शनिवार, 13 अप्रैल 2024

सतुआनी-जुड़ शीतल पर्व (13-14 अप्रैल) का आधुनिक-वैज्ञानिक महात्म्य

 

लेखक: डॉ हिमांशु शेखर

 

प्रस्तावना

विश्व आज ग्लोबल वार्मिंग का संज्ञान ले रहा है जबकी बिहार के मिथिलांचल में जुड़ शीतल नाम का लोकपर्व इस को लक्ष्य करते हुए आदिकाल से मनाया जाता है| ये इस बात का प्रतीक है कि हमारी परंपराएँ पृथ्वी के तापमान में वृद्धि को ध्यान में रखकर बनाई गई थी और प्राचीन काल में न सिर्फ इनका ज्ञान हमारे पूर्वजो को उपलब्ध था बल्कि इसका निदान भी इन लोक पर्वो में स्पष्ट दिखता है| जिसतरह छठ में सूर्य की पूजा होती है, चौकचंदा में चाँद की पूजा होती है, जुड़ शीतल का पर्व जल और पर्यावरण के पूजन से संबंधित है| जिसतरह मकर संक्रांति को सर्दी खत्म होने का प्रतीक माना जाता है, उसीतरह जुड़ शीतल को गरमी आरंभ होने का सूचक माना जाता है| इस पर्व की प्रासंगिकता आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यहाँ स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है|

 

दिन निर्धारण

भारत में प्रकृति को पूजने की परंपरा रही है| ऋग्वेद में सूर्य, चाँद, तारे, नक्षत्र आदि को समर्पित श्लोको की भरमार है| जुड़ शीतल भी प्रकृति को समर्पित एक लोकपर्व है| इसे मेष संक्रांति भी कहा जाता है| इस दिन भगवान भास्कर मीन राशि से मेष राशि में कदम रखते है| मकर संक्रांति में सूर्य उत्तरायण होते है और मेष संक्रांति के दिन वो उत्तरायण की आधी परिक्रमा पूरी कर लेते है| इसे बसंत ऋतु की समाप्ति और ग्रीष्म ऋतु का आरंभ भी माना जाता है| विक्रम संवत के अनुसार ये पर्व बैसाख माह के कृष्ण पक्ष की नवमी को मनाया जाता है| अंग्रेजी या रोमन कैलेण्डर के अनुसार इसे हर वर्ष 13-14 अप्रैल को मनाया जाता है|

हर व्यक्ति द्वारा अपनी आस्था, क्षमता और भक्ति के अनुसार इस पर्व को मनाने के कारण इसे लोक पर्व की श्रेणी में रखा गया है| वास्तव में लोक पर्वो की दो श्रेणियां प्रचलित है – लौकिक पर्व और लोकोत्तर पर्व| खाने पीने और मौज मस्ती के साथ प्रदर्शन को ज्यादा महत्त्व देने वाले पर्व लौकिक पर्व कहलाते है – जैसे होली, दिवाली, आदि| लोकोत्तर पर्व में तप, त्याग, उपवास आदि को ज्यादा महत्त्व दिया जाता है – तीज, छठ, आदि| इस दृष्टी से दो पर्वो का ये दो दिवसीय समूह लौकिक पर्व में गिना जाता है| वैसे तो इसमें ज्यादा दिखावा नही होता है पर फिर भी उपवास नही होने के कारण इसे प्रथम श्रेणी में रखना ही उचित लगता है|

 

मनाने की विधि

मेष संक्रांति का, गरमी का स्वागत करता ये पर्व, दो दिनों तक मनाया जाता है| पहले दिन को सतुआनी के रूप में मानते है जबकी अगले दिन को धुरखेल कहते है| इसमें भगवान सूर्य की पूजा होती है, अग्निदेव की पूजा होती है, जल की पूजा होती है – कुल मिलाकर सृष्टि के पंचभूतों में से दो की अराधना इस पर्व में सीधे की जाती है| किसी और पर्व में प्रकृति को, पर्यावरण संरक्षण को इतना महत्त्व नही दिया गया है|

सतुआनी में भोग के रूप में जौ का सत्तू, गुड और आम का टिकोला मिट्टी के पात्र में चढ़ाया जाता है| भोग सूर्य को और अपने कुल देवता को लगाया जाता है| इसी को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते है| इसमें कुछ भी पकाने की जरूरत नही पड़ती| इस दिन तुलसी के पेड़ में जल भरा मिट्टी का एक बर्तन बांधने की परंपरा है| यह तुलसी को गरमी से राहत देता है और साथ ही इससे पितरो की शान्ति को भी जोड़ा जाता है| इस दिन सुबह सुबह बच्चो को सर पर चुल्लू में पानी लेकर थापते है, डालते है, जिससे मन और शरीर शीतल हो|

