मंगलवार, 11 जून 2024

आतंकवाद

लेखिका: सरोजिनी चौधरी 

आये दिन समाचारपत्रों में तथा न्यूज़ चैनलों पर 

आतंकवाद की खबर देखकर मन आक्रोश से भर जाता है। आख़िर कब तक बेगुनाह जनता इन मुट्ठी भर आतंकवादियों के आतंक का शिकार होती रहेगी।बल और अधिकार की प्राप्ति का यह अर्थ बिल्कुल नहीं होता कि उस बल का प्रयोग निर्बल को संतानें के लिए किया जाए। अचानक मुझे कवि नीरज की ये पंक्तियाँ याद आ गईँ—

अब तो मज़हब भी कोई ऐसा चलाया जाए

जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए

आग बहती है जहाँ गंगा में झेलम में भी

कोई बतलाए कहाँ जा के नहाया जाए।

   आतंकवाद से त्रस्त जनता के लिए कोई स्थान सुरक्षित नहीं है।कभी दिल्ली,कभी मुंबई,कभी श्रीनगर,आए दिन धमाकों की आवाज़ से लोग धुएँ और राख की चादर से लिपट जाते हैं। पटरी पर चलते जीवन के पहिए पटरी से उतर जाते हैं।जब तक लोग हादसे को भुला सामान्य होते हैं तब तक एक नया हादसा हो जाता है।

  हमारे देश में कुछ ऐसे तंत्र हैं जो मौक़े का फ़ायदा उठाने ,एक दूसरे को भला-बुरा कहने,दंगा-फ़साद फैलाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करते।वे तो ऐसे अवसर की प्रतीक्षा में आँखें बिछाये रहते हैं।

   आतंकवाद से केवल हमारा देश ही त्रस्त नहीँ है बल्कि पूरी विश्व ही त्रस्त है।

 अमेरिका,ब्रिटेन आदि देश इसके दंश का अनुभव कर चुके हैं। भारत ने बार-बार दुनिया को ध्यान दिलाया है कि इन आतंकवादी शक्तियों को पड़ोसी देशों में आश्रय मिल रहा है प्रशिक्षक प्रेरणा के रूप में ।प्रमाणों से सिद्ध जिन आरोपों को भारत लंबे समय से अमेरिका के समक्ष रख रही है,उस ओर अमेरिका का रुझान क्यों नहीं है?


उभरते हुए खतरे

कई आतंकवादी संगठनों में एक-दूसरे के साथ सहयोग करने तथा आवश्यक रूप से वैचारिक बंधनों की भागीदारी किये बिना शस्त्रों की आपूर्ति, संभार तंत्र और यहाँ तक कि प्रचालनात्मक समर्थन के रूप में संपर्क निर्मित करने का सामर्थ्य है। ऐसे नेटवर्क अपने विनाशात्मक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिये संगठित आपराधिक संगठनों से भी समर्थन प्राप्त करने में सक्षम हैं।

21वीं सदी में आतंकवाद ने नवीन और अधिक घातक आयाम प्राप्त कर लिया है। उन सामग्रियों और प्रौद्योगिकी जिनमें पूर्व की तुलना में बहुत अधिक विनाशक क्षमता है, तक पहुँच ने भी आतंकवाद द्वारा उत्पन्न खतरे की प्रकृति को बढ़ा दिया है।

एक बहुसांस्कृतिक विश्व में प्रवासियों की बड़ी आबादी और आवागमन के विविध मार्गों वाली सीमाओं का अर्थ है कि प्राय: इंटरनेट का प्रयोग करते हुए आतंकवादी विचारधारा के प्रचार के माध्यम से उत्पन्न स्लीपर सेल लोकतांत्रिक देशों के राष्ट्रीय ढाँचे को खतरा पहुँचाते हुए पाँचवा कॉलम बन सकते है।

किसी देश में शत्रु देश के समर्थकों या उनसे गुप्त सहानुभूति रखने वाले लोगों का ऐसा समूह जो जासूसी या विध्वंसात्मक गतिविधियों में शामिल हो, उन्हें पाँचवा कॉलम (Fifth column) कहते है। 

राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार धनराशियों के तीव्रतर आवागमन के साथ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं, बैंकिंग और वित्तीय प्रणालियों का एकीकरण भी विश्व भर में आतंकवादी गतिविधियों का वित्तीयन सरल बनाता है।


भारत में आतंकवाद के नियंत्रण हेतु उठाए गए कदम

भारत विश्व में आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित देशों में से एक है। ‘इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस’ की मानें तो वर्ष 2018 भारत आतंकवाद से 7 वाँ सर्वाधिक प्रभावित देश था। आजादी के बाद से ही भारत में अनेक आतंकवादी घटनाएं घटित होती रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2001 से 2018 के मध्य भारत में आतंकी हमलों के कारण 8000 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। ऐसे में, भारत सरकार ने इसे नियंत्रित करने के लिए विभिन्न कदम उठाए हैं, जो निम्नानुसार हैं-

सभी प्रकार की आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए भारतीय संसद ने वर्ष 1967 में ‘गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम’ (UAPA) पारित किया था तथा इसे और प्रभावी बनाने के लिए वर्ष 2004 में इसमें संशोधन भी किया गया था।

भारतीय संसद में वर्ष 1987 में आतंकवादी गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए ‘आतंकवादी और विघटनकारी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम’ (TADA) पारित किया था।

वर्ष 2002 में भारतीय संसद में ‘आतंकवाद निवारण अधिनियम’ (POTA) भी पारित किया था इसका उद्देश्य भी आतंकवादी गतिविधियों से निपटना था।

भारत के मुंबई में हुए कुख्यात 26/11 आतंकवादी हमले के बाद भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय जांच एजेंसी’ (NIA) का गठन किया था।

इसके अलावा, भारत सरकार ने विभिन्न खुफिया एजेंसियों का गठन किया है, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद से निपटने के लिए कार्य करती हैं। इनमें ‘रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ (RAW), ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो’ (IB) आदि संस्थाएं प्रमुख हैं।

भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय खुफिया ग्रिड’ (NATGRID) का निर्माण भी किया है। इसका उद्देश्य विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के डेटाबेस को आपस में जोड़ना है, ताकि ये सुरक्षा एजेंसियां बेहतर सामंजस्य के साथ कार्य कर सकें।

भारत सरकार ने आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए ‘राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड’ (NSG) नामक एक अर्ध सैनिक बल का गठन भी किया है।

इसके अलावा, भारत ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ (FATF) नामक अंतर्राष्ट्रीय संगठन का भी सदस्य है, जो मुख्य रूप से धन शोधन व आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने का कार्य करती है।


उपसंहार 

मेरी राय में तो इस समस्या का समाधान सबको मिलकर ही करना होगा।इस क्षेत्र में काफ़ी कुछ किया गया है और अभी और बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।अपने ही लोग जब घातक कार्यों में लग जाते हैं तो यह चिंता का विषय हो जाता है।आवश्यकता है उनकी सोच को निर्मल करने की,जब तक अंतर से आवाज़ नहीं उठेगी कि ग़लत काम नहीं करना तब तक इसे रोकना संभव न होगा ।कुछ नियम,कुछ सतर्कता,लोगों का जागरुक होना,यह सब आवश्यक है।श्री विजय खेड़ा ने ठीक ही कहा है-“यदि हम समस्या के समाधान का हिस्सा नहीं हैं तो स्वयं एक समस्या हैं।”

धन्यवाद|

लेखिका का जीवन परिचय

इलाहाबाद में पली-बढ़ी सरोजिनी जी की शिक्षा वर्तमान प्रयाग राज (इलाहाबाद) में संपन्न हुई।विवाहोपरांत जबलपुर में रहना हुआ। तेईस वर्ष तक अध्यापन कार्य करने के उपरांत सेवानिवृत्त हो गईं।लेखन कार्य में रुचि पहले से ही थी।समय मिलने पर कविताएँ लिखती थीं,उनकी कई कविताएँ समाचार-पत्रों में छपती थी।करोना काल में ऑन लाइन पटल मिला और तब से लेखन कार्य को गति मिली।

अब विभिन्न पटलों से जुड़ी हुई ऑन लाइन और ऑफ लाइन कवि सम्मेलनों में भाग लेती हैं।आपकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं-पहली “काव्य-नीर” और दूसरी “शब्द पंख बन उर से निकले”।कई साझा संकलन भी प्रकाशित हुए हैं जैसे किलकारी,ऊर्जिता,सबके राम,माँ मान बेटी सम्मान,बापू आदि।

