गुरुवार, 11 अप्रैल 2024

कनपुरिया बौराई यादें

रेखा अस्थाना

हम कनपुरिया हैं  ।जैसा कि आप हमारी बोली से ही समझ जाते होंगे।

हमारी दादी जब कोई  बच्चा शरारत करता था या बेवकूफ़ी करता या उसे कोई  बात समझ न आती थी तो वे कहा करती थी---

"का भइया बौराए गए  हो का"बचपन में तो अनुमान लगा लिया था कि बौराना मतलब पागलपन या पागल हो गए  हो।

    हमारी दादी ने कभी हमसे सीधी बात नहीं कही हमेशा लोकोक्ति या मुहावरे का इस्तेमाल करके ही बात कही।नतीजा दसवीं कक्षा तक हमें ये दोनों चीजे याद नहीं करनी पड़ी।और विशेष योग्यता का विषय हिन्दी ही रहा बोर्ड  से।

अब हम आगे बढ़ते हैं ज्यों ज्यों शिक्षा बढ़ती गई  मैं हर शब्द की उत्पत्ति और व्याकरण  जानने की चेष्ठा करने लगी।तब जाकर पता चला कि बौर मायने कलियाँऔर उसमें नाम धातु लग कर वह बन गया बौराना अर्थात पागलाना या पागलपन।बसंत ऋतु में बहुत से वृक्षों में बौर आते हैं सारे कीट-भृंग पक्षीगण मद- मस्त होकर पगलाए फिरते हैं। तब मुझे  अपनी दादी माँ की याद आई। बसंत ऋतु के मादक बयार में अपने -अपने साथी को ढूंढते फिरते हैं ।और मीठी आवाज से वातावरण को गुंजायमान करते हैं।हमारी आयु वर्ग के लोगों को ही इस बात का पता होगा क्योंकि उन्होंने अमराई देखी है।

अहा! अमराई  के नीचे खाट बिछाकर बैठ कर टप्पकौए आम का स्वाद अगर मालूम है तो वह केवल हमारी आयु के लोग समझते हैं हम लोगों ने ही ही देखा है।

भई आप चाहे कितनी ही बुराई करो कानपुर  की जो मस्ती कानपुर के लोग करते हैं न वह मुझे अन्य कहीं नहीं दिखी।

तो कहने का मतलब ये है कि हमने दादी जी से पाँचवीं कक्षा तक आते आते सारी लोकोत्ति व मुहावरे सब सीख गए। बचपन में हमारे हिन्दी के गुरुजी का इतना अच्छा प्रभाव पड़ा कि मैं हिन्दी की ही अध्यापिका बनी।

गुरुजी का नाम था प॔0 उपदेश नारायण  उपाध्याय 🙏जिन्हें आज तक न भूल पाई हूँ।

  अवसर मिले तो कानपुर अवश्य  घूम आइएगा😊😊


🌳इमली का दरख्त और चने की झाड़ 🌳

     

इमली--यह एक विशाल  ,मजबूत और आर्थिक लाभ  देने वाला वृक्ष  होता है।यह लगभग 20से25वर्षो में फल देने योग्य  होता है।इसका फल खट्टा होता है और चटनी व साॅस बनाने  के काम आता है।इसकी आयु लगभग 200वर्ष की होती है।पर लोग इसे घर के आसपास या घरों में नहीं लगाते हैं।उनका मानना है कि यह जीवन में खटास घोलता है।अंधविश्वासी मानते हैं कि इसमें भूत प्रेत का वास होता है।पर इसके फलों का तो बहुत बड़ा व्यापार होता है।हमें अंधविश्वास की ओर नहीं जाना चाहिए। 

अब हम आगे हैं रबी की फसल चने की  ओर। काले चने जिनका उपयोग इसके अंकुरित होते ही होने लगता है।।इस पौधे की ऊंचाई लगभग एक से डेढ़ फुट की होती है। इसकी मुलायम, स्निग्ध पत्तियाँ लोग चटनी के साथ खाते हैं जिसके बहुत से फायदे हैं।यह पौधा झाड़ नुमा होता है कोमल भी और जब हम किसी ज्ञानी जन की अधिक  तारीफ  करते हैं तो उनको कहते सुना होगा कि हमें चने की झाड़ में मत  चढ़ाइए।

क्यों कि ऐसा हो ही नहीं  सकता है।

इन्हीं काले चने से बेसन भी बनाया जाता है।अब मैं विस्तार में तो नहीं जाऊँगी ।पर हमारी दादी कहा  करती थी,"बहुत इताराए की जरूरत नाहीं है नहीं तो चने की झाड़ पर बैठ  जहीओ।"

अगर कोई  कमी तो क्षमा करिएगा  पाठकगण। 

हम तो बस गुरुजी के आदेश के अनुसार  लिख  लेते हैं बस।कोई खेती बाड़ी तो है नहीं हमारी।पर हमारे समय  की पढ़ाई बहुत उपयोगी थी।😊🌳🦨

धन्यवाद।

रेखा अस्थाना

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

पाथेय

 सरोजिनी चौधरी

  ईश्वर ने जब पृथ्वी पर सब प्रकार के जलचर,नभचर एवं थलचर जीवों का निर्माण किया तब सोचा कि किसी ऐसे जीव की सृष्टि करनी चाहिए जो इन समस्त जीवों पर नियंत्रण रख सके।अतः उन्होंने अपनी असीम शारीरिक,मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों का समावेश कर अपने जैसे जीव का निर्माण किया और उसे पृथ्वी पर राज्य करने के लिए भेज दिया।

    अब ईश्वर का सर्वोत्कृष्ट प्राणी होने के कारण मनुष्य का संकल्प भव्य है।मनुष्य को परमेश्वर ने यह शक्ति दी है जिसके द्वारा वह नीर-क्षीर विवेक कर सकता है।उसके मानस जगत में एक ऐसे दिव्य ज्ञान का अस्तित्व है और वह है अन्तरात्मा।

   दूसरों के साथ बुराई करने को हम पाप कहते हैं परन्तु यही नियम स्वयं के साथ भी लागू होता है । जब हम अपने साथ बुरा बर्ताव करते हैं तब भी पाप करते हैं ।अतः स्वयं से यह प्रतिज्ञा करें कि सदा अपनी भलाई की बात करेंगे।अपना सम्मान स्वयं करेंगे और भविष्य के लिए उत्कृष्ट चित्र स्थापित करेंगे।

    जब व्यक्ति दृढ़तापूर्वक स्वयं से कहता है कि मैं एक साधारण व्यक्ति नहीं हूँ,शुद्ध आत्मस्वरूप शक्ति का पुंज हूँ, महान तेजस्वी,पूर्ण प्रतिभावान हूँ,शरीर नहीं,जीव नहीं 

परम आत्मा का स्वरूप हूँ।मैं अपनी शारीरिक ,मानसिक शक्तियों का स्वामी हूँ तब ऐसे आत्म संकेतों से सुप्त शक्तियाँ जागृत होने लगती हैं।

