गुरुवार, 2 मई 2024

श्रवण कुमार की तथ्यात्मक कथा

 

लेखक: डॉ हिमांशु शेखर

 

रामकथा की भूमिका में श्रवण कुमार की कथा का बहुत बड़ा योगदान है, पर इसकी कथा, नाम, और घटनाक्रम पर अलग अलग अवधारणाएं दिखाती है| प्रचलित अवधारणा के अनुसार श्रवण कुमार नाम के एक माता पिता के भक्त का जिक्र उद्धृत किया जाता है, जिसने अंधे माता पिता को कंधे पर लादकर तीर्थ यात्रा करवाई थी| इस दौरान दशरथ के बाणों से गलती से उसका वध हो गया था| इस मूल कथा में कई घटनाएँ कथा-वाचको द्वारा प्रसिद्धि के लिए जोड़ दी गई है| श्रवण कुमार के माता पिता जन्मांध नही थे, बल्कि ब्रह्मा के शाप के कारण पुत्र को देखते ही अंधे हो गए थे| एक कथा में श्रवण कुमार के माता पिता जन्मांध थे और तपस्या द्वारा उन्होने श्रवण कुमार को पुत्र रत्न के रूप में प्राप्त किया था| एक अन्य कथा में श्रवण कुमार की पत्नी द्वारा सास ससुर की उचित देखभाल नही होने के कारण श्रवण कुमार ने अपने माता पिता के साथ घर छोड़ दिया था| एक और अवधारणा के अनुसार आँख का अंधा नाम नयनसुख की तर्ज पर कम सुनाने वाले बालक का नाम श्रवण कुमार रख दिया गया था| इस कथा के सन्दर्भ और उसकी पौराणिक प्रामाणिकता पर एक नजर डालने की आवश्यकता है|

 

वाल्मीकि रामायण:

अयोध्या काण्ड का सर्ग 63 और 64 मुनि कुमार के वध की कथा और उसके माता पिता से दशरथ को मिलने वाले शाप का वर्णन करता है| राम, लक्षमण और सीता को वन में छोड़कर वापस लौटे सुमंत्र से मिलने के बाद दशरथ ने ये कथा कौसल्या को सुनाई है| सर्ग 63 का शीर्षक है – “राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनि कुमार के मारे जाने का प्रसंग सुनाना|” जब दशरथ राजकुमार थे तो अपने शब्दबेधी बाण की प्रशंसा सुनकर एक बार वो वर्षा ऋतु की ऊषा काल में सरयू तट पर शिकार करने के लिए गए| उन्हें पानी का घडा भरने का शब्द सुनाई पडा, जिसे उन्हें हाथी द्वारा सूंढ़ से पानी पीने का भ्रम हो गया| प्रत्यक्ष नही दिखने के कारण शब्द का अनुसरण करते हुए छोड़ा गया तीर एक पुरुष के आर्तनाद के रूप में उन्हें सुनाई दिया| पास पहुँच कर, दशरथ को पता चला कि एक मुनि कुमार उनके बाण से मरने की कगार पर पहुँच गया है|

लक्षयामास स ऋषिश्चिन्ताम मुनिसुतस्तदा|

ताम्यमानम स मां कृच्छ्रादुवाच परमार्थवित्|48|

मुनि कुमार का नाम यहाँ कही भी नही दिखता है| उसने बताया कि निकट ही एक कुटिया में उसके अंधे, बूढ़े, दुर्बल और लाचार माता पिता रहते है| वो उनके लिए ही जल लेने आया हुआ था| उसने स्पष्ट किया कि उसके वैश्य पिता और शूद्र जातीय माता से जन्म लेने के कारण दशरथ को ब्रह्म-ह्त्या का पाप नही लगेगा|

इसके आगे की कथा सर्ग 64 में दी गई है जिसका शीर्षक है – “राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुखी हुए उनके माता पिता के विलाप और उनके दी हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना|” इसमें शाप का जिक्र इस प्रकार है:

पुत्रव्यसनजमं दु:खं यदेतन्मम साम्प्रतं|

एवं त्वं पुत्रशोकेन राजन कालं करिष्यसि|54|

 

अन्य राम कथा सन्दर्भ:

तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस के अयोध्या काण्ड में अध्याय 86: दशरथ-सुमंत्र संवाद, दशरथ मरण में श्लोक 154 के बाद दूसरी चौपाई के अंश है:

तापस अंध साप सुधि आई|

कौसल्यहि सब कथा सुनाई||

इसमें न नाम दिया गया है, न घटनाक्रम है, न कथा दी गई है, सिर्फ एक शाप की ओर इशारा भर है|

कंब रामायण में अयोध्या काण्ड के अध्याय 4: नगर निष्क्रमण पटल में कैकयी के राम वन गमन का प्रस्ताव को सुनकर व्यथित महाराजा दशरथ महारानी कौसल्या को पूर्व काल में एक मुनि द्वारा प्राप्त शाप की कथा सुनाते है| दशरथ हाथियों के आखेट के लिए एक वन में गए थे, जिसमें अपने पुत्र पर आश्रित एक वृद्ध अंधे ब्राह्मण मुनि और उनकी अंधी पत्नी रहते थे| पुत्र द्वारा नदी से जल भरने के शब्द को हाथी द्वारा उत्पन्न ध्वनि मानकर महाराजा दशरथ ने शर संधान कर उसे बेध दिया| छटपटाते व्यक्ति ने अपना नाम सुरेचन (श्रवण कुमार नही) बताया और हाथी के भ्रम में हुई गलती के दोष से दशरथ को मुक्त बताया| जब दशरथ अंधे दंपती की पिपासा शांत करने पहुंचे तो व्याकुल होकर उन्होंने शाप दिया – “तुम भी हमारे जैसे ही पुत्र के विरह में स्वर्ग जाओगे|” यहाँ कुछ बाते द्रष्टव्य है:

  1. राम के वन गमन के पूर्व दशरथ ने ये कथा कौसल्या को सुनाई है|
  2. तीर्थ यात्रा की बात नही लिखी है|
  3. बेटे की पत्नी का जिक्र नही है|
  4. नदी का नाम नही बताया गया है|
  5. बेटे को ब्राह्मण कुमार बताया गया है|
  6. बेटे का नाम श्रवण कुमार नही है, सुरेचन है|
  7. पानी भरने के स्वर से हाथी का भ्रम हुआ था|

रंगनाथ की तेलुगु में लिखी रामायण (अयोध्या काण्ड, अध्याय 22, दशरथ का कौसल्या को अपने शाप का वृत्तांत सुनाना) के अनुसार दशरथ द्वारा गलती से मारे गए युवक का नाम यज्ञदत्त था, जो सरयू नदी से जल कलश भरने आया था| कलश में जल भरने की ध्वनि को हाथी समझकर दशरथ द्वारा चलाए गए शब्द बेधी बाण से युवक की मृत्यु हुई थी| युवक ने स्पष्ट किया कि उसके (अंधे, दीन और वृद्ध) वैश्य पिता और शूद्र माता का पुत्र होने के कारण दशरथ को ब्राह्मण ह्त्या का पाप नही लगेगा| निकटवर्ती  पहाड़ के पास एक वटवृक्ष की कोटर में उसने माता पिता को एक कांवर में रखने की बात कही थी| इसमें पुत्र की अंत्येष्टि करने के बाद उसके माता पिता की मृत्यु दशरथ को शाप देकर होती है – “तुम भी हमारे समान ही पुत्र शोक के कारण मृत्यु को प्राप्त करोगे|यहाँ कुछ बाते द्रष्टव्य है:

  1.     राम के वन गमन के बाद मंत्री सुमंत के लौटने के बाद दशरथ ने ये कथा कौसल्या को सुनाई है|
  2.      तीर्थ यात्रा की बात नही लिखी है, बल्कि वटवृक्ष की कोटर को स्थायी निवास के रूप में बताया गया है|
  3.        बेटे की पत्नी का जिक्र नही है|
  4.        नदी का नाम सरयू बताया गया है|
  5.        बेटे को ब्राह्मण कुमार नही बताया गया है|
  6.        बेटे का नाम श्रवण कुमार नही है, यज्ञदत्त है|
  7.        पानी भरने के स्वर से हाथी का भ्रम हुआ था|

चंद्रा झा की मैथिली भाषा रामायण में इस घटना का जिक्र (पानी पिलाने से दशरथ को शाप तक) है पर नाम की जगह सिर्फ मुनि लिखा है|

मुनि हम दशरथ भूप, 

जल भरइत मारल वृथा ||69||

जानल नहि ई रूप, 

गज भ्रम सौ अपराध बाद ||70||

बूढ़ बूढइ कय विविध विलाप | 

मरण समय हमरहु देल शाप ||92||

हमर पुत्र सुख कयलह हरण | 

पुत्र वियोगहि तोहरो मरण ||93||

 

विचित्र रामायण, जैन रामायण, प्रेम रामायण में यह प्रकरण नही खोजा जा सका|

 

श्रवण कुमार सन्दर्भ

अब उन राम कथाओं को देखते है, जहां श्रवण कुमार नाम का जिक्र है| गिरधर रामायण में प्रचलित कथाओं की तरह वर्णन (बालकाण्ड, अध्याय 9: श्रवण वध) है – महाराज दशरथ का आखेट के लिए सरोवर (सरयू तट या नदी तट नही) पर जाना, युवक का नाम श्रवण कुमार बताना, युवक को ब्राह्मण कुमार बताना, माता-पिता का अँधा-बूढा होना, श्रवण कुमार का उन्हें कांवर में लेकर तीर्थयात्रा करना, दशरथ का कमंडल में पानी भरने के स्वर को मृग (पशु) का स्वर समझना, दशरथ का शब्दबेधी बाण का प्रयोग, श्रवण कुमार की मृत्यु, उनके माता-पिता का दशरथ को पुत्र वियोग में मृत्यु का शाप देकर प्राण त्यागना| गिरधर रामायण के संदर्भित पद (श्रवण नाम का सत्यापन, शाप का जिक्र) नीचे दिए गए है:

नाम सत्यापन

ते समे ब्राह्मण श्रवण नामे, वृद्ध अंध मातपिताय,

ते फरे तीरथ-अटण करतो, धरि कावड काय|23|

दशरथ को शाप

एवुं कही धरणी ढल्या, मूर्च्छा थई तव आप,

अन्तकाले रायने, वे जणे दीधो शाप|39|

पुत्र-विजोगे प्राण तारा, जजों सत्य वचन,

एवुं कही वे मरण पाम्याँ, राय कंप्या मन|40|

ये दशरथ का आत्मकथ्य है और पुत्र वंचित रहने के बाद भी इस शाप में दशरथ को पुत्र प्राप्ति का बीज दिखा|

हनुमन्नाटक में भी श्रवण कुमार नाम का जिक्र तीसरे अंक में (प्रथम पद में ही) है पर पूरी घटना का विवरण नही दीखता है|

भुक्त्वा भोगान्सुरंगान्कतिपयसमायं राघवो घर्मपत्न्या

सार्धं वर्धिष्णुकाम: श्रवणमुनिपितु: प्राप् हा! शाप्कालम|1|

श्रवण मुनि के पिता द्वारा दिए गए शाप का समय आने के कारण सूर्य की किरणे मलीन होने की बात यहाँ की गई है, पर शाप का कारण नही बताया गया है| पर श्रवण कुमार नाम का सत्यापन होता है| इस श्लोक के बाद होने वाले अपशकुन की लम्बी सूचि दी गई है| राम के वनगमन के बाद वन से लौटे सुमंत्र को देखकर दशरथ ने प्राण त्याग के पूर्व भी शाप का स्मरण किया था|