      लम्हे ज़िंदगी के द्वारा साहित्य भूषण,साहित्य सुगंध ,साहित्य विभूषण एवं साहित्य संयोग तथा अन्य मंचों के द्वारा सम्मानित निरंतर साहित्य साधना में लगी हुई हैं।

सोमवार, 10 जून 2024

जेठ की तपती दोपहरी और वृक्षारोपण

लेखिका: डॉ पूर्णिमा शर्मा 'कात्यायनी'

जेठ की तपती दुपहरी में हमारी उम्र के बहुत से लोगों को याद आता होगा अपने गाँव के घर का चबूतरा और उसके बीचों बीच सर ऊँचा किये खड़ा नीम का पेड़ | किसी के घर में खड़े जामुन-आम-अमरूद के पेड़ मुस्कुराते रहते होंगे | तो किसी के घर के बाहर बरगद और पीपल के वृक्ष आग उगलती दोपहरी से राहत दिलाने शीतल हवा घर के भीतर पहुँचाते होंगे | और तुलसी गुलाब तो हर घर के आँगन में सुगन्धित हवा लुटाते ही रहते होंगे | पर आज वो ये सब केवल कल का सपना भर बनकर रह गया है | आज हम पण्डितों तथा ज्योतिषियों द्वारा निर्दिष्ट तुलसी विवाह, वट-पीपल के वृक्ष की पूजा जैसे धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन तो करते हैं, किन्तु इस सबके मूल में निहित महान और उदात्त भावना पर विचार नहीं करते |

मनुष्य अपने जीवन यापन के लिए प्रकृति पर निर्भर है यह सत्य है | 

किन्तु सभ्यता की अन्धी दौड़, शहरीकरण के दबाव, बढती जनसँख्या और आधुनिकीकरण की उत्कट लालसा ने सबसे अधिक प्रहार प्रकृति पर ही किया है | फिर चाहे वह नदियों का दोहन हो अथवा जंगलों की कटाई | आज जिस तरह तेज़ी से जंगल काट काट कर रातों रात पहाड़ों को नंगा करते हुए हम कंक्रीट के जंगल खड़े करते जा रहे हैं उसके सामने क्या हम अपने लिए विनाश का द्वार नहीं खोल रहे ? हम वृक्षों पर कुल्हाड़ी चलाते हुए एक पल को भी नहीं सोचते कि इसी तरह चलता रहा तो एक दिन हम बस घरों के भीतर एयरकंडीशनर की नकली हवा और सूर्य के प्रकाश का भ्रम देते दूधिया बल्वों की चमक पर ही आश्रित होकर रह जाएँगे जिसके फलस्वरूप अनेक रोगों का शिकार होकर अपने विनाश को ही आमन्त्रित करेंगे |

मनुष्य को अनादि काल से ही अपने दिन प्रतिदिन के कार्यों में लकड़ी की आवश्यकता रही है | लोग उस समय सादा व शान्त जीवन जीने के आदी थे | जनसँख्या सीमित होने के कारण लोगों के निवास की समस्या भी उस समय नहीं थी | इस प्रकार किसी भी रूप में पर्यावरण प्रदूषण से भी लोग परिचित नहीं थे | फिर भी उस समय का जनसमाज वृक्षारोपण के प्रति तथा उनके पालन के प्रति इतना जागरूक और सचेत था कि वृक्षों के साथ उसने भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित कर लिये थे | यही कारण था कि भीष्म ने मुनि पुलस्त्य से प्रश्न किया था कि “पादपानां विधिं ब्रह्मन्यथावद्विस्तराद्वद | विधिना येन कर्तव्यं पादपारोपणम् बुधै ||” अर्थात हे ब्रह्मन् ! मुझे वह विधि बताइये जिससे विधिवत वृक्षारोपण किया जा सके | – पद्मपुराण 28/1

भीष्म के इस प्रश्न के उत्तर में पुलस्त्य ने वृक्षारोपण तथा उनकी देखभाल की समस्त विधि बताई थी | उसके अनुसार जिस प्रकार हिन्दू मान्यता के अन्तर्गत व्यक्ति के विविध संस्कार किये जाते हैं जन्म से पूर्व से लेकर अन्तिम यात्रा तक उसी प्रकार वृक्ष के भी किये जाते थे | बीज बोने के समय गर्भाधान संस्कार की ही भाँति धार्मिक अनुष्ठान किये जाते थे | जैसे जैसे बीज अँकुरित होता जाता था, उस पर पत्तियाँ फूल फल आदि आते जाते थे – हर अवसर पर कोई न कोई धार्मिक अनुष्ठान किया जाता था | किसी वृक्ष की पत्तियाँ कब तोडनी हैं, किस प्रकार तोडनी हैं इस सबका पूरा एक विधान होता था | उस समय तो औषधि के निमित्त भी वृक्षों की ओर ही देखा जाता था – तो उस सबके लिए भी पूरा विधान था कि किस वृक्ष का कौन सा अंग किस रोग में काम आता है और किस प्रकार उसे तोडना चाहिए तथा तोड़ने से पूर्व किस प्रकार धार्मिक अनुष्ठान आदि के द्वारा वृक्ष से आज्ञा लेनी चाहिए | साथ ही यह भी आवश्यक था कि एक व्यक्ति जितने वृक्ष काटेगा उसके दुगुने वृक्ष लगाएगा भी और उनकी देखभाल भी करेगा |

सम्भवतः विधि विधान पूर्वक वृक्षारोपण तथा नियमित वृक्षार्चन आज की व्यस्त जीवन शैली को देखते हुए हास्यास्पद प्रतीत हो – किन्तु सामयिक अवश्य है | वृक्षों का विधिपूर्वक आरोपण करना, सन्तान के समान उन्हें संस्कारित करना तथा देवताओं के समान प्रतिदिन उनकी अर्चना का विधान कोरे अन्धविश्वास के कारण ही नहीं बनाया गया था – अपितु उसका उद्देश्य था जनसाधारण के हृदयों में वृक्षों के प्रति स्नेह व श्रद्धा की भावना जागृत करना | ये समस्त तुलसी विवाह, वट-पीपल आदि के वृक्ष की पूजा आदि भी इसी प्रक्रिया के ही अंग थे | स्वाभाविक है कि जिन वृक्षों को आरोपित करते समय सन्तान के समान माँगलिक संस्कार किये गए हों, देवताओं के समान जिन वृक्षों की नियमपूर्वक श्रद्धाभाव से उपासना की जाती हो उन्हें अपने किसी भी स्वार्थ के लिये मनुष्य आघात कैसे पहुँचा सकता है ? वेदी व मण्डल बनाने का उद्देश्य भी सम्भवतः यही था कि लोग आसानी से वृक्षों तक पहुँच न सकें | उस समय वनों की सुरक्षा तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता किसी दण्ड अथवा जुर्माने के भय से नहीं थी – अपितु वृक्षों के प्रति स्वाभाविक वात्सल्य ए़वं श्रद्धा के कारण थी |

दैनिक जीवन में लकड़ी की आवश्यकता से कभी भी इनकार नहीं किया जा सकता और इसके लिए वृक्षों की कटाई भी आवश्याक है | किन्तु, उपरोक्त समस्त पौराणिक तथ्यों में से कुछ भी यदि हम स्वीकार कर लें तो वृक्षों की कटाई के बाद भी वृक्षों का अभाव और उस अभाव से होने वाले दुष्परिणामों से हम स्वयं को, अपनी आने वाली कई पीढ़ियों को और प्रकृति को बचा सकते हैं…

धन्यवाद।

---कात्यायनी

सोमवार, 6 मई 2024

शिक्षा का महत्व

 स्कूली छात्रों और बच्चों के लिए शिक्षा पर लेख...

