंच का समय हो चुका था ,लंच किया और आराम किया क्योंकि 7 घंटे गाड़ी में थकान तो होती है, बच्चे स्विमिंग पूल में चले गए ,7 बजे से मैजिक शो देखा,फिर लाइव म्यूजिक एंड डिनर ,डिनर के बाद सब ने मिलकर कुछ खेल खेले और एक दिन इस तरह एक समाप्त हुआ। वनवासा रिजॉर्ट  का रोजाना का एक रात्रि का चार्ज ७ से ८ हजार रुपए है जो के एक कपल के लिए है, जिसमें,ब्रेक फास्ट डिनर,लंच तीनों मिलते है जब कभी सुकून और शांति की तलाश हो तो एक बार जरूर आए अपने दोस्त और परिवार के साथ 

दूसरे दिन  हम सब लंच के लिए करीब 9: 45 पर पहुंचे ,लंच किया वहा कई और लोग आए हुए थे ,तो जैसा मेरा व्यवहार है मैं उन लोगों से बात करने चली गई ,जहां मेरी मुलाकात एक पहाड़ी परिवार से हुई , वैसे तो वह लोग दिल्ली में रहते है , मेरी बात हुई कुसुम नेगी जी से बात हुई ,उन्होंने बातों बातों में बताया हम यहां अपने गांव जागर करने आए थे ,जागर के बाद हमने सोचा थोड़ा आराम कर लिया जाए तो रिजोर्ट आ गए ,

मैंने कहा :जागर ये क्या होता है पहली बार नाम सुना ,

कुसुम जी ने बताया कि जागर मतलब जागरण हमारे यहां  पूरे कुनबे के साथ मिलकर ये पूजा की जाती है ,कोई कहीं भी रह रहा हो पर उसे जागर के लिए आना पड़ता है

इसमें ग्राम देवताओं की पूजा की जाती है ,जिसमें हम अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए और कुछ गलती हुई हो उसके लिए माफी मांगते है और पूजा करते है,मुझे वैसे भी ऐसी बातें जानने का शौक है मैं उनकी बातें बड़ी गौर से सुन रही थी ,

कुसुम जी ने मुझे एक बात और बताई की एक परिवार पूरी तरह संपन्न था ,अचानक उनके घर बीमारी बढ़ने लगी ,तो वह अपने गांव आए और खोज ने लगे की हम से क्या गलती हुई है या क्या भूल रहे है हम जिस की वजह से ये सब हो रहा है कई महीने बीत गए,एक दिन अचानक एक १० साल की लड़की सामने आई और बोली की तुम इतने साल मुझे ही ढूंढ रहे हो ,मैं तुम्हारी दादी हूं , मैं भी सरप्राइज़ थी ये क्या है, क्योंकि आज कलयुग में कोई इन बातों को नहीं मानता पर फिर भी अपनी मान्यता है ,मैंने पूंछा फिर क्या हुआ कुसुम जी हंस गई ,मैंने कहा प्लीज़ बताओ मैं कल चली जाऊंगी ,फिर कहा आप से मुलाकात होगी ,तो उन्होंने बताया की वह लड़की इतना बोलते ही भाग गई उन्होंने उसका पीछा किया ,तो लड़की बदली बदली नज़र आई ,जब जाने लगे तो फिर बोली की तुम्हारे दादा जी ने दूसरी औरत  की वजह से  मुझे घर से निकल दिया था और मेरा हक तुम लोग निभा रहे हो अब तुम सब  अपने पूरे खानदान को लेकर आओ जागर करो तब शांत सब ठीक होगा फिर उन्होंने अपने सात पीढ़ी के लोगों को जागर के लिए सूचना दी सब गांव में एकत्र हुए और पूजा अर्चना की।

बस मस्ती ,बहुत सारी फोटो क्लिक की,वहां रिजॉर्ट से थोडी सी दूरी पर एक दुकान थी मैं वहां चली गई  और उनसे बात की पहाड़ों पर रहन सहन की ओर दिन में  स्विमिंग पूल का ओर शाम  को लाइव म्यूजिक और डीजे  पर नृत्य का आनंद लिया और खूब नृत्य किया।अगले दिन ब्रेकफास्ट कर के निकल ही रहे थे की बहुत तेज तूफ़ान और खूब तेज बारिश हो गई और थोड़ी ठंड बढ़ गई थी ,जिसे कहते है गर्मी में ठंड का एहसास 😂 फिर हम निकले घर के लिए और कुछ 30 किलोमीटर जा कर हमें रास्ते में बंदरों का झुंड दिखा और दिखा बारहसिंगा  क्योंकि वो रास्ता जंगल का होता है कालागढ़ टाइगर रिजर्व का मगर टाइगर नही दिखा। और हम एक सुखद अनुभव लेकर अपने घर आ गए , क्योंकि जितना सुकून और शांति अपने घर में है कही  नही।

ये थी मेरे सफ़र की कुछ यादें जो हमेशा मेरे साथ रहेंगी ,आप भी पढ़े और कैसा लगा जरूर बताएं।

धन्यवाद।

डॉ पूजा भारद्वाज

सोमवार, 22 अप्रैल 2024

संत कबीरदास

 लेखिका: डॉ.रश्मि चौबे

संत कबीरदास ऐसे व्यक्तित्व के धनी हैं , जो इतिहासकार वर्कले के इस कथन की सत्यता के प्रमाण हैं कि,” युग की महान विभूतियां काल प्रसूत होती हैं ,जिसमें जनजीवन की आत्मा को जीवित रखने के लिए विरोधी शक्तियों से खुलकर संघर्ष किया, जिसका व्यक्तित्व स्वयं ही जलती मशाल था। जिसकी चमक से युग धर्म और विरोधी शक्तियां सिहर उठीं इतना ही नहीं यह कभी रहस्यवाद का अमर गायक तथा ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया ‘जैसे पदों में मानव शरीर रचना की हड्डियों की व्याख्या करता है। जो राम को अपना प्रियतम और स्वयं को उसकी बहुरिया मानता है। एक प्रियतमा के रूप में वे अपने प्रियतम पर मुग्ध हैं। उसके विरह में व्याकुल है । उनमें अनुभूति की तीव्रता और वेदना की पुकार है । इसी वियोग में अपनी सृष्टि को रंगा देखते हैं ।

सचमुच कबीर वे कवि हैं, जिनकी पताका को धर्म लोक में फहराती देखकर पीपा और रयदास विस्मय से पुकार उठे नाव नवखंड पर सिद्ध कबीरा अनेकता को मिथ्या सिद्ध करके एकता का प्रतिपादन करने वाले सारगृही महात्मा थे। उनका लक्ष्य हृदयलोक से निकलकर ज्ञानलोक ले जाना है । भावनाओं को आधार बना वे ज्ञानशिखर पर आरोहण करते हैं ।