श्रुत्वा सुमंत्र वचनेन सुतप्रयाणम शापस्य

तस्य च विचिन्तय विपाकवेलाम|

हां राघवेति सकृदुश्चरितं तृपेण

निश्वस्य दिर्घतरमुच्छ्वासितम न भूय: |7|

आनंद रामायण के सारकांड के प्रथम सर्ग में श्रवण कुमार की कथा का वर्णन है| एक रात राजा दशरथ शिकार के लिए वन में गए| वहां जल को रोका कर उन्होंने कई शिकार किए| तब उस जगह अपने माता पिता को अपने कंधो पर लागाकर तीर्थाटन के लिए वाराणसी ले जाने वाला वैश्य कुमार श्रवण आया|

चकार वारिबंध चावधीद्वन्चराम बहून |

एतस्मिन्नन्तरे तत्र वने वरनासिपथा ||87||

करन्डस्थौ स्वपितरौ स्वस्कंधे श्रवानो वहन |

काशीं नेतुं यायो विश्वो धर्मबाधा भयान्निशि ||८८||

पानी भरने के स्वर को हाथी का स्वर समझ कर दशरथ द्वारा बाण से उसे घायल करना, उसकी मृत्यु, उसके माता पिता को जल पिलाने दशरथ का जाना और पुत्र शोक से मृत्यु का शाप पाना इसमें वर्णित है|

दशाराथाय तौ शापं ददतु: पुत्रदु:खितौ |

पुत्रशोकादावयोहि यथा मृत्युस्तवास्थिति ||95||

मराठी में लिखे श्री रामविजय रामायण के तीसरे अध्याय में भी श्रवण कुमार ही अपने माता पिता को कांवड में लेकर दिन की उष्णता से बचाते हुए रात में यात्रा कर रहा था| पूरी घटना इसमें वर्णित है|

तों ते मार्गी श्रवण | 

आला मायबाप घेऊन ||

दिवसा बहुत विघ्ने आणि ऊष्ण | 

म्हणोनि रात्री गमन करी|| 30 ||

एक सरोवर के निकट पानी पीने के लिए वे रूके| श्रवण कुमार द्वारा जल भरने के स्वर को पशु का स्वर समझ कर दशरथ ने बाण छोड़ दिया और उसकी मृत्यु हो गई| उसके माता पिता ने मरने से पहले दशरथ को पुत्र शोक में मृत्यु का शाप दिया|

मग ती शाप देती प्राण जातां | 

म्हणती तुझाही पुत्र पुत्र करितां |

प्राण जाईल रे दशरथा | 

आम्हां ऐसाचि तत्काल ||54||

 

संदर्भो की व्याख्या:

यह बात स्पष्ट है महाराजा दशरथ को शाप की कथा हर राम कथा बताती है| पर हर कथा में युवक का नाम, गोत्र आदि अलग अलग है| मूलत: ये कथा दशरथ कौसल्या को सुनाते है| कथा के उदघाटन का समय भी अलग अलग है, पर हर ग्रन्थ में यह अयोध्या काण्ड का ही हिस्सा है| कुछ राम कथाओं में तो इसका जिक्र ही नही है|

एक बात सोचने योग्य है कि अगर पुत्र के विरह को शाप में डाला गया था, तो पहले भी विश्वामित्र के साथ राम लक्ष्मण वन को गए थे| उस समय भी पुत्र शोक वाली स्थिति बन रही थी| पर उस समय तो कोई विलाप नही दिखता है| उस सन्दर्भ में प्राणांत करने वाली किसी पीड़ा का भी वर्णन नही मिलता है| यह बात भी अचंभित करती है|

कई बार इस शाप को इसतरह भी व्यक्त किया जाता है कि महाराज दशरथ को अपने पुत्र होने का पता पहले से था| तो ये शाप एक तरह से दशरथ को पुत्र पाने का पूर्वानुमान था| स्पष्ट है कि अगर पुत्र ही नही होगा तो पुत्र शोक कैसे होगा! साथ ही यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि अगर पुत्र पाना नियति थी, तो पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ का विधान अनावश्यक था| पुत्र नही होने के लिए राम कथा में व्यर्थ की चिंता व्यक्त की गई है|