     मन में यह विचार आना चाहिए कि मैं ईश्वर का अंश हूँ।मुझसे श्रेष्ठ जीव संसार में दूसरा कोई नहीं है।आत्म-ज्ञान के दिव्य स्वरूप को प्रकाशित करने से मस्तिष्क मानसिक दासता से मुक्त हो जाता है ।मन का प्राण आत्मा है और इसमें प्रवेश करने से संशय,भ्रम और भय -भ्रांति के जाल से हमारा मन मुक्त हो जाता है।यदि जीवन को वास्तव में उपयोगी बनाना है तो कमज़ोर भावनाओं को त्याग कर्तव्य की ओर ध्यान दें और इन्हें पूर्ण करने में संलग्न हो जायें।अब प्रश्न उठता है कि कर्तव्य कौन से हैं जिन्हें पूरा करना है-

  पहला कर्तव्य शरीर की सही देखभाल करना है।इस अनमोल मशीन के उपयोग में कितनी सावधानी की आवश्यकता है,यह हम सब अच्छी तरह जानते हैं।शरीर के उपरांत अपनी मानसिक शांति को स्थिर रखने का सतत प्रयत्न करना चाहिए।

      प्रश्न उठता है कि हम आगे कैसे बढ़ें? हमारी उन्नति का उद्गम स्थान हमारी आत्मा है।यदि अपनी आत्मा में भटकते हुए मन को इष्ट भावना पर आरूढ़ कर लिया तो कार्य अत्यन्त सुगम हो जाएगा।हमारा एक-एक विचार हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करता है।जैसा हम सोचते-विचारते और बोलते हैं,जैसी भावनाओं में निरंतर रमण करते हैं,उसी के अनुसार हमारा पथ प्रशस्त होता है।अतः आन्तरिक  ईश्वरीय शक्तियों के विकास की आवश्यकता है ।

   इसके लिए कुछ उपाय निम्नलिखित हैं-

१ सद् ग्रन्थों का अध्ययन 

२महापुरुषों की जीवनी,उनके भाषण और प्रवचन 

३ संसार का भ्रमण और क्रियात्मक अनुभव 

४ समाज में रह कर ज्ञान प्राप्त करना

५ बातचीत,लेखन तथा कहानी एवं लेख के द्वारा 

   मार्ग थोड़ा कठिन अवश्य है पर प्रयत्न करते रहने से सब संभव हो जाता है।हमारी दुर्बलताएँ हमें इस पथ पर चलने नहीं देतीं ,मन बार-बार विद्रोह करता है,कारण हैं हमारी पंचेन्द्रियाँ ।

   पंच इन्द्रियों को देह रूपी रथ को खींचने वाला अश्व माना गया है।आत्मा उस रथ में सवार है।रथी को ध्येय पर ले जाने के स्थान पर ये अश्व विषयों की खाई में ला गिराते हैं ।अतः इनको वश में करके नियत मार्ग पर चलाने के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है।

    भगवान कृष्ण ने गीता में इन्द्रियों को नियंत्रित करने के विषय में अर्जुन को समझाते हुए कहा है कि यद्यपि मन वायु की भाँति चंचल है और उसको नियंत्रित करना कठिन है फिर भी निरंतर अभ्यास और दृढ़ निश्चय के द्वारा इसे वश में किया जा सकता है।

    अतः निरंतर अभ्यास करें,अपने अंदर जो ईश्वरीय शक्तियाँ हैं उन्हें बाहर आने दें,यही दैवी संपदा है जिसके बल पर आप कल्याणकारी मार्ग के अनुयायी हो सकते हैं।

धन्यवाद।

सरोजिनी चौधरी

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

सीता जी के जन्म संदर्भो का विश्लेषण

 लेखक: डॉ हिमांशु शेखर

दिनांक 22 मार्च 2024 को रामायण रिसर्च काउंसिल की ओर से माता सीता के प्राकट्य क्षेत्र सीतामढ़ी में 55 एकड़ में मंदिर और 251 फीट ऊँची प्रतिमा स्थापित करने का समाचार दिया गया। माता सीता को भगवती के रूप में बताया गया है, जबकि माता सीता को महालक्ष्मी का रूप माना जाना चाहिए। 

राम कथा को समेटे विभिन्न प्रामाणिक ग्रंथो में राम की अर्धांगिनी सीताजी के जन्म के संबंध में अलग अलग राय व्यक्त किए गए है| समय के प्रवाह के हिसाब से सीताजी के जन्म के समय का सही उल्लेख ठीक से नही मिलता है| साथ ही, जन्म स्थल का भी स्पष्ट सूचक नही उपलब्ध है| इस आलेख में सीता जी के जन्म स्थल, जन्म के समय और पूर्व जन्म के संदर्भो के आलोक में पौराणिकता को अक्षुण्ण रखते हुए तथ्यात्मक विश्लेषण का प्रयास किया गया है| इसमें कोई निष्कर्ष नही है, सिर्फ एक मत है, सिर्फ आधुनिक समाज के लिए एक व्याख्या प्रस्तुत की गई है|

 

वाल्मीकि रामायण:

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 66वें सर्ग में राजा जनक सीता जी के जन्म के बारे में ब्रह्मर्षि विश्वामित्र को बताते है|

न्यासभूतं तदा न्यस्तमस्माकं पूर्वजे विभौ।

अथ मे कृषतः क्षेत्रं लांगलादुत्थिता ततः॥ १३॥

क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता।

भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा॥ १४॥

वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा।

भूतलादुत्थितां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम्॥ १५॥

 

उनके अनुसार यज्ञ के लिए भूमि निर्माण का काम हल चला कर करने का वर्णन है| साथ ही सीताजी जी के भूमि से उत्पन्न होने का जिक्र है, उन्हें भूमिजा कहा गया है, अयोनिजा कहा गया है| नामकरण के सन्दर्भ में लिखा है कि हल से जोतने पर जमीन पर बनी रेखा (क्यारी) को सीता या हराई (कही कही सीताजी को हरजाई देवी भी कहा जाता है, जो माता लक्ष्मी का रूप है) कहा जाता है| इसी जमीन पर बनी पंक्ति के कारण सीता नाम दिया गया था| ऐसा भी वर्णित है कि राजा जनक ने सीताजी को वीर्यशुल्का कहा है, अर्थात जिससे परिणय के लिए पराक्रम प्रदर्शित करना पड़े| जो प्रचलित कथाएँ है उससे कई जगह पर वाल्मीकि रामायण अलग कथा देता है| कुछ तथ्य द्रष्टव्य है|

1.    भूमि शोधन का कार्य यज्ञ के लिए था, न कि किसी अकाल के निवारण के लिए|

2.    भूमि शोधन के स्थल की जानकारी नहीं दी गई है|

3.    सीता जी जनक और सुनयना की पुत्री नही थी|

4.    सीता जी जमीन से उत्पन्न हुई थी|

5.    सीता जी का नाम जोती गई जमीन पर बनी रेखाओं (जिन्हें सीता या हराई कहा जाता है) से प्राप्त होने के कारण सीता पडा|

6.    सीता जी के जन्म की तारीख या समय का पता नही चलता है| 

परन्तु इंटरनेट पर कई विद्वान् वाल्मीकि रामायण का नाम लेकर कुछ अन्य कथा ही कहते रहते है|

