बुधवार, 6 मार्च 2024

अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस

 लेखिका: सरोजिनी चौधरी

 

किसी ने ठीक ही कहा है-

बिन नारी बनता नहीं एक सुखी परिवार

नारी का सम्मान कर नारी का अधिकार।

 

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस प्रतिवर्ष, 8 मार्च को विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान, प्रशंसा और प्रेम प्रकट करते हुए, महिलाओं के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों एवं कठिनाइयों की सापेक्षता के उपलक्ष्य में उत्सव के तौर पर मनाया जाता है। पूरे माह कार्यक्रम चलता रहता है। महिला माह महिलाओं द्वारा निभाई जाने वाली महत्वपूर्ण भूमिकाओं का जश्न मनाता है । अब समय आ गया है कि उनके परिवारों और समाज में उनके योगदान का सम्मान किया जाए और उसकी सराहना की जाए।

 

महिला माह मनाने का कारण

1.      लैंगिक समानता का समर्थन करें,

महिलाओं को अब कमजोर लिंग नहीं माना जाता। उन्हें समान अधिकार और अवसर दिए जाने चाहिए ताकि वे अपने जीवन को आकार देने की शक्ति प्राप्त कर सकें।

2.      अधिक महिलाओं को प्रेरित करें,

महिला माह महिलाओं को पहचानने और उनकी सराहना करने का एक अवसर है। इससे जागरूकता फैलाने में मदद मिल सकती है ।

3.      महिलाओं के लिए वित्तीय स्वतंत्रता के लिए 3 कदम- (i) पैसे बचाना, (ii) निवेश करना तथा (iii) पेशेवर सलाह लेना।

प्रतिवर्ष महिला दिवस का एक थीम निश्चित किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2024 अभियान का विषय 'इंस्पायर इंक्लूजन' है। जब हम दूसरों को महिलाओं के समावेशन को समझने और महत्व देने के लिए प्रेरित करते हैं, तो हम एक बेहतर दुनिया का निर्माण करते हैं। और जब महिलाओं को स्वयं शामिल होने के लिए प्रेरित किया जाता है, तो अपनेपन, प्रासंगिकता और सशक्तिकरण की भावना आती है। आइए सामूहिक रूप से महिलाओं के लिए एक अधिक समावेशी विश्व का निर्माण करें, IWD (International Women’s Day) 2024 के लिए शामिल हों|

एक सदी से अधिक के इतिहास और परिवर्तन के साथ, पहला अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (IWD) मार्च 1911 में आयोजित किया गया था। IWD किसी देश, समूह या संगठन के लिए विशिष्ट नहीं है। यह सामूहिक वैश्विक सक्रियता और उत्सव का दिन है जो महिलाओं की समानता के लिए प्रतिबद्ध सभी लोगों का है।

विश्व प्रसिद्ध नारीवादी, पत्रकार और कार्यकर्ता, ग्लोरिया स्टीनम ने कथित तौर पर एक बार समझाया था: "समानता के लिए महिलाओं के संघर्ष की कहानी किसी एक नारीवादी या किसी एक संगठन की नहीं बल्कि उन सभी के सामूहिक प्रयासों की है जो मानवाधिकारों की परवाह करते हैं।"

 

तो आइए हम सब मिलकर अच्छी लड़ाई लड़ने में मदद करें। सभी IWD गतिविधियाँ वैध हैं, यही बात IWD को इतना समावेशी बनाती है। इसमें शामिल हों और महिलाओं को समर्थन देने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए जो कुछ भी आप कर सकते हैं वह करके IWD को अपना दिन बनाएं।

संगठनात्मक या समूह आधार पर, यह सुनिश्चित करने के कई तरीके हैं कि महिलाओं और लड़कियों की जरूरतों, हितों और आकांक्षाओं को महत्व दिया जाए और उन्हें शामिल किया जाए। संगठन और समूह निम्नलिखित क्षेत्रों में कार्रवाई के माध्यम से समावेश को प्रेरित कर सकते हैं:

 

1.      महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना

2.      महिला प्रतिभाओं को भर्ती करना, बनाए रखना और विकसित करना ,

3.      नेतृत्व, निर्णय लेने, व्यवसाय और एसटीईएम में महिलाओं और लड़कियों का समर्थन करना

4.      महिलाओं और लड़कियों की जरूरतों को पूरा करने वाले बुनियादी ढांचे का डिजाइन और निर्माण,

