बुधवार, 17 अप्रैल 2024

राम नवमी : भगवान राम का जन्मदिन

 

लेखक: डॉ हिमांशु शेखर

जय श्री राम

प्रस्तावना

भगवान श्री राम का जन्म दिन धूमधाम से रामनवमी के दिन पूरे विश्व में मनाया जाता है| रामकथा में भगवान राम को बारह कलाओं से युक्त विष्णु का सातवां अवतार माना जाता है| यह कथा इतने रूपों में धरा पर उपस्थित है कि प्रामाणिकता पर हमेशा सवाल उठते है| पर प्रमाणिकता पर सवाल उठाने से ज्यादा सही ये लगता है कि इस कथा में राम के अवतरण और महात्मय को खोज कर भक्ति का मार्ग स्थापित किया जाए|एक और विसंगति है - जन्मदिन को जयंती कहते है - हनुमान जयंती, सीता जयंती,  महावीर जयंती, गुरू नानक जयंती, गीता जयंती....। तो भगवान श्रीराम के जन्मदिन को राम नवमी की जगह राम जयंती कहना चाहिए। 


आधुनिक गणन के परिणाम

भगवान राम का जन्म 10 जनवरी, 5114 ईसापूर्व को सुबह 12 बजकर पांच मिनट पर हुआ था। यह जानकारी 'यूनीक एग्ज़िबिशन ऑन कल्चरल कॉन्टिन्यूटी फ़्रॉम ऋग्वेद टू रोबॉटिक्स' नाम की एक रिपोर्ट में दी गई है। डॉ॰ वर्तक ने अपने ग्रंथ 'वास्तव रामायण' में ग्रहगतियों के आधार पर गणित करके राम की जन्म-तिथि 4 दिसंबर, 7323 ईसापूर्व बताई है। उनके मुताबिक, इसी दिन दिन में 1:30 से 3:00 बजे के बीच राम का जन्म हुआ होगा। 

इसपर एक पुनरावलोकन किया जा सकता है। वाल्मीकि के अनुसार श्रीराम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी तिथि एवं पुनर्वसु नक्षत्र में जब पांच ग्रह अपने उच्च स्थान में थे तब हुआ था। इस प्रकार सूर्य मेष में 10 डिग्री, मंगल मकर में 28 डिग्री, बृहस्पति कर्क में 5 डिग्री पर, शुक्र मीन में 27 डिग्री पर एवं शनि तुला राशि में 20 डिग्री पर था। (बाल कांड 18/श्लोक 8, 9)।

शोधकर्ता डॉ. पीवी वर्तक के अनुसार ऐसी स्थिति 7323 ईसा पूर्व दिसंबर में ही निर्मित हुई थी, लेकिन प्रोफेसर तोबयस के अनुसार जन्म के ग्रहों के विन्यास के आधार पर 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व हुआ था। उनके अनुसार ऐसी आका‍शीय स्थिति तब भी बनी थी। तब 12 बजकर 25 मिनट पर आकाश में ऐसा ही दृष्य था जो कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित है। ज्यातादर शोधकर्ता प्रोफेसर तोबयस के शोध से सहमत हैं। इसका मतलब यह कि राम का जन्म 10 जनवरी को 12 बजकर 25 मिनट पर 5114 ईसा पूर्व हुआ था।


जन्म की भूमिका

श्री राम का जन्म संतो के उद्धार और दुर्जनों के नाश के लिए हुआ था| उनके जन्म को सार्थक करने के लिए इतनी ज्यादा कथाएँ पंक्तिबद्ध है कि उनको जोड़कर सक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करना भी एक रचना का निर्माण कर सकता है| श्री राम जन्म की सबसे बड़ी आवश्यकता रावण के संहार की थी| स्वर्गाधिपति इंद्र को परास्त कर रावण वास्तव में अपने पुत्र इन्द्रजीत की मदद से विश्व विजयी हो गया था| पर विश्व विजय करना एक सामान्य बात थी, परेशानी इस बात से थी कि वो संतो ऋषियों, मुनियों की तपस्या, यज्ञ, पूजन आदि में अड़चन पैदा करने लगा था| वो अत्याचारी हो गया था और उसको मारने का सामर्थ्य सिर्फ भगवान के अवतार द्वारा ही संभव था| वास्तव में वह भगवान बिष्णु के द्वारपाल जय विजय में से एक का पुनर्जन्म था, जिसे तीन जन्मो तक भगवान के हाथो मरने का शाप मिला था|पिछले जन्म में वो दोनों हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष बन कर पैदा हुए थे और भगवान विष्णु के नरसिंह और वाराह अवतारों द्वारा मारे गए थे। त्रेता में वे रावण और कुंभकर्ण बनकर पैदा हुए थे। द्वापर में कंस और शिशुपाल बनकर पैदा होना था। फिर भगवान के अवतार श्रीकृष्ण द्वारा मरने के बाद तीन जनँम तक भगवान के द्वारा मारे जाने का शाप पूर्ण होना था। 

दूसरा प्रयोजन था मनु और शतरूपा को भगवान द्वारा दिया गया वरदान जिसमें मनु शतरूपा ने वरदान माँगा था कि आपके सामान ही मुझे पुत्ररत्न प्राप्त हो| भगवान ने कहा था कि अपने सामान व्यक्ति खोजने से अच्छा है मै स्वयं आपका पुत्र बनाकर जन्म लूंगा| इस वरदान के फलित होने के लिए भी भवान का अवतार लेना आवश्यक था| त्रेता युग में मनु दशरथ के रूप में और शतरूपा कौसल्या के रूप में धरती पर आई थी|

तीसरी कथा थी नारद के काम-विजय के मिथ्या अभिमान के मोह भंग की| नारद में उत्पन्न मोह के निराकरण के लिए भगवान ने एक राज्य की राजकुमारी के स्वयंवर की माया नारद जी के मार्ग में उत्पन्न की| नारद उस कन्या से विवाह हेतु एक सुन्दर रूप बनाने की प्रार्थना लेकर भगवान के पास गए| उन्होंने ने  माँगा| पर पर्यायवाची शब्द होने के कारण भगवान ने उन्हें वानर का मुख प्रदान कर दिया| स्वयंवर में राजकुमारी ने भगवान का वरण किया| जब नारद जी का भ्रम टूटा तो उन्होंने क्रोध में भगवान को पत्नी विरह का शाप दिया तथा वानर की सहायता से पत्नी मिलन की व्यवस्था होगी ऐसा भी कहा|

एक प्रतापभानु की कथा भी इस सन्दर्भ में दिखती है, पर उसका सूत्र और प्रामाणिकता अन्य श्रोतों में खोजना थोड़ा जटिल है|

 

जन्म का दिन और लीला  

कंब रामायण के अनुसार राम के जन्म के समय मेष (चैत्र) मास था, नवमी तिथि थी, नक्षत्र पुनर्वसु था, श्रेष्ठ लग्न कर्कटक था| गृह गणना में ग्यारहवे घर में चार ग्रह उच्च स्थानों पर पाए गए| उनके जन्मदिवस का उत्सव बारह दिनों तक चलता रहा और तेरहवे दिन उनका नामकरण गुरु वसिष्ठ ने श्रीराम नाम से किया| कौसल्या ने मेघ और काजल की छटा दिखाने वाले विष्णु को जन्म दिया था|

गिरधर रामायण के अनुसार भगवान राम के जन्म के समय समय मंगलसूचक शब्द हो रहे थे| उनका जन्म बसंत ऋतु के चैत मास की नवमी को मध्यान्ह में हुआ था| उस समय पुष्य नक्षत्र चल रहा था और वो रविवार का दिन था| इसका वर्णन आनंद रामायण ने सारकाण्ड के द्वितीय सर्ग में कुछ इसतरह किया है|

अथ विष्णु चैत्र मासि नवम्यां मध्यमे रचौ |

सूतिकागृह मध्येअथ कौसल्याया: पुरोअभवत ||

चतुर्भुज: पीतवामा मेघश्यामो महाद्युति: ||4||

मराठी का श्री राम विजय रामायण (अध्याय 4) राम भूअवतरण को अलग ढंग से चित्रित करता है |