 

श्रीरामचरितमानस:

श्रीरामचरित मानस में कही भी सीता जी के जन्म का सीधे उल्लेख नही है| उनके लिए प्रयुक्त उपमाओं से थोड़ी बहुत जानकारी मिल सकती है| बालकाण्ड से कुछ द्रष्टव्य दृष्टांत अवलोकनार्थ नीचे है:

जनकसुता जग जननि जानकी। 

अतिशय प्रिय करुना निधान की।। : 1/18

अर्थात, जनकसुता-मांडवी, जगजननि-श्रुतिकीर्ति, जानकी-उर्मिला और अतिशय प्रिय- रामबल्लभा सीताजी हैं| इस व्याख्या या अनुवाद पर भी कुछ मतभेद है, क्योकि जानकी से सीता जी का भी बोध एक मान्य अवधारणा है| इस व्याख्या की जगह ये भी माना जा सकता है कि चारो उपमाएं सीताजी के लिए ही हो|

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।

सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्।  सोपान 1/ श्लोक 5

अर्थात सीता जी को ब्रह्म की तीन क्रियाओं उद्भव, स्थिति, संहार, की संचालिका तथा आद्याशक्ति, शुभ करने वाली, दुःख हराने वाली, तथा राम की पत्नी कहकर उनके सामने नत होने की बात की गई है|

तात जनक तनया यह सोई। 

धनुष जग्य जेहि कारन होई।। 231/1

अर्थात, यह धनुष यज्ञ जिनके कारण हो रहा है, वो जनकतनया है|

इन सबमें सीता जी के बारे में न जन्म का दिन या समय बताया गया है, न जन्म स्थान का वर्णन है, न जन्म के बारे में कोई जानकारी है|

 

रामकथा के अन्य सन्दर्भ:

ब्रह्मवैवर्त पुराण में भगवती सीता जी के पूर्वजन्म का वर्णन है| कुशध्वज नामक राजा ने कठिन तपस्या द्वारा भगवती लक्ष्मी को प्रसन्न किया| धन धान्य से परिपूर्ण होने के साथ साथ माता लक्ष्मी ने पुत्री के रूप में उसकी साध्वी पत्नी मालावती की कोख से जन्म लिया| वो कन्या सूतिका गृह से ही स्पष्ट स्वर में वेद के मंत्रो का उच्चारण करते हुए उठ खडी हुई| इसलिए उनका नाम वेदवती रखा गया| भगवान नारायण की प्राप्ति के लिए वो वन की ओर तपस्या के लिए चल दी| बहुत तपोबल एकत्र होने के बाद भी, अगले जन्म में ही भगवान श्रीहरि को पति रूप में पाने की आकाशवाणी हुई| पर उसकी तपस्या जारी रही| इसी समय रावण उधर से गुजरा और उसपर मोहित होकर उसका शृंगार खंडित करने की चेष्टा करने लगा| तपोबल से वेदवती ने रावण को स्तंभित कर दिया| तब रावण ने उनका मानस स्तवन किया| वेदवती ने परलोक में उसकी स्तुति का फल मिलना स्वीकार किया| साथ ही उसे शाप दिया – “तू मेरे लिए ही अपने बंधू बांधव सहित काल का ग्रास बनेगा| तेरे द्वारा काम भाव से स्पर्श के कारण मै अपने इस शरीर का त्याग करती हूँ|” वेदवती ने अपना शरीर त्याग दिया और अगले जन्म में वो जनक की कन्या हुई, जिसका नाम सीता था| सीता जी के जन्म स्थान और काल के बारे में यह पुराण कोई जानकारी नही देता है|

श्री विष्णु पुराण भी सीता जी के जन्म के सन्दर्भ में कुछ भी प्रामाणिक नही दे पाता है| इसके चतुर्थ अंश के चतुर्थ अध्याय में संक्षेप में राम कथा दी गई है| और उसमें सीता के जन्म को खोजना बहुत ही मुश्किल है| उसमें लिखा है – “जनकगृहे च माहेश्वरं चापमनायासैनैव बभंज सीतान्चायोनिजां जनकराजतनयां वीर्य्यशुल्कां लेभे|42|”

यहाँ सीताजी को अयोनिजा तो कहा गया है, पर जन्म की विधि नही दी गई है| साथ ही वीर्यशुल्का अर्थात परिश्रम कर, सामर्थ्य दिखला कर, पराक्रम कर पत्नी रूप में प्राप्त करने का वर्णन भी है| एक और उपमा भी है – जनक राज तनया अर्थात राजा जनक के तन से उत्पन्न| पर यह उपमा अन्य विशेषणों के साथ अपवादस्वरूप लगती है| सीता जी को राजा जनक के तन से उत्पन्न होने को अयोनिजा और वीर्यशुल्का दोनों गलत ठहराते है|

अद्भुत रामायण का उल्लेख अनुसार सीता राजा जनक की अपनी पुत्री नहीं थीं। धरती के अंदर छुपे कलश से प्राप्त होने के कारण सीता खुद को पृथ्वी की पुत्री मानती थीं। ‘अद्भुत रामायण’ में उल्लेख है कि रावण कहता है कि- “जब मैं भूलवश अपनी पुत्री से प्रणय की इच्छा करूँ, तब वही मेरी मृत्यु का कारण बने।” रावण के इस कथन से ज्ञात होता है कि सीता रावण की पुत्री थीं। ‘अद्भुत रामायण’ में उल्लेख है कि गृत्स्मद नामक ब्राह्मण लक्ष्मी को पुत्री रूप में पाने की कामना से प्रतिदिन एक कलश में कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूंदें डालता था। एक दिन जब ब्राह्मण कहीं बाहर गया था, तब रावण इनकी कुटिया में आया और यहाँ मौजूद ऋषियों को मारकर उनका रक्त कलश में भर लिया। यह कलश लाकर रावण ने मंदोदरी को सौंप दिया। रावण ने कहा कि यह तेज विष है। इसे छुपाकर रख दो। मंदोदरी रावण की उपेक्षा से दुःखी थी। एक दिन जब रावण बाहर गया था, तब मौका देखकर मंदोदरी ने अपनी मृत्यु के लिए कलश में रखा रक्त पी लिया। इसके पीने से मंदोदरी गर्भवती हो गयी, जिससे सीताजी का जन्म लिखा गया है|

इस कथा का सन्दर्भ देकर कई विद्वान वेदवती को रावण और मंदोदरी की पुत्री के रूप में जन्म लेना बताते है| पर वेदवती के शाप में रावण की मृत्यु का कारण बनाना लिखा है, रावण की पुत्री बन कुल का नाश करना नही लिखा है| ये जोडी गई कथाए है| उसमें वेदवती के शाप को बदला गया है, पुत्री पर मोहित होने पर रावण की मृत्यु का वरदान ब्रह्मा जी से मिलना बताया गया है, मंदोदरी का रक्त पीने से गर्भवती होना बताया गया है, सीताजी को मंदोदरी की पुत्री बताया गया है, आदि| ये सब तंत्र साधना या पैशाचिक कथा का भाग हो सकते है, और आधुनिक काल में लिखे होने के कारण ये अनावश्यक भ्रामक प्रचार भर रह जाता है| अदभुत रामायण सही मायने में अद्भुत है और राम - कथा को विकृत कर देता है|