5.      महिलाओं और लड़कियों को उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारीपूर्ण निर्णय लेने में मदद करना,

6.      टिकाऊ कृषि और खाद्य सुरक्षा में महिलाओं और लड़कियों को शामिल करना,

7.      महिलाओं और लड़कियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रशिक्षण तक पहुंच प्रदान करना

8.      खेल में महिलाओं और लड़कियों की भागीदारी और उपलब्धि को बढ़ाना,

9.      महिलाओं और लड़कियों की रचनात्मक और कलात्मक प्रतिभा को बढ़ावा देना,

10.  महिलाओं और लड़कियों की उन्नति का समर्थन करने वाले अन्य क्षेत्रों को संबोधित करना।

 

हर जगह हर कोई महिलाओं और लड़कियों के लिए सकारात्मक बदलाव लाने में मदद करने के लिए आईडब्ल्यूडी के सदियों पुराने इतिहास का लाभ उठा सकता है।

 

धन्यवाद| 

 

सरोजिनी चौधरी

रविवार, 3 मार्च 2024

कविता का सौंदर्य

 लेखक: प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

छन्द (Metres) क्या है:

वर्णो या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आह्लाद पैदा हो, तो उसे छंद कहते है।

दूसरे ढंग से यदि छंद के बारे मे कहा जाये तो - अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रागणना तथा यति-गति से सम्बद्ध कुछ खास नियमों को ध्यान मे रखते हुये जो रचना की जाती है वह पद्य का रूप ले लेती है और छंद कहलाती है।

महर्षि पाणिनी के अनुसार जो आह्लादित करे, प्रसन्न करे, वह छंद है (चन्दति हष्यति येन दीप्यते वा तच्छन्द) ।

उनके विचार से छंद 'चदि' धातु से निकला है। यास्क ने निरुक्त में 'छन्द' की व्युत्पत्ति 'छदि' धातु से मानी है जिसका अर्थ है 'संवरण या आच्छादन' (छन्दांसि छादनात्) ।

इन दोनों अतिप्राचीन परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि छंदोबद्ध रचना केवल आहलादकारिणी ही नहीं होती, वरन् वह चिरस्थायिनी भी होती है। जो रचना छंद में बँधी नहीं है उसे हम याद नहीं रख पाते और जिसे याद नहीं रख पाते, उसका नष्ट हो जाना स्वाभाविक ही है। इन परिभाषाओं के अतिरिक्त सुगमता के लिए यह समझ लेना चाहिए कि जो पदरचना अक्षर, अक्षरों की गणना, क्रम, मात्रा, मात्रा की गणना, यति-गति आदि नियमों से नियोजित हो, वह छंदोबद्ध कहलाती है।

छंद शब्द 'छद्' धातु से बना है जिसका अर्थ है 'आह्लादित करना', 'खुश करना।' 'छंद का दूसरा नाम पिंगल भी है। इसका कारण यह है कि छंद-शास्त्र के आदि प्रणेता पिंगल नाम के ऋषि थे।

छंद की चर्चा ऋग्वेद मे की गयी है। गद्य मे व्याकरण के कड़े नियम हैं लेकिन छंद मे सरलता है, सरसता है, हृदयग्राही है और व्याकरण के नियमों मे पूरी तरह जकड़ा नहीं है। इसमे स्वच्छंदता है जो छंद शास्त्र के नियमों को मान कर चलती है। इसके नियम हृदय के करीब होते हैं, भावनाओं के करीब होते हैं, मानवता के करीब होते हैं अतः यह हृदय मे बस जाती है, याद रहती है।

जो बात हृदय मे बस जाय, याद रहे वह चिरकाल तक जीवित रहती है। छंद के यही गुण इस बात का प्रमाण देते हैं हैं कि हजारों सालों बाद भी आज पुरानी कवितायें , श्लोक आदि पढे जाते हैं गए जाते हैं और आनंद देते हैं। गद्य की बातें हवा में उड़ जाती है, लेकिन छन्दों में कही गयी कोई बात हमारे हृदय पर अमिट छाप छोड़ती है। मानवीय भावों को आकृष्ट करने और झंकृत करने की अदभुत क्षमता छन्दों में होती है। छन्दाबद्ध रचना में स्थायित्व अधिक है।

इन्हीं कारणों से हिन्दी के कवियों ने छन्दों को इतनी सहृदयता से अपनाया। अतः छन्द अनावश्यक और निराधार नहीं हैं। इनकी भी अपनी उपयोगिता और महत्ता है। हिन्दी में छन्दशास्त्र का जितना विकास हुआ, उतना किसी भी देशी-विदेशी भाषा में नहीं हुआ।