उनके पास क्रांति दृष्टि होने के साथ ही अनंतर दृष्टि भी उपलब्ध थी। जो उस युग की विषम परिस्थितियों को भेदकर मनुष्य की पीड़ा को पहचान ही नहीं सकती थी वरना, अभिव्यक्ति भी दे सकती थी। उग्रता के साथ उनकी साधना में मस्ती है और अभिव्यक्ति में अर्थ भेदी पारदर्शिता। उनकी अखंडता और लापरवाही में उनकी सच्ची साधुता और चिंतन शीलता प्रतिबिंबित है।

कबीर जी की भाषा तो सधुक्कडी भाषा थी और उनकी भाषा में ब्रज, पंजाबी, अरबी, फारसी , राजस्थानी , तुर्की सभी के शब्द मिलते थे और वे कहते थे कि संस्कृत है कूप जल, भाषा बहता नीर। ज्यादातर संतों का सारा साहित्य मुक्तक है। दोहा शब्द रमैनी आदि में इनकी कविता आम जनता की आत्मा को झकझोर देती थी। ठेठ बोली में बिना लपेट के अपनी अनुभूति को वे इस तत्परता से रख देते थे कि, उनकी उक्तियों, रूपकों, मुहावरों में कवित्व निखर उठता है।

‘मसि कागद छुओ’ वाले कवि ‘केवल ढाई आखर प्रेम का’ पढ़े थे। कबीर की अभिव्यक्ति सिद्ध करती है कि , कबीर ज्ञान भक्ति एवं प्रेम के अगाध भंडार हैं। उनके काव्य में न शब्दों की जटिलता है न , अलंकारों का धटाटोप और न छन्दों की उछल कूद । सब कुछ स्वभाविक मानव उलट वासियों में जीवन के सत्य की यथार्थ सीधी सुरीली मधुर वंशी बज रही है । ये उलट बासियां सुलटकर जीवन का राग सुना रही हैं।

डॉ रामकुमार वर्मा के शब्दों में_” उनकी युगांतकारी कविता भक्ति की विनय शीलता और आत्मरक्षा के बीच में स्पष्ट कंठ से कही गई धार्मिक और सामाजिक जीवन की पक्षपात रहित विवेचना है।”

यह एवेलिन अंडर विल के शब्दों में-“कबीर आत्मा विस्मयकारी और परम उल्लास में साक्षात्कार के समय दैनन्दिन व्यवहार की दुनिया छोड़ नहीं जाते और साधारण मानव जीवन को भुला नहीं देते उनके पैर मजबूती के साथ धरती पर जमे रहते हैं उनके महिमासमन्वित और आवेगमय विचार दीन और सजीव बुद्धि तथा सहज भाव द्वारा नियंत्रित होते रहते हैं जो सच्चे मार्ग मर्मी कवियों में ही मिलते हैं।”

कबीर जी पेसे से बुनकर थे पर यह समाज के लिए 600 साल पहले ऐसी बातें बुनकर चले गए कि उनके बगैर भारत की कहानी अधूरी है। कहते हैं -कबीर हर इंसान के अंदर हैं जरूरत है उन्हें ढूंढने की । कबीर ना हिंदू हैं ना मुस्लिम हैं, ना अमीर हैं ना गरीब हैं, कुछ लोग तो इन्हें भगवान का अवतार मानते हैं और कहते हैं ‘सब पीरन के पीर’ कुछ निर्गुण संत, कुछ लोग सतगुरु, तो कुछ कवि, तो कुछ राम के भक्त कुछ लोग फकीर कहते हैं । कबीर दास जी बनारस के थे । काशी के पास लहरतारा तालाब है । जहां कबीर की मूर्ति है । जो कमल के फूल पर है। कहते हैं, विधवा ब्राह्मणी की कोख से पैदा हुए और वो उनको छोड़कर चली गयी ।कबीर जी लहरतारा तालाब में कमल पुष्प पर बाल स्वरूप में नीरू और नीमा को प्राप्त हुए थे । ऐसा कहना है। परंतु यहां कोई ऐतिहासिक तथ्य की व्यंजना प्रस्तुत नहीं हुई । वे मुस्लिम थे या हिंदू थे या तुर्क थे इससे कबीर दास जी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

ज्ञानामार्गी शाखा के कवि जैसे कि, कबीर दास जी मलूक दास जी सूरदास जी नानक देव जी इन की विचार धारा क्रांतिकारी विचारधारा के रूप में विख्यात है। यह किसी निश्चित दार्शनिक मत का प्रतिपादन नहीं करते। उनकी जो रचना है वह लोक भाषा और लोग जगत के घटनाओं पर आधारित है और यह कहते हैं कि- तू कहता कागज की लेखी ,मैं कहता आंखन की देखी।संत काव्य धारा में गुरु को ईश्वर से भी ऊपर रखा है -गुरु गोविंद दोऊ खड़े ,काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो बताए।।कबीर जी के गुरु रामानंद जी थे। जिन्होंने पहले तो इन्हें शिष्य बनाने से मना कर दिया लेकिन बाद में इनसे प्रभावित हुए और शिष्य बनाया। कबीर दास जी का कहना है कि, अनुभव ही सबसे बड़ा गुरु है। अक्षर ज्ञान प्राप्त नहीं किया था परंतु जब भी वे सत्संग करते थे तब समाज के निचले दवे लोगों की भीड़ होती थी। सत्संग बहुत ही सुंदर होता था। कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लकुटिया हाथ। जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ।।

कबीर दास जी के समय समाज में बहुत उथल-पुथल मची थी। भीष्म साहनी ने ‘कबीरा खड़ा बाजार में’ में तब के हालात का वर्णन किया है। कवि ने जो समाज में देखा उस में तरह-तरह की विशेषताएं थी। उस समय इंसान को बड़े या छोटे होने का मापदंड भाग्य तय करता था। कौन किस कुल में जन्मा है ,वही बहुत कुछ तय करता था । कवि ने कहा -जात पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि को होई।

कबीर दास जी आडंबर विरोधी थे। इन्होंने समाज में फैली अनेक प्रकार की बुराइयों का विरोध किया उन्होंने जाति प्रथा वर्ग भेद और मूर्ति पूजा, नामाज ,व्रत ,रोजा, बांग लगाना ,तीर्थयात्रा, तिलक और माला सभी का विरोध किया। उनके लिए यह सब आडंबर है। उनके अनुसार ईश्वर कण-कण में व्याप्त है।और कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा-