आध्यात्म रामायण/बालकांड/ सर्ग 6 श्लोक संख्या 59-60, और 65, जनकजी के कथन की ‘वाल्मीकीय रामायण’ से तुलना कीजिए।

यज्ञ भूमि विशुद्ध्यर्थम् कर्षतो लाङ्गलेन मे ।

सीतामुखात्समुत्पन्नाकन्यका शुभ लक्षणा॥

तामद्राक्षमहं प्रीत्यापुत्रिकाभाव भाविताम्।

अर्पिता प्रियाभार्यायै शरच्चन्द्रनिभानना ॥

योगमायापि सीतेति जाता वै तव वेश्मनि।

अतस्त्वं राघवायैव देहि सीता प्रयत्नत: ।॥

अर्थात, सीताजी भूमि शोधन के समय हल के अग्र भाग से उत्पन्न, पुत्रिका भाव से पोषित, योगमाया और रामजी की प्राणबल्लभा हैं।

कंब रामायण सीताजी को लक्ष्मी का अवतार मानता है (बालकाण्ड: अध्याय 10 मिथिला दर्शन पटल)| और सीताजी की उत्पत्ति धरती से यज्ञ के लिए भूमि जोतते समय जुए के फाल से प्रगट होना लिखा है (बालकाण्ड: अध्याय 12 धनुर्भंग  पटल)| रंगनाथ रामायण में यज्ञ के लिए भूमि शोधन करते समय हल की फाल रेखा (जिसे सीता नाम दिया गया है) से एक मंजूषा मिलने का वर्णन है, जिससे अत्यंत प्रभा संपन्न कन्या सीता के निकलने का वर्णन है (बालकाण्ड: 32: शिव धनुष का वृतांत)| प्रेम रामायण सीताजी को भी महत्त्व देता है और उसमें पहला काण्ड है - मिथिला काण्ड| इसमें सीताजी की जन्म तिथि तथा अन्य कई सन्दर्भ भी दिए गए है| जनक जी को पुत्री की अभिलाषा से हल चलाने की प्रेरणा भगवान शिवाजी से मिली|

दोहा 126 के बाद की चौपाई:

शुक्ल नवमि तिथि माधवमासा | 

अभिजित प्रियदिन मध्यप्रकाशा ||

अब नरनाह समय शुभ आवा | 

करहु भूमि करषण सुख छावा ||

इसके बाद हल के एक स्थान पर रुकने का जिक्र है, जहां पर एक प्रकाशमान सिंहासन पर बैठी सीता जी (लक्ष्मी जी की अवतार) का जमीन से ऊपर आने का वर्णन है| इसमें सीताजी की स्तुति (दोहा 130 के बाद) भी दी गई है, जो मुनि, देव और ऋषियों ने की है| फिर राजा जनक को पिता कहना और उनके कहने पर सीताजी का बालरूप में प्रकट होना भी लिखा गया है|

 

विश्लेषण तथा अवलोकन:

सर्वप्रथम जन्म तिथि के संबंध में मनाई जाने वाली जयंतियो से ऐसा प्रतीत होता है कि दो तिथियाँ प्रचलन में है:

  1.    फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी 
  2.             वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी

पहली तिथि को सीता अष्टमी के नाम से जाना जाता है और ऐसा लगता है कि इस दिन माता सीता धरती पर अवतरित हुई थी| दूसरी तिथि सीता नवमी कही जाती है, जिस दिन महाराज जनक को ये प्राप्त हुई थी| इनकी प्रामाणिकता खोजने में बहुत सारी बाधाएँ है| दोनों तिथियों को जानकी जयन्ती के रूप में जाना जाता है| अगर इस कथा पर ध्यान दिया जाए कि खेत में हल चलाते समय या उसकी जुताई करते समय सीता जी हल से बनी दो क्यारियों (जिन्हें सीत भी कहा जाता है) के बीच मिली थी तो हमें भारत में हल चलाने के समय पर ध्यान देना होगा| ऐसा माना जा सकता है कि एक तिथि उनके धरती पर अवतरण को दिखाती है तो दूसरी तिथि राजा जनक द्वारा उनको पाने का दिन बतलाती है|

ग्रीष्मकालीन जुताई रबी मौसम की फसलें कटने के बाद शुरू होती है, जो बरसात शुरू होने पर समाप्त होती है। अप्रैल से जून तक ग्रीष्मकालीन जुताई की जाती है, जहां तक हो सके गर्मी की जुताई रबी की फसल कटने के तुरन्त बाद मिट्‌टी पलटने वाले हल से कर देनी चाहिए। अगर इस तथ्य पर ध्यान दिया जाए, तो सीता नवमी वाला दिन जानकी जयन्ती के लिए ज्यादा उपयुक्त लगता है| प्रेम रामायण इसका सत्यापन भी करता है|

महाराज जनक मिथिला के राजा थे, जिसकी राजधानी जनकपुर (अभी नेपाल में) थी| पर जनकपुर के पहाडी इलाके में हल जोतने का काम संभव नही था| इसलिए वे मैदानी क्षेत्र में आए होंगे| सीतामढी के निकट पुनौरा ग्राम में उन्होंने हल चलाया, जहाँ से उन्हें सीता जी की प्राप्ति हुई| एक सन्दर्भ में जनकपुर से 3 योजन या 40 किलोमीटर दूर हल चलाने का जिक्र है| आज के जनकपुर और सीतामढी में 54 किलोमीटर की दूरी है| सीतामढी को उनके अवतरण और जनक द्वारा पाने का स्थान माना जा सकता है|

अब बच जाती है बात जमीन से उत्पन्न होने की| सभी जीवित प्राणियों को कई भागो में बांटा जाता है – मानस, नादज, बिन्दुज, उद्भिज्ज, जरायुज, अण्डज, स्वेदज| इसमें उद्भिज श्रेणी भूमि से उत्पन्न होती है| इसमें लताए, पेड़, पौधे आदि आते है| माता सीता को भी शायद इसी श्रेणी में रखने की कल्पना की गई है, जिससे सामान्य पिंडजो या जरायुजो से उन्हें अलग दिखाया जा सके|

जिसतरह भगवान श्रीराम प्रकट हुए थे, उसीतरह सीताजी भी प्रकट हुई थी| अगर श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार थे, तो माता सीता लक्ष्मी का अवतार थी| रामायण की तर्ज पर अगर कभी सीतायण लिखी जाएगी (जो प्रेम रामायण में बहुत हद तक सार्थक है) तो शोध द्वारा सीता जी के जन्म पर सही आकलन संभव हो पाएगा| तब तक सभी से ये गुजारिश है कि ‘कहा जाता है’, ‘पौराणिक कथा में लिखा है’, ऐसे वाक्यांशों को जांच करने के बाद ही प्रयोग में लाए| सीता जी के जन्म की गुत्थी एक खुली चुनौती है, जिसके आधुनिक सन्दर्भ में स्थान और समय पर तो सहमति बनाई जा सकती है पर पूर्वजन्म और जन्म की विधि पर प्रामाणिक सन्दर्भ नही उपलब्ध है|