वशिष्ठ की भविष्यवाणी

शंख चक्र शेष नारायण | चतुर्धा रूपे प्रकाटेल जगजीवन ||

ज्याची कथा ऐकतां पापी जन | उद्धारोनि तरतील || 49 ||

जन्म समय विवरण

बसंत ऋतु चैत्र मॉस | शुक्ल पक्ष नवमी  दिवस ||

सूर्यवंशी जगन्निवास | सूर्यवासरी जन्माला || 54 ||

माध्यान्हा आला चंदाकिरण | पुष्य नक्षत्र साधून ||

अवतरला रघुनन्दन | पूर्ण ब्रह्म जगद्गुरु || 55 ||

 

रंगनाथ रामायण बालकाण्ड के 13वे अध्याय में पहली पंक्ति से राम जन्म का आख्यान शुरू हो जाता है| इसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है – “प्रशंसनीय मधुमास के श्रेष्ठ शुक्ल पक्ष में, पूर्ण नवमी तिथि, बुधवार, पुनर्वसु नक्षत्र में मध्यान्ह के समय ग्रह पचाको के उच्च स्थिति में रहते हुए, गुरु और चन्द्र का योग रहते हुए, ललित कर्क लग्न में, सर्वलिकाधार, जगादेकवीर, इन्द्रादि देवताओं के स्तुत्य, दिव्य लक्षणों से देदीप्यमान, अव्यय, असमान, आर्ट त्रान परायण, भव्य, चिदानंद, परम कल्याण मूर्ति, देवताओं के रक्षक, दीनार्त्तिहरण, गुनू से अलंकृत, महान कीर्तिवान, शेषशायी, श्रीपति, हृषिकेश, कमल-गर्भ के अर्द्धांश के रूप में, काकुत्स्थावंशी, श्रीराम कौसल्या के गर्भ से उत्पन्न हुए|”

गिरधर रामायण के अनुसार भगवान अट्ठारह वर्ष की सांवली मूरत के रूप में चतुर्भुज रूप धारकर प्रकट हुए| शंख, चक्र, गदा और पदम् से युक्त होकर आभूषण, कुंडल, मुकुट भी शोभायमान हो रहा था| उनके रूप पर करोडो कामदेव लज्जित हो जाते थे| पीताम्बर धारी, सुकोमल, रत्न सी कान्ति लिए भगवान में अट्ठारह रेखा कृतियाँ विद्यमान थी| कौसल्या ने ये रूप देखकर उनकी पूजा अर्चना की और राजा दशरथ के राजपुत्र के रूप में प्रकट होने की प्रार्थना की| तब भगवान पालने में छोटे बच्चे के रूप में आकर रोदन करने लगे|

श्री चंद्रा झा कृत मैथिली रामायण के बालकाण्ड में तृतीय अध्याय में हंसगति छंद में राम के प्रादुर्भाव्  का वर्णन मिलता है|

कौशल्या थिकि धनी जनिक सुत भेलाह |

ब्रह्मानंदानंदे दोष दुःख गेलाह || 59 ||

शुक्ल पक्ष नवमी शुभ कर्क्क उदित हित |

मध्य दिवस नक्षत्र पुनार्व्वसु अभिजित || 60 ||

पंचग्रह उच्चस्थ मेशामे दिनकर |

सृष्टि त्रिगुण उतपत्ति  शक्ति कर जनिकर || 61 ||

भगवान के बाल रूप का वर्णन चौपाई छंद में किया गया है|

ई कहि बनला सुन्दर बाल | 

इन्द्रनील छवि नयन विशाल || 82 ||

बाल अरुण तन दिव्य प्रकास | 

जनिकर माया विश्व विलास || 83 ||

कंब रामायण, विचित्र रामायण, जैन रामायण में भगवान के जन्म के समय की रूप सज्जा का वर्णन नही मिलता है|  


प्रामाणिक मान्य संदर्भ

इस आलेख का उपसंहार तुलसीदास जी की रामचरित मानस के बाल काण्ड की चौपाइयो और दोहों से कर रहा हूँ, जो राम जन्म के समय को बताती है और उनके रूप का भी वर्णन करती है| इनमें कौसल्या द्वारा की गई राम जी की आरती “भए प्रगट कृपाला” को हटा दिया गया है| इसमें भी भगवान चतुर्भुज रूप में प्रगट होते है और कौसल्या जी के अनुरोध पर बाल रूप में दिखते है|

जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल |

चार अरु आचार हर्षजुत राम जनम सुखमूल ||190||

नौमी तिथि मधु मास पुनीता | 

सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता ||

मध्य दिवस अति सीट न घामा | 

पावन काल लोक बिश्रामा ||

....

सुर समूह बिनती करि पहुंचे निज निज धाम |

जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम || 191 ||

समापन में वाल्मीकी रामायण के अंश नही उद्धृत करने पर इस आलेख को पूर्ण नही माना जा सकता है| बालकाण्ड के 18वे सर्ग में इसका वर्णन है|

ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतुनां षट समत्ययु: |

ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ |8|

नक्षत्रेअदितिदेवात्ये स्वोच्चसंस्थेषु पंचसु |

ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सा |9|

प्रोद्यमाने जगन्नाथंसर्वलोकनमस्कृतम |

कौसल्याजन्यदरामं दिव्यलक्षणसंयुतम |10|

 

निष्कर्ष

भगवान श्री राम का जन्म चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मध्यान्ह में हुआ था| उस समय पांच ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र उच्च स्थान में विराजमान थे| सूर्य मेष राशि में था और लग्न में चन्द्रमा के साथ वृहस्पति उपस्थित थे| आधुनिक गणना के अनुसार यह संयोग 5114 ईसा पूर्व में संभव है, जो भगवान राम के जन्म का वर्ष माना जा सकता है|

 

आज राम नवमी है और भगवान राम आ गए है | जय श्री राम|

धन्यवाद|

डॉ हिमांशु शेखर

सोमवार, 15 अप्रैल 2024

रामनवमी पर राम नाम

 "राम से विमुख हो तू कहां जायेगा

राम तू राम मैं,राम में ही रम जाएगा "

पूजा 


राम जी को जितना पढ़ते ,जानते है उतना ही कम लगता है ,राम एक शक्ति हैं, राम एक भक्ति है, जिसने राम को जाना ,उसने सब जान लिया , राम अलौकिक हैं ,राम सौंदर्य ,शक्ति और तेज के प्रतीक हैं। त्रेता युग में जन्में राम  कलयुग की पहचान है ,चाहते सब रामराज्य है 


राम दो शब्द है राम ही है किताब

राम जीवन का सार, राम मुक्ति का धाम"

डॉ पूजा भारद्वाज


तो चलो राम जी जानने की कोशिश करते है , हिंदू शास्त्रों ओर पौराणिक कथाओं के अनुसार राम जी भगवान विष्णु जी अवतार थे ,और धरती पर जन्म उन्होंने रावण का वध करने और सभ्यता संस्कृति और मर्यादा का पाठ सीखने के लिए जन्म लिया था ,जबकि राम जी भगवान थे फिर भी उन्होंने सांसारिक तरह से कौशल्या मां की कोख से जन्म लिया ,

अयोध्या के राजा दशरथ के कोई संतान नहीं थी ,जबकि उनकी तीन रानियां थी, कौशल्या,केकई , सुमित्रा 

राजा दशरथ ने एक यज्ञ करने का फैसला लिया और कई  विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों ,महर्षियों पंडितों को बुला कर यज्ञ किया, और ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के साथ यज्ञ की समाप्ति हुई। राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद खीर को अपने महल में ले जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने गर्भधारण किया,इस तरह

हमारे पालनहार राम जी  का जन्म  पावन नगरी अयोध्या में राजा दशरथ जी के यहां  चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को हुआ था ,इसलिए उनके जन्म दिवस के उपलक्ष्य में राम नवमी मनाई जाती है ,

मेरे शब्दों में 


"नदियों में गंगा बड़ी, बड़ा रामेश्वर धाम

अयोध्या बड़ी नगरी , जहां जन्में है श्री राम"