कांकर पाथर जोड़ कर ,मस्जिद लई बनाय। 

ता चढ मुल्ला बांग दे क्या, बहरा हुआ खुदाय।


कबीर ने ब्राह्मण को नहाते हुए देखकर कहा- 

नहाए धोए का भया जो मन मैल ना जाए, 

मीन सदा जल में रहे धोए बास ना जाए।


और माला फेरने के लिए उनके विचार थे-

माला फेरत युग गया, गया न मन का फेर ।

मन का मनका डार के, मन का मनका फेर।।


उन्होंने जीव हत्या को पाप कहा और कहा कि-

दिन भर रोजा रखत है, रात हनत हैं गाय। 

यह तो खून वो बंदगी, कैसी खुशी खुदाय।।


सन्यासियों पर व्यंग करते हुए कहते हैं-

नारी मुई धन-संपत्ति नासी, मूड मुड़ाए भीए सन्यासी।।


हठ योग साधना का विरोध किया और कहा कि- ईश्वर को सरलता से प्राप्त किया जा सकता है।

भारत जिन तत्वों से मिलकर बना है। उसमें से एक तत्व है कबीर मतलब जो दिया है । वह मान्य नहीं है। इसलिए वे कहते हैं कि- ‘दुई जगदीश कहां से आए ‘ईश्वर एक है कबीर जी की पंडित और मौलवियों से लगातार टक्कर रहती थी और वह निर्भय होकर निर्गुण की उपासना करते थे । इसीलिए वह कहते थे कि’ मोको कहां ढूंढे बंदे मैं तो तेरे पास में…. इन सांसो की सांस में ‘आध्यात्मिक क्रांति और दोनों में जनतांत्रिकरण है। हर व्यक्ति को ईश्वर तक पहुंचने का अधिकार है। ऐसा भी मानते थे। कबीरदास जी कहते हैं कि ,जात पात पूछा नहीं कोई ,हरि को भजे सो हरि को होई।।

कबीर जी सिकंदर लोदी के समय के थे और कहा जाता है कि इनकी शिकायत कर दी गई थी । लोधी जी से तब उसने 52 परीक्षा के लिए सैनिकों और पीरों को आदेश दिया था ।उसके लिए और इनको दरबार में बुलाया गया । इनको सुबह बुलाया था यह शाम को पहुंचे और उन्होंने कहा वहां जाकर कि ‘कबीर सोई पीर है जो जाने पर पीर और कहते हैं कि लोधी जी इन से प्रभावित हुए और इनको छोड़ दिया।

कविता बौद्धिक अभिव्यक्ति का माध्यम है ।विचारों के प्रवाह का जरिया रही है ।जो समाज का दर्पण है ।प्राचीन भारत में कविता राजनीतिक इतिहास और समाज सब के विचार लिए हुए होती थी। कबीर की भक्ति आंदोलन के मशहूर कवि हैं और इनको समाज सुधारक के रूप में मैं देखती हूं । सर्वप्रथम जो दवे कुचले लोगों की आवाज लेकर खड़े हुए, व्यक्ति के रूप में हैं। निडर और निर्भीक। उनकी रचना साकी,शब्द,रमैनी के माध्यम से कबीर आज भी हमारे बीच जिन्दा हैं। यहीं अपनी लेखनी को विराम देती हूं।

धन्यवाद।

डॉ.रश्मि चौबे

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2024

पुराना पेड़ फल नहीं छांव ठंडी देता है

 लेखिका: रेखा चौहान 'राज'

     एक रात की बात है ठंड बहुत ज्यादा थी एक बुजुर्ग महिला जिसका नाम बुगली था गांव के एक घर के  सामने आकर चारपाई बिछाकर आराम कर रही थी उस घर की महिला की नजर उस पर पड़ी वहीं पर उस महिला सुखबीरी देवी का घर था तो उसने देखा कि वह बुजुर्ग महिला चारपाई पर लेटी थी।

   😲ठंड बहुत ज्यादा थी महिला घर से बाहर आई उसने देखा कि इस कंपकंपाती ठंड में महिला सिकुड़ते हुए सोने की कोशिश कर रही है फिर उसने उस बुजुर्ग महिला से पूछा कि आप यहां क्यों लेटी हैं बुजुर्ग महिला ने भावुक होते हुए अपनी कहानी बताईं और कहा कि उसके पास बच्चे नहीं है और परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से मकान बिक चुका है कोई कमाने वाला भी नहीं है।

   इसलिए मैं यहां बुग्गी ( भैंसा बुग्गी)  ने नीचे लेट कर ठंड से बचने की कोशिश कर रही हूं महिला को उस बुजुर्ग महिला की बातों पर बड़ा ही आश्चर्य हुआ और उसने बड़े  नर्म स्वभाव के साथ अपने घर के अंदर आने के लिए कहा। फिर धीरे-धीरे करके वह बुजुर्ग महिला परिवार के सभी सदस्य के साथ घुल मिल गई और घर के बच्चों के प्रति उसका स्नेह और बच्चों का प्यार उसके प्रति बेहद मार्मिक रहा बच्चों में वह बुजुर्ग महिला अपनी सारी परेशानियां भूल गई कई सालों तक वह महिला उसी परिवार के साथ रही। 

 बच्चों को नित नई कहानियां सुनाती जीवन के प्रति संघर्ष और हौसलों के साथ आगे बढ़ाने की प्रेरणा देती, घर की लड़कियों को  संस्कार और सभ्यता के बातें बताती, जीवन में आगे बढ़ाने के  विवाह से पहले और विवाह के बाद कैसे दोनों परिवारों को जोड़ कर रखना है ऐसी बहुत सी बातें वह घर के बच्चों के साथ अन्य लोगों को भी अपने जीवन के अनुभव सुना कर जीवन के प्रति प्रेरित करती।

सच कहूं तो उन लड़कियों में से एक लड़की मैं भी थी मैं अपनी सारे कजिन भाई बहनों के साथ स्कूल कॉलेज से बाद में उस महिला के साथ खाने से लेकर हर चीज पर बातचीत करते। कभी-कभी जब उस महिला की आज भी याद आती है तो लगता है कि काश इस समय भी कोई ऐसी महिला मेरे घर में होती और मेरे बच्चों को आने वाले जीवन के प्रति कहानियां सुनाती।

तो शायद एक बार फिर संस्कृति जी उठतीं।

  दे किसी का साथ पुण्य कमाएं

  अपने लिए न सही बच्चों के लिए थोड़ा नेक कर्म कर जाएं

  अंतिम समय में भी वह महिला उसी परिवार के साथ थी जब उसका देहांत हुआ तो उसके परिवार के कुछ लोगों को बुलाकर उसका अंतिम संस्कार किया गया । इस तरह बुजुर्ग महिला का दर्द समझते हुए पूरे परिवार ने उसका साथ दिया।

    उस परिवार के बच्चे तो आज भी उस बुजुर्ग महिला की बातों को याद रखते हुए उसके द्वारा दिया ज्ञान जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा मान कर चलते हैं बुजुर्ग अपने हो या पराए हमेशा ज्ञान ही मिलता है।☺️

संस्कृति को संजोए रखना

बुजुर्गो को घर में बनाएं रखना।

पुराना पेड़ फल न सही छांव ठंडी देता है

इस सभ्यता आर्यावर्त की बनाएं रखना।


(मेरी मां और एक बुजुर्ग महिला का साथ जो की बरसों तक चला)

धन्यवाद।

रेखा चौहान 'राज'

बुधवार, 17 अप्रैल 2024

राम नवमी : भगवान राम का जन्मदिन

 