हृदय ग्राही छंद की रचना करने के लिए कुछ नियम भी होने चाहिएन जो अहलादित कर सकें। इन नियमों को हम छंद के अंग के रूप मे कह सकते हैं। छंद का प्रत्येक अंग अगर अपना काम सुचारु रूप से करे तो छंद अहलादित कर देने वाल होगा ही। आइये देखें, छंद के अंग:   

छन्द के निम्नलिखित अंग है-

(1) चरण /पद

(2) वर्ण और मात्रा

(3) संख्या क्रम और गण

(4) लघु और गुरु

(5) गति

(6) यति /विराम

(7) तुक

आइये, एक एक कर के इन्हें समझें:

1..... चरण/पद: अधिकतर छंदों के चार चरण होते हैं। प्रायः ये समान होते लेकिन आसमान भी हो सकते हैं। जैसे –

कंकण किंकिन नूपुर धुनि सुनि/ कहहिं लखन
 (1)                         (2)

सन राम हृदय गुनि/ मनहुं मदन दुंदुभि दीन्ही/ मनसा बिस्व बिजय कर लीन्ही।
                          (3)                  (4)

यह एक चौपाई चार चरण या पदों मे है।

वही पर एक दोहे को देखिये:

सुनहुं भरत भावी प्रबल/ बिलखि कह्यो मुनिनाथ/हानि लाभ जीवन मरण/ यश
      (1)                         (2)                 (3)   

अपयश विधि हाथ।

       (4)

इन दोनों मे चार चरण हैं लेकिन दोनों के संतुलन मे अंतर है। चौपाई मे चारों चरण समान हैं लेकिन दोहे मे पहले के साथ तीसरा तथा दूसरे के साथ चौथा चरण समान है।   

वर्ण एवं मात्रा:

2...वर्ण/अक्षर

  • एक स्वर वाली ध्वनि को वर्ण कहते हैं, चाहे वह स्वर हस्व हो या दीर्घ।
  • जिस ध्वनि में स्वर नहीं हो (जैसे हलन्त शब्द राजन् का 'न्', संयुक्ताक्षर का पहला अक्षर- कृष्ण का 'ष्') उसे वर्ण नहीं माना जाता।
  • वर्ण ही अक्षर कहलाता है।

वर्ण 2 प्रकार के होते हैं-
(i)हस्व स्वर वाले वर्ण (हस्व वर्ण): अ, , , ; , कि, कु, कृ
(ii)दीर्घ स्वर वाले वर्ण (दीर्घ वर्ण) : आ, , , , , , ; का, की, कू, के, कै, को, कौ

वर्ण और मात्रा की गणना

वर्ण की गणना

  • हस्व स्वर वाले वर्ण (हस्व वर्ण)- अ, , , ; , कि, कु, कृ
  • दीर्घ स्वर वाले वर्ण (दीर्घ वर्ण)- आ, , , , , , ; का, की, कू, के, कै, को, कौ

नोट: 'वर्णिक छंद' में चाहे हस्व वर्ण हो या दीर्घ- वह एक ही वर्ण माना जाता है; जैसे- राम, रामा, रम, रमा इन चारों शब्दों में दो-दो ही वर्ण हैं।)

मात्रा की गणना

  • हस्व स्वर- एकमात्रिक- अ, , ,
    दीर्घ स्वर- द्विमात्रिक- आ, , , , , ,
  • वर्णो और मात्राओं की गिनती में स्थूल भेद यही है कि वर्ण 'सस्वर अक्षर' को और मात्रा 'सिर्फ स्वर' को कहते है।

वर्ण और मात्रा में अंतर- वर्ण में हस्व और दीर्घ रहने पर वर्ण-गणना में कोई अंतर नहीं पड़ता है, किंतु मात्रा-गणना में हस्व-दीर्घ से बहुत अंतर पड़ जाता है। उदाहरण के लिए, 'भरत' और 'भारती' शब्द कोलें। दोनों में तीन वर्ण हैं, किन्तु पहले में तीन मात्राएँ और दूसरे में पाँच मात्राएँ हैं।

3…संख्या क्रम और गण

वर्णो और मात्राओं की सामान्य गणना को संख्या कहते हैं, किन्तु कहाँ लघुवर्ण हों और कहाँ गुरुवर्ण हों- इसके नियोजन को क्रम कहते है।
छंद-शास्त्र में तीन मात्रिक वर्णो के समुदाय को गण कहते है।