और इस दिन चैत्र मास नवरात्र भी संपन्न होते है ,राम जन्म को गोस्वामी तुलसीदास जी ने कुछ इस तरह वर्णित किया है ,

रामचरित मानस में 

"भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।

हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥

लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।

भूषन वनमाला नयन बिसाला सोभासिन्धु खरारी॥

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।

माया गुन ग्यानातीत अमाना वेद पुरान भनंता॥

करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।

सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रकट श्रीकंता


इस प्रकार राम जी ने जन्म लिया ,और उनको राम ,राघव रघुवंशी आदि नामों से संबोधित किया गया । 

राम की महत्ता,राम के बिना सृष्टि की कल्पना ही नहीं की जा सकती ,

राम आखिर राम ही क्यों है, क्योंकि राम जी ने बड़े बड़े काम किए , राक्षसों का वध किया ,14 साल वनवास गए, इसलिए  नही , बल्कि इसलिए कि ये सभी कार्य उन्होंने शांत स्वभाव से ,बिना किसी को दोषी ठहराए,बिना क्रोध में आए , और बिना सवाल जवाब के किए थे ,उन्होंने कभी भी अपनी मर्यादा नही भूली ,

चाहे वो बेटे हो, शिष्य हो,भाई हो,या फिर पति कभी भी क्रोध नही  किया , बिना घबराए परस्थिति चाहे कैसी भी रही हो उन्होंने अपनी मर्यादा नही भूली, इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहा जाता है राम जी ने एक नीति अपनाई और अयोध्या नगरी उसी नीति पर चली


रघुकुल रीति सदा चली आई ,

प्राण जाए पर वचन ना जाई 


राम जी को जितना जानते पढ़ते है ,उतना ही कम लगता है रामचरित्र  को दर्शाने वाली  हिन्दी में कम से कम 11, मराठी में 8, बांग्ला में 25, तमिल में 12, तेलुगु में 12 तथा उड़िया में 6 प्रकार की  रामायण मिलती हैं। इसके अलावा भी और भी कई भाषाओं में रामचरित्र का वर्णन किया गया है ।

राम सभ्यता संस्कृति, संस्कारों का एक सुंदर संगम है जिसने राम को जाना ,उसने भ्रात प्रेम को जाना ,वह वो भाई थे जिन्होंने माता केकई जी मुख से सुनते ही की मेरे भरत को राजा बनाया जाए, उन्होंने १४ साल का वनवास स्वीकार कर लिया ,कलयुग में राम जी के चरित्र से सारी बातें सीखी जा सकती है जो व्यक्ति को हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार करती है कैसे थे राम जी।

राम जी एक बेटे के रूप में: राजा दशरथ के चार पुत्र थे जिन में राम जी सबसे बड़े थे ,और अयोध्या के भावी नरेश  होने वाले थे,मगर माता केकई के आदेश का पालन करते हुए उन्होंने राजसिंहासन छोड़ वनवास स्वीकार किया क्योंकि संतान का प्रथम कर्तव्य माता पिता की आज्ञा का पालन करना होता है ,जो राम जी ने बड़े होने के नाते अपना कर्तव्य निभाया और जिको  राजा बनाना था उन्होंने संन्यासी की तरह जीवन व्यतीत किया

रामजी भाई के रूप में: कलयुग जहां भाई भाई को राजपाट के लिए एक दूसरे का कत्ल कर देते है, अहंकार के चलते घरों का बटवारा कर दिया जाता है ,वहीं  राम जी  जब भाई भरत उन्हें वापिस अयोध्या लेने आए तो उन्होंने माता-पिता की आज्ञा को ही सर्वोपरि रखा और राजपाट भरत को ही सौंप दिया और एक आदर्श भाई होने जा कर्तव्य का निर्वाह किया ,जबकि भरत जी ने जब वनवास की बात सुनी तो उन्होंने अपनी माता केकई को ही दोषी ठहराया मगर राम जी ने उनको समझाया भाई माता की गलती नहीं है ये होनी है जो हो कर रहेगी है और  पुत्र होने के नाते मेरा कर्त्तव्य बनता है और मैं उसका पालन जरूर करूं।

राम जी एक मित्र के रूप में एक मिसाल कायम की : राम जी ने मित्र ,सखा के रूप कर्तव्य का निर्वाह किया ,और सभी परेशानियों का सामना करते हुए , उन्होंने केवट ,सुग्रीव,और विभाषण से सच्चे दिल से मित्रता निभाई और अपना वचन पूर्ण किया  ,इस पर एक लाइन याद आती है  ये शब्द केवट निषादराज के शब्द थे 


"तुम आए पार लगाए हम,जब हम आयेंगे घाट तुम्हारे

तब तुम पार लगाना राम "रघुपति राघव राजा राम "


राम जी को क्रोध आया था ,ऐसा बिल्कुल भी नही की राम जी क्रोधित ना हुए हो ,जब राम जी लंका जाने के लिए समुंदर देव से विनती की ओर तीन दिन तक तपस्या 

करते है और समुंदर देव नही माने तब राम जी ने क्रोध वश बाण उठाया और कहा समुंदर देव तुम मुझे नहीं जानते मैं कौन और तुम मुझे अपना हट दिखा रहे हो,मैं तुम्हें एक बाण से ही सूखा देता हूं । समंदर देव की विनती रामचरित्र मानस में 


"सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥।

गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥1॥

इसका अर्थ यह है कि: समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर कहा- हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिए। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है॥1॥

समुंद्र देव ने कहा प्रभु आप जैसा कहेंगे वैसा ही होगा ,मगर इसमें आप की ओर आपकी सेना की बड़ाई नही है , तब सुंदर ने नल नील के बारे में बताया की दोनों भाई जो कुछ सुंदर फेंकेगे वो डूबेगा नहीं इस तरह आप का रास्ता बन जायेगा और मेरा स्वाभिमान भी रह जायेगा तब राम जी अपनी करुणा दिखा कर बाण उत्तर दिशा में पापियों पर चलाया और क्रोध को त्याग दिया ,इस तरह रामसेतु का निर्माण हुआ जो कलयुग में भी रहस्य का विषय बना हुआ है। 

राम जी  भगवान विष्णु जी के अवतार थे एक पल में ही लंका जा कर सीता माता को ले आ सकते थे ,

मगर उन्होंने मनुष्य की भांति अपने आराध्य देव शिव की स्तुति की ओर बालू से  शिव लिंग का निर्माण किया, जो रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग नाम से प्रसिद्ध शिवलिंग है।

राम जी व्यक्तित्व ऐसा था उनके सबसे बड़े शत्रु रावण का भाई विभीषण राम जी के चरणों में आया तो उन्होंने विभीषण की मित्रता भी स्वीकार की ओर सोने की लंका का नरेश बनाने का वचन भी दिया ,राम जी ने सलोचना और मंदोदरी के प्रति मातृभाव सम्मान रखा और अपनी मर्यादा का पालन किया 

राम जी ने हमेशा अपने वचन और मर्यादा का पालन किया ,आज के समय में कोई राम तो नहीं बन सकता पर राम जी का अनुसरण कर राममय हो सकता है राम जी सम्पूर्ण मानव जीवन के लिए एक प्रेरणादायक हैं, और रहेंगे।


"राम दो शब्द है, राम ही है किताब..........