लेखक: डॉ.अवधेश तिवारी "भावुक"

शिक्षा एक महत्वपूर्ण उपकरण है जो हर किसी के जीवन में बहुत उपयोगी है। शिक्षा ही हमें पृथ्वी पर मौजूद अन्य प्राणियों से अलग करती है। यह मनुष्य को पृथ्वी पर सबसे बुद्धिमान प्राणी बनाता है। यह मनुष्यों को सशक्त बनाता है और उन्हें जीवन की चुनौतियों का कुशलतापूर्वक सामना करने के लिए तैयार करता है। जैसा कि कहा गया है, हमारे देश में शिक्षा अभी भी एक विलासिता बनी हुई है न कि एक आवश्यकता। शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए पूरे देश में शैक्षिक जागरूकता फैलाने की जरूरत है। लेकिन, शिक्षा के महत्व का विश्लेषण किए बिना यह अधूरा है। केवल जब लोगों को एहसास होता है कि इसका क्या महत्व है, तो वे इसे अच्छे जीवन के लिए एक आवश्यकता मान सकते हैं। शिक्षा पर इस लेख में, हम शिक्षा के महत्व को देखेंगे और यह कैसे सफलता का द्वार है।

गरीबी और बेरोजगारी को दूर करने में शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है । इसके अलावा, यह वाणिज्यिक परिदृश्य को बढ़ाता है और देश को समग्र रूप से लाभान्वित करता है। इसलिए, किसी देश में शिक्षा का स्तर जितना ऊँचा होगा, विकास की संभावनाएँ उतनी ही बेहतर होंगी।

इसके अतिरिक्त यह शिक्षा व्यक्ति को विभिन्न प्रकार से लाभ भी पहुँचाती है। यह व्यक्ति को अपने ज्ञान के उपयोग से बेहतर और सूचित निर्णय लेने में मदद करता है। इससे व्यक्ति की जीवन में सफलता दर बढ़ती है।

इसके बाद, शिक्षा एक बेहतर जीवनशैली प्रदान करने के लिए भी जिम्मेदार है। यह आपको करियर के अवसर प्रदान करता है जो आपके जीवन की गुणवत्ता को बढ़ा सकता है।

उसी प्रकार शिक्षा भी व्यक्ति को स्वतंत्र बनाने में सहायक होती है। जब कोई व्यक्ति पर्याप्त रूप से शिक्षित होगा, तो उसे अपनी आजीविका के लिए किसी और पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। वे अपने लिए कमाने और अच्छा जीवन जीने के लिए आत्मनिर्भर होंगे।

सबसे बढ़कर, शिक्षा व्यक्ति के आत्मविश्वास को भी बढ़ाती है और उन्हें जीवन में चीजों के बारे में निश्चित बनाती है। जब हम देशों के नजरिए से बात करते हैं, तब भी शिक्षा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पढ़े-लिखे लोग देश के बेहतर उम्मीदवार को वोट देते हैं। यह किसी राष्ट्र के विकास और प्रगति को सुनिश्चित करता है।

यह कहना कि शिक्षा ही आपकी सफलता का द्वार है, अतिशयोक्ति होगी। यह उस कुंजी के रूप में कार्य करता है जो कई दरवाजों को खोलेगी जो सफलता की ओर ले जाएंगी। बदले में, इससे आपको अपने लिए बेहतर जीवन बनाने में मदद मिलेगी।

एक शिक्षित व्यक्ति के पास दरवाजे के दूसरी तरफ नौकरी के ढेर सारे अवसर इंतजार कर रहे होते हैं। वे विभिन्न विकल्पों में से चुन सकते हैं और ऐसा कुछ करने के लिए बाध्य नहीं हैं जो उन्हें नापसंद हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा हमारी धारणा पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। यह हमें सही रास्ता चुनने और चीजों को केवल एक के बजाय विभिन्न दृष्टिकोण से देखने में मदद करता है।

धन्यवाद।

डॉ.अवधेश तिवारी "भावुक"

गुरुवार, 2 मई 2024

श्रवण कुमार की तथ्यात्मक कथा

 

लेखक: डॉ हिमांशु शेखर

 

रामकथा की भूमिका में श्रवण कुमार की कथा का बहुत बड़ा योगदान है, पर इसकी कथा, नाम, और घटनाक्रम पर अलग अलग अवधारणाएं दिखाती है| प्रचलित अवधारणा के अनुसार श्रवण कुमार नाम के एक माता पिता के भक्त का जिक्र उद्धृत किया जाता है, जिसने अंधे माता पिता को कंधे पर लादकर तीर्थ यात्रा करवाई थी| इस दौरान दशरथ के बाणों से गलती से उसका वध हो गया था| इस मूल कथा में कई घटनाएँ कथा-वाचको द्वारा प्रसिद्धि के लिए जोड़ दी गई है| श्रवण कुमार के माता पिता जन्मांध नही थे, बल्कि ब्रह्मा के शाप के कारण पुत्र को देखते ही अंधे हो गए थे| एक कथा में श्रवण कुमार के माता पिता जन्मांध थे और तपस्या द्वारा उन्होने श्रवण कुमार को पुत्र रत्न के रूप में प्राप्त किया था| एक अन्य कथा में श्रवण कुमार की पत्नी द्वारा सास ससुर की उचित देखभाल नही होने के कारण श्रवण कुमार ने अपने माता पिता के साथ घर छोड़ दिया था| एक और अवधारणा के अनुसार आँख का अंधा नाम नयनसुख की तर्ज पर कम सुनाने वाले बालक का नाम श्रवण कुमार रख दिया गया था| इस कथा के सन्दर्भ और उसकी पौराणिक प्रामाणिकता पर एक नजर डालने की आवश्यकता है|

 

वाल्मीकि रामायण:

अयोध्या काण्ड का सर्ग 63 और 64 मुनि कुमार के वध की कथा और उसके माता पिता से दशरथ को मिलने वाले शाप का वर्णन करता है| राम, लक्षमण और सीता को वन में छोड़कर वापस लौटे सुमंत्र से मिलने के बाद दशरथ ने ये कथा कौसल्या को सुनाई है| सर्ग 63 का शीर्षक है – “राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनि कुमार के मारे जाने का प्रसंग सुनाना|” जब दशरथ राजकुमार थे तो अपने शब्दबेधी बाण की प्रशंसा सुनकर एक बार वो वर्षा ऋतु की ऊषा काल में सरयू तट पर शिकार करने के लिए गए| उन्हें पानी का घडा भरने का शब्द सुनाई पडा, जिसे उन्हें हाथी द्वारा सूंढ़ से पानी पीने का भ्रम हो गया| प्रत्यक्ष नही दिखने के कारण शब्द का अनुसरण करते हुए छोड़ा गया तीर एक पुरुष के आर्तनाद के रूप में उन्हें सुनाई दिया| पास पहुँच कर, दशरथ को पता चला कि एक मुनि कुमार उनके बाण से मरने की कगार पर पहुँच गया है|

लक्षयामास स ऋषिश्चिन्ताम मुनिसुतस्तदा|

ताम्यमानम स मां कृच्छ्रादुवाच परमार्थवित्|48|

मुनि कुमार का नाम यहाँ कही भी नही दिखता है| उसने बताया कि निकट ही एक कुटिया में उसके अंधे, बूढ़े, दुर्बल और लाचार माता पिता रहते है| वो उनके लिए ही जल लेने आया हुआ था| उसने स्पष्ट किया कि उसके वैश्य पिता और शूद्र जातीय माता से जन्म लेने के कारण दशरथ को ब्रह्म-ह्त्या का पाप नही लगेगा|

इसके आगे की कथा सर्ग 64 में दी गई है जिसका शीर्षक है – “राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुखी हुए उनके माता पिता के विलाप और उनके दी हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना|” इसमें शाप का जिक्र इस प्रकार है:

पुत्रव्यसनजमं दु:खं यदेतन्मम साम्प्रतं|

एवं त्वं पुत्रशोकेन राजन कालं करिष्यसि|54|

 

अन्य राम कथा सन्दर्भ:

तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस के अयोध्या काण्ड में अध्याय 86: दशरथ-सुमंत्र संवाद, दशरथ मरण में श्लोक 154 के बाद दूसरी चौपाई के अंश है:

तापस अंध साप सुधि आई|

कौसल्यहि सब कथा सुनाई||

इसमें न नाम दिया गया है, न घटनाक्रम है, न कथा दी गई है, सिर्फ एक शाप की ओर इशारा भर है|

कंब रामायण में अयोध्या काण्ड के अध्याय 4: नगर निष्क्रमण पटल में कैकयी के राम वन गमन का प्रस्ताव को सुनकर व्यथित महाराजा दशरथ महारानी कौसल्या को पूर्व काल में एक मुनि द्वारा प्राप्त शाप की कथा सुनाते है| दशरथ हाथियों के आखेट के लिए एक वन में गए थे, जिसमें अपने पुत्र पर आश्रित एक वृद्ध अंधे ब्राह्मण मुनि और उनकी अंधी पत्नी रहते थे| पुत्र द्वारा नदी से जल भरने के शब्द को हाथी द्वारा उत्पन्न ध्वनि मानकर महाराजा दशरथ ने शर संधान कर उसे बेध दिया| छटपटाते व्यक्ति ने अपना नाम सुरेचन (श्रवण कुमार नही) बताया और हाथी के भ्रम में हुई गलती के दोष से दशरथ को मुक्त बताया| जब दशरथ अंधे दंपती की पिपासा शांत करने पहुंचे तो व्याकुल होकर उन्होंने शाप दिया – “तुम भी हमारे जैसे ही पुत्र के विरह में स्वर्ग जाओगे|” यहाँ कुछ बाते द्रष्टव्य है:

  1. राम के वन गमन के पूर्व दशरथ ने ये कथा कौसल्या को सुनाई है|
  2. तीर्थ यात्रा की बात नही लिखी है|
  3. बेटे की पत्नी का जिक्र नही है|
  4. नदी का नाम नही बताया गया है|
  5. बेटे को ब्राह्मण कुमार बताया गया है|
  6. बेटे का नाम श्रवण कुमार नही है, सुरेचन है|
  7. पानी भरने के स्वर से हाथी का भ्रम हुआ था|

रंगनाथ की तेलुगु में लिखी रामायण (अयोध्या काण्ड, अध्याय 22, दशरथ का कौसल्या को अपने शाप का वृत्तांत सुनाना) के अनुसार दशरथ द्वारा गलती से मारे गए युवक का नाम यज्ञदत्त था, जो सरयू नदी से जल कलश भरने आया था| कलश में जल भरने की ध्वनि को हाथी समझकर दशरथ द्वारा चलाए गए शब्द बेधी बाण से युवक की मृत्यु हुई थी| युवक ने स्पष्ट किया कि उसके (अंधे, दीन और वृद्ध) वैश्य पिता और शूद्र माता का पुत्र होने के कारण दशरथ को ब्राह्मण ह्त्या का पाप नही लगेगा| निकटवर्ती  पहाड़ के पास एक वटवृक्ष की कोटर में उसने माता पिता को एक कांवर में रखने की बात कही थी| इसमें पुत्र की अंत्येष्टि करने के बाद उसके माता पिता की मृत्यु दशरथ को शाप देकर होती है – “तुम भी हमारे समान ही पुत्र शोक के कारण मृत्यु को प्राप्त करोगे|यहाँ कुछ बाते द्रष्टव्य है:

  1.     राम के वन गमन के बाद मंत्री सुमंत के लौटने के बाद दशरथ ने ये कथा कौसल्या को सुनाई है|
  2.      तीर्थ यात्रा की बात नही लिखी है, बल्कि वटवृक्ष की कोटर को स्थायी निवास के रूप में बताया गया है|
  3.        बेटे की पत्नी का जिक्र नही है|
  4.        नदी का नाम सरयू बताया गया है|
  5.        बेटे को ब्राह्मण कुमार नही बताया गया है|
  6.        बेटे का नाम श्रवण कुमार नही है, यज्ञदत्त है|
  7.        पानी भरने के स्वर से हाथी का भ्रम हुआ था|

चंद्रा झा की मैथिली भाषा रामायण में इस घटना का जिक्र (पानी पिलाने से दशरथ को शाप तक) है पर नाम की जगह सिर्फ मुनि लिखा है|

मुनि हम दशरथ भूप, 

जल भरइत मारल वृथा ||69||

जानल नहि ई रूप, 

गज भ्रम सौ अपराध बाद ||70||

बूढ़ बूढइ कय विविध विलाप | 

मरण समय हमरहु देल शाप ||92||

हमर पुत्र सुख कयलह हरण | 

पुत्र वियोगहि तोहरो मरण ||93||

 

विचित्र रामायण, जैन रामायण, प्रेम रामायण में यह प्रकरण नही खोजा जा सका|

 

श्रवण कुमार सन्दर्भ

अब उन राम कथाओं को देखते है, जहां श्रवण कुमार नाम का जिक्र है| गिरधर रामायण में प्रचलित कथाओं की तरह वर्णन (बालकाण्ड, अध्याय 9: श्रवण वध) है – महाराज दशरथ का आखेट के लिए सरोवर (सरयू तट या नदी तट नही) पर जाना, युवक का नाम श्रवण कुमार बताना, युवक को ब्राह्मण कुमार बताना, माता-पिता का अँधा-बूढा होना, श्रवण कुमार का उन्हें कांवर में लेकर तीर्थयात्रा करना, दशरथ का कमंडल में पानी भरने के स्वर को मृग (पशु) का स्वर समझना, दशरथ का शब्दबेधी बाण का प्रयोग, श्रवण कुमार की मृत्यु, उनके माता-पिता का दशरथ को पुत्र वियोग में मृत्यु का शाप देकर प्राण त्यागना| गिरधर रामायण के संदर्भित पद (श्रवण नाम का सत्यापन, शाप का जिक्र) नीचे दिए गए है:

नाम सत्यापन

ते समे ब्राह्मण श्रवण नामे, वृद्ध अंध मातपिताय,

ते फरे तीरथ-अटण करतो, धरि कावड काय|23|

दशरथ को शाप

एवुं कही धरणी ढल्या, मूर्च्छा थई तव आप,

अन्तकाले रायने, वे जणे दीधो शाप|39|

पुत्र-विजोगे प्राण तारा, जजों सत्य वचन,

एवुं कही वे मरण पाम्याँ, राय कंप्या मन|40|

ये दशरथ का आत्मकथ्य है और पुत्र वंचित रहने के बाद भी इस शाप में दशरथ को पुत्र प्राप्ति का बीज दिखा|

हनुमन्नाटक में भी श्रवण कुमार नाम का जिक्र तीसरे अंक में (प्रथम पद में ही) है पर पूरी घटना का विवरण नही दीखता है|

भुक्त्वा भोगान्सुरंगान्कतिपयसमायं राघवो घर्मपत्न्या

सार्धं वर्धिष्णुकाम: श्रवणमुनिपितु: प्राप् हा! शाप्कालम|1|

श्रवण मुनि के पिता द्वारा दिए गए शाप का समय आने के कारण सूर्य की किरणे मलीन होने की बात यहाँ की गई है, पर शाप का कारण नही बताया गया है| पर श्रवण कुमार नाम का सत्यापन होता है| इस श्लोक के बाद होने वाले अपशकुन की लम्बी सूचि दी गई है| राम के वनगमन के बाद वन से लौटे सुमंत्र को देखकर दशरथ ने प्राण त्याग के पूर्व भी शाप का स्मरण किया था|

श्रुत्वा सुमंत्र वचनेन सुतप्रयाणम शापस्य

तस्य च विचिन्तय विपाकवेलाम|

हां राघवेति सकृदुश्चरितं तृपेण

निश्वस्य दिर्घतरमुच्छ्वासितम न भूय: |7|

आनंद रामायण के सारकांड के प्रथम सर्ग में श्रवण कुमार की कथा का वर्णन है| एक रात राजा दशरथ शिकार के लिए वन में गए| वहां जल को रोका कर उन्होंने कई शिकार किए| तब उस जगह अपने माता पिता को अपने कंधो पर लागाकर तीर्थाटन के लिए वाराणसी ले जाने वाला वैश्य कुमार श्रवण आया|

चकार वारिबंध चावधीद्वन्चराम बहून |

एतस्मिन्नन्तरे तत्र वने वरनासिपथा ||87||

करन्डस्थौ स्वपितरौ स्वस्कंधे श्रवानो वहन |

काशीं नेतुं यायो विश्वो धर्मबाधा भयान्निशि ||८८||

पानी भरने के स्वर को हाथी का स्वर समझ कर दशरथ द्वारा बाण से उसे घायल करना, उसकी मृत्यु, उसके माता पिता को जल पिलाने दशरथ का जाना और पुत्र शोक से मृत्यु का शाप पाना इसमें वर्णित है|

दशाराथाय तौ शापं ददतु: पुत्रदु:खितौ |

पुत्रशोकादावयोहि यथा मृत्युस्तवास्थिति ||95||

मराठी में लिखे श्री रामविजय रामायण के तीसरे अध्याय में भी श्रवण कुमार ही अपने माता पिता को कांवड में लेकर दिन की उष्णता से बचाते हुए रात में यात्रा कर रहा था| पूरी घटना इसमें वर्णित है|

तों ते मार्गी श्रवण | 

आला मायबाप घेऊन ||

दिवसा बहुत विघ्ने आणि ऊष्ण | 

म्हणोनि रात्री गमन करी|| 30 ||

एक सरोवर के निकट पानी पीने के लिए वे रूके| श्रवण कुमार द्वारा जल भरने के स्वर को पशु का स्वर समझ कर दशरथ ने बाण छोड़ दिया और उसकी मृत्यु हो गई| उसके माता पिता ने मरने से पहले दशरथ को पुत्र शोक में मृत्यु का शाप दिया|