वर्णिक छंद में न केवल वर्णों की संख्या नियत रहती है वरन वर्णो का लघु-गुरु-क्रम भी नियत रहता है।
मात्राओं और वर्णों की 'संख्या' और 'क्रम' की सुविधा के लिए तीन वर्णों का एक-एक गण मान लिया गया है। इन गणों की संख्या आठ है। इनके ही उलटफेर से छन्दों की रचना होती है।

लघु मात्रा का चिन्ह I और दीर्घ का s होता है।

आइये देखें, इन गणों के नाम, लक्षण, चिह्न और उदाहरण-

 


इनमे तगण, रगण, जगण तथा सगण अशुभ कहलाते हैं बाकी गण शुभ कहलाते हैं। अशुभ गण के अक्षरों से छंदों की शुरुआत करने पर लय या उच्चारण मे कठिनता होती है, शायद इसीलिए ये अशुभ गण कहलाते हैं। 

4...लघु और गुरु;

लघु-

(i) , , उ- ये हस्व स्वर तथा इनसे मिले एक व्यंजन या संयुक्त व्यंजन को 'लघु' समझा जाता है। जैसे- रमण; इसमें तीनों वर्ण लघु हैं। इस शब्द का मात्राचिह्न हुआ- ।।।

(ii) चन्द्र बिन्दुवाले हस्व स्वर भी लघु होते हैं। जैसे- 'हँ'

गुरु-

(i) , , ऊ और ऋ इत्यादि दीर्घ स्वर और इनसे युक्त व्यंजन गुरु होते है। जैसे- नाना, पापा, दीदी, दादी इत्यादि। इन तीनों शब्दों का मात्राचिह्न हुआ- ऽऽ
(ii) , , , औ- ये संयुक्त स्वर और इनसे मिले व्यंजन भी गुरु होते हैं। जैसे- ऐसा(ss),ओला(ss), औरत (SII), नौका(SS) इत्यादि।
(iii) अनुस्वारयुक्त वर्ण गुरु होता है। जैसे- संसार (SSI)। लेकिन, चन्द्रबिन्दुवाले वर्ण गुरु नहीं होते जैसे जंगल (III)
(iv) विसर्गयुक्त वर्ण भी गुरु होता है। जैसे- स्वतः, दुःख; - (।ऽ), (ऽ।)
(v) संयुक्त वर्ण के पूर्व का लघु वर्ण गुरु होता है। जैसे- सत्य, भक्त, दुष्ट, धर्म इनमे प्रत्येक की मात्रा है (ऽ।)

5…गति

यति और गति को हम अपनी पोस्ट मे दे चुके हैं। कुछ बातें जो उससे इतर हैं यहाँ दे रहे हैं।

छंद के पढ़ने के प्रवाह या लय को गति कहते हैं।

वर्णिक छंदों मे इसकी आवश्यकता नहीं है, किन्तु मात्रिक छंदों में इसकी आवश्यकता पड़ती है। “बहुरि रघुराया आगे चले' में ९६ मात्राएँ हैं, लेकिन इसे हम चौपाई का एक चरण नहीं मान सकते, क्योंकि इसमें गति नहीं है। गति ठीक करने के लिए इसे 'आगे चले बहुरि रघुराया' लिखना पड़ेगा।

गति का महत्व वर्णिक छंदों की अपेक्षा मात्रिक छंदों में अधिक है। मात्राओं की संख्या ठीक रहने पर भी चरण की गति (प्रवाह) में बाधा पड़ सकती है।

जैसे: सुनहुं भरत भावी प्रबल, बिलखि कह्यो मुनिनाथ
     हानि लाभ जीवन मरण
, यश अपयश विधि हाथ

यह एक दोहा है जिसमे 13, 11/13,11 मात्राएं चरो चरण मे हैं। ऊपर की पंक्ति मे 24 और नीचे भी 24 मात्राएं हैं।

अब अगर इसमे परिवर्तन कर के लिखें

 बिलखि कह्यो मुनिनाथ, सुनहुं भरत भावी प्रबल
 यश अपयश विधि हाथ
, हानि लाभ जीवन मरण।

तो भी ऊपर और नीचे की पंक्तियों मे 24 , 24 मात्राएं हैं लेकिन प्रत्येक चरण की मात्राएं बादल जाने से इसकी गति मे परिवर्तन हो गया और अब दोहा से इसने सोरठा रुओ ले लिया है।