लेखक: डॉ हिमांशु शेखर

जय श्री राम

प्रस्तावना

भगवान श्री राम का जन्म दिन धूमधाम से रामनवमी के दिन पूरे विश्व में मनाया जाता है| रामकथा में भगवान राम को बारह कलाओं से युक्त विष्णु का सातवां अवतार माना जाता है| यह कथा इतने रूपों में धरा पर उपस्थित है कि प्रामाणिकता पर हमेशा सवाल उठते है| पर प्रमाणिकता पर सवाल उठाने से ज्यादा सही ये लगता है कि इस कथा में राम के अवतरण और महात्मय को खोज कर भक्ति का मार्ग स्थापित किया जाए|एक और विसंगति है - जन्मदिन को जयंती कहते है - हनुमान जयंती, सीता जयंती,  महावीर जयंती, गुरू नानक जयंती, गीता जयंती....। तो भगवान श्रीराम के जन्मदिन को राम नवमी की जगह राम जयंती कहना चाहिए। 


आधुनिक गणन के परिणाम

भगवान राम का जन्म 10 जनवरी, 5114 ईसापूर्व को सुबह 12 बजकर पांच मिनट पर हुआ था। यह जानकारी 'यूनीक एग्ज़िबिशन ऑन कल्चरल कॉन्टिन्यूटी फ़्रॉम ऋग्वेद टू रोबॉटिक्स' नाम की एक रिपोर्ट में दी गई है। डॉ॰ वर्तक ने अपने ग्रंथ 'वास्तव रामायण' में ग्रहगतियों के आधार पर गणित करके राम की जन्म-तिथि 4 दिसंबर, 7323 ईसापूर्व बताई है। उनके मुताबिक, इसी दिन दिन में 1:30 से 3:00 बजे के बीच राम का जन्म हुआ होगा। 

इसपर एक पुनरावलोकन किया जा सकता है। वाल्मीकि के अनुसार श्रीराम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी तिथि एवं पुनर्वसु नक्षत्र में जब पांच ग्रह अपने उच्च स्थान में थे तब हुआ था। इस प्रकार सूर्य मेष में 10 डिग्री, मंगल मकर में 28 डिग्री, बृहस्पति कर्क में 5 डिग्री पर, शुक्र मीन में 27 डिग्री पर एवं शनि तुला राशि में 20 डिग्री पर था। (बाल कांड 18/श्लोक 8, 9)।

शोधकर्ता डॉ. पीवी वर्तक के अनुसार ऐसी स्थिति 7323 ईसा पूर्व दिसंबर में ही निर्मित हुई थी, लेकिन प्रोफेसर तोबयस के अनुसार जन्म के ग्रहों के विन्यास के आधार पर 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व हुआ था। उनके अनुसार ऐसी आका‍शीय स्थिति तब भी बनी थी। तब 12 बजकर 25 मिनट पर आकाश में ऐसा ही दृष्य था जो कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित है। ज्यातादर शोधकर्ता प्रोफेसर तोबयस के शोध से सहमत हैं। इसका मतलब यह कि राम का जन्म 10 जनवरी को 12 बजकर 25 मिनट पर 5114 ईसा पूर्व हुआ था।


जन्म की भूमिका

श्री राम का जन्म संतो के उद्धार और दुर्जनों के नाश के लिए हुआ था| उनके जन्म को सार्थक करने के लिए इतनी ज्यादा कथाएँ पंक्तिबद्ध है कि उनको जोड़कर सक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करना भी एक रचना का निर्माण कर सकता है| श्री राम जन्म की सबसे बड़ी आवश्यकता रावण के संहार की थी| स्वर्गाधिपति इंद्र को परास्त कर रावण वास्तव में अपने पुत्र इन्द्रजीत की मदद से विश्व विजयी हो गया था| पर विश्व विजय करना एक सामान्य बात थी, परेशानी इस बात से थी कि वो संतो ऋषियों, मुनियों की तपस्या, यज्ञ, पूजन आदि में अड़चन पैदा करने लगा था| वो अत्याचारी हो गया था और उसको मारने का सामर्थ्य सिर्फ भगवान के अवतार द्वारा ही संभव था| वास्तव में वह भगवान बिष्णु के द्वारपाल जय विजय में से एक का पुनर्जन्म था, जिसे तीन जन्मो तक भगवान के हाथो मरने का शाप मिला था|पिछले जन्म में वो दोनों हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष बन कर पैदा हुए थे और भगवान विष्णु के नरसिंह और वाराह अवतारों द्वारा मारे गए थे। त्रेता में वे रावण और कुंभकर्ण बनकर पैदा हुए थे। द्वापर में कंस और शिशुपाल बनकर पैदा होना था। फिर भगवान के अवतार श्रीकृष्ण द्वारा मरने के बाद तीन जनँम तक भगवान के द्वारा मारे जाने का शाप पूर्ण होना था। 

दूसरा प्रयोजन था मनु और शतरूपा को भगवान द्वारा दिया गया वरदान जिसमें मनु शतरूपा ने वरदान माँगा था कि आपके सामान ही मुझे पुत्ररत्न प्राप्त हो| भगवान ने कहा था कि अपने सामान व्यक्ति खोजने से अच्छा है मै स्वयं आपका पुत्र बनाकर जन्म लूंगा| इस वरदान के फलित होने के लिए भी भवान का अवतार लेना आवश्यक था| त्रेता युग में मनु दशरथ के रूप में और शतरूपा कौसल्या के रूप में धरती पर आई थी|

तीसरी कथा थी नारद के काम-विजय के मिथ्या अभिमान के मोह भंग की| नारद में उत्पन्न मोह के निराकरण के लिए भगवान ने एक राज्य की राजकुमारी के स्वयंवर की माया नारद जी के मार्ग में उत्पन्न की| नारद उस कन्या से विवाह हेतु एक सुन्दर रूप बनाने की प्रार्थना लेकर भगवान के पास गए| उन्होंने ने  माँगा| पर पर्यायवाची शब्द होने के कारण भगवान ने उन्हें वानर का मुख प्रदान कर दिया| स्वयंवर में राजकुमारी ने भगवान का वरण किया| जब नारद जी का भ्रम टूटा तो उन्होंने क्रोध में भगवान को पत्नी विरह का शाप दिया तथा वानर की सहायता से पत्नी मिलन की व्यवस्था होगी ऐसा भी कहा|

एक प्रतापभानु की कथा भी इस सन्दर्भ में दिखती है, पर उसका सूत्र और प्रामाणिकता अन्य श्रोतों में खोजना थोड़ा जटिल है|

 

जन्म का दिन और लीला  

कंब रामायण के अनुसार राम के जन्म के समय मेष (चैत्र) मास था, नवमी तिथि थी, नक्षत्र पुनर्वसु था, श्रेष्ठ लग्न कर्कटक था| गृह गणना में ग्यारहवे घर में चार ग्रह उच्च स्थानों पर पाए गए| उनके जन्मदिवस का उत्सव बारह दिनों तक चलता रहा और तेरहवे दिन उनका नामकरण गुरु वसिष्ठ ने श्रीराम नाम से किया| कौसल्या ने मेघ और काजल की छटा दिखाने वाले विष्णु को जन्म दिया था|

गिरधर रामायण के अनुसार भगवान राम के जन्म के समय समय मंगलसूचक शब्द हो रहे थे| उनका जन्म बसंत ऋतु के चैत मास की नवमी को मध्यान्ह में हुआ था| उस समय पुष्य नक्षत्र चल रहा था और वो रविवार का दिन था| इसका वर्णन आनंद रामायण ने सारकाण्ड के द्वितीय सर्ग में कुछ इसतरह किया है|