मग ती शाप देती प्राण जातां | 

म्हणती तुझाही पुत्र पुत्र करितां |

प्राण जाईल रे दशरथा | 

आम्हां ऐसाचि तत्काल ||54||

 

संदर्भो की व्याख्या:

यह बात स्पष्ट है महाराजा दशरथ को शाप की कथा हर राम कथा बताती है| पर हर कथा में युवक का नाम, गोत्र आदि अलग अलग है| मूलत: ये कथा दशरथ कौसल्या को सुनाते है| कथा के उदघाटन का समय भी अलग अलग है, पर हर ग्रन्थ में यह अयोध्या काण्ड का ही हिस्सा है| कुछ राम कथाओं में तो इसका जिक्र ही नही है|

एक बात सोचने योग्य है कि अगर पुत्र के विरह को शाप में डाला गया था, तो पहले भी विश्वामित्र के साथ राम लक्ष्मण वन को गए थे| उस समय भी पुत्र शोक वाली स्थिति बन रही थी| पर उस समय तो कोई विलाप नही दिखता है| उस सन्दर्भ में प्राणांत करने वाली किसी पीड़ा का भी वर्णन नही मिलता है| यह बात भी अचंभित करती है|

कई बार इस शाप को इसतरह भी व्यक्त किया जाता है कि महाराज दशरथ को अपने पुत्र होने का पता पहले से था| तो ये शाप एक तरह से दशरथ को पुत्र पाने का पूर्वानुमान था| स्पष्ट है कि अगर पुत्र ही नही होगा तो पुत्र शोक कैसे होगा! साथ ही यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि अगर पुत्र पाना नियति थी, तो पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ का विधान अनावश्यक था| पुत्र नही होने के लिए राम कथा में व्यर्थ की चिंता व्यक्त की गई है|

सबसे बड़ी विडम्बना है मुनिकुमार के नाम को लेकर जिसपर रामायण, रामचरितमानस, कंब रामायण, रंगनाथ रामायण आदि अलग अलग राय रखते है| आधुनिक सन्दर्भ में ऐसा माना जा सकता है कि वह मुनि कुमार माता पिता का इतना आज्ञाकारी था कि उसे केवल निर्देश लेकर उसपर अमल करना आता था| वो पूरे शरीर से केवल श्रवण ही करता था| सामान्य जन बोलते भी है, सोचते भी है, पर वो केवल श्रवण ही करता था| इसलिए उसका नाम आरम्भ में उपालंभ के तौर पर श्रवण कुमार रख दिया गया, जो कालान्तर में अर्थ संकोच द्वारा माता पिता के अंध आज्ञाकारी बेटे का पर्याय बन गया| इस नाम की उत्पत्ति प्रामाणिक ग्रंथो में खोजना सही नही लगता है क्योकि ये मूल कथा से जुड़ा एक सहयोगी दृष्टांत है| पर नाम की उत्पत्ति खोजने में शायद नाम का अर्थ दिशा निर्देश देने में सक्षम है|

धन्यवाद| 

डॉ हिमांशु शेखर

रविवार, 28 अप्रैल 2024

होली , प्रकृति और आत्मा

लेखिका: डॉ.रश्मि चौबे

होली का दिन था ।सुबह से सभी बड़ों और छोटों को होली की बधाई देना लेना हो रहा था। आज रोशनी के घर उसकी कुछ सहेलियां आई हुई थीं होली मिलने रोशनी के पैर में चोट आने के कारण और उसके परिवार में  सूतक है(किसी की मृत्यु या जन्म होने पर 10या13दिन लगता है)।कल होली खेलने सोसाइटी में नहीं गई इसलिए वहां की सारी सखियां  मिलने चली आई थीं। रंगों में मिले केमिकल के कारण या खाने की वजह और गीले होने के कारण किसी को बुखार,तो किसी की आँख में रंग चला गया, चाय पीते हंसी ठहाकों के साथ सभी जिंदगी के रंगों और रूपों पर चर्चा कर रहे थे ।सभी कह रही थीं पिछली बार की होली कितनी अच्छी थी रोशनी सचमुच बहुत अच्छी व्यवस्था थी और हमने बहुत इंजॉय किया था । रोशनी अचानक उनके जाने के बाद एकांत में बैठी तो जैसे कलम ने कहा कि, विचारों के रंगों को पन्नों पर उडेल दो, होली है भाई। रोशनी पिछली होली की और इस बार की होली की तुलना करने लगी ।पिछले वर्ष अपने कर्तव्यों को निभाते हुए सोसायटी के लोग अच्छे से होली का आनंद उठा पाऐं इस व्यवस्था के कार्यभार को सुचारू रूप से निभाने में लगी हुई उसने  समाज में व्याप्त अनेक रंगों में स्त्री पुरुषों की मानसिकता समझी ।कुछ लोग सहयोग दे रहे थे उसके साथ तो, कुछ उसकी बनी बनाई बात को बिगाड़ने में लगे हुए थे ।सच ,आज समाज में एक के साथ एक ग्यारह नहीं बल्कि एक से घटकर शून्य करने की मानसिकता अधिक प्रबल है। स्वयं के नाम के लिए इंसान अच्छे से अच्छे कार्यक्रम में जहर फैलाने में माहिर दिखाई देते हैं । तभी उसे याद आया कि ,कुछ दिन पहले ही ज्यादातर युवा जो उससे मिले थे, उसके पूछते ही कि आप क्या कर रहे हैं? उत्तर में कहा कि, मनोविज्ञान में एम.ए. कर रहे हैं ,इसका बहुत स्कोप है आंटी।इन शब्दों का अर्थ शायद समझ आज आ रहा था । इस बार की होली में पैरों में चोट के कारण वह होली खेलने के लिए तो जा नहीं पाई।रोशनी ने सोचा बचपन से ही उसे होली कहां पसंद थी पर शादी के  बाद होली खेल लेती थी पर आज विचार उसे कुछ और ही समझना चाहते थे।

 उसे अचानक में घर में अलग-अलग तरह के रंग दिखाई देने लगे सर्वप्रथम उसे खाने की टेबल पर रखे हुए  हरेअंगूर और केसरिया संतरे, लाल सेब और पीला पपीता फलों में अलग-अलग रंग टेबल पर दिखाई देने लगे फिर जैसे ही वह भोजन की व्यवस्था देखने गई तो उसे दिखा कि, हरे रंग की मूंग दाल ,काले रंग की उड़द दाल, लाल रंग की मसूर और पीला चना और सब्जियां भी अलग-अलग रंग की रंगों से भरी हुई फ्रिज खुला तो लाल टमाटर, हरी मिर्च, बैगनी रंग का बैगन ,पीले रंग का नींबू अलग-अलग रंग दिखाई दे रहे थे।सतरंगों से सजा हुआ घर फिर जैसे ही वह बालकनी में गई तो प्रकृति कह उठी देखा, तुमने पौधों में पानी देकर मुझे पीले गेंदे ,नीली अपराजिता ,लाल रुकमणी के फूल ,सफेद सदाबहार और हरे पौधे से सतरंग कर दिया है तुमने मुझे रंग दिऐ हैं इसलिए आज मैंने  तुम्हारे घर को रंगों से भर दिया है । उसकी नजर हाथ में पहने नवरत्न और रंगे हुए नाखूनों पर भी पडी रंग ही रंग दिखाई देने लगे ।शाम हुई तो सामने चाँदनी की रोशनी के रंग दिखाई दिए।उसे याद आया सुबह सूरज भी होली खेलने आया था फिर ,सामने की भी चारों ओर जो कारें सड़क पर चल रही थीं उनकी लाइटें थीं। उसके प्रकाश ने उसका ध्यान आकर्षित किया, लाल रंग की और सफेद रंग की कार की लाइट दिख रही थी वो सब प्रकृति में रोशनी भरते हुए लग रहे  थे और कहीं ना कहीं रोशनी आत्मा को भी प्रकाशित कर रही थी।