गति भेद से ये छंद परस्पर भिन्न हो जाते हैं।

अतएव, मात्रिक छंदों का दोष रहित प्रयोग गति के लिए अत्यन्त आवश्यक है। भाषा की प्रकृति, नाद के परिज्ञान एवं अभ्यास से गति निर्दोष हो सकते हैं।

6... यति या विराम: छंद में नियमित वर्ण या मात्रा पर साँस लेने के लिए रूकना पड़ता है, इसी रूकने के स्थान को यति या विराम कहते है। छोटे छंदों में साधारणतः यति चरण के अन्त में होती है; पर बड़े छंदों में एक ही चरण में एक से अधिक यति या विराम होते है।
सुनहुं भरत भावी प्रबल, (यति) बिलखि कह्यो मुनिनाथ (यति/विराम)

अवधेस के द्वारे सकारे गई (यति) सुत गोद में भूपति लै निकसे(यति/विराम)

मनहर घनाक्षरी छंद मे 31 वर्ण के चार चरण होते हैं और 8, 8, 8, 7 पर यति या विराम होता है जैसे:

 नैनों में अंगार भरो, कर में कटार धरो  (8,8)
बढ़ चलो बेटों तुम, बैरियों को मारने।      (8,7)

धरती भी कहती है, गगन भी कहता है, (8.8)
अब तो हवा भी जैसे, लगी है पुकारने॥  (8.7)

7….तुक

छंद के चरणों के अंत में समान स्वरयुक्त व्यवस्था को 'तुक' कहते हैं।
जैसे- आई, जाई/ रवाना बनाना, ठिकाना आदि से चरण समाप्त करने पर कहा जाता है कि कविता तुकांत है।

जिस छंद के अंत में तुक हो उसे तुकान्त छंद और जिसके अन्त में तुक न हो उसे अतुकान्त छंद कहते हैं।

अगली पोस्ट मे देखेंगे ---- छंद के भेद ....

धन्यवाद| 

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

शुक्रवार, 1 मार्च 2024

लक्ष्मण रेखा के अस्तित्व की पौराणिक और वैज्ञानिक व्याख्या

 लेखक: डॉ हिमांशु शेखर

 

प्रस्तावना

राम कथा के अरण्यकाण्ड में अपने वनवास के अंतिम वर्ष में श्रीराम, सीताजी  और लक्ष्मण जी पंचवटी में कुटी बनाकर रह रहे थे| इसी दौरान शूर्पनखा के अंग भंग प्रकरण और खर-दूषण का सेना सहित वध के बाद, शूर्पनखा के उकसाने पर रावण सीता जी के अपहरण के लिए उद्यत होता है| मारीच को कपट मृग बना कर श्रीराम को कुटी से दूर किया जाता है| कुटी और सीताजी से लक्ष्मण जी को अलग करने के लिए मिथ्या चित्कार का सहारा लिया जाता है| सीताजी लक्ष्मण जी को श्रीराम की सेवा में जाने के लिए कटु वचनों से दवाब डालती है| सीताजी को अकेले छोड़ने के पहले सीताजी की सुरक्षा के लिए किए गए प्रयत्न में जमीन पर खिंची गई एक रेखा का जिक्र आता है, जिसे पार करना रावण के लिए असंभव था| कहा जाता है कि सीताजी का हरण उस रेखा को पार करने के कारण हुआ| आज इस पोस्ट में इस लक्ष्मण रेखा की प्रामाणिकता पर एक विचार प्रस्तुत है|

प्रामाणिकता में संशय

परेशानी इस बात की है कि महर्षि वाल्मिकी की रामायण, तुलसीदास जी की श्रीरामचरितमानस और वेदव्यास की महाभारत में लक्ष्मण रेखा का जिक्र नही है|

रामायण:

माता सीता के कठोर वचन सुनकर लक्ष्मण व्यथित हुए और वन देवता से उनकी रक्षा का आह्वान कर धनुष-बाण लेकर ध्वनि की दिशा में चल दिए।

रक्षन्तु त्वामङ्घपुनरागत:। (श्लोक 34)

अर्थात् विशाललोचने! वन के सम्पूर्ण देवता आपकी रक्षा करें, क्या मैं श्रीरामचंद्र के साथ लौटकर पुन: आपको कुशल देख सकूंगा?’ यह कह कर लक्ष्मण जी चल देते हैं और सीताजी व्यथित हो जाती हैं। इसके बाद महर्षि वाल्मीकि ने उनकी व्यथा का तो वर्णन किया है। पर रेखा खींचे जाने का उल्लेख नहीं किया है।