अथ विष्णु चैत्र मासि नवम्यां मध्यमे रचौ |

सूतिकागृह मध्येअथ कौसल्याया: पुरोअभवत ||

चतुर्भुज: पीतवामा मेघश्यामो महाद्युति: ||4||

मराठी का श्री राम विजय रामायण (अध्याय 4) राम भूअवतरण को अलग ढंग से चित्रित करता है |

वशिष्ठ की भविष्यवाणी

शंख चक्र शेष नारायण | चतुर्धा रूपे प्रकाटेल जगजीवन ||

ज्याची कथा ऐकतां पापी जन | उद्धारोनि तरतील || 49 ||

जन्म समय विवरण

बसंत ऋतु चैत्र मॉस | शुक्ल पक्ष नवमी  दिवस ||

सूर्यवंशी जगन्निवास | सूर्यवासरी जन्माला || 54 ||

माध्यान्हा आला चंदाकिरण | पुष्य नक्षत्र साधून ||

अवतरला रघुनन्दन | पूर्ण ब्रह्म जगद्गुरु || 55 ||

 

रंगनाथ रामायण बालकाण्ड के 13वे अध्याय में पहली पंक्ति से राम जन्म का आख्यान शुरू हो जाता है| इसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है – “प्रशंसनीय मधुमास के श्रेष्ठ शुक्ल पक्ष में, पूर्ण नवमी तिथि, बुधवार, पुनर्वसु नक्षत्र में मध्यान्ह के समय ग्रह पचाको के उच्च स्थिति में रहते हुए, गुरु और चन्द्र का योग रहते हुए, ललित कर्क लग्न में, सर्वलिकाधार, जगादेकवीर, इन्द्रादि देवताओं के स्तुत्य, दिव्य लक्षणों से देदीप्यमान, अव्यय, असमान, आर्ट त्रान परायण, भव्य, चिदानंद, परम कल्याण मूर्ति, देवताओं के रक्षक, दीनार्त्तिहरण, गुनू से अलंकृत, महान कीर्तिवान, शेषशायी, श्रीपति, हृषिकेश, कमल-गर्भ के अर्द्धांश के रूप में, काकुत्स्थावंशी, श्रीराम कौसल्या के गर्भ से उत्पन्न हुए|”

गिरधर रामायण के अनुसार भगवान अट्ठारह वर्ष की सांवली मूरत के रूप में चतुर्भुज रूप धारकर प्रकट हुए| शंख, चक्र, गदा और पदम् से युक्त होकर आभूषण, कुंडल, मुकुट भी शोभायमान हो रहा था| उनके रूप पर करोडो कामदेव लज्जित हो जाते थे| पीताम्बर धारी, सुकोमल, रत्न सी कान्ति लिए भगवान में अट्ठारह रेखा कृतियाँ विद्यमान थी| कौसल्या ने ये रूप देखकर उनकी पूजा अर्चना की और राजा दशरथ के राजपुत्र के रूप में प्रकट होने की प्रार्थना की| तब भगवान पालने में छोटे बच्चे के रूप में आकर रोदन करने लगे|

श्री चंद्रा झा कृत मैथिली रामायण के बालकाण्ड में तृतीय अध्याय में हंसगति छंद में राम के प्रादुर्भाव्  का वर्णन मिलता है|

कौशल्या थिकि धनी जनिक सुत भेलाह |

ब्रह्मानंदानंदे दोष दुःख गेलाह || 59 ||

शुक्ल पक्ष नवमी शुभ कर्क्क उदित हित |

मध्य दिवस नक्षत्र पुनार्व्वसु अभिजित || 60 ||

पंचग्रह उच्चस्थ मेशामे दिनकर |

सृष्टि त्रिगुण उतपत्ति  शक्ति कर जनिकर || 61 ||

भगवान के बाल रूप का वर्णन चौपाई छंद में किया गया है|

ई कहि बनला सुन्दर बाल | 

इन्द्रनील छवि नयन विशाल || 82 ||

बाल अरुण तन दिव्य प्रकास | 

जनिकर माया विश्व विलास || 83 ||

कंब रामायण, विचित्र रामायण, जैन रामायण में भगवान के जन्म के समय की रूप सज्जा का वर्णन नही मिलता है|  


प्रामाणिक मान्य संदर्भ

इस आलेख का उपसंहार तुलसीदास जी की रामचरित मानस के बाल काण्ड की चौपाइयो और दोहों से कर रहा हूँ, जो राम जन्म के समय को बताती है और उनके रूप का भी वर्णन करती है| इनमें कौसल्या द्वारा की गई राम जी की आरती “भए प्रगट कृपाला” को हटा दिया गया है| इसमें भी भगवान चतुर्भुज रूप में प्रगट होते है और कौसल्या जी के अनुरोध पर बाल रूप में दिखते है|

जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल |

चार अरु आचार हर्षजुत राम जनम सुखमूल ||190||

नौमी तिथि मधु मास पुनीता | 

सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता ||

मध्य दिवस अति सीट न घामा | 

पावन काल लोक बिश्रामा ||

....

सुर समूह बिनती करि पहुंचे निज निज धाम |

जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम || 191 ||

समापन में वाल्मीकी रामायण के अंश नही उद्धृत करने पर इस आलेख को पूर्ण नही माना जा सकता है| बालकाण्ड के 18वे सर्ग में इसका वर्णन है|

ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतुनां षट समत्ययु: |

ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ |8|

नक्षत्रेअदितिदेवात्ये स्वोच्चसंस्थेषु पंचसु |

ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सा |9|

प्रोद्यमाने जगन्नाथंसर्वलोकनमस्कृतम |

कौसल्याजन्यदरामं दिव्यलक्षणसंयुतम |10|

 

निष्कर्ष

भगवान श्री राम का जन्म चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मध्यान्ह में हुआ था| उस समय पांच ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र उच्च स्थान में विराजमान थे| सूर्य मेष राशि में था और लग्न में चन्द्रमा के साथ वृहस्पति उपस्थित थे| आधुनिक गणना के अनुसार यह संयोग 5114 ईसा पूर्व में संभव है, जो भगवान राम के जन्म का वर्ष माना जा सकता है|

 

आज राम नवमी है और भगवान राम आ गए है | जय श्री राम|

धन्यवाद|

डॉ हिमांशु शेखर

सोमवार, 15 अप्रैल 2024

रामनवमी पर राम नाम

 "राम से विमुख हो तू कहां जायेगा

राम तू राम मैं,राम में ही रम जाएगा "

पूजा 


राम जी को जितना पढ़ते ,जानते है उतना ही कम लगता है ,राम एक शक्ति हैं, राम एक भक्ति है, जिसने राम को जाना ,उसने सब जान लिया , राम अलौकिक हैं ,राम सौंदर्य ,शक्ति और तेज के प्रतीक हैं। त्रेता युग में जन्में राम  कलयुग की पहचान है ,चाहते सब रामराज्य है 