राम सत्य जी जीत,राम अधर्मी का नाश

राम में ही समाई हुई सृष्टि अपार

राम डमरू में है, ध्वनि का प्रलय राग"

धन्यवाद।

डॉ पूजा भारद्वाज

शनिवार, 13 अप्रैल 2024

सतुआनी-जुड़ शीतल पर्व (13-14 अप्रैल) का आधुनिक-वैज्ञानिक महात्म्य

 

लेखक: डॉ हिमांशु शेखर

 

प्रस्तावना

विश्व आज ग्लोबल वार्मिंग का संज्ञान ले रहा है जबकी बिहार के मिथिलांचल में जुड़ शीतल नाम का लोकपर्व इस को लक्ष्य करते हुए आदिकाल से मनाया जाता है| ये इस बात का प्रतीक है कि हमारी परंपराएँ पृथ्वी के तापमान में वृद्धि को ध्यान में रखकर बनाई गई थी और प्राचीन काल में न सिर्फ इनका ज्ञान हमारे पूर्वजो को उपलब्ध था बल्कि इसका निदान भी इन लोक पर्वो में स्पष्ट दिखता है| जिसतरह छठ में सूर्य की पूजा होती है, चौकचंदा में चाँद की पूजा होती है, जुड़ शीतल का पर्व जल और पर्यावरण के पूजन से संबंधित है| जिसतरह मकर संक्रांति को सर्दी खत्म होने का प्रतीक माना जाता है, उसीतरह जुड़ शीतल को गरमी आरंभ होने का सूचक माना जाता है| इस पर्व की प्रासंगिकता आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यहाँ स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है|

 

दिन निर्धारण

भारत में प्रकृति को पूजने की परंपरा रही है| ऋग्वेद में सूर्य, चाँद, तारे, नक्षत्र आदि को समर्पित श्लोको की भरमार है| जुड़ शीतल भी प्रकृति को समर्पित एक लोकपर्व है| इसे मेष संक्रांति भी कहा जाता है| इस दिन भगवान भास्कर मीन राशि से मेष राशि में कदम रखते है| मकर संक्रांति में सूर्य उत्तरायण होते है और मेष संक्रांति के दिन वो उत्तरायण की आधी परिक्रमा पूरी कर लेते है| इसे बसंत ऋतु की समाप्ति और ग्रीष्म ऋतु का आरंभ भी माना जाता है| विक्रम संवत के अनुसार ये पर्व बैसाख माह के कृष्ण पक्ष की नवमी को मनाया जाता है| अंग्रेजी या रोमन कैलेण्डर के अनुसार इसे हर वर्ष 13-14 अप्रैल को मनाया जाता है|

हर व्यक्ति द्वारा अपनी आस्था, क्षमता और भक्ति के अनुसार इस पर्व को मनाने के कारण इसे लोक पर्व की श्रेणी में रखा गया है| वास्तव में लोक पर्वो की दो श्रेणियां प्रचलित है – लौकिक पर्व और लोकोत्तर पर्व| खाने पीने और मौज मस्ती के साथ प्रदर्शन को ज्यादा महत्त्व देने वाले पर्व लौकिक पर्व कहलाते है – जैसे होली, दिवाली, आदि| लोकोत्तर पर्व में तप, त्याग, उपवास आदि को ज्यादा महत्त्व दिया जाता है – तीज, छठ, आदि| इस दृष्टी से दो पर्वो का ये दो दिवसीय समूह लौकिक पर्व में गिना जाता है| वैसे तो इसमें ज्यादा दिखावा नही होता है पर फिर भी उपवास नही होने के कारण इसे प्रथम श्रेणी में रखना ही उचित लगता है|

 

मनाने की विधि

मेष संक्रांति का, गरमी का स्वागत करता ये पर्व, दो दिनों तक मनाया जाता है| पहले दिन को सतुआनी के रूप में मानते है जबकी अगले दिन को धुरखेल कहते है| इसमें भगवान सूर्य की पूजा होती है, अग्निदेव की पूजा होती है, जल की पूजा होती है – कुल मिलाकर सृष्टि के पंचभूतों में से दो की अराधना इस पर्व में सीधे की जाती है| किसी और पर्व में प्रकृति को, पर्यावरण संरक्षण को इतना महत्त्व नही दिया गया है|

सतुआनी में भोग के रूप में जौ का सत्तू, गुड और आम का टिकोला मिट्टी के पात्र में चढ़ाया जाता है| भोग सूर्य को और अपने कुल देवता को लगाया जाता है| इसी को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते है| इसमें कुछ भी पकाने की जरूरत नही पड़ती| इस दिन तुलसी के पेड़ में जल भरा मिट्टी का एक बर्तन बांधने की परंपरा है| यह तुलसी को गरमी से राहत देता है और साथ ही इससे पितरो की शान्ति को भी जोड़ा जाता है| इस दिन सुबह सुबह बच्चो को सर पर चुल्लू में पानी लेकर थापते है, डालते है, जिससे मन और शरीर शीतल हो|

अगले दिन चूल्हे को विश्राम देना होता है और चूल्हे की पूजा की जाती है| कई घरो में रात भर खाने के सामान बनते है| चुल्हा नही जलने के कारण अगले दिन बासी खाना खाना पड़ता है| इसे बसियोर कहते है| चुल्हा नही जलने के कारण बचे समय को जल संग्रह स्थलों जैसे कुंएं, तालाबो की सफाई में लगाना होता है| जल प्रदूषण के निदान और जल संरक्षण की इतनी सुन्दर व्यवस्था इस पर्व से स्थापित होती है|

क्षेत्र, स्थान आदि में बदलाव के कारण मनाने की विधि में कुछ भिन्नताएं दिखती है| कहा जाता है इस दिन शिकार करने की परंपरा भी थी, जो अब लुप्त हो गई है| कुछ जगहों पर मांसाहार का प्रावधान भी मिलता है, पर चूल्हा नही जलने के कारण दूसरे दिन तो इसकी व्यवस्था असंभव है| शायद सतुआनी वाले दिन वैसा किया जाता होगा| ये सब एक परंपरा का हिस्सा है और इनमें तथ्यात्मक सन्दर्भ नही खोजे जा सकते है| जिस क्षेत्र में ये मनाए जाते है, उस क्ष्रेत्र का निवासी होने के कारण, जो मैंने देखा है, उसका वर्णन मैंने किया है| यह पर्व बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है|

 

आज के परिपेक्ष्य में वैज्ञानिक विश्लेषण

आज विश्व के सामने ग्लोबल वार्मिंग एक बहुत बड़ा मुद्दा है| इस मुद्दे को यह पर्व, ग्लोबल वार्मिंग शब्द की उत्पत्ति के बहुत पहले से हल करने का प्रयास कर रहा है| एक दिन चूल्हा नही जलाना ग्रीन हाउस गैसों को कम करता है| जब ये पर्व बने होगे तब ग्लोबल वार्मिंग इतनी बड़ी समस्या नही थी, तो वर्ष में एक दिन चूल्हा बंद करने पर पृथ्वी के ताप नियंत्रण संभव था| त्वरित औद्योगीकरण के कारण वर्त्तमान काल इस पर्व के परंपरा की आवृत्ति को बढाने की आवश्यकता बताता है| आज इजरायल में ज्यू नियम के हिसाब से सप्ताह का साँतवा दिन (शब्बात) यानी शुक्रवार सूर्यास्त से शनिवार सूर्यास्त तक खाना गर्म करने की मनाही है| इसे बाइबिल के अनुसार आराम का दिन कहा जाता है| जिसको आज समाज एक आवश्यकता के रूप में देखता है, उसे ये पारंपरिक लोकपर्व पता नही कब से अपने में समेटे बिहार में मनाया जाता रहा है| इस लोक पर्व का सबसे बड़ा सन्देश निकटवर्ती जल संग्रह स्थलों जैसे कुंएं और तालाबो की सफाई से है| इससे शुद्ध जल की उपलब्धी बढ़ेगी तथा वैश्विक स्तर पर मौजूद जल संकट से छुटकारा भी मिलेगा|

ये पर्व गरमी के आरंभ का पर्व है| गरमी में लू लगाने की संभावना होती है| निरोग रहने के लिए शरीर को ठंढा रखने की भी जरूरत है| इसलिए इस पर्व का नाम जुड़शीतल अर्थात 'शीतलता से जुड़ो' रखा गया था। मेष संक्रांति के इस पर्व से सत्तू का सेवन आरंभ किया जाता है| सत्तू शरीर को ठंढा रखता है| सत्तू की सबसे बड़ी खासियत ये भी है कि इसको खाने के लिए पकाने की जरुरत नही पड़ती| इससे पकाने में लगे अनावश्यक ताप वर्धन की संभावना भी कंम हो जाती है| साथ ही इसे नमकीन या मीठा, दोनों रूपों में खाया जा सकता है| नमक, गुड, चीनी ये सबके साथ सुसंगत है|

