लेखक: डॉ हिमांशु शेखर
दिनांक 22 मार्च 2024 को रामायण रिसर्च काउंसिल की ओर से माता सीता के प्राकट्य क्षेत्र सीतामढ़ी में 55 एकड़ में मंदिर और 251 फीट ऊँची प्रतिमा स्थापित करने का समाचार दिया गया। माता सीता को भगवती के रूप में बताया गया है, जबकि माता सीता को महालक्ष्मी का रूप माना जाना चाहिए।
राम कथा
को समेटे विभिन्न प्रामाणिक ग्रंथो में राम की अर्धांगिनी सीताजी के जन्म के संबंध
में अलग अलग राय व्यक्त किए गए है| समय के प्रवाह के हिसाब से सीताजी के जन्म के
समय का सही उल्लेख ठीक से नही मिलता है| साथ ही, जन्म स्थल का भी स्पष्ट सूचक नही
उपलब्ध है| इस आलेख में सीता जी के जन्म स्थल, जन्म के समय और पूर्व जन्म के संदर्भो
के आलोक में पौराणिकता को अक्षुण्ण रखते हुए तथ्यात्मक विश्लेषण का प्रयास किया
गया है| इसमें कोई निष्कर्ष नही है, सिर्फ एक मत है, सिर्फ आधुनिक समाज के लिए एक
व्याख्या प्रस्तुत की गई है|
वाल्मीकि रामायण:
वाल्मीकि
रामायण के बालकाण्ड के 66वें सर्ग में राजा जनक सीता जी के जन्म के बारे में ब्रह्मर्षि
विश्वामित्र को बताते है|
न्यासभूतं तदा न्यस्तमस्माकं पूर्वजे
विभौ।
अथ मे कृषतः क्षेत्रं लांगलादुत्थिता
ततः॥ १३॥
क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति
विश्रुता।
भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा॥
१४॥
वीर्यशुल्केति मे कन्या
स्थापितेयमयोनिजा।
भूतलादुत्थितां तां तु वर्धमानां
ममात्मजाम्॥ १५॥
उनके
अनुसार यज्ञ के लिए भूमि निर्माण का काम हल चला कर करने का वर्णन है| साथ ही
सीताजी जी के भूमि से उत्पन्न होने का जिक्र है, उन्हें भूमिजा कहा गया है,
अयोनिजा कहा गया है| नामकरण के सन्दर्भ में लिखा है कि हल से जोतने पर जमीन पर बनी
रेखा (क्यारी) को सीता या हराई (कही कही सीताजी को हरजाई देवी भी कहा जाता है, जो
माता लक्ष्मी का रूप है) कहा जाता है| इसी जमीन पर बनी पंक्ति के कारण सीता नाम
दिया गया था| ऐसा भी वर्णित है कि राजा जनक ने सीताजी को वीर्यशुल्का कहा है, अर्थात
जिससे परिणय के लिए पराक्रम प्रदर्शित करना पड़े| जो प्रचलित कथाएँ है उससे कई जगह
पर वाल्मीकि रामायण अलग कथा देता है| कुछ तथ्य द्रष्टव्य है|
1. भूमि शोधन का कार्य यज्ञ के लिए था, न कि किसी
अकाल के निवारण के लिए|
2. भूमि शोधन के स्थल की जानकारी नहीं दी गई है|
3. सीता जी जनक और सुनयना की पुत्री नही थी|
4. सीता जी जमीन से उत्पन्न हुई थी|
5. सीता जी का नाम जोती गई जमीन पर बनी रेखाओं (जिन्हें
सीता या हराई कहा जाता है) से प्राप्त होने के कारण सीता पडा|
6. सीता जी के जन्म की तारीख या समय का पता नही चलता
है|
परन्तु इंटरनेट
पर कई विद्वान् वाल्मीकि रामायण का नाम लेकर कुछ अन्य कथा ही कहते रहते है|
श्रीरामचरितमानस:
श्रीरामचरित
मानस में कही भी सीता जी के जन्म का सीधे उल्लेख नही है| उनके लिए प्रयुक्त उपमाओं
से थोड़ी बहुत जानकारी मिल सकती है| बालकाण्ड से कुछ द्रष्टव्य दृष्टांत अवलोकनार्थ
नीचे है:
जनकसुता जग जननि जानकी।
अतिशय प्रिय करुना
निधान की।। : 1/18
अर्थात, जनकसुता-मांडवी, जगजननि-श्रुतिकीर्ति, जानकी-उर्मिला और अतिशय प्रिय-
रामबल्लभा सीताजी हैं| इस व्याख्या या अनुवाद पर भी कुछ मतभेद है, क्योकि जानकी से