 अचानक गुड़िया ने कहा आंटी आपकी चाय और अंकल की कॉफी दोनों एक ही टेबल पर  रख दिए हैं और साथ ही साथ मोबाइल पर ग़ज़ल गूंज रही थी और  पति साथ-साथ गा रहे थे ‘आप जिनके करीब होते हैं ,वह बड़े खुशनसीब होते हैं ।समझ में आ गया था ईश्वर ने समझा दिया था कि, होली तन को नहीं मन को भी रंगती है।रोशनी को महसूस हो रहा था कि , परमात्मा के रंगों ने चारों ओर से रंग दिया है । बेटे ने भी वीडियो काल पर इंद्रधनुष (रेनवो) दिखाकर कहा माँ विदेश में होली नहीं होती पर ये रंग आपके लिए हैं। रोशनी भाव विभोर हुई।दूसरे दिन सुबह-सुबह रोशनी की भाभी (जोदिल्ली वीजा बनवाने आई थी रोशनी के घर ठहरी थी)ने उठकर कहा कि,दीदी मैं आपके मंदिर में पूजा कर देती हूं। रोशनी के कहा ,कहा सब रंगों के फूल तोड़कर प्रभु को अर्पित कर दो और फिर वो गाने लगी ‘आप जिनके करीब होते हैं, वह बड़े खुशनसीब होते हैं ‘पंकज उदास कलाकार तो चले गए पर उनके गाए शब्द बहुत कुछ समझा गए।

जिस दिन मैंने ये लेख लिखा मेरे पतिदेव ने एयरपोर्ट से फूलों की पिचकारी का फोटो भेजा जैसे मेरे लेख पर मोहर लग गयी।

धन्यवाद।

डॉ.रश्मि चौबे , गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत

गुरुवार, 25 अप्रैल 2024

वनवासा रिसार्ट

लेखिका: डॉ पूजा भारद्वाज


दोस्तों  तो हम और हमारी धन्नो  (टोयोटा इनोवा क्रिस्टा)  निकल चुके है ,एक नई मंजिल की ओर जहां मिलेंगी  कुछ मन लुभाने वाली यादें और नए चेहरे मुस्कान लिए हुए 

अरे अरे ये बताना तो भूल ही  गई कि हम जा कहां रहे हैं, हम जा रहे हैं देवभूमि उत्तराखण्ड के ऋषि कन्न्व की नगरी कोटद्वार के पास  "वनवासा " जो एक बहुत खूब सूरत रिजॉर्ट जो स्थित है  कोटद्वार से कुछ किलोमीटर दूर काला गढ़ टाइगर रिजर्व में, तो देरी किस बात की शुरुवात करते है अपने सफर की...

28/3/2024 को हम  सुबह ६ बजे  बजे निकल पड़े , मेरठ होते हुए  करीब 8:30 से हम चीतल ग्रैंड होटल पहुंच गए,पर किसी को भूख नही लग रही थी,तो हमने सिर्फ प्रसाधन इस्तेमाल किया और आगे निकल गए , खतौली चीनी मिल हमारे रास्ते में पड़ी और जगह जगह पर गुड बनाने वाले कोल्हू चल रहे थे , हम 90s के गीत सुनते और गुनगुनाते हुए जा रहे थे ,अब करीब 10:00 बजे  बिजनौर से आगे भूख लगने लगी उसके बाद हमें अच्छा ढाबा या कोई  रेस्ट ओ रेंट नहीं मिला , खाना खाना करते हुए हम पहुंचे कीरतपुर वहां मिला हमको एक पंजाबी ढाबा और बस आलू प्याज के स्वादिष्ट परांठा और छाछ मीठी लस्सी अब पेट भरा और जान में जान आई।

11:30 बजे हम कणव नगरी कोटद्वार पहुंच गए ,कोटद्वार में हनुमान जी का प्रसिद्ध मंदिर भी है , सिद्धबली मंदिर जिसकी मान्यता है की यहां जो कोई अपना बोला हुआ प्रसाद भूल जाता है तो यहां आ कर प्रसाद बांटने से सब काम सिद्ध हो जाते है ,जय बजरंग बली


कोटद्वार से शुरू होती है पहाड़ों की चढ़ाई , क्योंकि वहां से 70 किलोमीटर दूर था   वनवासा रिजॉर्ट और यहां पहुंचने का रास्ते काला गढ़ टाइगर रिजर्व से हो कर गुजरता है,आगे चले तो कुछ छोटे छोटे गांव मिले और फिर शुरू होता है "कालागढ़ टाइगर रिजर्व " जिस के बीच में से होते हुए अपनी मंजिल तक पहुंचना था,रास्ते में जंगल के बीच हमने यादें संजोने के लिए कुछ तस्वीरें ली।


और करीब 2:20 पर हम रिजॉर्ट  पहुंचने वाले ही थे कि देखा  वहां भू स्खलन होने की वजह से एक विशाल पत्थर सड़क के बीच में पड़ा है और उसको हटाने के लिए विस्फोट की तयारी हो रखी है , वहा एक आदमी खड़ा था  वो पास आया और बोला की आप अपनी गाड़ी पीछे ले जाओ ,यहां ब्लास्ट किया जा रहा है ,पहले तो लगा आना बेकार हो गया पर उसने कहा ब्लास्ट के बाद आप जा सकते हो ,अब गाड़ी यू टर्न तो हो नहीं सकता था तो सब ने गाड़ी रिवर्स लेली ,और कुछ ही सेकंड में इतनी जोरदार धमाका हुआ की सब डर गए , फिर रास्ता साफ हुआ और हम सभी  पहुंच गए अंततः अपने वनवासा रिजॉर्ट 😀 आ कर स्वागत पेय से स्वागत हुआ और कमरे दिए गए सामान रखा और लंच का समय हो चुका था ,लंच किया और आराम किया क्योंकि 7 घंटे गाड़ी में थकान तो होती है, बच्चे स्विमिंग पूल में चले गए ,7 बजे से मैजिक शो देखा,फिर लाइव म्यूजिक एंड डिनर ,डिनर के बाद सब ने मिलकर कुछ खेल खेले और एक दिन इस तरह एक समाप्त हुआ। वनवासा रिजॉर्ट  का रोजाना का एक रात्रि का चार्ज ७ से ८ हजार रुपए है जो के एक कपल के लिए है, जिसमें,ब्रेक फास्ट डिनर,लंच तीनों मिलते है जब कभी सुकून और शांति की तलाश हो तो एक बार जरूर आए अपने दोस्त और परिवार के साथ 

दूसरे दिन  हम सब लंच के लिए करीब 9: 45 पर पहुंचे ,लंच किया वहा कई और लोग आए हुए थे ,तो जैसा मेरा व्यवहार है मैं उन लोगों से बात करने चली गई ,जहां मेरी मुलाकात एक पहाड़ी परिवार से हुई , वैसे तो वह लोग दिल्ली में रहते है , मेरी बात हुई कुसुम नेगी जी से बात हुई ,उन्होंने बातों बातों में बताया हम यहां अपने गांव जागर करने आए थे ,जागर के बाद हमने सोचा थोड़ा आराम कर लिया जाए तो रिजोर्ट आ गए ,

मैंने कहा :जागर ये क्या होता है पहली बार नाम सुना ,

कुसुम जी ने बताया कि जागर मतलब जागरण हमारे यहां  पूरे कुनबे के साथ मिलकर ये पूजा की जाती है ,कोई कहीं भी रह रहा हो पर उसे जागर के लिए आना पड़ता है

इसमें ग्राम देवताओं की पूजा की जाती है ,जिसमें हम अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए और कुछ गलती हुई हो उसके लिए माफी मांगते है और पूजा करते है,मुझे वैसे भी ऐसी बातें जानने का शौक है मैं उनकी बातें बड़ी गौर से सुन रही थी ,

कुसुम जी ने मुझे एक बात और बताई की एक परिवार पूरी तरह संपन्न था ,अचानक उनके घर बीमारी बढ़ने लगी ,तो वह अपने गांव आए और खोज ने लगे की हम से क्या गलती हुई है या क्या भूल रहे है हम जिस की वजह से ये सब हो रहा है कई महीने बीत गए,एक दिन अचानक एक १० साल की लड़की सामने आई और बोली की तुम इतने साल मुझे ही ढूंढ रहे हो ,मैं तुम्हारी दादी हूं , मैं भी सरप्राइज़ थी ये क्या है, क्योंकि आज कलयुग में कोई इन बातों को नहीं मानता पर फिर भी अपनी मान्यता है ,मैंने पूंछा फिर क्या हुआ कुसुम जी हंस गई ,मैंने कहा प्लीज़ बताओ मैं कल चली जाऊंगी ,फिर कहा आप से मुलाकात होगी ,तो उन्होंने बताया की वह लड़की इतना बोलते ही भाग गई उन्होंने उसका पीछा किया ,तो लड़की बदली बदली नज़र आई ,जब जाने लगे तो फिर बोली की तुम्हारे दादा जी ने दूसरी औरत  की वजह से  मुझे घर से निकल दिया था और मेरा हक तुम लोग निभा रहे हो अब तुम सब  अपने पूरे खानदान को लेकर आओ जागर करो तब शांत सब ठीक होगा फिर उन्होंने अपने सात पीढ़ी के लोगों को जागर के लिए सूचना दी सब गांव में एकत्र हुए और पूजा अर्चना की।