अगर वैज्ञानिक या पौष्टिकता की बात करे तो सत्तू में प्रोटीन, आहार तंतु (फाइबर), कैल्शियम, आयरन, मैगनेशियम और पोटेशियम होते है| ये अपने आप में संपूर्ण आहार होता है| ये शरीर को ठंढक देता है और ऊर्जा बढाने में भी मदद करता है| ये वजन भी नियंत्रित करता है और पाचन क्षमता बढाता है| ये कोलेस्ट्राल, शर्करा, रक्तचाप, आदि नियंत्रित करता है| ये गरमी में लू से बचाता है, भूख बढाता है और कब्ज को नियंत्रित करता है| वास्तव में गरमी के आगमन का सन्देश देता ये लोकपर्व खाने में परिवर्तन की अपेक्षा रखता है, जो गरमी के अनुरूप शरीर को पोषक तत्व दे और स्वास्थ्य बनाए रखे| अगर कार्बोहाइड्रेट के साथ इसका सेवन किया जाए तो ये एक पूर्ण आहार हो सकता है| इसे शरबत की तरह पी सकते है या खाना के रूप में खा सकते है| इसे खाने योग्य बनाने के लिए सिर्फ जल की जरूरत होती है|

बेसन के बने पदार्थो के प्रयोग का भी इस दिन से आरंभ किया जाता है| इन पदार्थो से बने खाद्य ज्यादा दिनों तक बिना खराब हुए रह सकते है| सत्तू और बेसन के बने पदार्थ एक संकेत है कि गरमी में खाद्य जल्दी खराब हो जाते है और ऐसे पदार्थो का उपयोग किया जाए जो ज्यादा दिनों तक बिना गरम किए रखे जा सके| एक दिन चुल्हा नही जलाना इसी दिशा में एक इशारा भर है|

बच्चो के सर पर पानी डालकर ये बताया जाता है कि शरीर को ठंढा रखने की आवश्यकता है| पानी इसके लिए सबसे अच्छा साधन है| जल का सेवन पेय के रूप में या स्नान के रूप में करना गरमी में आवश्यक है| ताप निवारण के लिए आज भी इसकी उपयोगिता है| कुल मिलाकर ये पर्व मानव को गरमी के अनुरूप अपने को ढालने का प्रतीक है|

 

उपसंहार

हर वर्ष 13-14 अप्रैल को मनाया जाने वाला पर्व, जिसे मेष संक्रांति, सतुआनि, बसियोरा, धुरखेल, जुड़ शीतल, आदि कई नामो से गंगा की तराई वाले बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में मनाया जाता है, कई आधुनिक और वैज्ञानिक सन्देश सामने रखता है:

  1. इसमें ग्लोबल वार्मिंग के निदान का बीज दिखता है|
  2. इससे जल संरक्षण की प्रेरणा मिलती है|
  3. इसमें गरमी के आरंभ से होने वाले खाद्य पदार्थ में परिवर्तन का आभास होता है|
  4. खाना गर्म करने और पकाने को गरमी में कम करना जरूरी कदम है|
  5. इससे शरीर को ठंढा रखने का सन्देश मिलता है|
  6. सत्तू, बेसन जैसे जल्दी खराब न होने वाले खाद्यो की उपयोगिता को बल मिलता है|
  7. लोक पर्व होते हुए भी इसमें वैज्ञानिक, आधुनिक और उपयोगी अनुकरणीय दृष्टांत छिपे है|

धन्यवाद|

डॉ हिमांशु शेखर

गुरुवार, 11 अप्रैल 2024

कनपुरिया बौराई यादें

रेखा अस्थाना

हम कनपुरिया हैं  ।जैसा कि आप हमारी बोली से ही समझ जाते होंगे।

हमारी दादी जब कोई  बच्चा शरारत करता था या बेवकूफ़ी करता या उसे कोई  बात समझ न आती थी तो वे कहा करती थी---

"का भइया बौराए गए  हो का"बचपन में तो अनुमान लगा लिया था कि बौराना मतलब पागलपन या पागल हो गए  हो।

    हमारी दादी ने कभी हमसे सीधी बात नहीं कही हमेशा लोकोक्ति या मुहावरे का इस्तेमाल करके ही बात कही।नतीजा दसवीं कक्षा तक हमें ये दोनों चीजे याद नहीं करनी पड़ी।और विशेष योग्यता का विषय हिन्दी ही रहा बोर्ड  से।

अब हम आगे बढ़ते हैं ज्यों ज्यों शिक्षा बढ़ती गई  मैं हर शब्द की उत्पत्ति और व्याकरण  जानने की चेष्ठा करने लगी।तब जाकर पता चला कि बौर मायने कलियाँऔर उसमें नाम धातु लग कर वह बन गया बौराना अर्थात पागलाना या पागलपन।बसंत ऋतु में बहुत से वृक्षों में बौर आते हैं सारे कीट-भृंग पक्षीगण मद- मस्त होकर पगलाए फिरते हैं। तब मुझे  अपनी दादी माँ की याद आई। बसंत ऋतु के मादक बयार में अपने -अपने साथी को ढूंढते फिरते हैं ।और मीठी आवाज से वातावरण को गुंजायमान करते हैं।हमारी आयु वर्ग के लोगों को ही इस बात का पता होगा क्योंकि उन्होंने अमराई देखी है।

अहा! अमराई  के नीचे खाट बिछाकर बैठ कर टप्पकौए आम का स्वाद अगर मालूम है तो वह केवल हमारी आयु के लोग समझते हैं हम लोगों ने ही ही देखा है।

भई आप चाहे कितनी ही बुराई करो कानपुर  की जो मस्ती कानपुर के लोग करते हैं न वह मुझे अन्य कहीं नहीं दिखी।

तो कहने का मतलब ये है कि हमने दादी जी से पाँचवीं कक्षा तक आते आते सारी लोकोत्ति व मुहावरे सब सीख गए। बचपन में हमारे हिन्दी के गुरुजी का इतना अच्छा प्रभाव पड़ा कि मैं हिन्दी की ही अध्यापिका बनी।

गुरुजी का नाम था प॔0 उपदेश नारायण  उपाध्याय 🙏जिन्हें आज तक न भूल पाई हूँ।

  अवसर मिले तो कानपुर अवश्य  घूम आइएगा😊😊


🌳इमली का दरख्त और चने की झाड़ 🌳

     

इमली--यह एक विशाल  ,मजबूत और आर्थिक लाभ  देने वाला वृक्ष  होता है।यह लगभग 20से25वर्षो में फल देने योग्य  होता है।इसका फल खट्टा होता है और चटनी व साॅस बनाने  के काम आता है।इसकी आयु लगभग 200वर्ष की होती है।पर लोग इसे घर के आसपास या घरों में नहीं लगाते हैं।उनका मानना है कि यह जीवन में खटास घोलता है।अंधविश्वासी मानते हैं कि इसमें भूत प्रेत का वास होता है।पर इसके फलों का तो बहुत बड़ा व्यापार होता है।हमें अंधविश्वास की ओर नहीं जाना चाहिए। 

अब हम आगे हैं रबी की फसल चने की  ओर। काले चने जिनका उपयोग इसके अंकुरित होते ही होने लगता है।।इस पौधे की ऊंचाई लगभग एक से डेढ़ फुट की होती है। इसकी मुलायम, स्निग्ध पत्तियाँ लोग चटनी के साथ खाते हैं जिसके बहुत से फायदे हैं।यह पौधा झाड़ नुमा होता है कोमल भी और जब हम किसी ज्ञानी जन की अधिक  तारीफ  करते हैं तो उनको कहते सुना होगा कि हमें चने की झाड़ में मत  चढ़ाइए।

क्यों कि ऐसा हो ही नहीं  सकता है।

इन्हीं काले चने से बेसन भी बनाया जाता है।अब मैं विस्तार में तो नहीं जाऊँगी ।पर हमारी दादी कहा  करती थी,"बहुत इताराए की जरूरत नाहीं है नहीं तो चने की झाड़ पर बैठ  जहीओ।"

