सोमवार, 15 अप्रैल 2024

रामनवमी पर राम नाम

 "राम से विमुख हो तू कहां जायेगा

राम तू राम मैं,राम में ही रम जाएगा "

पूजा 


राम जी को जितना पढ़ते ,जानते है उतना ही कम लगता है ,राम एक शक्ति हैं, राम एक भक्ति है, जिसने राम को जाना ,उसने सब जान लिया , राम अलौकिक हैं ,राम सौंदर्य ,शक्ति और तेज के प्रतीक हैं। त्रेता युग में जन्में राम  कलयुग की पहचान है ,चाहते सब रामराज्य है 


राम दो शब्द है राम ही है किताब

राम जीवन का सार, राम मुक्ति का धाम"

डॉ पूजा भारद्वाज


तो चलो राम जी जानने की कोशिश करते है , हिंदू शास्त्रों ओर पौराणिक कथाओं के अनुसार राम जी भगवान विष्णु जी अवतार थे ,और धरती पर जन्म उन्होंने रावण का वध करने और सभ्यता संस्कृति और मर्यादा का पाठ सीखने के लिए जन्म लिया था ,जबकि राम जी भगवान थे फिर भी उन्होंने सांसारिक तरह से कौशल्या मां की कोख से जन्म लिया ,

अयोध्या के राजा दशरथ के कोई संतान नहीं थी ,जबकि उनकी तीन रानियां थी, कौशल्या,केकई , सुमित्रा 

राजा दशरथ ने एक यज्ञ करने का फैसला लिया और कई  विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों ,महर्षियों पंडितों को बुला कर यज्ञ किया, और ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के साथ यज्ञ की समाप्ति हुई। राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद खीर को अपने महल में ले जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने गर्भधारण किया,इस तरह

हमारे पालनहार राम जी  का जन्म  पावन नगरी अयोध्या में राजा दशरथ जी के यहां  चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को हुआ था ,इसलिए उनके जन्म दिवस के उपलक्ष्य में राम नवमी मनाई जाती है ,

मेरे शब्दों में 


"नदियों में गंगा बड़ी, बड़ा रामेश्वर धाम

अयोध्या बड़ी नगरी , जहां जन्में है श्री राम"


और इस दिन चैत्र मास नवरात्र भी संपन्न होते है ,राम जन्म को गोस्वामी तुलसीदास जी ने कुछ इस तरह वर्णित किया है ,

रामचरित मानस में 

"भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।

हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥

लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।

भूषन वनमाला नयन बिसाला सोभासिन्धु खरारी॥

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।

माया गुन ग्यानातीत अमाना वेद पुरान भनंता॥

करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।

सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रकट श्रीकंता


इस प्रकार राम जी ने जन्म लिया ,और उनको राम ,राघव रघुवंशी आदि नामों से संबोधित किया गया । 

राम की महत्ता,राम के बिना सृष्टि की कल्पना ही नहीं की जा सकती ,

राम आखिर राम ही क्यों है, क्योंकि राम जी ने बड़े बड़े काम किए , राक्षसों का वध किया ,14 साल वनवास गए, इसलिए  नही , बल्कि इसलिए कि ये सभी कार्य उन्होंने शांत स्वभाव से ,बिना किसी को दोषी ठहराए,बिना क्रोध में आए , और बिना सवाल जवाब के किए थे ,उन्होंने कभी भी अपनी मर्यादा नही भूली ,

चाहे वो बेटे हो, शिष्य हो,भाई हो,या फिर पति कभी भी क्रोध नही  किया , बिना घबराए परस्थिति चाहे कैसी भी रही हो उन्होंने अपनी मर्यादा नही भूली, इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहा जाता है राम जी ने एक नीति अपनाई और अयोध्या नगरी उसी नीति पर चली


रघुकुल रीति सदा चली आई ,

प्राण जाए पर वचन ना जाई 


राम जी को जितना जानते पढ़ते है ,उतना ही कम लगता है रामचरित्र  को दर्शाने वाली  हिन्दी में कम से कम 11, मराठी में 8, बांग्ला में 25, तमिल में 12, तेलुगु में 12 तथा उड़िया में 6 प्रकार की  रामायण मिलती हैं। इसके अलावा भी और भी कई भाषाओं में रामचरित्र का वर्णन किया गया है ।

राम सभ्यता संस्कृति, संस्कारों का एक सुंदर संगम है जिसने राम को जाना ,उसने भ्रात प्रेम को जाना ,वह वो भाई थे जिन्होंने माता केकई जी मुख से सुनते ही की मेरे भरत को राजा बनाया जाए, उन्होंने १४ साल का वनवास स्वीकार कर लिया ,कलयुग में राम जी के चरित्र से सारी बातें सीखी जा सकती है जो व्यक्ति को हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार करती है कैसे थे राम जी।

राम जी एक बेटे के रूप में: राजा दशरथ के चार पुत्र थे जिन में राम जी सबसे बड़े थे ,और अयोध्या के भावी नरेश  होने वाले थे,मगर माता केकई के आदेश का पालन करते हुए उन्होंने राजसिंहासन छोड़ वनवास स्वीकार किया क्योंकि संतान का प्रथम कर्तव्य माता पिता की आज्ञा का पालन करना होता है ,जो राम जी ने बड़े होने के नाते अपना कर्तव्य निभाया और जिको  राजा बनाना था उन्होंने संन्यासी की तरह जीवन व्यतीत किया