धन्यवाद|

 

डॉ हिमांशु शेखर

रविवार, 31 मार्च 2024

हिंदू नव वर्ष

लेखिका: अनामिका संजयअग्रवाल *मुस्कान *

भारतीय संस्कृति का पवित्र पर्व,वर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को माना जाता है।कहा जाता है कि भगवान ब्रम्हा ने इसी दिन सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी।इसी दिन भगवान विष्णु ने दशावतार में से पहला मत्स्य अवतार लेकर प्रलय काल में अथाह जल राशी में से मनु की नौका को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया था। प्रलयकाल समाप्त होने पर मनु से ही नई सृष्टि की शुरूआत हुई।

      नव वर्ष में नये सिरे से प्रकृति के नये जीवन की शुरूआत होती है।बसंत की बहार आती है।लगभग इन्ही दिनों 21 मार्च को पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरा करती है। उस वक्त दिन रात बराबर है।इसी दिन से धरती में प्राकृतिक नव वर्ष प्रारंभ होता है 

     बसंत के मनमोहक सौंदर्य की आभार यह प्रकृति रानी हरीतिमा की चुनरी ओढ़े नई दुल्हन की भांती संवर जाती है। खेतों में खिली है सरसों के पीले पीले फूल और गेहूं की बालियां मंद मंद लहराते हुए झूमती है निर्जर सघन घने जंगलों में खिले पलाश और सेमल के फूलों का अनुपम सौंदर्य मिलकर प्रकृति की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं आम्र के वृक्षों में आम्र मंजरियों से लदे वृक्षों में नई-नई सुंदर कोपलें आती हैं । कोयल की मधुर ध्वनी भौरों को आकर्षित करने लगती है चारों और प्रकृति का ही उत्सव चल रहा होता है वातारण आनंदित होकर आनन्द की अमृत वर्षा करने लगती हैं। रंगीन रंगोत्सव साथ नव संवत्सर का आगमन होता है।

प्राचीन काल में ऋतु और राशि परिवर्तन के ऐसे समय स्वयं को स्वस्थ और निरोगी रखने के लिए  सात्विक आहार व्रत उपवास से मन और शरीर दोनों को शुद्ध और सशक्त उपक्रम है। शीत और ग्रीष्म ऋतु का समागम होता है तब शरीर में वात पित्त और कफ का समायोजन घट बढ़ जाता है।तो रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है इसलिये इस समयकाल में नीम की कोमल पत्तियों को खाने से स्वास्थ्य लाभ होता है। इस समय अचानक गर्मी बढ़ जाने से बुखार मलेरिया और चेचक फैलता है अपच और उल्टी से बचने के लिये हल्काभोजन करना चाहिये ।इस समय कीट पतंगा मच्छरों का आतंक बढ़ जाता है जीससे बिमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है।वाइरस फैलते है इन सब से बचने के लिये नीम और कपूर जलाकर सकारात्मक उर्जा फैलाकर पर्यावरण को शुद्ध करते है।

पशु पक्षी और जीवजंतु में नव जीवन के संचार से नवांकुर प्रस्फुटित होने लगते हैं।

सरसो और गेहूं की लहलहाती फसलों को देखकर किसान खुशी से झुमते नाचते गाते है।

     इस समय सभी कुछ नया होता है। बच्चों की पढ़ाई का एक सत्र खत्म होता है। नये जोश के साथ नयी किताबें नयी अध्ययन सामग्री के साथ नयी कक्षायें प्रारंभ होती हैं। इसी समय 1अप्रेल से नये सत्र के वित्तीय काम प्रारंभ होते हैं। 

   वर्तमान में विश्वविख्यात स्वयंसेवी सामाजिक  संगठन राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केशवराम बलिराम हेडगेवार जी की जयंती भी इसी दिन मनाई जाती है

    भारत वर्ष के गौरव को पुनः विश्व पटल पर लाने के लिये पश्चिम अंधानुकरण के भ्रमजाल से निकलकर अपनी हिन्दू सभ्यता के नव वर्ष को मनाने की परंपरा को अपनाना चाहिये और नयी पीढी को भी यही करने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये। 

धन्यवाद।

अनामिका संजयअग्रवाल *मुस्कान *

बुधवार, 27 मार्च 2024

माटी को बचाना है

विनोद शर्मा

माटी की उपयोगिता क्या है?  इसको इस तरह से समझा जा सकता है कि यह जीवन के पांच तत्वों में से एक है | यदि माटी (भूमि) नहीं है तो जीव का कोई भी अस्तित्व ही नहीं होगा बल्कि यों कहे तो अतिशयोक्ति नही होगी कि जीव की उत्पत्ति ही नहीं हो पाएगी | ब्रह्मांड में केवल पृथ्वी पर ही जीवन है, यह परम सत्य है | संपूर्ण जगत के जीवों में मनुष्य ही एक अकेला विवेकशील प्राणी है जो अच्छे बुरे को पहचानता है | पांच तत्वों/भूतों से बने तन को चलाने या जिंदा रखने के लिए इन्हीं पांच तत्वों या इनसे ही उत्पन्न वस्तुओं या सीधे रूप से सेवन कर जीव अपना जीवन यापन करता है या ऐसा कहे कि इन पर ही आश्रित रहता है | मनुष्य को छोड़कर सभी प्राणियों में वस्तुओं के भंडारण या एकत्रीकरण की दक्षता नहीं होती है | वह तो केवल अपने वर्तमान के लिए भोजन को जुटाने के लिए व्यस्त रहते हैं, जबकि मनुष्य में वस्तुओं को एकत्र करने/ इकट्ठा करने/ धरोहर के रूप में संजोने की क्षमता के साथ-साथ अपनी असीमित इच्छाओं को पूरा करने के लालच में हर प्रकार के दोहन करने में बना/लगा रहता है और वस्तुओं के संरक्षण के विषयों को भी दरकिनाक कर देता है | इसी कारण से मनुष्य पृथ्वी पर प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं जैसे-धातुएं, वनस्पति, वन्य जीव, जल यानी नदियां झील सागर इत्यादि के संतुलन को बिगाड़ने में भी संकोच नहीं करता है | मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो खुद मनुष्यों को और दूसरे प्राणियों को अपने लिए प्रयोग में लाता है |

पृथ्वी पर जन्में सभी जीवों के भरण पोषण के लिए यह धरती/पृथ्वी भरपूर वस्तुएं प्रदान करती है | इसके अनुसार एक खाद्य श्रृंखला का निर्माण होता है, किंतु मानव धरा पर ऐसा प्राणी है जो प्रकृति द्वारा बनाए गए नियमों में अपनी सुविधा अनुसार परिवर्तन करता रहता है जिसके परिणाम स्वरुप प्रकृति का संतुलन कई बार बिगड़ने की कगार पर पहुँच जाता है या बिगड़ जाता है | देखा जाए तो इसका प्रभाव स्वयं मनुष्य के ऊपर भी अन्य जीवों के साथ-साथ पड़ता है, मगर वह ऐसा कभी नहीं सोचता है कि मुझ पर भी इन कृत्यों का क्या प्रभाव पड़ेगा | सही मायने में हमारी यह धरा सभी का भरण पोषण करने में पूर्णत: सक्षम है, लेकिन यह किसी के लालच को पूरा कभी नहीं कर सकती/कर पाती है और समय-समय पर चेताती भी/ आगाह भी करती रहती है | मनुष्य केवल अपने ही विषय में सोचता या विचार करता रहता है जिसके अनुसार वह पृथ्वी पर रहकर अपने क्रियाकलापों को कार्यान्वित करता है |