अगर कोई  कमी तो क्षमा करिएगा  पाठकगण। 

हम तो बस गुरुजी के आदेश के अनुसार  लिख  लेते हैं बस।कोई खेती बाड़ी तो है नहीं हमारी।पर हमारे समय  की पढ़ाई बहुत उपयोगी थी।😊🌳🦨

धन्यवाद।

रेखा अस्थाना

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

पाथेय

 सरोजिनी चौधरी

  ईश्वर ने जब पृथ्वी पर सब प्रकार के जलचर,नभचर एवं थलचर जीवों का निर्माण किया तब सोचा कि किसी ऐसे जीव की सृष्टि करनी चाहिए जो इन समस्त जीवों पर नियंत्रण रख सके।अतः उन्होंने अपनी असीम शारीरिक,मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों का समावेश कर अपने जैसे जीव का निर्माण किया और उसे पृथ्वी पर राज्य करने के लिए भेज दिया।

    अब ईश्वर का सर्वोत्कृष्ट प्राणी होने के कारण मनुष्य का संकल्प भव्य है।मनुष्य को परमेश्वर ने यह शक्ति दी है जिसके द्वारा वह नीर-क्षीर विवेक कर सकता है।उसके मानस जगत में एक ऐसे दिव्य ज्ञान का अस्तित्व है और वह है अन्तरात्मा।

   दूसरों के साथ बुराई करने को हम पाप कहते हैं परन्तु यही नियम स्वयं के साथ भी लागू होता है । जब हम अपने साथ बुरा बर्ताव करते हैं तब भी पाप करते हैं ।अतः स्वयं से यह प्रतिज्ञा करें कि सदा अपनी भलाई की बात करेंगे।अपना सम्मान स्वयं करेंगे और भविष्य के लिए उत्कृष्ट चित्र स्थापित करेंगे।

    जब व्यक्ति दृढ़तापूर्वक स्वयं से कहता है कि मैं एक साधारण व्यक्ति नहीं हूँ,शुद्ध आत्मस्वरूप शक्ति का पुंज हूँ, महान तेजस्वी,पूर्ण प्रतिभावान हूँ,शरीर नहीं,जीव नहीं 

परम आत्मा का स्वरूप हूँ।मैं अपनी शारीरिक ,मानसिक शक्तियों का स्वामी हूँ तब ऐसे आत्म संकेतों से सुप्त शक्तियाँ जागृत होने लगती हैं।

     मन में यह विचार आना चाहिए कि मैं ईश्वर का अंश हूँ।मुझसे श्रेष्ठ जीव संसार में दूसरा कोई नहीं है।आत्म-ज्ञान के दिव्य स्वरूप को प्रकाशित करने से मस्तिष्क मानसिक दासता से मुक्त हो जाता है ।मन का प्राण आत्मा है और इसमें प्रवेश करने से संशय,भ्रम और भय -भ्रांति के जाल से हमारा मन मुक्त हो जाता है।यदि जीवन को वास्तव में उपयोगी बनाना है तो कमज़ोर भावनाओं को त्याग कर्तव्य की ओर ध्यान दें और इन्हें पूर्ण करने में संलग्न हो जायें।अब प्रश्न उठता है कि कर्तव्य कौन से हैं जिन्हें पूरा करना है-

  पहला कर्तव्य शरीर की सही देखभाल करना है।इस अनमोल मशीन के उपयोग में कितनी सावधानी की आवश्यकता है,यह हम सब अच्छी तरह जानते हैं।शरीर के उपरांत अपनी मानसिक शांति को स्थिर रखने का सतत प्रयत्न करना चाहिए।

      प्रश्न उठता है कि हम आगे कैसे बढ़ें? हमारी उन्नति का उद्गम स्थान हमारी आत्मा है।यदि अपनी आत्मा में भटकते हुए मन को इष्ट भावना पर आरूढ़ कर लिया तो कार्य अत्यन्त सुगम हो जाएगा।हमारा एक-एक विचार हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करता है।जैसा हम सोचते-विचारते और बोलते हैं,जैसी भावनाओं में निरंतर रमण करते हैं,उसी के अनुसार हमारा पथ प्रशस्त होता है।अतः आन्तरिक  ईश्वरीय शक्तियों के विकास की आवश्यकता है ।

   इसके लिए कुछ उपाय निम्नलिखित हैं-

१ सद् ग्रन्थों का अध्ययन 

२महापुरुषों की जीवनी,उनके भाषण और प्रवचन 

३ संसार का भ्रमण और क्रियात्मक अनुभव 

४ समाज में रह कर ज्ञान प्राप्त करना

५ बातचीत,लेखन तथा कहानी एवं लेख के द्वारा 

   मार्ग थोड़ा कठिन अवश्य है पर प्रयत्न करते रहने से सब संभव हो जाता है।हमारी दुर्बलताएँ हमें इस पथ पर चलने नहीं देतीं ,मन बार-बार विद्रोह करता है,कारण हैं हमारी पंचेन्द्रियाँ ।

   पंच इन्द्रियों को देह रूपी रथ को खींचने वाला अश्व माना गया है।आत्मा उस रथ में सवार है।रथी को ध्येय पर ले जाने के स्थान पर ये अश्व विषयों की खाई में ला गिराते हैं ।अतः इनको वश में करके नियत मार्ग पर चलाने के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है।

    भगवान कृष्ण ने गीता में इन्द्रियों को नियंत्रित करने के विषय में अर्जुन को समझाते हुए कहा है कि यद्यपि मन वायु की भाँति चंचल है और उसको नियंत्रित करना कठिन है फिर भी निरंतर अभ्यास और दृढ़ निश्चय के द्वारा इसे वश में किया जा सकता है।

    अतः निरंतर अभ्यास करें,अपने अंदर जो ईश्वरीय शक्तियाँ हैं उन्हें बाहर आने दें,यही दैवी संपदा है जिसके बल पर आप कल्याणकारी मार्ग के अनुयायी हो सकते हैं।

धन्यवाद।

सरोजिनी चौधरी

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

सीता जी के जन्म संदर्भो का विश्लेषण

 लेखक: डॉ हिमांशु शेखर

दिनांक 22 मार्च 2024 को रामायण रिसर्च काउंसिल की ओर से माता सीता के प्राकट्य क्षेत्र सीतामढ़ी में 55 एकड़ में मंदिर और 251 फीट ऊँची प्रतिमा स्थापित करने का समाचार दिया गया। माता सीता को भगवती के रूप में बताया गया है, जबकि माता सीता को महालक्ष्मी का रूप माना जाना चाहिए। 

राम कथा को समेटे विभिन्न प्रामाणिक ग्रंथो में राम की अर्धांगिनी सीताजी के जन्म के संबंध में अलग अलग राय व्यक्त किए गए है| समय के प्रवाह के हिसाब से सीताजी के जन्म के समय का सही उल्लेख ठीक से नही मिलता है| साथ ही, जन्म स्थल का भी स्पष्ट सूचक नही उपलब्ध है| इस आलेख में सीता जी के जन्म स्थल, जन्म के समय और पूर्व जन्म के संदर्भो के आलोक में पौराणिकता को अक्षुण्ण रखते हुए तथ्यात्मक विश्लेषण का प्रयास किया गया है| इसमें कोई निष्कर्ष नही है, सिर्फ एक मत है, सिर्फ आधुनिक समाज के लिए एक व्याख्या प्रस्तुत की गई है|

 

वाल्मीकि रामायण:

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 66वें सर्ग में राजा जनक सीता जी के जन्म के बारे में ब्रह्मर्षि विश्वामित्र को बताते है|

न्यासभूतं तदा न्यस्तमस्माकं पूर्वजे विभौ।

अथ मे कृषतः क्षेत्रं लांगलादुत्थिता ततः॥ १३॥

क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता।

भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा॥ १४॥

वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा।

भूतलादुत्थितां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम्॥ १५॥

 