राम दो शब्द है राम ही है किताब

राम जीवन का सार, राम मुक्ति का धाम"

डॉ पूजा भारद्वाज


तो चलो राम जी जानने की कोशिश करते है , हिंदू शास्त्रों ओर पौराणिक कथाओं के अनुसार राम जी भगवान विष्णु जी अवतार थे ,और धरती पर जन्म उन्होंने रावण का वध करने और सभ्यता संस्कृति और मर्यादा का पाठ सीखने के लिए जन्म लिया था ,जबकि राम जी भगवान थे फिर भी उन्होंने सांसारिक तरह से कौशल्या मां की कोख से जन्म लिया ,

अयोध्या के राजा दशरथ के कोई संतान नहीं थी ,जबकि उनकी तीन रानियां थी, कौशल्या,केकई , सुमित्रा 

राजा दशरथ ने एक यज्ञ करने का फैसला लिया और कई  विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों ,महर्षियों पंडितों को बुला कर यज्ञ किया, और ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के साथ यज्ञ की समाप्ति हुई। राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद खीर को अपने महल में ले जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने गर्भधारण किया,इस तरह

हमारे पालनहार राम जी  का जन्म  पावन नगरी अयोध्या में राजा दशरथ जी के यहां  चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को हुआ था ,इसलिए उनके जन्म दिवस के उपलक्ष्य में राम नवमी मनाई जाती है ,

मेरे शब्दों में 


"नदियों में गंगा बड़ी, बड़ा रामेश्वर धाम

अयोध्या बड़ी नगरी , जहां जन्में है श्री राम"


और इस दिन चैत्र मास नवरात्र भी संपन्न होते है ,राम जन्म को गोस्वामी तुलसीदास जी ने कुछ इस तरह वर्णित किया है ,

रामचरित मानस में 

"भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।

हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥

लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।

भूषन वनमाला नयन बिसाला सोभासिन्धु खरारी॥

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।

माया गुन ग्यानातीत अमाना वेद पुरान भनंता॥

करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।

सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रकट श्रीकंता


इस प्रकार राम जी ने जन्म लिया ,और उनको राम ,राघव रघुवंशी आदि नामों से संबोधित किया गया । 

राम की महत्ता,राम के बिना सृष्टि की कल्पना ही नहीं की जा सकती ,

राम आखिर राम ही क्यों है, क्योंकि राम जी ने बड़े बड़े काम किए , राक्षसों का वध किया ,14 साल वनवास गए, इसलिए  नही , बल्कि इसलिए कि ये सभी कार्य उन्होंने शांत स्वभाव से ,बिना किसी को दोषी ठहराए,बिना क्रोध में आए , और बिना सवाल जवाब के किए थे ,उन्होंने कभी भी अपनी मर्यादा नही भूली ,

चाहे वो बेटे हो, शिष्य हो,भाई हो,या फिर पति कभी भी क्रोध नही  किया , बिना घबराए परस्थिति चाहे कैसी भी रही हो उन्होंने अपनी मर्यादा नही भूली, इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहा जाता है राम जी ने एक नीति अपनाई और अयोध्या नगरी उसी नीति पर चली


रघुकुल रीति सदा चली आई ,

प्राण जाए पर वचन ना जाई 


राम जी को जितना जानते पढ़ते है ,उतना ही कम लगता है रामचरित्र  को दर्शाने वाली  हिन्दी में कम से कम 11, मराठी में 8, बांग्ला में 25, तमिल में 12, तेलुगु में 12 तथा उड़िया में 6 प्रकार की  रामायण मिलती हैं। इसके अलावा भी और भी कई भाषाओं में रामचरित्र का वर्णन किया गया है ।

राम सभ्यता संस्कृति, संस्कारों का एक सुंदर संगम है जिसने राम को जाना ,उसने भ्रात प्रेम को जाना ,वह वो भाई थे जिन्होंने माता केकई जी मुख से सुनते ही की मेरे भरत को राजा बनाया जाए, उन्होंने १४ साल का वनवास स्वीकार कर लिया ,कलयुग में राम जी के चरित्र से सारी बातें सीखी जा सकती है जो व्यक्ति को हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार करती है कैसे थे राम जी।

राम जी एक बेटे के रूप में: राजा दशरथ के चार पुत्र थे जिन में राम जी सबसे बड़े थे ,और अयोध्या के भावी नरेश  होने वाले थे,मगर माता केकई के आदेश का पालन करते हुए उन्होंने राजसिंहासन छोड़ वनवास स्वीकार किया क्योंकि संतान का प्रथम कर्तव्य माता पिता की आज्ञा का पालन करना होता है ,जो राम जी ने बड़े होने के नाते अपना कर्तव्य निभाया और जिको  राजा बनाना था उन्होंने संन्यासी की तरह जीवन व्यतीत किया

रामजी भाई के रूप में: कलयुग जहां भाई भाई को राजपाट के लिए एक दूसरे का कत्ल कर देते है, अहंकार के चलते घरों का बटवारा कर दिया जाता है ,वहीं  राम जी  जब भाई भरत उन्हें वापिस अयोध्या लेने आए तो उन्होंने माता-पिता की आज्ञा को ही सर्वोपरि रखा और राजपाट भरत को ही सौंप दिया और एक आदर्श भाई होने जा कर्तव्य का निर्वाह किया ,जबकि भरत जी ने जब वनवास की बात सुनी तो उन्होंने अपनी माता केकई को ही दोषी ठहराया मगर राम जी ने उनको समझाया भाई माता की गलती नहीं है ये होनी है जो हो कर रहेगी है और  पुत्र होने के नाते मेरा कर्त्तव्य बनता है और मैं उसका पालन जरूर करूं।

राम जी एक मित्र के रूप में एक मिसाल कायम की : राम जी ने मित्र ,सखा के रूप कर्तव्य का निर्वाह किया ,और सभी परेशानियों का सामना करते हुए , उन्होंने केवट ,सुग्रीव,और विभाषण से सच्चे दिल से मित्रता निभाई और अपना वचन पूर्ण किया  ,इस पर एक लाइन याद आती है  ये शब्द केवट निषादराज के शब्द थे 


"तुम आए पार लगाए हम,जब हम आयेंगे घाट तुम्हारे

तब तुम पार लगाना राम "रघुपति राघव राजा राम "


राम जी को क्रोध आया था ,ऐसा बिल्कुल भी नही की राम जी क्रोधित ना हुए हो ,जब राम जी लंका जाने के लिए समुंदर देव से विनती की ओर तीन दिन तक तपस्या 

करते है और समुंदर देव नही माने तब राम जी ने क्रोध वश बाण उठाया और कहा समुंदर देव तुम मुझे नहीं जानते मैं कौन और तुम मुझे अपना हट दिखा रहे हो,मैं तुम्हें एक बाण से ही सूखा देता हूं । समंदर देव की विनती रामचरित्र मानस में 


"सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥।

गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥1॥

इसका अर्थ यह है कि: समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर कहा- हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिए। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है॥1॥