श्रीरामचरितमानस:

मरम बचन जब सीता बोला।

हरि प्रेरित लछिमन मन डोला।

बन दिसि देव सौंपि सब काहू।

चले जहाँ रावन ससि राहू।"

#अरण्यकाड रामचरितमानस (दोहा 27 चौपाई 3)

इस पर जब सीताजी कुछ मर्मभेदी वचन कहने लगीं तब भगवान की प्रेरणा से लक्ष्मण जी का मन चँचल हो उठा। वे श्रीसीता जी को वन और दिशाओं के देवताओं को सौंपकर वहाँ चले जहाँ रावण रूपी चंद्रमा के लिए राहुरूपी श्री राम जी थे। यहाँ भी लक्ष्मण रेखा का विवरण नही है| लेकिन सीताहरण के पश्चात लंकाकाण्ड में मन्दोदरी ने रावण को समझाते हुए कहा-

कंत समुझि मन तजहु कुमति ही।

सोई न समर तुम्हहि रघुपति ही।।

रामानुज लघु रेख खचाई।

सोउ नहिं नाधेहु असि मनुसाई।।

श्रीरामचरितमानस लंकाकाण्ड ३६-१

हे कांत! मन में सोच विचार कर कुबुद्धि को छोड़ दो। आपको रघुनाथजी से युद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटा भाई (रामानुज) ने जरा-सी रेखा खींच दी थी। उसे आप नहीं लाँघ सके, ऐसा तो आपका पुरुषत्व है। इस प्रकार यहाँ लक्ष्मण-रेखा का वर्णन है, किन्तु लक्ष्मण रेखा धनुष या बाण से खींची गई स्पष्ट नहीं है। लक्ष्मण रेखा का वर्णन अरण्यकाण्ड में न होकर लंकाकाण्ड में है। महाभारत की राम कथा में तो इसका जिक्र है ही नही| कुछ प्रसिद्ध प्रामाणिक राम कथाओं में भी इसका जिक्र नही है|

लिखित प्रमाण

हनुमन्नाटक:

स व्याह रद्धर्मिणि देहि भिक्षामलंघयँलक्ष्मणलक्ष्मलेखाम

जग्राह तां पणितले क्षिपन्तीमाकारयन्ती रघुराज पुत्री।।

हनुमन्नाटक भाषा टीका समेत अंक ४-६

रावण ने कहा- हे धर्मपरायण। भिक्षा दो। तब ज्योंहि लक्ष्मण जी की धनुष रेखा को लाँघकर, रावण के हाथ में भीख देने लगी त्यों ही वह उन्हें हरण कर ले गया और हा आर्यपुत्र! हा लक्ष्मण! पुकारती (सीता) रह गईं। इस प्रकार यहां लक्ष्मण रेखा लक्ष्मणजी के धनुष द्वारा खींची गई बताई गई है।

आनन्दरामायण:

लक्ष्मण : “तुमने मुझको जो वाणी रूपी बाणों से प्रताड़ित किया है, उसका फल तुम शीघ्र प्राप्त करोगी।“

तथापि श्रुणु म्रद्वाक्यं यन्मयाऽत्रोच्यते हितम्।

नयैतां घनुषा रेखां कृतां त्वसरितोऽघुनो।।

त्वद्रक्षणार्थं दुष्टानां दुर्विलंघ्यां महन्तमाम्।

मा त्वमुल्लंघयस्वेमां प्राणै: कंठगतैरपि।।

इत्युक्त्वा धनुष: कोटया कृत्वा रेखां समंतत:।

बाह्यदेशे पंचवहया: सौमित्र: परिघोपमाम्।।

आनन्दरामायण सारकाण्ड सर्ग ७-९८ से १००

इतना होने पर भी मेरे कहे हुए इस हितकारी वचन को सुन लो। मैं धनुष से तुम्हारे चारों ओर यह रेखा खींच देता हूँ। यदि तुम्हारी रक्षा के लिए और दुष्टों के दुर्लंघनीय तथा भयंकर भय उत्पन्न करने वाली होगी। तुम्हारे प्राणों के कंठ में आ जाने पर भी तुम इस रेखा का उल्लंघन मत करना। इतना कहकर धनुष की कोर से लक्ष्मण ने पंचवटी के बाहर खाई की भाँति सीताजी के चारों ओर रेखा खींच दी। इतना कहकर वह श्रीरामजी की ओर चल पड़े।