सबसे बड़ी विडम्बना है मुनिकुमार के नाम को लेकर जिसपर रामायण, रामचरितमानस, कंब रामायण, रंगनाथ रामायण आदि अलग अलग राय रखते है| आधुनिक सन्दर्भ में ऐसा माना जा सकता है कि वह मुनि कुमार माता पिता का इतना आज्ञाकारी था कि उसे केवल निर्देश लेकर उसपर अमल करना आता था| वो पूरे शरीर से केवल श्रवण ही करता था| सामान्य जन बोलते भी है, सोचते भी है, पर वो केवल श्रवण ही करता था| इसलिए उसका नाम आरम्भ में उपालंभ के तौर पर श्रवण कुमार रख दिया गया, जो कालान्तर में अर्थ संकोच द्वारा माता पिता के अंध आज्ञाकारी बेटे का पर्याय बन गया| इस नाम की उत्पत्ति प्रामाणिक ग्रंथो में खोजना सही नही लगता है क्योकि ये मूल कथा से जुड़ा एक सहयोगी दृष्टांत है| पर नाम की उत्पत्ति खोजने में शायद नाम का अर्थ दिशा निर्देश देने में सक्षम है|

धन्यवाद| 

डॉ हिमांशु शेखर

23 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर लेख हिमांशु जी 👏👏👏👏

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    1. धन्यवाद सर। आप सबके सहयोग से कुछ पढ़ाई कर पा रहा हूँ।

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  2. हर बार की तरह जानकारी से भरपूर सुंदर लेख

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    1. धन्यवाद पूजा जी। राम जी की कृपा से राम कथा में विषयों की भरमार है।

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  3. Rekha Chauhan वाह बहुत खूब आदरणीय 🌷

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  4. बहुत सही बात लिखी है, बधाई

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    1. धन्यवाद। शुभकामनाओ की सदा प्रतीक्षा रहती है।

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  5. अनेकों ग्रंथों के शोध के बाद लिखे गए ज्ञानवर्धक लेख के लिए हार्दिक बधाई और धन्यवाद

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  6. बहुत मेहनत करके तिथियाँ एकत्रित करके आपने स्पष्ट करने की कोशिश की है,सुंदर लेख(सरोजिनी)

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  7. तिथियों के स्थान पर मैंने तथ्य लिखा था ( सरोजिनी)

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    1. धन्यवाद। लिखने के बाद बहुत कम लोग अपनी टिप्पणी पुनः देखते हैं। प्रतिक्रिया जानने की उत्सुकता भी कम रहती है। आपका हार्दिक आभार मेरी लिखने की हिम्मत बरकरार रखने के लिए।

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  8. उत्तर
    1. धन्यवाद। आप सबके प्रोत्साहन से लिखने की प्रेरणा मिलती है।

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  9. पुत्र प्राप्ति की व्यग्रता भी सम्भवतः यज्ञ की वजह रही होगी।
    बेहद गहराई के साथ श्रवण कुमार के पात्र की विवेचना की गई है।
    आपकी लेखन शैली व्यख्यात्मक है, सर।

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    1. धन्यवाद। आपने बिल्कुल सही कहा है। पर भाग्य और कर्म में से कौन प्रधान है ये विचारणीय है, संवाद योग्य अवधारणा है। भाग्य में होने के बाद भी कर्म करना इच्छित फल प्राप्ति की संभावना बढ़ाता है। भाग्य में न होकर भी कर्म से कुछ हासिल होना, तथा भाग्य में होकर भी कर्म न करने से अप्राप्य फल की कथाओं में वर्णित हैं। आपकी टिप्पणी सकारात्मक है। मेरा मनोबल बढ़ाती है। हार्दिक आभार।

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  10. From USA, Pradeep Singh commented:

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    Thanks to him.
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