बस मस्ती ,बहुत सारी फोटो क्लिक की,वहां रिजॉर्ट से थोडी सी दूरी पर एक दुकान थी मैं वहां चली गई  और उनसे बात की पहाड़ों पर रहन सहन की ओर दिन में  स्विमिंग पूल का ओर शाम  को लाइव म्यूजिक और डीजे  पर नृत्य का आनंद लिया और खूब नृत्य किया।अगले दिन ब्रेकफास्ट कर के निकल ही रहे थे की बहुत तेज तूफ़ान और खूब तेज बारिश हो गई और थोड़ी ठंड बढ़ गई थी ,जिसे कहते है गर्मी में ठंड का एहसास 😂 फिर हम निकले घर के लिए और कुछ 30 किलोमीटर जा कर हमें रास्ते में बंदरों का झुंड दिखा और दिखा बारहसिंगा  क्योंकि वो रास्ता जंगल का होता है कालागढ़ टाइगर रिजर्व का मगर टाइगर नही दिखा। और हम एक सुखद अनुभव लेकर अपने घर आ गए , क्योंकि जितना सुकून और शांति अपने घर में है कही  नही।

ये थी मेरे सफ़र की कुछ यादें जो हमेशा मेरे साथ रहेंगी ,आप भी पढ़े और कैसा लगा जरूर बताएं।

धन्यवाद।

डॉ पूजा भारद्वाज

सोमवार, 22 अप्रैल 2024

संत कबीरदास

 लेखिका: डॉ.रश्मि चौबे

संत कबीरदास ऐसे व्यक्तित्व के धनी हैं , जो इतिहासकार वर्कले के इस कथन की सत्यता के प्रमाण हैं कि,” युग की महान विभूतियां काल प्रसूत होती हैं ,जिसमें जनजीवन की आत्मा को जीवित रखने के लिए विरोधी शक्तियों से खुलकर संघर्ष किया, जिसका व्यक्तित्व स्वयं ही जलती मशाल था। जिसकी चमक से युग धर्म और विरोधी शक्तियां सिहर उठीं इतना ही नहीं यह कभी रहस्यवाद का अमर गायक तथा ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया ‘जैसे पदों में मानव शरीर रचना की हड्डियों की व्याख्या करता है। जो राम को अपना प्रियतम और स्वयं को उसकी बहुरिया मानता है। एक प्रियतमा के रूप में वे अपने प्रियतम पर मुग्ध हैं। उसके विरह में व्याकुल है । उनमें अनुभूति की तीव्रता और वेदना की पुकार है । इसी वियोग में अपनी सृष्टि को रंगा देखते हैं ।

सचमुच कबीर वे कवि हैं, जिनकी पताका को धर्म लोक में फहराती देखकर पीपा और रयदास विस्मय से पुकार उठे नाव नवखंड पर सिद्ध कबीरा अनेकता को मिथ्या सिद्ध करके एकता का प्रतिपादन करने वाले सारगृही महात्मा थे। उनका लक्ष्य हृदयलोक से निकलकर ज्ञानलोक ले जाना है । भावनाओं को आधार बना वे ज्ञानशिखर पर आरोहण करते हैं ।

उनके पास क्रांति दृष्टि होने के साथ ही अनंतर दृष्टि भी उपलब्ध थी। जो उस युग की विषम परिस्थितियों को भेदकर मनुष्य की पीड़ा को पहचान ही नहीं सकती थी वरना, अभिव्यक्ति भी दे सकती थी। उग्रता के साथ उनकी साधना में मस्ती है और अभिव्यक्ति में अर्थ भेदी पारदर्शिता। उनकी अखंडता और लापरवाही में उनकी सच्ची साधुता और चिंतन शीलता प्रतिबिंबित है।

कबीर जी की भाषा तो सधुक्कडी भाषा थी और उनकी भाषा में ब्रज, पंजाबी, अरबी, फारसी , राजस्थानी , तुर्की सभी के शब्द मिलते थे और वे कहते थे कि संस्कृत है कूप जल, भाषा बहता नीर। ज्यादातर संतों का सारा साहित्य मुक्तक है। दोहा शब्द रमैनी आदि में इनकी कविता आम जनता की आत्मा को झकझोर देती थी। ठेठ बोली में बिना लपेट के अपनी अनुभूति को वे इस तत्परता से रख देते थे कि, उनकी उक्तियों, रूपकों, मुहावरों में कवित्व निखर उठता है।

‘मसि कागद छुओ’ वाले कवि ‘केवल ढाई आखर प्रेम का’ पढ़े थे। कबीर की अभिव्यक्ति सिद्ध करती है कि , कबीर ज्ञान भक्ति एवं प्रेम के अगाध भंडार हैं। उनके काव्य में न शब्दों की जटिलता है न , अलंकारों का धटाटोप और न छन्दों की उछल कूद । सब कुछ स्वभाविक मानव उलट वासियों में जीवन के सत्य की यथार्थ सीधी सुरीली मधुर वंशी बज रही है । ये उलट बासियां सुलटकर जीवन का राग सुना रही हैं।

डॉ रामकुमार वर्मा के शब्दों में_” उनकी युगांतकारी कविता भक्ति की विनय शीलता और आत्मरक्षा के बीच में स्पष्ट कंठ से कही गई धार्मिक और सामाजिक जीवन की पक्षपात रहित विवेचना है।”

यह एवेलिन अंडर विल के शब्दों में-“कबीर आत्मा विस्मयकारी और परम उल्लास में साक्षात्कार के समय दैनन्दिन व्यवहार की दुनिया छोड़ नहीं जाते और साधारण मानव जीवन को भुला नहीं देते उनके पैर मजबूती के साथ धरती पर जमे रहते हैं उनके महिमासमन्वित और आवेगमय विचार दीन और सजीव बुद्धि तथा सहज भाव द्वारा नियंत्रित होते रहते हैं जो सच्चे मार्ग मर्मी कवियों में ही मिलते हैं।”

कबीर जी पेसे से बुनकर थे पर यह समाज के लिए 600 साल पहले ऐसी बातें बुनकर चले गए कि उनके बगैर भारत की कहानी अधूरी है। कहते हैं -कबीर हर इंसान के अंदर हैं जरूरत है उन्हें ढूंढने की । कबीर ना हिंदू हैं ना मुस्लिम हैं, ना अमीर हैं ना गरीब हैं, कुछ लोग तो इन्हें भगवान का अवतार मानते हैं और कहते हैं ‘सब पीरन के पीर’ कुछ निर्गुण संत, कुछ लोग सतगुरु, तो कुछ कवि, तो कुछ राम के भक्त कुछ लोग फकीर कहते हैं । कबीर दास जी बनारस के थे । काशी के पास लहरतारा तालाब है । जहां कबीर की मूर्ति है । जो कमल के फूल पर है। कहते हैं, विधवा ब्राह्मणी की कोख से पैदा हुए और वो उनको छोड़कर चली गयी ।कबीर जी लहरतारा तालाब में कमल पुष्प पर बाल स्वरूप में नीरू और नीमा को प्राप्त हुए थे । ऐसा कहना है। परंतु यहां कोई ऐतिहासिक तथ्य की व्यंजना प्रस्तुत नहीं हुई । वे मुस्लिम थे या हिंदू थे या तुर्क थे इससे कबीर दास जी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

ज्ञानामार्गी शाखा के कवि जैसे कि, कबीर दास जी मलूक दास जी सूरदास जी नानक देव जी इन की विचार धारा क्रांतिकारी विचारधारा के रूप में विख्यात है। यह किसी निश्चित दार्शनिक मत का प्रतिपादन नहीं करते। उनकी जो रचना है वह लोक भाषा और लोग जगत के घटनाओं पर आधारित है और यह कहते हैं कि- तू कहता कागज की लेखी ,मैं कहता आंखन की देखी।संत काव्य धारा में गुरु को ईश्वर से भी ऊपर रखा है -गुरु गोविंद दोऊ खड़े ,काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो बताए।।कबीर जी के गुरु रामानंद जी थे। जिन्होंने पहले तो इन्हें शिष्य बनाने से मना कर दिया लेकिन बाद में इनसे प्रभावित हुए और शिष्य बनाया। कबीर दास जी का कहना है कि, अनुभव ही सबसे बड़ा गुरु है। अक्षर ज्ञान प्राप्त नहीं किया था परंतु जब भी वे सत्संग करते थे तब समाज के निचले दवे लोगों की भीड़ होती थी। सत्संग बहुत ही सुंदर होता था। कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लकुटिया हाथ। जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ।।