मराठी राम-विजय रामायण (रचयिता पं. श्रीधर स्वामी):

इन कटु एवं मार्मिक वचनों को सुनकर लक्ष्मण ने सीता जी को कुछ गलतियाँ बताई| तब लक्ष्मण ने गुफा के द्वार पर धनुष की डोरी से एक रेखा खींच दी और कहा- यदि तुम इस रेखा के बाहर जाओगी तो परम संकट होगा। श्रीराम की तुम्हें सौगन्ध है। घोर अरण्य में रोते हुए लक्ष्मण श्रीराम को खोजने निकल पड़े। तत्पश्चात् रावण लक्ष्मण द्वारा अंकित रेखा के बाहर खड़ा हो गया। उसने कहा अब बिना फलों के आहार के यहाँ मेरे प्राण निकलना चाहते हैं अत: तुम गुफा के बाहर आकर मेरे मुख में फल डाल दो। रावण ने कहा दौड़ो मेरे प्राण निकले जा रहे हैं। तब सीताजी फल लेकर रेखा के निकट पहुँच गई ज्यों ही सीता ने भिक्षा डालने के लिए हाथ लक्ष्मण रेखा के बाहर बढ़ाया त्यों ही उस राक्षस ने सीताजी को खींचकर झट से उन्हें उठा लिया एवं सच्चा रूप लंकापति रावण का बताकर हरण कर लिया।

गुजराती गिरधर रामायण:

लक्ष्मण ने सीताजी से कहा कि आप माता हैं तो मैं आपका पुत्र हूँ। मैं मन में ऐसा ही जानता हूँ। श्रीराम को भगवान् जानकर सेवा करता हूँ। तदनन्तर उन्होंने उस समय कुटी के पीछे धनुष से रेखा खींच दी तथा वे बोले- हे जानकी, बिना हमारे (लौट) आए यदि आप बाहर निकलें तो आपको श्रीराम की शपथ है। मैं निश्चयपूर्वक यह कह रहा हूँ कि बिना हमारे लौट आए जो यह रेखा लाँघकर कुटी में प्रवेश करेगा, वह प्राणी जलकर भस्म हो जाएगा। तत्पश्चात् रावण ने सीताजी को लक्ष्मण रेखा को पार करने के लिए विवश किया।

मैथिली रामायण (रचयिता चन्द्रा झा):

हम कहइत छी दुइ कर जोड़ि। सीताकाँ जाइत घी छोड़ि।।

सोपि देल अछि अपनेकँ हाथ। हम चललहुँ जत छथि रघुनाथ।।

धनुष-रेख-बाहर जनि जाउ। वञ्चक वचनन कि घुपपतिआउ।।

चन्द्रा झा कृत मैथिलीरामायण अरण्यकाण्ड अध्याय ७-५५ से ५७

मैं दोनों हाथ जोड़कर कहता हूँ आप सुनिये। मैं सीता को अकेली छोड़कर जाता हूँ, तत्पश्चात् लक्ष्मणजी ने सीताजी से कहा- मैं धनुष से लकीर खींच देता हूँ। आप उस लकीर (रेखा) से बाहर मत जाइए तथा ठगों की बात पर विश्वास मत कीजिएगा। लक्ष्मणजी के जाने के बाद रावण संन्यासी के वेश में आया तथा सीताजी को विवश कर हरण कर लिया।

आधुनिक व्याख्या

ऐसा लगता है कि शुरू में लक्ष्मण रेखा राम कथा का हिस्सा नही थी| लेकिन स्मृति और श्रुति ग्रन्थ होने के कारण हर आश्रम और ज्ञान-केन्द्रों ने अपनी सुविधा अनुसार इस कथा में अपनी मान्यता के आधार पर कुछ परिवर्तन किए है| बाद के ग्रंथो में इसका जिक्र ज्यादा दिखता है| एक बहुत प्रामाणिक सी दिखने वाली व्याख्या है – “लक्ष्मण रेखा का मूल नाम सोमातिती विद्या है| इसे सोमना कृतिका यंत्र से जोड़ा गया है, जिसे पृथ्वी और वृहस्पति के मध्य में स्थापित किया जाता है| ये जल, वायु और अग्नि को सोखता है और उल्टा करने पर अग्नि और विद्युत् के परमाणुओ का उत्सर्जन करता है| लक्ष्मण ने इसकी शिक्षा महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में ली थी| मुनि दधीचि और शांडिल्य इसके जानकार थे| इसके अंतिम जानकार भगवान श्रीकृष्ण थे, जिन्होंने महाभारत के रणक्षेत्र के बाहर इसे खींचा था| इससे दिव्यास्त्रो का प्रभाव युद्ध क्षेत्र के बाहर नही दिखा था|” ये व्याख्या भी बहुत प्रामाणिक प्रतीत नही होती है| इसका  सन्दर्भ खोजना भी बहुत मुश्किल है|