सीता जी का भी बोध एक मान्य अवधारणा है| इस व्याख्या की जगह ये भी माना जा सकता है
कि चारो उपमाएं सीताजी के लिए ही हो|
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्। सोपान 1/ श्लोक 5
अर्थात सीता जी को ब्रह्म की तीन क्रियाओं उद्भव, स्थिति, संहार, की संचालिका तथा आद्याशक्ति, शुभ करने वाली, दुःख
हराने वाली, तथा राम की पत्नी कहकर उनके सामने नत होने की बात की गई है|
तात जनक तनया यह सोई।
धनुष जग्य जेहि कारन होई।।
231/1
अर्थात,
यह धनुष यज्ञ जिनके कारण हो रहा है, वो जनकतनया है|
इन सबमें
सीता जी के बारे में न जन्म का दिन या समय बताया गया है, न जन्म स्थान का वर्णन
है, न जन्म के बारे में कोई जानकारी है|
रामकथा के अन्य सन्दर्भ:
ब्रह्मवैवर्त
पुराण में भगवती सीता जी के पूर्वजन्म का वर्णन है| कुशध्वज नामक राजा ने कठिन
तपस्या द्वारा भगवती लक्ष्मी को प्रसन्न किया| धन धान्य से परिपूर्ण होने के साथ
साथ माता लक्ष्मी ने पुत्री के रूप में उसकी साध्वी पत्नी मालावती की कोख से जन्म
लिया| वो कन्या सूतिका गृह से ही स्पष्ट स्वर में वेद के मंत्रो का उच्चारण करते
हुए उठ खडी हुई| इसलिए उनका नाम वेदवती रखा गया| भगवान नारायण की प्राप्ति के लिए
वो वन की ओर तपस्या के लिए चल दी| बहुत तपोबल एकत्र होने के बाद भी, अगले जन्म में
ही भगवान श्रीहरि को पति रूप में पाने की आकाशवाणी हुई| पर उसकी तपस्या जारी रही|
इसी समय रावण उधर से गुजरा और उसपर मोहित होकर उसका शृंगार खंडित करने की चेष्टा
करने लगा| तपोबल से वेदवती ने रावण को स्तंभित कर दिया| तब रावण ने उनका मानस
स्तवन किया| वेदवती ने परलोक में उसकी स्तुति का फल मिलना स्वीकार किया| साथ ही
उसे शाप दिया – “तू मेरे लिए ही अपने बंधू बांधव सहित काल का ग्रास बनेगा| तेरे
द्वारा काम भाव से स्पर्श के कारण मै अपने इस शरीर का त्याग करती हूँ|” वेदवती ने
अपना शरीर त्याग दिया और अगले जन्म में वो जनक की कन्या हुई, जिसका नाम सीता था|
सीता जी के जन्म स्थान और काल के बारे में यह पुराण कोई जानकारी नही देता है|
श्री
विष्णु पुराण भी सीता जी के जन्म के सन्दर्भ में कुछ भी प्रामाणिक नही दे पाता है|
इसके चतुर्थ अंश के चतुर्थ अध्याय में संक्षेप में राम कथा दी गई है| और उसमें
सीता के जन्म को खोजना बहुत ही मुश्किल है| उसमें लिखा है – “जनकगृहे च
माहेश्वरं चापमनायासैनैव बभंज सीतान्चायोनिजां जनकराजतनयां वीर्य्यशुल्कां लेभे|42|”
यहाँ
सीताजी को अयोनिजा तो कहा गया है, पर जन्म की विधि नही दी गई है| साथ ही
वीर्यशुल्का अर्थात परिश्रम कर, सामर्थ्य दिखला कर, पराक्रम कर पत्नी रूप में
प्राप्त करने का वर्णन भी है| एक और उपमा भी है – जनक राज तनया अर्थात राजा जनक के
तन से उत्पन्न| पर यह उपमा अन्य विशेषणों के साथ अपवादस्वरूप लगती है| सीता जी को
राजा जनक के तन से उत्पन्न होने को अयोनिजा और वीर्यशुल्का दोनों गलत ठहराते है|
अद्भुत रामायण का उल्लेख अनुसार सीता
राजा जनक की अपनी पुत्री नहीं थीं। धरती के अंदर छुपे कलश से प्राप्त होने के कारण
सीता खुद को पृथ्वी की पुत्री मानती थीं। ‘अद्भुत रामायण’ में उल्लेख है कि रावण कहता
है कि- “जब मैं भूलवश अपनी पुत्री से प्रणय की इच्छा करूँ, तब वही मेरी मृत्यु का कारण बने।” रावण के इस
कथन से ज्ञात होता है कि सीता रावण की पुत्री थीं। ‘अद्भुत रामायण’ में उल्लेख है