समुंद्र देव ने कहा प्रभु आप जैसा कहेंगे वैसा ही होगा ,मगर इसमें आप की ओर आपकी सेना की बड़ाई नही है , तब सुंदर ने नल नील के बारे में बताया की दोनों भाई जो कुछ सुंदर फेंकेगे वो डूबेगा नहीं इस तरह आप का रास्ता बन जायेगा और मेरा स्वाभिमान भी रह जायेगा तब राम जी अपनी करुणा दिखा कर बाण उत्तर दिशा में पापियों पर चलाया और क्रोध को त्याग दिया ,इस तरह रामसेतु का निर्माण हुआ जो कलयुग में भी रहस्य का विषय बना हुआ है। 

राम जी  भगवान विष्णु जी के अवतार थे एक पल में ही लंका जा कर सीता माता को ले आ सकते थे ,

मगर उन्होंने मनुष्य की भांति अपने आराध्य देव शिव की स्तुति की ओर बालू से  शिव लिंग का निर्माण किया, जो रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग नाम से प्रसिद्ध शिवलिंग है।

राम जी व्यक्तित्व ऐसा था उनके सबसे बड़े शत्रु रावण का भाई विभीषण राम जी के चरणों में आया तो उन्होंने विभीषण की मित्रता भी स्वीकार की ओर सोने की लंका का नरेश बनाने का वचन भी दिया ,राम जी ने सलोचना और मंदोदरी के प्रति मातृभाव सम्मान रखा और अपनी मर्यादा का पालन किया 

राम जी ने हमेशा अपने वचन और मर्यादा का पालन किया ,आज के समय में कोई राम तो नहीं बन सकता पर राम जी का अनुसरण कर राममय हो सकता है राम जी सम्पूर्ण मानव जीवन के लिए एक प्रेरणादायक हैं, और रहेंगे।


"राम दो शब्द है, राम ही है किताब..........

राम सत्य जी जीत,राम अधर्मी का नाश

राम में ही समाई हुई सृष्टि अपार

राम डमरू में है, ध्वनि का प्रलय राग"

धन्यवाद।

डॉ पूजा भारद्वाज

शनिवार, 13 अप्रैल 2024

सतुआनी-जुड़ शीतल पर्व (13-14 अप्रैल) का आधुनिक-वैज्ञानिक महात्म्य

 

लेखक: डॉ हिमांशु शेखर

 

प्रस्तावना

विश्व आज ग्लोबल वार्मिंग का संज्ञान ले रहा है जबकी बिहार के मिथिलांचल में जुड़ शीतल नाम का लोकपर्व इस को लक्ष्य करते हुए आदिकाल से मनाया जाता है| ये इस बात का प्रतीक है कि हमारी परंपराएँ पृथ्वी के तापमान में वृद्धि को ध्यान में रखकर बनाई गई थी और प्राचीन काल में न सिर्फ इनका ज्ञान हमारे पूर्वजो को उपलब्ध था बल्कि इसका निदान भी इन लोक पर्वो में स्पष्ट दिखता है| जिसतरह छठ में सूर्य की पूजा होती है, चौकचंदा में चाँद की पूजा होती है, जुड़ शीतल का पर्व जल और पर्यावरण के पूजन से संबंधित है| जिसतरह मकर संक्रांति को सर्दी खत्म होने का प्रतीक माना जाता है, उसीतरह जुड़ शीतल को गरमी आरंभ होने का सूचक माना जाता है| इस पर्व की प्रासंगिकता आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यहाँ स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है|

 

दिन निर्धारण

भारत में प्रकृति को पूजने की परंपरा रही है| ऋग्वेद में सूर्य, चाँद, तारे, नक्षत्र आदि को समर्पित श्लोको की भरमार है| जुड़ शीतल भी प्रकृति को समर्पित एक लोकपर्व है| इसे मेष संक्रांति भी कहा जाता है| इस दिन भगवान भास्कर मीन राशि से मेष राशि में कदम रखते है| मकर संक्रांति में सूर्य उत्तरायण होते है और मेष संक्रांति के दिन वो उत्तरायण की आधी परिक्रमा पूरी कर लेते है| इसे बसंत ऋतु की समाप्ति और ग्रीष्म ऋतु का आरंभ भी माना जाता है| विक्रम संवत के अनुसार ये पर्व बैसाख माह के कृष्ण पक्ष की नवमी को मनाया जाता है| अंग्रेजी या रोमन कैलेण्डर के अनुसार इसे हर वर्ष 13-14 अप्रैल को मनाया जाता है|

हर व्यक्ति द्वारा अपनी आस्था, क्षमता और भक्ति के अनुसार इस पर्व को मनाने के कारण इसे लोक पर्व की श्रेणी में रखा गया है| वास्तव में लोक पर्वो की दो श्रेणियां प्रचलित है – लौकिक पर्व और लोकोत्तर पर्व| खाने पीने और मौज मस्ती के साथ प्रदर्शन को ज्यादा महत्त्व देने वाले पर्व लौकिक पर्व कहलाते है – जैसे होली, दिवाली, आदि| लोकोत्तर पर्व में तप, त्याग, उपवास आदि को ज्यादा महत्त्व दिया जाता है – तीज, छठ, आदि| इस दृष्टी से दो पर्वो का ये दो दिवसीय समूह लौकिक पर्व में गिना जाता है| वैसे तो इसमें ज्यादा दिखावा नही होता है पर फिर भी उपवास नही होने के कारण इसे प्रथम श्रेणी में रखना ही उचित लगता है|

 

मनाने की विधि

मेष संक्रांति का, गरमी का स्वागत करता ये पर्व, दो दिनों तक मनाया जाता है| पहले दिन को सतुआनी के रूप में मानते है जबकी अगले दिन को धुरखेल कहते है| इसमें भगवान सूर्य की पूजा होती है, अग्निदेव की पूजा होती है, जल की पूजा होती है – कुल मिलाकर सृष्टि के पंचभूतों में से दो की अराधना इस पर्व में सीधे की जाती है| किसी और पर्व में प्रकृति को, पर्यावरण संरक्षण को इतना महत्त्व नही दिया गया है|

सतुआनी में भोग के रूप में जौ का सत्तू, गुड और आम का टिकोला मिट्टी के पात्र में चढ़ाया जाता है| भोग सूर्य को और अपने कुल देवता को लगाया जाता है| इसी को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते है| इसमें कुछ भी पकाने की जरूरत नही पड़ती| इस दिन तुलसी के पेड़ में जल भरा मिट्टी का एक बर्तन बांधने की परंपरा है| यह तुलसी को गरमी से राहत देता है और साथ ही इससे पितरो की शान्ति को भी जोड़ा जाता है| इस दिन सुबह सुबह बच्चो को सर पर चुल्लू में पानी लेकर थापते है, डालते है, जिससे मन और शरीर शीतल हो|

अगले दिन चूल्हे को विश्राम देना होता है और चूल्हे की पूजा की जाती है| कई घरो में रात भर खाने के सामान बनते है| चुल्हा नही जलने के कारण अगले दिन बासी खाना खाना पड़ता है| इसे बसियोर कहते है| चुल्हा नही जलने के कारण बचे समय को जल संग्रह स्थलों जैसे कुंएं, तालाबो की सफाई में लगाना होता है| जल प्रदूषण के निदान और जल संरक्षण की इतनी सुन्दर व्यवस्था इस पर्व से स्थापित होती है|