अगले दिन चूल्हे को विश्राम देना होता है और चूल्हे की पूजा की जाती है| कई घरो में रात भर खाने के सामान बनते है| चुल्हा नही जलने के कारण अगले दिन बासी खाना खाना पड़ता है| इसे बसियोर कहते है| चुल्हा नही जलने के कारण बचे समय को जल संग्रह स्थलों जैसे कुंएं, तालाबो की सफाई में लगाना होता है| जल प्रदूषण के निदान और जल संरक्षण की इतनी सुन्दर व्यवस्था इस पर्व से स्थापित होती है|

क्षेत्र, स्थान आदि में बदलाव के कारण मनाने की विधि में कुछ भिन्नताएं दिखती है| कहा जाता है इस दिन शिकार करने की परंपरा भी थी, जो अब लुप्त हो गई है| कुछ जगहों पर मांसाहार का प्रावधान भी मिलता है, पर चूल्हा नही जलने के कारण दूसरे दिन तो इसकी व्यवस्था असंभव है| शायद सतुआनी वाले दिन वैसा किया जाता होगा| ये सब एक परंपरा का हिस्सा है और इनमें तथ्यात्मक सन्दर्भ नही खोजे जा सकते है| जिस क्षेत्र में ये मनाए जाते है, उस क्ष्रेत्र का निवासी होने के कारण, जो मैंने देखा है, उसका वर्णन मैंने किया है| यह पर्व बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है|

 

आज के परिपेक्ष्य में वैज्ञानिक विश्लेषण

आज विश्व के सामने ग्लोबल वार्मिंग एक बहुत बड़ा मुद्दा है| इस मुद्दे को यह पर्व, ग्लोबल वार्मिंग शब्द की उत्पत्ति के बहुत पहले से हल करने का प्रयास कर रहा है| एक दिन चूल्हा नही जलाना ग्रीन हाउस गैसों को कम करता है| जब ये पर्व बने होगे तब ग्लोबल वार्मिंग इतनी बड़ी समस्या नही थी, तो वर्ष में एक दिन चूल्हा बंद करने पर पृथ्वी के ताप नियंत्रण संभव था| त्वरित औद्योगीकरण के कारण वर्त्तमान काल इस पर्व के परंपरा की आवृत्ति को बढाने की आवश्यकता बताता है| आज इजरायल में ज्यू नियम के हिसाब से सप्ताह का साँतवा दिन (शब्बात) यानी शुक्रवार सूर्यास्त से शनिवार सूर्यास्त तक खाना गर्म करने की मनाही है| इसे बाइबिल के अनुसार आराम का दिन कहा जाता है| जिसको आज समाज एक आवश्यकता के रूप में देखता है, उसे ये पारंपरिक लोकपर्व पता नही कब से अपने में समेटे बिहार में मनाया जाता रहा है| इस लोक पर्व का सबसे बड़ा सन्देश निकटवर्ती जल संग्रह स्थलों जैसे कुंएं और तालाबो की सफाई से है| इससे शुद्ध जल की उपलब्धी बढ़ेगी तथा वैश्विक स्तर पर मौजूद जल संकट से छुटकारा भी मिलेगा|

ये पर्व गरमी के आरंभ का पर्व है| गरमी में लू लगाने की संभावना होती है| निरोग रहने के लिए शरीर को ठंढा रखने की भी जरूरत है| इसलिए इस पर्व का नाम जुड़शीतल अर्थात 'शीतलता से जुड़ो' रखा गया था। मेष संक्रांति के इस पर्व से सत्तू का सेवन आरंभ किया जाता है| सत्तू शरीर को ठंढा रखता है| सत्तू की सबसे बड़ी खासियत ये भी है कि इसको खाने के लिए पकाने की जरुरत नही पड़ती| इससे पकाने में लगे अनावश्यक ताप वर्धन की संभावना भी कंम हो जाती है| साथ ही इसे नमकीन या मीठा, दोनों रूपों में खाया जा सकता है| नमक, गुड, चीनी ये सबके साथ सुसंगत है|

अगर वैज्ञानिक या पौष्टिकता की बात करे तो सत्तू में प्रोटीन, आहार तंतु (फाइबर), कैल्शियम, आयरन, मैगनेशियम और पोटेशियम होते है| ये अपने आप में संपूर्ण आहार होता है| ये शरीर को ठंढक देता है और ऊर्जा बढाने में भी मदद करता है| ये वजन भी नियंत्रित करता है और पाचन क्षमता बढाता है| ये कोलेस्ट्राल, शर्करा, रक्तचाप, आदि नियंत्रित करता है| ये गरमी में लू से बचाता है, भूख बढाता है और कब्ज को नियंत्रित करता है| वास्तव में गरमी के आगमन का सन्देश देता ये लोकपर्व खाने में परिवर्तन की अपेक्षा रखता है, जो गरमी के अनुरूप शरीर को पोषक तत्व दे और स्वास्थ्य बनाए रखे| अगर कार्बोहाइड्रेट के साथ इसका सेवन किया जाए तो ये एक पूर्ण आहार हो सकता है| इसे शरबत की तरह पी सकते है या खाना के रूप में खा सकते है| इसे खाने योग्य बनाने के लिए सिर्फ जल की जरूरत होती है|