वर्तमान काल में संसार की जनसंख्या वृद्धि के कारण पृथ्वी पर उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बहुत बड़ा दबाव पृथ्वी पर ही बढ़ता जा रहा है | सभी को खाने के लिए अन्न इत्यादि की आपूर्ति हेतु मनुष्य ने आधुनिक तकनीकी ज्ञान में वृद्धि कर इसका प्रयोग करके कृषि उत्पादन के साथ-साथ औद्योगिक क्रांति लाकर सभी यातायात घरेलू उपकरण आदि के अलावा रक्षा के क्षेत्र में युद्ध के लिए शास्त्रों का जिसमें थल, जल और वायु सभी प्रकार के शास्त्रों का विकास किया है | इस प्रगतिवाद युग में होड़ के कारण पृथ्वी पर सभी ओर से बराबर दबाव बढ़ता ही जा रहा है | इन सभी को ध्यान में रखते हुए यदि हम विचार करें कि हमने धरा की मिट्टी/मृदा की क्या दशा बना दी है? कृषि उत्पादन में वृद्धि करने के लिए हरित क्रांति जैसे कार्यक्रमों को प्रोत्साहन दिया जिससे खेतों में संकर बीजों तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग अधिकतम सीमा से भी अधिक किया | आधुनिक कृषि औजारों का भी प्रयोग किया जा रहा है | कीटनाशक दवा तथा खरपतवार को नष्ट करने के लिए भी अनेक प्रकार के रसायनों का प्रयोग अत्यधिक तेज गति से किया गया है/ किया जा रहा है | 

इन सभी प्रयोगों के कारण शुरुआती वर्षों में तो प्रति एकड़ उपज की मात्रा बहुत ही उच्च स्तर से बढोतरी हुई परंतु बाद में अब धीरे-धीरे गिरावट की ओर जा रही है | ट्रैक्टरों इत्यादि के कृषि कार्य में प्रयोग करने से हमारे देश भारत में बैलों यानी परंपरागत जोत के तरीकों को पूर्णतया छोड़कर आधुनिक विधियो को अपनाया गया है | फलस्वरूप बैल धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है/गया है | इन सभी सुविधाजनक उपकरणों और रासायनिक खादों तथा अन्य दवाओं के प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता में धीरे-धीरे बड़ी गिरावट आई है | ये सभी कारक मिट्टी प्रदूषण का भी एक बड़ा कारण बना है |

इन सभी कारकों के द्वारा केवल मिट्टी की उर्वरा शक्ति ही नहीं घटी अपितु भूमिगत जल प्रदूषण की समस्या भी उभर कर सामने आई है | भूमि पर जितने भी रसायनों का प्रयोग पैदावार बढ़ाने को होता है, वे कभी समाप्त नहीं होते हैं या यूं कहें कि वे मिट्टी में ही घुल जाते हैं और रंध्रों के माध्यम से भूमि के आन्तरिक भाग में प्रविष्ट कर जाते हैं, जिससे मिट्टी और जल दोनों को प्रदूषित करते हैं | आधुनिक संकर बीजों तथा फसलों के गलत चयन (किस खेत में कौन सी फसल को बोना उचित होगा) के कारण सिंचाई के लिए भूमिगत जल का अधिक दोहन किया गया/ जा रहा है, इससे भू जल स्तर भी नीचे जा रहा है/जा चुका है | यहां पर सभी को विशेषत: किसानों का ध्यान इस ओर आकर्षित करना आवश्यक है कि खेतों में जो भी रसायन खाद, कीटनाशक और खरपतवार नाशक दवाएं डाली जाती है उससे खाद्य श्रृंखला बर्बाद होती है तथा इससे भी अधिक बात यह है कि इन सभी रसायनों का जैव आवर्धन होता है ( बायो-मैग्नीफिकेशन) अर्थात ये सभी रसायन फसलों की जड़ों के माध्यम से बीजों में जिसे मनुष्य अपने भोजन के रूप में प्रयोग करता है तथा चारे के माध्यम से पशुओं में पहुंचते हैं | साथ ही दूध और मांस आदि के माध्यम से मनुष्यों के शरीर में खाने के रूप में प्रविष्टि करता है जो पूर्णतया प्रदूषित होता है | जितना जिस गति से हम इन रसायनों का प्रयोग कर रहे हैं या बढ़ता जा रहा है उसकी उतनी ही तीव्र गति से नई-नई बीमारियां मनुष्यों और अन्य जीवों को अपनी चपेट में ले रही हैं/ लेती जा रहीं हैं |

इसमें कोई शक नहीं है कि हमें खेतों में पैदावार बढ़ानी है क्योंकि जिस तरह जनसंख्या बढ़ रही है उसी प्रकार से खाने की वस्तुओं अर्थात खाद्यान्नों की आवश्यकता भी बढ़ रही है | इसके लिए हमें उन माध्यमों के प्रयोग पर जोर देना चाहिए जिससे पैदावार भी बढ़ सके और मिट्टी तथा जल प्रदूषण होने से बचा रहे | इसके लिए हमें खेतों में जैविक खादों के प्रयोग पर जोर देना चाहिए | फसल चक्र का विशेष ध्यान रखना चाहिए, साथ-साथ खेतों में निराई गुड़ाई को करना चाहिए जिससे खरपतवार के असर को कम करने में मदद मिल सके और रसायन ना डालना पड़े | पशुधन पर ध्यान देकर जैविक खाद तथा दूध आदि के उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है |

इस प्रकार जैव आवर्धन से बचाव होगा जिससे बीमारियों का कम प्रकोप होगा | यदि हम आने वाले समय में माटी को सुरक्षित कर लेंगे तो पृथ्वी पर प्राणी जीवन को सुरक्षा प्रदान कर पाएंगे | यह सब आपसी सहयोग से ही संभव हो पाएगा वैज्ञानिक सोच समझ तथा आविष्कारों का सदुपयोग कर हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं या हमें अपना लक्ष्य प्राप्त करना चाहिए |