कई बार लक्ष्मण रेखा को नारी की मर्यादा रेखा से जोड़ा जाता है| यह भी एक अंधविश्वास है| रामकथा में अपनी लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन तो रावण ने किया था, जो ब्राह्मण का रूप लेकर अपहरण करने आया था| मै नारियो पर इसतरह के किसी भी मर्यादा रेखा को थोपने के खिलाफ हूँ| नर नारी में इसतरह का विभेद दकियानूसी और पाश्चात्य प्रेमी के दिमाग की उपज होती है|

आधुनिक सन्दर्भ में बंजारों और आदिवासियों में चौकी बांधने की प्रक्रिया होती है, जिसका प्रयोग वे अपने बच्चो या मवेशियों के चारो ओर अभिमंत्रित सुरक्षा रेखा खींच कर करते है| इसे आजकल अंधविश्वास माना जाता है पर मान्यता तो है| इसी तरह माता की चौकी, भैरव बाबा की चौकी आदि की चर्चा भी अभी आम है| इससे होने वाले सुरक्षा चक्र निर्माण को भी लक्ष्मण रेखा के समकक्ष माना जा सकता है| ऐसा भी माना जा सकता है कि लक्ष्मण रेखा आजकल के ट्रिप वायर वाली बारूदी सुरंग थी, जिसके तार को विस्थापित करने पर विस्फोट द्वारा विध्वंस को अंजाम दिया जा सकता है|

आज भी हर किले के बाहर खाई का निर्माण दिखता है| उसमें जल भर कर मगर छोड़ कर किले की सुरक्षा की जाती थी| ये भी एक प्रकार से लक्ष्मण रेखा के समकक्ष मानी जा सकती है| इसतरह के दुर्ग का वर्णन लंका से सीताजी का पता लगाकर लौटने के बाद हनुमान जी ने भी किया था| खाई पार करने के बाद खडी दीवाल पर चढ़ाना भी एक चुनौती होती  थी| साथ ही किलो की प्राचीर से जब गरम पानी या मोम फेंके जाते थे तो किला अभेद्य हो जाता था| ये सब मिलकर लक्ष्मण रेखा का निर्माण करते है, जिसे पार कर किले तक पहुँचना मुश्किल था|

इसतरह हर युग में लक्ष्मण रेखा का अस्तित्व है| पर उसका स्वरूप अलग होता गया| हो सकता है त्रेता में ये कार्य मन्त्र की शक्ति से हो जाता था, जो समर्थ लोगो के लिए संभव था| जिनमें उतनी आध्यात्मिक शक्ति नही थी या जो ज्यादा भौतिकवादी थे, उन्होंने भौतिक बाधाओं को लक्ष्मण रेखा की तरह प्रयोग किया| अगर तुलना की जाय तो ट्रिप वायर पर आधारित बारूदी सुरंगे इसका आधुनिक स्वरूप हो जाती है|

उपसंहार

इसतरह रामकथा में लक्ष्मण रेखा थी या नही इसमें संदेह है| पर अगर कोई रेखा थी भी तो उसे आधुनिक सन्दर्भ में ट्रिप वायर वाले बारूदी सुरंग के समकक्ष माना जा सकता है| साहित्य में व्याख्या के ढंग अलग अलग हो सकते है और समय के साथ साथ कुछ अनावश्यक सन्दर्भ भी जुड़ जाते है, जिसपर विश्वास करने से पूर्व उसकी समीक्षा आवश्यक है| लक्ष्मण रेखा ऐसा ही एक प्रसंग है जो मूल कथा का हिस्सा नही होने के बावजूद बहुत ज्यादा प्रचलित हो गया| अन्याय के खिलाफ उपलब्ध, आज की हर बाधा को लक्ष्मण रेखा माना जा सकता है|

(पिछला शोध: शबरी के जूठे बेरों की प्रामाणिकता)

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धन्यवाद| 

डॉ हिमांशु शेखर

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