बेसन के बने पदार्थो के प्रयोग का भी इस दिन से आरंभ किया जाता है| इन पदार्थो से बने खाद्य ज्यादा दिनों तक बिना खराब हुए रह सकते है| सत्तू और बेसन के बने पदार्थ एक संकेत है कि गरमी में खाद्य जल्दी खराब हो जाते है और ऐसे पदार्थो का उपयोग किया जाए जो ज्यादा दिनों तक बिना गरम किए रखे जा सके| एक दिन चुल्हा नही जलाना इसी दिशा में एक इशारा भर है|

बच्चो के सर पर पानी डालकर ये बताया जाता है कि शरीर को ठंढा रखने की आवश्यकता है| पानी इसके लिए सबसे अच्छा साधन है| जल का सेवन पेय के रूप में या स्नान के रूप में करना गरमी में आवश्यक है| ताप निवारण के लिए आज भी इसकी उपयोगिता है| कुल मिलाकर ये पर्व मानव को गरमी के अनुरूप अपने को ढालने का प्रतीक है|

 

उपसंहार

हर वर्ष 13-14 अप्रैल को मनाया जाने वाला पर्व, जिसे मेष संक्रांति, सतुआनि, बसियोरा, धुरखेल, जुड़ शीतल, आदि कई नामो से गंगा की तराई वाले बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में मनाया जाता है, कई आधुनिक और वैज्ञानिक सन्देश सामने रखता है:

  1. इसमें ग्लोबल वार्मिंग के निदान का बीज दिखता है|
  2. इससे जल संरक्षण की प्रेरणा मिलती है|
  3. इसमें गरमी के आरंभ से होने वाले खाद्य पदार्थ में परिवर्तन का आभास होता है|
  4. खाना गर्म करने और पकाने को गरमी में कम करना जरूरी कदम है|
  5. इससे शरीर को ठंढा रखने का सन्देश मिलता है|
  6. सत्तू, बेसन जैसे जल्दी खराब न होने वाले खाद्यो की उपयोगिता को बल मिलता है|
  7. लोक पर्व होते हुए भी इसमें वैज्ञानिक, आधुनिक और उपयोगी अनुकरणीय दृष्टांत छिपे है|

धन्यवाद|

डॉ हिमांशु शेखर

12 टिप्‍पणियां:

  1. Logically आप एकदम सही हैं , बहुत ही सुंदर रचना

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    1. शेखर सर, मैं एक संगीतकार हूँ ।मुझे संगीत का कुछ ज्ञान है लेकिन शास्त्र का थोड़ा ज्ञान है ।जितना मैं समझ पाता हूँ ।
      आपका लेखन मुझे बहुत ही अच्छा लगता है बहुत ही उच्च कोटि है ।
      उसमें स्वयं आपके व्यक्तित्व का दर्शन हो जाता है
      जितना यह ज्ञानवर्धक है उतना ही इसका प्रसंग वैज्ञानिक है ।
      आज की नयी पीढ़ी को यह अवश्य पढ़ना चाहिए लेकिन उनको इसके लिए प्रेरित करना और तैयार करना आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है ।
      इस संदर्भ को भी कृपया करके आपके संपर्क में जीतने लोग और ग्रुप के लोग हैं उनके समक्ष रखने की मेरी इच्छा है ।
      मेरी यही इच्छाऔर शुभकामनाओं के साथ - आपका कुशल पाठक
      ९८५००९७५५८/९९६००९३९१० (मुंबई / पुणे)

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    2. धन्यवाद कुशल जी। आपके संगीत का मैं कायल हूँ। आज ये लुप्त होते पर्व इस बात की ओर इशारा करते हैं कि पाश्चात्य सभ्यता की नकल ही नियति बन रहें हैं। हमारे हर पर्व काल, स्थान और संदर्भ के हिसाब से उचित जगह स्थापित थे, पर अब ये विस्मृत होकर गायब हो चुके है। हम अपनी सभ्यता संस्कृति को समझने की जगह उसके आलोचक बनते जा रहें हैं। अपनी जड़ों को भूलकर कोई पेड़ समृद्ध नहीं हो सकता है। आप जैसे सुधि पाठकों से इन पर्वों को आगे प्रचारित करने की अपेक्षा है। आप इसे साझा कर सकते हैं। आत्मिक आभार।

      हिमांशु

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  2. बहुत ही सुन्दर लेख 👌👌👌👌

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  3. बहुत सुंदर ज्ञानवर्धक 👌👌 बहुत बहुत धन्यवाद सर इतना सुंदर लेख शेयर करने के लिए आपकी लेखनी को नमन है 🙏🙏

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  4. एक भूल सी गई परम्परा को बताती आपकी लेखनी को प्रणाम। नई जानकारियों से भरा सारगर्भित आलेख।

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