कि गृत्स्मद नामक ब्राह्मण लक्ष्मी को पुत्री रूप में पाने की कामना से प्रतिदिन
एक कलश में कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूंदें डालता था। एक
दिन जब ब्राह्मण कहीं बाहर गया था, तब
रावण इनकी कुटिया में आया और यहाँ मौजूद ऋषियों को मारकर उनका रक्त कलश में भर
लिया। यह कलश लाकर रावण ने मंदोदरी को सौंप दिया। रावण ने कहा कि यह तेज विष है।
इसे छुपाकर रख दो। मंदोदरी रावण की उपेक्षा से दुःखी थी। एक दिन जब रावण बाहर गया
था, तब मौका देखकर मंदोदरी ने अपनी मृत्यु
के लिए कलश में रखा रक्त पी लिया। इसके पीने से मंदोदरी गर्भवती हो गयी, जिससे
सीताजी का जन्म लिखा गया है|
इस कथा
का सन्दर्भ देकर कई विद्वान वेदवती को रावण और मंदोदरी की पुत्री के रूप में जन्म
लेना बताते है| पर वेदवती के शाप में रावण की मृत्यु का कारण बनाना लिखा है, रावण
की पुत्री बन कुल का नाश करना नही लिखा है| ये जोडी गई कथाए है| उसमें वेदवती के शाप
को बदला गया है, पुत्री पर मोहित होने पर रावण की मृत्यु का वरदान ब्रह्मा जी से
मिलना बताया गया है, मंदोदरी का रक्त पीने से गर्भवती होना बताया गया है, सीताजी
को मंदोदरी की पुत्री बताया गया है, आदि| ये सब तंत्र साधना या पैशाचिक कथा का भाग
हो सकते है, और आधुनिक काल में लिखे होने के कारण ये अनावश्यक भ्रामक प्रचार भर रह
जाता है| अदभुत रामायण सही मायने में अद्भुत है और राम - कथा को विकृत कर देता है|
आध्यात्म रामायण/बालकांड/ सर्ग 6 श्लोक संख्या 59-60, और
65, जनकजी के कथन की ‘वाल्मीकीय रामायण’ से तुलना कीजिए।
यज्ञ भूमि विशुद्ध्यर्थम् कर्षतो लाङ्गलेन मे ।
सीतामुखात्समुत्पन्नाकन्यका शुभ लक्षणा॥
तामद्राक्षमहं प्रीत्यापुत्रिकाभाव भाविताम्।
अर्पिता प्रियाभार्यायै शरच्चन्द्रनिभानना ॥
योगमायापि सीतेति जाता वै तव वेश्मनि।
अतस्त्वं राघवायैव देहि सीता प्रयत्नत: ।॥
अर्थात, सीताजी भूमि शोधन के समय हल के अग्र भाग से उत्पन्न, पुत्रिका भाव से पोषित, योगमाया और रामजी की प्राणबल्लभा
हैं।
कंब रामायण सीताजी को लक्ष्मी का अवतार मानता है (बालकाण्ड: अध्याय
10 मिथिला दर्शन पटल)| और सीताजी की उत्पत्ति धरती से यज्ञ के लिए भूमि जोतते समय जुए
के फाल से प्रगट होना लिखा है (बालकाण्ड: अध्याय 12 धनुर्भंग पटल)| रंगनाथ रामायण में यज्ञ के लिए भूमि शोधन
करते समय हल की फाल रेखा (जिसे सीता नाम दिया गया है) से एक मंजूषा मिलने का वर्णन
है, जिससे अत्यंत प्रभा संपन्न कन्या सीता के निकलने का वर्णन है (बालकाण्ड: 32:
शिव धनुष का वृतांत)| प्रेम रामायण सीताजी को भी महत्त्व देता है और उसमें पहला
काण्ड है - मिथिला काण्ड| इसमें सीताजी की जन्म तिथि तथा अन्य कई सन्दर्भ भी दिए
गए है| जनक जी को पुत्री की अभिलाषा से हल चलाने की प्रेरणा भगवान शिवाजी से मिली|
दोहा 126 के बाद की चौपाई:
शुक्ल नवमि तिथि माधवमासा |
अभिजित प्रियदिन
मध्यप्रकाशा ||
अब नरनाह समय शुभ आवा |
करहु भूमि करषण सुख
छावा ||
इसके
बाद हल के एक स्थान पर रुकने का जिक्र है, जहां पर एक प्रकाशमान सिंहासन पर बैठी सीता
जी (लक्ष्मी जी की अवतार) का जमीन से ऊपर आने का वर्णन है| इसमें सीताजी की स्तुति
(दोहा 130 के बाद) भी दी गई है, जो मुनि, देव और ऋषियों ने की है| फिर राजा जनक को