उनके अनुसार यज्ञ के लिए भूमि निर्माण का काम हल चला कर करने का वर्णन है| साथ ही सीताजी जी के भूमि से उत्पन्न होने का जिक्र है, उन्हें भूमिजा कहा गया है, अयोनिजा कहा गया है| नामकरण के सन्दर्भ में लिखा है कि हल से जोतने पर जमीन पर बनी रेखा (क्यारी) को सीता या हराई (कही कही सीताजी को हरजाई देवी भी कहा जाता है, जो माता लक्ष्मी का रूप है) कहा जाता है| इसी जमीन पर बनी पंक्ति के कारण सीता नाम दिया गया था| ऐसा भी वर्णित है कि राजा जनक ने सीताजी को वीर्यशुल्का कहा है, अर्थात जिससे परिणय के लिए पराक्रम प्रदर्शित करना पड़े| जो प्रचलित कथाएँ है उससे कई जगह पर वाल्मीकि रामायण अलग कथा देता है| कुछ तथ्य द्रष्टव्य है|

1.    भूमि शोधन का कार्य यज्ञ के लिए था, न कि किसी अकाल के निवारण के लिए|

2.    भूमि शोधन के स्थल की जानकारी नहीं दी गई है|

3.    सीता जी जनक और सुनयना की पुत्री नही थी|

4.    सीता जी जमीन से उत्पन्न हुई थी|

5.    सीता जी का नाम जोती गई जमीन पर बनी रेखाओं (जिन्हें सीता या हराई कहा जाता है) से प्राप्त होने के कारण सीता पडा|

6.    सीता जी के जन्म की तारीख या समय का पता नही चलता है| 

परन्तु इंटरनेट पर कई विद्वान् वाल्मीकि रामायण का नाम लेकर कुछ अन्य कथा ही कहते रहते है|

 

श्रीरामचरितमानस:

श्रीरामचरित मानस में कही भी सीता जी के जन्म का सीधे उल्लेख नही है| उनके लिए प्रयुक्त उपमाओं से थोड़ी बहुत जानकारी मिल सकती है| बालकाण्ड से कुछ द्रष्टव्य दृष्टांत अवलोकनार्थ नीचे है:

जनकसुता जग जननि जानकी। 

अतिशय प्रिय करुना निधान की।। : 1/18

अर्थात, जनकसुता-मांडवी, जगजननि-श्रुतिकीर्ति, जानकी-उर्मिला और अतिशय प्रिय- रामबल्लभा सीताजी हैं| इस व्याख्या या अनुवाद पर भी कुछ मतभेद है, क्योकि जानकी से सीता जी का भी बोध एक मान्य अवधारणा है| इस व्याख्या की जगह ये भी माना जा सकता है कि चारो उपमाएं सीताजी के लिए ही हो|

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।

सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्।  सोपान 1/ श्लोक 5

अर्थात सीता जी को ब्रह्म की तीन क्रियाओं उद्भव, स्थिति, संहार, की संचालिका तथा आद्याशक्ति, शुभ करने वाली, दुःख हराने वाली, तथा राम की पत्नी कहकर उनके सामने नत होने की बात की गई है|

तात जनक तनया यह सोई। 

धनुष जग्य जेहि कारन होई।। 231/1

अर्थात, यह धनुष यज्ञ जिनके कारण हो रहा है, वो जनकतनया है|

इन सबमें सीता जी के बारे में न जन्म का दिन या समय बताया गया है, न जन्म स्थान का वर्णन है, न जन्म के बारे में कोई जानकारी है|

 

रामकथा के अन्य सन्दर्भ:

ब्रह्मवैवर्त पुराण में भगवती सीता जी के पूर्वजन्म का वर्णन है| कुशध्वज नामक राजा ने कठिन तपस्या द्वारा भगवती लक्ष्मी को प्रसन्न किया| धन धान्य से परिपूर्ण होने के साथ साथ माता लक्ष्मी ने पुत्री के रूप में उसकी साध्वी पत्नी मालावती की कोख से जन्म लिया| वो कन्या सूतिका गृह से ही स्पष्ट स्वर में वेद के मंत्रो का उच्चारण करते हुए उठ खडी हुई| इसलिए उनका नाम वेदवती रखा गया| भगवान नारायण की प्राप्ति के लिए वो वन की ओर तपस्या के लिए चल दी| बहुत तपोबल एकत्र होने के बाद भी, अगले जन्म में ही भगवान श्रीहरि को पति रूप में पाने की आकाशवाणी हुई| पर उसकी तपस्या जारी रही| इसी समय रावण उधर से गुजरा और उसपर मोहित होकर उसका शृंगार खंडित करने की चेष्टा करने लगा| तपोबल से वेदवती ने रावण को स्तंभित कर दिया| तब रावण ने उनका मानस स्तवन किया| वेदवती ने परलोक में उसकी स्तुति का फल मिलना स्वीकार किया| साथ ही उसे शाप दिया – “तू मेरे लिए ही अपने बंधू बांधव सहित काल का ग्रास बनेगा| तेरे द्वारा काम भाव से स्पर्श के कारण मै अपने इस शरीर का त्याग करती हूँ|” वेदवती ने अपना शरीर त्याग दिया और अगले जन्म में वो जनक की कन्या हुई, जिसका नाम सीता था| सीता जी के जन्म स्थान और काल के बारे में यह पुराण कोई जानकारी नही देता है|

श्री विष्णु पुराण भी सीता जी के जन्म के सन्दर्भ में कुछ भी प्रामाणिक नही दे पाता है| इसके चतुर्थ अंश के चतुर्थ अध्याय में संक्षेप में राम कथा दी गई है| और उसमें सीता के जन्म को खोजना बहुत ही मुश्किल है| उसमें लिखा है – “जनकगृहे च माहेश्वरं चापमनायासैनैव बभंज सीतान्चायोनिजां जनकराजतनयां वीर्य्यशुल्कां लेभे|42|”

यहाँ सीताजी को अयोनिजा तो कहा गया है, पर जन्म की विधि नही दी गई है| साथ ही वीर्यशुल्का अर्थात परिश्रम कर, सामर्थ्य दिखला कर, पराक्रम कर पत्नी रूप में प्राप्त करने का वर्णन भी है| एक और उपमा भी है – जनक राज तनया अर्थात राजा जनक के तन से उत्पन्न| पर यह उपमा अन्य विशेषणों के साथ अपवादस्वरूप लगती है| सीता जी को राजा जनक के तन से उत्पन्न होने को अयोनिजा और वीर्यशुल्का दोनों गलत ठहराते है|

अद्भुत रामायण का उल्लेख अनुसार सीता राजा जनक की अपनी पुत्री नहीं थीं। धरती के अंदर छुपे कलश से प्राप्त होने के कारण सीता खुद को पृथ्वी की पुत्री मानती थीं। ‘अद्भुत रामायण’ में उल्लेख है कि रावण कहता है कि- “जब मैं भूलवश अपनी पुत्री से प्रणय की इच्छा करूँ, तब वही मेरी मृत्यु का कारण बने।” रावण के इस कथन से ज्ञात होता है कि सीता रावण की पुत्री थीं। ‘अद्भुत रामायण’ में उल्लेख है कि गृत्स्मद नामक ब्राह्मण लक्ष्मी को पुत्री रूप में पाने की कामना से प्रतिदिन एक कलश में कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूंदें डालता था। एक दिन जब ब्राह्मण कहीं बाहर गया था, तब रावण इनकी कुटिया में आया और यहाँ मौजूद ऋषियों को मारकर उनका रक्त कलश में भर लिया। यह कलश लाकर रावण ने मंदोदरी को सौंप दिया। रावण ने कहा कि यह तेज विष है। इसे छुपाकर रख दो। मंदोदरी रावण की उपेक्षा से दुःखी थी। एक दिन जब रावण बाहर गया था, तब मौका देखकर मंदोदरी ने अपनी मृत्यु के लिए कलश में रखा रक्त पी लिया। इसके पीने से मंदोदरी गर्भवती हो गयी, जिससे सीताजी का जन्म लिखा गया है|