*माटी हमें बचानी है, जैविक खाद लगानी है, 

बैलों से खेती करनी है, पैदावार बढ़ानी है|*

धन्यवाद।

विनोद शर्मा

रविवार, 24 मार्च 2024

फेसबुक को पक्षाघात पर भक्तों का अरण्यरोदन

 लेखक: राकेश अचल

'फेसबुक ' को बीती रात अल्प पक्षाघात हुआ तो पूरी दुनिया में फेसबुक के भक्त विचलित हो गए। लगा कि जैसे किसी ने उनकी जान ही छीन ली हो। मै भी इस भक्तमंडली का सदस्य था लेकिन फेसबुक   के शांत होने के बाद मैंने भी चैन की सांस ली। मैंने बहुत कम अवसरों पर देखा है, जब लोग किसी चीज के लिए इतने परेशान और फिक्रमंद होते हैं। फेसबुक तो कोई चीज भी नहीं है। एक सेवा है किन्तु अपनी उपयोगिता की वजह से आज दुनिया के एक बड़े हिस्से के लिए प्राणवायु बन गयी है।

दुनिया में जिंदगी के लिए जैसे भोजन -पानी और आक्सीजन आवश्यक है वैसे ही अब सोशल मीडिया एक आवश्यक अवयव बन गया है ।  अकेले फेसबुक दुनिया के 1560  मिलियन लोग फेसबुक की सेवाओं से जुड़े हैं ,और ऐसे जुड़े हैं कि  कुछ समय के लिए ही फेसबुक के बंद होने से सदमे की स्थिति में पहुँच गए। फेसबुक के हितग्राहियों की दशा ऐसी हो गयी जैसे किसी सांप के मुंह से उसकी मणि छीन ली गयी हो ,या किसी मछली को पानी से निकाल कर गर्म रेत पर फेंक दिया हो। जाहिर है कि  फेसबुक ने बीस साल में ही   जनमानस पर अपना इतना प्रभुत्व बना लिया है की लोग उसके आदी हो गए हैं और एक पल भी ' फेसबुकाये ' बिना नहीं रह सकते।

फेसबुक  'अनंग  ' है। फेसबुक को शैव सम्प्रदाय का कोई ' हैकर ' ही अपनी तीसरी आँख से भस्म कर सकता है लेकिन हमेशा  के लिए नहीं। फेसबुक की मारक क्षमता से समाज ही नहीं बल्कि सियासत भी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है ,बावजूद इसके फेसबुक अपनी जगह है ,उसे मिटाने की,' हैक ' करने की तमाम कोशिशें बार-बार नाकाम हो जाती है।  5  मार्च 2024  को भी ऐसी ही कोशिशें नाकाम हुईं और लोगों ने चैन की सांस ली। सवाल ये है कि  गुण-दोषों से भरी फेसबुक आम आदमी की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन कैसे गयी  ? इसके लिए हम खुद जिम्मेदार है।  हमारी सियासत जिम्मेदार है।  जिन्होंने लगातार ऐसी परिस्थितियां पैदा की  जिसकी वजह से इंसान आपस में कटता चला गया। संवाद की सूरत लगातार कम होती चली गयी।

आज फेसबुक है तो तमाम दूसरी बुक्स बेकार है।  फेसबुक आज का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा लोकप्रिय महाग्रंथ बन चुका है। फेसबुक किसी से भेदभाव नहीं करता। फेसबुक की  अपनी दुनिया है ।  अपने कानून हैं। अपने तौर-तरीके हैं। फेसबुक की अपनी कोई भाषा नहीं है। फेसबुक   अपने उपयोगकर्ताओं को अपनी पसंद की भाषा चुनने का अवसर देती है। फेसबुक का अपना लोकतंत्र है,अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है,हालाँकि इसके अपने मापदंड हैं,सीमाएं है ।  फेसबुक भी अभिव्यक्ति की आजादी को एक सीमा के बाद पाबंद करती है किन्तु उस तरीके से नहीं जिस तरीके से आज दुनिया में तमाम  धार्मिक और लोकतांत्रिक सरकारें कर रही हैं। फेसबुक दुनिया के तमाम सत्ता प्रतिष्ठानों के लिए खतरा है। इसीलिए जब तब दुनिया के तमाम देशों की सरकारें फेसबुक   को प्रतिबंधित करने के लिए इंटरनेट को ही बंद करा देतीहैं। हमारे हिन्दुस्तान में तो ये सब आये दिन होता रहता है।

कहते हैं कि  आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है ,सो इसी तरह अमेरिका के एक कालेज छात्र मार्क जुकरबर्ग की मित्रों से जुड़े रहने की जरूरत ने 2004  में फेसबुक को जन्म दिया था जो आज दुनिया के एक बाद हिस्से की जरूरत बन चुकी है। दुनिया के के तमाम लोग जुकरबर्ग के शुक्रगुजार हैं फेसबुक बनाने के लिए। फेसबुक दुनिया का ऐसा मेला है जहाँ दशकों से गुम हुए लोग आपस में मिल जाते हैं। ये काम आसान काम नहीं है। फेसबुक ने मनुष्य के एकांत में दखल किया है ।  मनुष्य को अवसाद से बचाया भी है और सामाजिक सुरक्षा भी  दी है ,साथ ही  अश्लीलता ,घृणा भी परोसी है। फेसबुक   गोपनीयता के लिए खतरा भी है और समाज को पारदर्शिता की और भी ले जाती है। यानि फेसबुक  एक दोधारी तलवार है। ये ऐसा उस्तरा भी है जो यदि बंदर के हाथ लग जाये तो हजामत बनने के बजाय गर्दन काटने   का भी काम कर सकती है।

फेसबुक के अनेक रूप है।  फेसबुक दवा भी है और जहर भी ।  फेसबुक मनोरंजन भी देती है और विकृति भी ।  फेसबुक के पास दोस्ती  और दुश्मनी के लिए पर्याप्त समय है ।  फेसबुक राजनीतिक हस्तक्षेप भी करती है और निजता पर भी डाका डालती है। फेसबुक नशा भी है और नशामुक्ति भी। फेसबुक के समर्थक भी हैं और विरोधी भी ।  फेसबुक अबाल-वृद्ध सबकी मित्र है। सबकी अभिभावक भी है ।  सबकी हमराह,हम जुल्फ,हमदर्द, हमजोली यानि सब कुछ है। फेसबुक किसी के लिए गीता है तो किसी के लिए कुरआन । किसी के लिए बाइबल है तो किसी के लिए कुछ और। इतना रूतबा  और व्यापकता शायद किसी दूसरे माध्यम के पास नहीं हैं। 

फेसबुक से आप मनोरंजन,ज्ञानार्जन   ,व्यवसाय  ,महिमा मण्डन और मन मर्दन जो चाहे सो कर सकते है।  ये आपके ऊपर है कि  आप फेसबुक का कैसे इस्तेमाल करना चाहते है।  दुनिया में जैसे विभिन्न प्रकार के नशा से मुक्ति के लिए अभियान चलाये जाते हैं उसी तरह फेसबुक से मुक्ति के लिए भी अभियान चलाये जाते हैं। कुछ लोग 31  मई को फेसबुक   छोडो दिवस के रूप में भी मानते हैं। कुल मिलाकर फेसबुक आज मनुष्य जीवन  की प्राणवायु है। इस पर जब-जब खतरा मंडराता है दुनिया  बेचैन हो जाती है ।  इसलिए जरूरी है कि  आप फेसबुक से मुहब्बत करते हुए भी इसका कोई न कोई विकल्प खोजकर रखिये अन्यथा खुदा न खस्ता किसी दिन फेसबुक समाप्त हुई उस दिन आपकी दुनिया भी आपको समाप्त होती सी नजर आएगी। वैसे मै फेसबुक को कलियुग का असली अवतार मानता हूँ ।  प्रधानमंत्री श्री मोदी जी को मैंने कभी अवतार नहीं माना जबकि वे एक महान से महान नेता हैं। आइये हम सब फेसबुक की सलामती के लिए समवेत होकर ईश्वर से ,हैकरों से प्रार्थना करने की वे इस पाकीजा उपक्रम से छेड़छाड़ न करें और ईश्वर इसे लम्बी उम्र दे । 