पिता कहना और उनके कहने पर सीताजी का बालरूप में प्रकट होना भी लिखा गया है|
विश्लेषण तथा अवलोकन:
सर्वप्रथम
जन्म तिथि के संबंध में मनाई जाने वाली जयंतियो से ऐसा प्रतीत होता है कि दो
तिथियाँ प्रचलन में है:
- फाल्गुन
माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी
- वैशाख
माह के शुक्ल पक्ष की नवमी
पहली
तिथि को सीता अष्टमी के नाम से जाना जाता है और ऐसा लगता है कि इस दिन माता सीता धरती
पर अवतरित हुई थी| दूसरी तिथि सीता नवमी कही जाती है, जिस दिन महाराज जनक को ये
प्राप्त हुई थी| इनकी प्रामाणिकता खोजने में बहुत सारी बाधाएँ है| दोनों तिथियों
को जानकी जयन्ती के रूप में जाना जाता है| अगर इस कथा पर ध्यान दिया जाए कि खेत
में हल चलाते समय या उसकी जुताई करते समय सीता जी हल से बनी दो क्यारियों (जिन्हें
सीत भी कहा जाता है) के बीच मिली थी तो हमें भारत में हल चलाने के समय पर ध्यान
देना होगा| ऐसा माना जा सकता है कि एक तिथि उनके धरती पर अवतरण को दिखाती है तो
दूसरी तिथि राजा जनक द्वारा उनको पाने का दिन बतलाती है|
ग्रीष्मकालीन जुताई रबी मौसम की फसलें कटने के बाद शुरू होती है, जो बरसात शुरू होने पर समाप्त होती है। अप्रैल
से जून तक ग्रीष्मकालीन जुताई की जाती है, जहां
तक हो सके गर्मी की जुताई रबी की फसल कटने के तुरन्त बाद मिट्टी पलटने वाले हल से
कर देनी चाहिए। अगर इस तथ्य पर ध्यान दिया जाए, तो सीता नवमी वाला दिन जानकी
जयन्ती के लिए ज्यादा उपयुक्त लगता है| प्रेम रामायण इसका सत्यापन भी करता है|
महाराज जनक मिथिला के राजा थे, जिसकी राजधानी जनकपुर (अभी नेपाल में)
थी| पर जनकपुर के पहाडी इलाके में हल जोतने का काम संभव नही था| इसलिए वे मैदानी
क्षेत्र में आए होंगे| सीतामढी के निकट पुनौरा ग्राम में उन्होंने हल चलाया, जहाँ
से उन्हें सीता जी की प्राप्ति हुई| एक सन्दर्भ में जनकपुर से 3 योजन या 40
किलोमीटर दूर हल चलाने का जिक्र है| आज के जनकपुर और सीतामढी में 54 किलोमीटर की
दूरी है| सीतामढी को उनके अवतरण और जनक द्वारा पाने का स्थान माना जा सकता है|
अब बच जाती है बात जमीन से उत्पन्न होने की| सभी जीवित प्राणियों को कई
भागो में बांटा जाता है – मानस, नादज, बिन्दुज, उद्भिज्ज, जरायुज, अण्डज, स्वेदज| इसमें उद्भिज श्रेणी भूमि से उत्पन्न होती है| इसमें लताए,
पेड़, पौधे आदि आते है| माता सीता को भी शायद इसी श्रेणी में रखने की कल्पना की गई
है, जिससे सामान्य पिंडजो या जरायुजो से उन्हें अलग दिखाया जा सके|
जिसतरह भगवान श्रीराम प्रकट हुए थे, उसीतरह सीताजी भी प्रकट हुई थी|
अगर श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार थे, तो माता सीता लक्ष्मी का अवतार थी| रामायण
की तर्ज पर अगर कभी सीतायण लिखी जाएगी (जो प्रेम रामायण में बहुत हद तक सार्थक है)
तो शोध द्वारा सीता जी के जन्म पर सही आकलन संभव हो पाएगा| तब तक सभी से ये
गुजारिश है कि ‘कहा जाता है’, ‘पौराणिक कथा में लिखा है’, ऐसे वाक्यांशों को जांच
करने के बाद ही प्रयोग में लाए| सीता जी के जन्म की गुत्थी एक खुली चुनौती है,
जिसके आधुनिक सन्दर्भ में स्थान और समय पर तो सहमति बनाई जा सकती है पर पूर्वजन्म
और जन्म की विधि पर प्रामाणिक सन्दर्भ नही उपलब्ध है|
धन्यवाद|

डॉ हिमांशु शेखर