कबीर दास जी के समय समाज में बहुत उथल-पुथल मची थी। भीष्म साहनी ने ‘कबीरा खड़ा बाजार में’ में तब के हालात का वर्णन किया है। कवि ने जो समाज में देखा उस में तरह-तरह की विशेषताएं थी। उस समय इंसान को बड़े या छोटे होने का मापदंड भाग्य तय करता था। कौन किस कुल में जन्मा है ,वही बहुत कुछ तय करता था । कवि ने कहा -जात पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि को होई।

कबीर दास जी आडंबर विरोधी थे। इन्होंने समाज में फैली अनेक प्रकार की बुराइयों का विरोध किया उन्होंने जाति प्रथा वर्ग भेद और मूर्ति पूजा, नामाज ,व्रत ,रोजा, बांग लगाना ,तीर्थयात्रा, तिलक और माला सभी का विरोध किया। उनके लिए यह सब आडंबर है। उनके अनुसार ईश्वर कण-कण में व्याप्त है।और कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा-

कांकर पाथर जोड़ कर ,मस्जिद लई बनाय। 

ता चढ मुल्ला बांग दे क्या, बहरा हुआ खुदाय।


कबीर ने ब्राह्मण को नहाते हुए देखकर कहा- 

नहाए धोए का भया जो मन मैल ना जाए, 

मीन सदा जल में रहे धोए बास ना जाए।


और माला फेरने के लिए उनके विचार थे-

माला फेरत युग गया, गया न मन का फेर ।

मन का मनका डार के, मन का मनका फेर।।


उन्होंने जीव हत्या को पाप कहा और कहा कि-

दिन भर रोजा रखत है, रात हनत हैं गाय। 

यह तो खून वो बंदगी, कैसी खुशी खुदाय।।


सन्यासियों पर व्यंग करते हुए कहते हैं-

नारी मुई धन-संपत्ति नासी, मूड मुड़ाए भीए सन्यासी।।


हठ योग साधना का विरोध किया और कहा कि- ईश्वर को सरलता से प्राप्त किया जा सकता है।

भारत जिन तत्वों से मिलकर बना है। उसमें से एक तत्व है कबीर मतलब जो दिया है । वह मान्य नहीं है। इसलिए वे कहते हैं कि- ‘दुई जगदीश कहां से आए ‘ईश्वर एक है कबीर जी की पंडित और मौलवियों से लगातार टक्कर रहती थी और वह निर्भय होकर निर्गुण की उपासना करते थे । इसीलिए वह कहते थे कि’ मोको कहां ढूंढे बंदे मैं तो तेरे पास में…. इन सांसो की सांस में ‘आध्यात्मिक क्रांति और दोनों में जनतांत्रिकरण है। हर व्यक्ति को ईश्वर तक पहुंचने का अधिकार है। ऐसा भी मानते थे। कबीरदास जी कहते हैं कि ,जात पात पूछा नहीं कोई ,हरि को भजे सो हरि को होई।।

कबीर जी सिकंदर लोदी के समय के थे और कहा जाता है कि इनकी शिकायत कर दी गई थी । लोधी जी से तब उसने 52 परीक्षा के लिए सैनिकों और पीरों को आदेश दिया था ।उसके लिए और इनको दरबार में बुलाया गया । इनको सुबह बुलाया था यह शाम को पहुंचे और उन्होंने कहा वहां जाकर कि ‘कबीर सोई पीर है जो जाने पर पीर और कहते हैं कि लोधी जी इन से प्रभावित हुए और इनको छोड़ दिया।

कविता बौद्धिक अभिव्यक्ति का माध्यम है ।विचारों के प्रवाह का जरिया रही है ।जो समाज का दर्पण है ।प्राचीन भारत में कविता राजनीतिक इतिहास और समाज सब के विचार लिए हुए होती थी। कबीर की भक्ति आंदोलन के मशहूर कवि हैं और इनको समाज सुधारक के रूप में मैं देखती हूं । सर्वप्रथम जो दवे कुचले लोगों की आवाज लेकर खड़े हुए, व्यक्ति के रूप में हैं। निडर और निर्भीक। उनकी रचना साकी,शब्द,रमैनी के माध्यम से कबीर आज भी हमारे बीच जिन्दा हैं। यहीं अपनी लेखनी को विराम देती हूं।

धन्यवाद।

डॉ.रश्मि चौबे

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2024

पुराना पेड़ फल नहीं छांव ठंडी देता है

 लेखिका: रेखा चौहान 'राज'

     एक रात की बात है ठंड बहुत ज्यादा थी एक बुजुर्ग महिला जिसका नाम बुगली था गांव के एक घर के  सामने आकर चारपाई बिछाकर आराम कर रही थी उस घर की महिला की नजर उस पर पड़ी वहीं पर उस महिला सुखबीरी देवी का घर था तो उसने देखा कि वह बुजुर्ग महिला चारपाई पर लेटी थी।

   😲ठंड बहुत ज्यादा थी महिला घर से बाहर आई उसने देखा कि इस कंपकंपाती ठंड में महिला सिकुड़ते हुए सोने की कोशिश कर रही है फिर उसने उस बुजुर्ग महिला से पूछा कि आप यहां क्यों लेटी हैं बुजुर्ग महिला ने भावुक होते हुए अपनी कहानी बताईं और कहा कि उसके पास बच्चे नहीं है और परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से मकान बिक चुका है कोई कमाने वाला भी नहीं है।

   इसलिए मैं यहां बुग्गी ( भैंसा बुग्गी)  ने नीचे लेट कर ठंड से बचने की कोशिश कर रही हूं महिला को उस बुजुर्ग महिला की बातों पर बड़ा ही आश्चर्य हुआ और उसने बड़े  नर्म स्वभाव के साथ अपने घर के अंदर आने के लिए कहा। फिर धीरे-धीरे करके वह बुजुर्ग महिला परिवार के सभी सदस्य के साथ घुल मिल गई और घर के बच्चों के प्रति उसका स्नेह और बच्चों का प्यार उसके प्रति बेहद मार्मिक रहा बच्चों में वह बुजुर्ग महिला अपनी सारी परेशानियां भूल गई कई सालों तक वह महिला उसी परिवार के साथ रही। 

 बच्चों को नित नई कहानियां सुनाती जीवन के प्रति संघर्ष और हौसलों के साथ आगे बढ़ाने की प्रेरणा देती, घर की लड़कियों को  संस्कार और सभ्यता के बातें बताती, जीवन में आगे बढ़ाने के  विवाह से पहले और विवाह के बाद कैसे दोनों परिवारों को जोड़ कर रखना है ऐसी बहुत सी बातें वह घर के बच्चों के साथ अन्य लोगों को भी अपने जीवन के अनुभव सुना कर जीवन के प्रति प्रेरित करती।

सच कहूं तो उन लड़कियों में से एक लड़की मैं भी थी मैं अपनी सारे कजिन भाई बहनों के साथ स्कूल कॉलेज से बाद में उस महिला के साथ खाने से लेकर हर चीज पर बातचीत करते। कभी-कभी जब उस महिला की आज भी याद आती है तो लगता है कि काश इस समय भी कोई ऐसी महिला मेरे घर में होती और मेरे बच्चों को आने वाले जीवन के प्रति कहानियां सुनाती।

तो शायद एक बार फिर संस्कृति जी उठतीं।

  दे किसी का साथ पुण्य कमाएं

  अपने लिए न सही बच्चों के लिए थोड़ा नेक कर्म कर जाएं

  अंतिम समय में भी वह महिला उसी परिवार के साथ थी जब उसका देहांत हुआ तो उसके परिवार के कुछ लोगों को बुलाकर उसका अंतिम संस्कार किया गया । इस तरह बुजुर्ग महिला का दर्द समझते हुए पूरे परिवार ने उसका साथ दिया।

    उस परिवार के बच्चे तो आज भी उस बुजुर्ग महिला की बातों को याद रखते हुए उसके द्वारा दिया ज्ञान जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा मान कर चलते हैं बुजुर्ग अपने हो या पराए हमेशा ज्ञान ही मिलता है।☺️

संस्कृति को संजोए रखना

बुजुर्गो को घर में बनाएं रखना।

पुराना पेड़ फल न सही छांव ठंडी देता है

इस सभ्यता आर्यावर्त की बनाएं रखना।


(मेरी मां और एक बुजुर्ग महिला का साथ जो की बरसों तक चला)

धन्यवाद।

रेखा चौहान 'राज'

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