रामजी भाई के रूप में: कलयुग जहां भाई भाई को राजपाट के लिए एक दूसरे का कत्ल कर देते है, अहंकार के चलते घरों का बटवारा कर दिया जाता है ,वहीं  राम जी  जब भाई भरत उन्हें वापिस अयोध्या लेने आए तो उन्होंने माता-पिता की आज्ञा को ही सर्वोपरि रखा और राजपाट भरत को ही सौंप दिया और एक आदर्श भाई होने जा कर्तव्य का निर्वाह किया ,जबकि भरत जी ने जब वनवास की बात सुनी तो उन्होंने अपनी माता केकई को ही दोषी ठहराया मगर राम जी ने उनको समझाया भाई माता की गलती नहीं है ये होनी है जो हो कर रहेगी है और  पुत्र होने के नाते मेरा कर्त्तव्य बनता है और मैं उसका पालन जरूर करूं।

राम जी एक मित्र के रूप में एक मिसाल कायम की : राम जी ने मित्र ,सखा के रूप कर्तव्य का निर्वाह किया ,और सभी परेशानियों का सामना करते हुए , उन्होंने केवट ,सुग्रीव,और विभाषण से सच्चे दिल से मित्रता निभाई और अपना वचन पूर्ण किया  ,इस पर एक लाइन याद आती है  ये शब्द केवट निषादराज के शब्द थे 


"तुम आए पार लगाए हम,जब हम आयेंगे घाट तुम्हारे

तब तुम पार लगाना राम "रघुपति राघव राजा राम "


राम जी को क्रोध आया था ,ऐसा बिल्कुल भी नही की राम जी क्रोधित ना हुए हो ,जब राम जी लंका जाने के लिए समुंदर देव से विनती की ओर तीन दिन तक तपस्या 

करते है और समुंदर देव नही माने तब राम जी ने क्रोध वश बाण उठाया और कहा समुंदर देव तुम मुझे नहीं जानते मैं कौन और तुम मुझे अपना हट दिखा रहे हो,मैं तुम्हें एक बाण से ही सूखा देता हूं । समंदर देव की विनती रामचरित्र मानस में 


"सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥।

गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥1॥

इसका अर्थ यह है कि: समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर कहा- हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिए। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है॥1॥

समुंद्र देव ने कहा प्रभु आप जैसा कहेंगे वैसा ही होगा ,मगर इसमें आप की ओर आपकी सेना की बड़ाई नही है , तब सुंदर ने नल नील के बारे में बताया की दोनों भाई जो कुछ सुंदर फेंकेगे वो डूबेगा नहीं इस तरह आप का रास्ता बन जायेगा और मेरा स्वाभिमान भी रह जायेगा तब राम जी अपनी करुणा दिखा कर बाण उत्तर दिशा में पापियों पर चलाया और क्रोध को त्याग दिया ,इस तरह रामसेतु का निर्माण हुआ जो कलयुग में भी रहस्य का विषय बना हुआ है। 

राम जी  भगवान विष्णु जी के अवतार थे एक पल में ही लंका जा कर सीता माता को ले आ सकते थे ,

मगर उन्होंने मनुष्य की भांति अपने आराध्य देव शिव की स्तुति की ओर बालू से  शिव लिंग का निर्माण किया, जो रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग नाम से प्रसिद्ध शिवलिंग है।

राम जी व्यक्तित्व ऐसा था उनके सबसे बड़े शत्रु रावण का भाई विभीषण राम जी के चरणों में आया तो उन्होंने विभीषण की मित्रता भी स्वीकार की ओर सोने की लंका का नरेश बनाने का वचन भी दिया ,राम जी ने सलोचना और मंदोदरी के प्रति मातृभाव सम्मान रखा और अपनी मर्यादा का पालन किया 

राम जी ने हमेशा अपने वचन और मर्यादा का पालन किया ,आज के समय में कोई राम तो नहीं बन सकता पर राम जी का अनुसरण कर राममय हो सकता है राम जी सम्पूर्ण मानव जीवन के लिए एक प्रेरणादायक हैं, और रहेंगे।


"राम दो शब्द है, राम ही है किताब..........

राम सत्य जी जीत,राम अधर्मी का नाश

राम में ही समाई हुई सृष्टि अपार

राम डमरू में है, ध्वनि का प्रलय राग"

धन्यवाद।

डॉ पूजा भारद्वाज

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर 👏👏👏👏

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  2. बहुत सुन्दर आलेख है, बधाई पूजा जी।

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  3. बहुत सुंदर आलेख है भगवान राम पर। वैसे राम को शब्दों में समेटा नहीं जा सकता लेकिन इस आलेख में भगवान राम की महत्ता और उनके मानवीय रूपों का बहुत सुंदर वर्णन, सुंदर शब्दों से सार्थक महिमा और राम की विश्व में महत्वपूर्ण पहचान बतायी गई है। बधाई हो!

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