इस कथा का सन्दर्भ देकर कई विद्वान वेदवती को रावण और मंदोदरी की पुत्री के रूप में जन्म लेना बताते है| पर वेदवती के शाप में रावण की मृत्यु का कारण बनाना लिखा है, रावण की पुत्री बन कुल का नाश करना नही लिखा है| ये जोडी गई कथाए है| उसमें वेदवती के शाप को बदला गया है, पुत्री पर मोहित होने पर रावण की मृत्यु का वरदान ब्रह्मा जी से मिलना बताया गया है, मंदोदरी का रक्त पीने से गर्भवती होना बताया गया है, सीताजी को मंदोदरी की पुत्री बताया गया है, आदि| ये सब तंत्र साधना या पैशाचिक कथा का भाग हो सकते है, और आधुनिक काल में लिखे होने के कारण ये अनावश्यक भ्रामक प्रचार भर रह जाता है| अदभुत रामायण सही मायने में अद्भुत है और राम - कथा को विकृत कर देता है|

आध्यात्म रामायण/बालकांड/ सर्ग 6 श्लोक संख्या 59-60, और 65, जनकजी के कथन की ‘वाल्मीकीय रामायण’ से तुलना कीजिए।

यज्ञ भूमि विशुद्ध्यर्थम् कर्षतो लाङ्गलेन मे ।

सीतामुखात्समुत्पन्नाकन्यका शुभ लक्षणा॥

तामद्राक्षमहं प्रीत्यापुत्रिकाभाव भाविताम्।

अर्पिता प्रियाभार्यायै शरच्चन्द्रनिभानना ॥

योगमायापि सीतेति जाता वै तव वेश्मनि।

अतस्त्वं राघवायैव देहि सीता प्रयत्नत: ।॥

अर्थात, सीताजी भूमि शोधन के समय हल के अग्र भाग से उत्पन्न, पुत्रिका भाव से पोषित, योगमाया और रामजी की प्राणबल्लभा हैं।

कंब रामायण सीताजी को लक्ष्मी का अवतार मानता है (बालकाण्ड: अध्याय 10 मिथिला दर्शन पटल)| और सीताजी की उत्पत्ति धरती से यज्ञ के लिए भूमि जोतते समय जुए के फाल से प्रगट होना लिखा है (बालकाण्ड: अध्याय 12 धनुर्भंग  पटल)| रंगनाथ रामायण में यज्ञ के लिए भूमि शोधन करते समय हल की फाल रेखा (जिसे सीता नाम दिया गया है) से एक मंजूषा मिलने का वर्णन है, जिससे अत्यंत प्रभा संपन्न कन्या सीता के निकलने का वर्णन है (बालकाण्ड: 32: शिव धनुष का वृतांत)| प्रेम रामायण सीताजी को भी महत्त्व देता है और उसमें पहला काण्ड है - मिथिला काण्ड| इसमें सीताजी की जन्म तिथि तथा अन्य कई सन्दर्भ भी दिए गए है| जनक जी को पुत्री की अभिलाषा से हल चलाने की प्रेरणा भगवान शिवाजी से मिली|

दोहा 126 के बाद की चौपाई:

शुक्ल नवमि तिथि माधवमासा | 

अभिजित प्रियदिन मध्यप्रकाशा ||

अब नरनाह समय शुभ आवा | 

करहु भूमि करषण सुख छावा ||

इसके बाद हल के एक स्थान पर रुकने का जिक्र है, जहां पर एक प्रकाशमान सिंहासन पर बैठी सीता जी (लक्ष्मी जी की अवतार) का जमीन से ऊपर आने का वर्णन है| इसमें सीताजी की स्तुति (दोहा 130 के बाद) भी दी गई है, जो मुनि, देव और ऋषियों ने की है| फिर राजा जनक को पिता कहना और उनके कहने पर सीताजी का बालरूप में प्रकट होना भी लिखा गया है|

 

विश्लेषण तथा अवलोकन:

सर्वप्रथम जन्म तिथि के संबंध में मनाई जाने वाली जयंतियो से ऐसा प्रतीत होता है कि दो तिथियाँ प्रचलन में है:

  1.    फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी 
  2.             वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी

पहली तिथि को सीता अष्टमी के नाम से जाना जाता है और ऐसा लगता है कि इस दिन माता सीता धरती पर अवतरित हुई थी| दूसरी तिथि सीता नवमी कही जाती है, जिस दिन महाराज जनक को ये प्राप्त हुई थी| इनकी प्रामाणिकता खोजने में बहुत सारी बाधाएँ है| दोनों तिथियों को जानकी जयन्ती के रूप में जाना जाता है| अगर इस कथा पर ध्यान दिया जाए कि खेत में हल चलाते समय या उसकी जुताई करते समय सीता जी हल से बनी दो क्यारियों (जिन्हें सीत भी कहा जाता है) के बीच मिली थी तो हमें भारत में हल चलाने के समय पर ध्यान देना होगा| ऐसा माना जा सकता है कि एक तिथि उनके धरती पर अवतरण को दिखाती है तो दूसरी तिथि राजा जनक द्वारा उनको पाने का दिन बतलाती है|

ग्रीष्मकालीन जुताई रबी मौसम की फसलें कटने के बाद शुरू होती है, जो बरसात शुरू होने पर समाप्त होती है। अप्रैल से जून तक ग्रीष्मकालीन जुताई की जाती है, जहां तक हो सके गर्मी की जुताई रबी की फसल कटने के तुरन्त बाद मिट्‌टी पलटने वाले हल से कर देनी चाहिए। अगर इस तथ्य पर ध्यान दिया जाए, तो सीता नवमी वाला दिन जानकी जयन्ती के लिए ज्यादा उपयुक्त लगता है| प्रेम रामायण इसका सत्यापन भी करता है|

महाराज जनक मिथिला के राजा थे, जिसकी राजधानी जनकपुर (अभी नेपाल में) थी| पर जनकपुर के पहाडी इलाके में हल जोतने का काम संभव नही था| इसलिए वे मैदानी क्षेत्र में आए होंगे| सीतामढी के निकट पुनौरा ग्राम में उन्होंने हल चलाया, जहाँ से उन्हें सीता जी की प्राप्ति हुई| एक सन्दर्भ में जनकपुर से 3 योजन या 40 किलोमीटर दूर हल चलाने का जिक्र है| आज के जनकपुर और सीतामढी में 54 किलोमीटर की दूरी है| सीतामढी को उनके अवतरण और जनक द्वारा पाने का स्थान माना जा सकता है|

अब बच जाती है बात जमीन से उत्पन्न होने की| सभी जीवित प्राणियों को कई भागो में बांटा जाता है – मानस, नादज, बिन्दुज, उद्भिज्ज, जरायुज, अण्डज, स्वेदज| इसमें उद्भिज श्रेणी भूमि से उत्पन्न होती है| इसमें लताए, पेड़, पौधे आदि आते है| माता सीता को भी शायद इसी श्रेणी में रखने की कल्पना की गई है, जिससे सामान्य पिंडजो या जरायुजो से उन्हें अलग दिखाया जा सके|

जिसतरह भगवान श्रीराम प्रकट हुए थे, उसीतरह सीताजी भी प्रकट हुई थी| अगर श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार थे, तो माता सीता लक्ष्मी का अवतार थी| रामायण की तर्ज पर अगर कभी सीतायण लिखी जाएगी (जो प्रेम रामायण में बहुत हद तक सार्थक है) तो शोध द्वारा सीता जी के जन्म पर सही आकलन संभव हो पाएगा| तब तक सभी से ये गुजारिश है कि ‘कहा जाता है’, ‘पौराणिक कथा में लिखा है’, ऐसे वाक्यांशों को जांच करने के बाद ही प्रयोग में लाए| सीता जी के जन्म की गुत्थी एक खुली चुनौती है, जिसके आधुनिक सन्दर्भ में स्थान और समय पर तो सहमति बनाई जा सकती है पर पूर्वजन्म और जन्म की विधि पर प्रामाणिक सन्दर्भ नही उपलब्ध है|

धन्यवाद|

 

डॉ हिमांशु शेखर

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कैसे लिखें, अच्छी कविता..? भाग 02

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