गुरुवार, 11 अप्रैल 2024

कनपुरिया बौराई यादें

रेखा अस्थाना

हम कनपुरिया हैं  ।जैसा कि आप हमारी बोली से ही समझ जाते होंगे।

हमारी दादी जब कोई  बच्चा शरारत करता था या बेवकूफ़ी करता या उसे कोई  बात समझ न आती थी तो वे कहा करती थी---

"का भइया बौराए गए  हो का"बचपन में तो अनुमान लगा लिया था कि बौराना मतलब पागलपन या पागल हो गए  हो।

    हमारी दादी ने कभी हमसे सीधी बात नहीं कही हमेशा लोकोक्ति या मुहावरे का इस्तेमाल करके ही बात कही।नतीजा दसवीं कक्षा तक हमें ये दोनों चीजे याद नहीं करनी पड़ी।और विशेष योग्यता का विषय हिन्दी ही रहा बोर्ड  से।

अब हम आगे बढ़ते हैं ज्यों ज्यों शिक्षा बढ़ती गई  मैं हर शब्द की उत्पत्ति और व्याकरण  जानने की चेष्ठा करने लगी।तब जाकर पता चला कि बौर मायने कलियाँऔर उसमें नाम धातु लग कर वह बन गया बौराना अर्थात पागलाना या पागलपन।बसंत ऋतु में बहुत से वृक्षों में बौर आते हैं सारे कीट-भृंग पक्षीगण मद- मस्त होकर पगलाए फिरते हैं। तब मुझे  अपनी दादी माँ की याद आई। बसंत ऋतु के मादक बयार में अपने -अपने साथी को ढूंढते फिरते हैं ।और मीठी आवाज से वातावरण को गुंजायमान करते हैं।हमारी आयु वर्ग के लोगों को ही इस बात का पता होगा क्योंकि उन्होंने अमराई देखी है।

अहा! अमराई  के नीचे खाट बिछाकर बैठ कर टप्पकौए आम का स्वाद अगर मालूम है तो वह केवल हमारी आयु के लोग समझते हैं हम लोगों ने ही ही देखा है।

भई आप चाहे कितनी ही बुराई करो कानपुर  की जो मस्ती कानपुर के लोग करते हैं न वह मुझे अन्य कहीं नहीं दिखी।

तो कहने का मतलब ये है कि हमने दादी जी से पाँचवीं कक्षा तक आते आते सारी लोकोत्ति व मुहावरे सब सीख गए। बचपन में हमारे हिन्दी के गुरुजी का इतना अच्छा प्रभाव पड़ा कि मैं हिन्दी की ही अध्यापिका बनी।

गुरुजी का नाम था प॔0 उपदेश नारायण  उपाध्याय 🙏जिन्हें आज तक न भूल पाई हूँ।

  अवसर मिले तो कानपुर अवश्य  घूम आइएगा😊😊


🌳इमली का दरख्त और चने की झाड़ 🌳

     

इमली--यह एक विशाल  ,मजबूत और आर्थिक लाभ  देने वाला वृक्ष  होता है।यह लगभग 20से25वर्षो में फल देने योग्य  होता है।इसका फल खट्टा होता है और चटनी व साॅस बनाने  के काम आता है।इसकी आयु लगभग 200वर्ष की होती है।पर लोग इसे घर के आसपास या घरों में नहीं लगाते हैं।उनका मानना है कि यह जीवन में खटास घोलता है।अंधविश्वासी मानते हैं कि इसमें भूत प्रेत का वास होता है।पर इसके फलों का तो बहुत बड़ा व्यापार होता है।हमें अंधविश्वास की ओर नहीं जाना चाहिए। 

अब हम आगे हैं रबी की फसल चने की  ओर। काले चने जिनका उपयोग इसके अंकुरित होते ही होने लगता है।।इस पौधे की ऊंचाई लगभग एक से डेढ़ फुट की होती है। इसकी मुलायम, स्निग्ध पत्तियाँ लोग चटनी के साथ खाते हैं जिसके बहुत से फायदे हैं।यह पौधा झाड़ नुमा होता है कोमल भी और जब हम किसी ज्ञानी जन की अधिक  तारीफ  करते हैं तो उनको कहते सुना होगा कि हमें चने की झाड़ में मत  चढ़ाइए।

क्यों कि ऐसा हो ही नहीं  सकता है।

इन्हीं काले चने से बेसन भी बनाया जाता है।अब मैं विस्तार में तो नहीं जाऊँगी ।पर हमारी दादी कहा  करती थी,"बहुत इताराए की जरूरत नाहीं है नहीं तो चने की झाड़ पर बैठ  जहीओ।"

अगर कोई  कमी तो क्षमा करिएगा  पाठकगण। 

हम तो बस गुरुजी के आदेश के अनुसार  लिख  लेते हैं बस।कोई खेती बाड़ी तो है नहीं हमारी।पर हमारे समय  की पढ़ाई बहुत उपयोगी थी।😊🌳🦨

धन्यवाद।

रेखा अस्थाना

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह,,,, बहुत सारी बातें याद गईं,,, टप्पकैया आम और भूसे में पकाए गए आमों का मज़ा ही अलग था। बाल्टी में पानी भर कर आम तब तक खाओ, जब तक पीछे से चपत न लगे,,, उठाे,,, कुछ खइहो न का बचुआ?

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  2. बहुत ही सुन्दर 👏👏👏👏

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