धन्यवाद| 

राकेश अचल

बुधवार, 20 मार्च 2024

होली का पर्व

 लेखिका: रेखा अस्थाना

सुखद विविधताओं की मेरी जन्मभूमि भारत🌷🌹🌸🌺

ईश्वरीय कृपा से भारत एक विशाल देश है और इसमें छः ॠतुएँ क्रमवार आती जाती हैं। सभी का अद्भुत नजारा होता है।कोई किसी से कम नहीं।वर्ष  के 365 दिनों में 365पर्व मनाए जाते हैं।पर कुछ खास पर्व जैसे होली,दिवाली,दशहरा।पर्व  सदा से ही खुशहाली का कारण होते आए हैं।क्योंकि इनका सीधा संबंध फसलों से होता है।

आज मैं केवल अपने बचपन की होली वह भी प्रयागराज जो पहले इलाहाबाद के नाम से जाना जाता था ।आज से कई दशक पहले की बात है तब तीज त्योहार की अपनी ही रौनक व गरिमा होती थी।पूरा मोहल्ला एक होता था।सभी अपने अपने घरों से चंदा देते व लकड़ियां  लाकर बीच चौराहे में जहाँ होलिका दहन निश्चित किया जाता था जमा करते थे।

टेसू के फूल लाए जाते थे बढ़िया अबीर-गुलाल चंदे के पैसों से मंगवाया जाता था। वैसे तो होली की तैयारी महीनों पहले से शुरु की जाती थी।घर पर स्त्रियाँ पापड़,चिप्स,कचरी  बनाकर रखती थी ।चार -पाँच दिन पहले से गुजिया भी बनने लगती थी।घर पर ही नमकीन बनाया करती थी।

   होली  का नाम होली कैसे पड़ाअब मैंआपको इसके बारे में बताऊँगी।बिष्णुभक्त प्रह्लाद भगवान को सबसे बड़ा मानता था जब कि प्रह्लाद के पिता हरिण्याकश्पु का कहना था कि उसके आगे संसार में  कोई नहीं है बसवही भगवान है।प्रह्लाद के न मानने पर उसे नानाप्रकार के कष्ट दिए।पर भक्त के आगे तो भगवान रहते ही हैं।अंत में अपनी बहन जिसका नाम होलिका था उसको वरदान था कि वह आग में नहीं जल सकती जब वह प्रह्लाद को गोद में लेकर बैठी तो खुद जल गई और प्रह्लाद बच गए। तभी से होलिका दहन का रिवाज चल पड़ा कि इस अग्नि में प्रतिज्ञा कर अपनी सभी बुराइयों को त्याग  दो या जला दो।

तो मैं बात कर रही थी प्रयागराज के होलिकोत्सव  की।हम सब बच्चे तो कितने दिन पहले से ही होली मनाते थे पर उस खासदिन टेसू के फूलों में गर्म पानी डालकर  रखा जाता था सभी लोग अपने अपने पुराने पोशाक  में दोपहर एक बजे तक होली खेलते फिर घर आकर नहा-धोकर पकवान खाते।

अब आइए शाम के समय का दृश्य  क्योंकि यह एक सामाजिक पर्व है तो आपसी भाईचारा भी जरूरी है।हम सब नए वस्त्र पहनकर  एक दूसरे घर जाते जहाँ हमें मुँह पर गुलाल लगाकर कान में इत्र का फाहा रखा जाता था।बिना किसी भेदभाव के सबसे बड़े प्रेम से गले मिला जाता था।पूरे साल का राग-द्वेष मिट जाता था ।फिर हम खुशी खुशी गुजिया खा कर घर लौटते थे। तब प्लास्टिक का चलन न था पीतल की पिचकारी होती थी।होलिकोत्सव मिलन समारोह हफ्तों चलता था।आज जब मैं यहाँ गाजियाबाद की हालत देखती हूँ तो बस यही कहना पड़ता है----देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान , कितना बदल गया इंसान।

अहंकार और अहं जिसमें भी आ गया उसका अंत निश्चित जानों।क्योंकि हिरण्याकश्पु स्वयं को भगवान  मानने लगा था तो उसने प्रह्लाद को मरवाने के लिए एक लोहे के खंभे को खूब लाल कर गर्म किया और प्रह्लाद से कहा  क्या तेरे भगवान इस खंभे में भी हैं तब उसने कहा सर्वत्र।तो आज्ञा मिली इसे गले लगाओ ।कुछ पल प्रह्लाद ने खंभे को निहारा उसे एक छोटी चींटी आती जाती दिखाई दी तब प्रह्लाद ने सोचा अवश्य ही यह भगवान  का संकेत है।वह खंभे से लिपट गया खंभा फटा और नृसिंह भगवान अवतरित हुए उन्होंने हिरण्याकश्पु को अपनी जांघ में लिटा कर उसका पेट चीर दिया और एक अहंकारी राक्षस का अंत हो गया।सच ही कहा गया है--

भक्तों के सिर पर भगवान का हाथ होता है।

जाको राखे साईयाँ मार सके न कोई।

अब आते हैं हम होली बसन्त ऋतु की पूर्णिमा को मनाई जाती उसके पश्चात हिन्दू नववर्ष प्रारम्भ होता है।मौसम सुहावना व सुखद होता है चारों ओर की सुन्दरता देखते ही बनती है। रबी की फसल पकने को तैयार है ।इसी कारण लोग गेहूँ व चने की बालें लाकर होलिका को समर्पित करते हैं ।गाँव में रात में फाग गाए जाते हैं।गेहूँ और चने की बालों होलिका में समर्पित करते हैं फिर उसका प्रसाद सभी को देते हैं।इसमें भाव यह होता है जो प्रभु तुमने  दिया वह तुमको समर्पित। 'इदम न मम'आज के युग में न संस्कार  न संस्कृति न हर्ष  न उल्लास ।सबके मनोरंजन के अपने अपने साधन हैं।हमारा बचपन जिसे आज भी हम हृदय से न निकाल पाए अभी तक।अब किसी भी त्योहार में खुशी कम दिखावा ज्यादा।चने के बालों को भूनने से उसका नाम होरहा पड़ गया।

  क्योंकि होली का पर्व  आने वाला है इस कारण  मुझे अपने बचपन की  याद आ गई ।इसलिए यह लेख लिखा।

धन्यवाद| 

रेखा अस्थाना

ब्लॉग का अद्यतन पोस्ट :

कैसे लिखें, अच्छी कविता..? भाग 02

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