क्षेत्र, स्थान आदि में बदलाव के कारण मनाने की विधि में कुछ भिन्नताएं दिखती है| कहा जाता है इस दिन शिकार करने की परंपरा भी थी, जो अब लुप्त हो गई है| कुछ जगहों पर मांसाहार का प्रावधान भी मिलता है, पर चूल्हा नही जलने के कारण दूसरे दिन तो इसकी व्यवस्था असंभव है| शायद सतुआनी वाले दिन वैसा किया जाता होगा| ये सब एक परंपरा का हिस्सा है और इनमें तथ्यात्मक सन्दर्भ नही खोजे जा सकते है| जिस क्षेत्र में ये मनाए जाते है, उस क्ष्रेत्र का निवासी होने के कारण, जो मैंने देखा है, उसका वर्णन मैंने किया है| यह पर्व बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है|

 

आज के परिपेक्ष्य में वैज्ञानिक विश्लेषण

आज विश्व के सामने ग्लोबल वार्मिंग एक बहुत बड़ा मुद्दा है| इस मुद्दे को यह पर्व, ग्लोबल वार्मिंग शब्द की उत्पत्ति के बहुत पहले से हल करने का प्रयास कर रहा है| एक दिन चूल्हा नही जलाना ग्रीन हाउस गैसों को कम करता है| जब ये पर्व बने होगे तब ग्लोबल वार्मिंग इतनी बड़ी समस्या नही थी, तो वर्ष में एक दिन चूल्हा बंद करने पर पृथ्वी के ताप नियंत्रण संभव था| त्वरित औद्योगीकरण के कारण वर्त्तमान काल इस पर्व के परंपरा की आवृत्ति को बढाने की आवश्यकता बताता है| आज इजरायल में ज्यू नियम के हिसाब से सप्ताह का साँतवा दिन (शब्बात) यानी शुक्रवार सूर्यास्त से शनिवार सूर्यास्त तक खाना गर्म करने की मनाही है| इसे बाइबिल के अनुसार आराम का दिन कहा जाता है| जिसको आज समाज एक आवश्यकता के रूप में देखता है, उसे ये पारंपरिक लोकपर्व पता नही कब से अपने में समेटे बिहार में मनाया जाता रहा है| इस लोक पर्व का सबसे बड़ा सन्देश निकटवर्ती जल संग्रह स्थलों जैसे कुंएं और तालाबो की सफाई से है| इससे शुद्ध जल की उपलब्धी बढ़ेगी तथा वैश्विक स्तर पर मौजूद जल संकट से छुटकारा भी मिलेगा|

ये पर्व गरमी के आरंभ का पर्व है| गरमी में लू लगाने की संभावना होती है| निरोग रहने के लिए शरीर को ठंढा रखने की भी जरूरत है| इसलिए इस पर्व का नाम जुड़शीतल अर्थात 'शीतलता से जुड़ो' रखा गया था। मेष संक्रांति के इस पर्व से सत्तू का सेवन आरंभ किया जाता है| सत्तू शरीर को ठंढा रखता है| सत्तू की सबसे बड़ी खासियत ये भी है कि इसको खाने के लिए पकाने की जरुरत नही पड़ती| इससे पकाने में लगे अनावश्यक ताप वर्धन की संभावना भी कंम हो जाती है| साथ ही इसे नमकीन या मीठा, दोनों रूपों में खाया जा सकता है| नमक, गुड, चीनी ये सबके साथ सुसंगत है|

अगर वैज्ञानिक या पौष्टिकता की बात करे तो सत्तू में प्रोटीन, आहार तंतु (फाइबर), कैल्शियम, आयरन, मैगनेशियम और पोटेशियम होते है| ये अपने आप में संपूर्ण आहार होता है| ये शरीर को ठंढक देता है और ऊर्जा बढाने में भी मदद करता है| ये वजन भी नियंत्रित करता है और पाचन क्षमता बढाता है| ये कोलेस्ट्राल, शर्करा, रक्तचाप, आदि नियंत्रित करता है| ये गरमी में लू से बचाता है, भूख बढाता है और कब्ज को नियंत्रित करता है| वास्तव में गरमी के आगमन का सन्देश देता ये लोकपर्व खाने में परिवर्तन की अपेक्षा रखता है, जो गरमी के अनुरूप शरीर को पोषक तत्व दे और स्वास्थ्य बनाए रखे| अगर कार्बोहाइड्रेट के साथ इसका सेवन किया जाए तो ये एक पूर्ण आहार हो सकता है| इसे शरबत की तरह पी सकते है या खाना के रूप में खा सकते है| इसे खाने योग्य बनाने के लिए सिर्फ जल की जरूरत होती है|

बेसन के बने पदार्थो के प्रयोग का भी इस दिन से आरंभ किया जाता है| इन पदार्थो से बने खाद्य ज्यादा दिनों तक बिना खराब हुए रह सकते है| सत्तू और बेसन के बने पदार्थ एक संकेत है कि गरमी में खाद्य जल्दी खराब हो जाते है और ऐसे पदार्थो का उपयोग किया जाए जो ज्यादा दिनों तक बिना गरम किए रखे जा सके| एक दिन चुल्हा नही जलाना इसी दिशा में एक इशारा भर है|

बच्चो के सर पर पानी डालकर ये बताया जाता है कि शरीर को ठंढा रखने की आवश्यकता है| पानी इसके लिए सबसे अच्छा साधन है| जल का सेवन पेय के रूप में या स्नान के रूप में करना गरमी में आवश्यक है| ताप निवारण के लिए आज भी इसकी उपयोगिता है| कुल मिलाकर ये पर्व मानव को गरमी के अनुरूप अपने को ढालने का प्रतीक है|

 

उपसंहार

हर वर्ष 13-14 अप्रैल को मनाया जाने वाला पर्व, जिसे मेष संक्रांति, सतुआनि, बसियोरा, धुरखेल, जुड़ शीतल, आदि कई नामो से गंगा की तराई वाले बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में मनाया जाता है, कई आधुनिक और वैज्ञानिक सन्देश सामने रखता है:

  1. इसमें ग्लोबल वार्मिंग के निदान का बीज दिखता है|
  2. इससे जल संरक्षण की प्रेरणा मिलती है|
  3. इसमें गरमी के आरंभ से होने वाले खाद्य पदार्थ में परिवर्तन का आभास होता है|
  4. खाना गर्म करने और पकाने को गरमी में कम करना जरूरी कदम है|
  5. इससे शरीर को ठंढा रखने का सन्देश मिलता है|
  6. सत्तू, बेसन जैसे जल्दी खराब न होने वाले खाद्यो की उपयोगिता को बल मिलता है|
  7. लोक पर्व होते हुए भी इसमें वैज्ञानिक, आधुनिक और उपयोगी अनुकरणीय दृष्टांत छिपे है|

धन्यवाद|

डॉ हिमांशु शेखर

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